कैसा चमार चूट्टा सा लग रहा है "मुहावरा"

>> 30 April 2009

पता नहीं दोस्तों ये मुहावरा है या लोकोक्ति....पर मैंने अक्सर सवर्ण जाति के इंसान को किसी अपने ही इंसान से बोलते हुए कई बार पाया है ...अगर कोई ज़रा सा गन्दा दिखा या साफ़ सुथरा ना लगा तो अक्सर बोलते देखा है कि कैसा चमार चूट्टा सा लग रहा है .....

"ये लेख लोग पढेंगे जरूर और पढ़कर खिसक भी लेंगे या कुछ कहेंगे कि वाकई कुछ लोगों की मानसिकता बहुत ख़राब है ..लेकिन कोई अपने इस सम्बन्ध में विचार नहीं रखेगा ...कि आखिर क्यों करते हैं ये सब ...किस लिए करते हैं ये सब ...आखिर ये जुमला क्यों बना और आज तक क्यों इस्तेमाल होता है कही न कहीं"

इस बात का क्या मतलब निकाला जाये ...भाई मुझे तो यही समझ आता है कि ....लोगों की जुबान को आदत है ....उन्हें संस्कार में ये बात बताई जाती रही है कि जो भी सबसे गन्दा ...गया गुजरा इंसान हो तो समझ लो वो चमार है .....जो भी बेढंगे से कपड़े पहनता हो ....लाचार सा दिखे ....साफ़ सुथरा न लगे ...तो समझ लो कि वो चमार है ...हाँ यही तो परिभाषा बनायीं गयी होगी ...तभी तो लोग आज भी यही बोलते पाए जाते हैं ...यार वो बड़ा चमार टाइप कपड़े पहनता है ...या चमार चूट्टा दिखता है ...कैसा चमार सा लग रहा है ....

कहने को तो हम सब कब के आजाद हो चुके हैं .... पर क्या कुछ भी कहने को ...बस मुंह खोला और भक्क से उगल दिया ...होना है जो हो हमारी बला से ....भाई हमारा तो मन यही करता है ...यही बात रही है लोगों के मन में ...दिमाग में ...जो भी ये जुमला इस्तेमाल करते आये हैं ...और आज तक कर रहे हैं .....क्यों भाई ...किस लिए ....एक तरफ आप जाति व्यवस्था को ख़त्म करने की बात करते हैं ...ढकोसला दिखाते हैं .... तो आखिर भाई कैसे ख़त्म करना चाहते हो .....क्या यही तरीका है

आज से बीस बरस पहले आर.ई.सी. कुरुक्षेत्र इंजीनियरिंग कॉलेज(R.E.C. Engineering College) में चमारों की खाने की टेबिलें अलग लगती थीं ...हाँ क्योंकि सवर्ण दलित शब्द ठीक से नहीं समझते ...उन्हें उन्हें नहीं पता की दलित समुदाय में ढेर सारी जातियाँ हैं ....वो दलित का मतलब चमार ही समझते हैं .....तो क्यों भला ...किस लिए ....तब भी तो भारत महान था ...लोग महान थे ..नेता महान थे ...सोच भी बदल रही थी ..... जाति व्यवस्था तब भी लोग ख़त्म करने की बात करते थे ....पर खाने की टेबलें अलग लगवाते थे ...हैं न ....सही है जी .....अरे वो तो खुद चमार समुदाय के छात्र आगे आये ....लड़े ...मरे ... और जब एक जाट समुदाय का छात्र मारा गया ...और देखा कि सबके सब चमार एक साथ रहते हैं हर जगह ...और उन्होंने अपने हक़ की लड़ाई लड़ी ....तो टेबलें भी तब से साथ लगने लगी ...

अरे दूर की ही बात क्यों करें ....वर्ष 2005 मेरी अपनी ही क्लास का एक लड़का जिसका नाम में यहाँ नहीं रखना चाहूँगा ...वो एक दलित को चमार -चमार कहकर संबोधित कर रहा .... घृणा भरे अंदाज में .... क्यों भाई ये शब्द क्या मजाक है ...और फिर दूजे कमरे में जाकर ऐसी बातें कर रहे हो कि ..अरे हमने अपने गाँव में चमारों की लड़कियों को "......... " ये करते थे वो करते थे ......जब 4-5 पांच लड़के दलित उर्फ़ चमार इकट्ठे हुए मार पीट करने को को तो वो भागा हुआ एक ब्राहमण के कमरे में छुप गया ...आखिर उस वक़्त उन उलटी सीधी बातों को करने के खिलाफ कोई उच्च जातीय क्यों नहीं आया .... आखिर फिर कैसे ख़त्म करना चाहते हैं जात पात ....

कुछ लोगों का कहना है है कि भाई आरक्षण ख़त्म कर दो ...जात पात अपने आप ख़त्म हो जायेगी .....भाई एक बात बताओ .....आरक्षण के बाद ही जात पात शुरू हुई थी क्या .....या अचानक से जिस दिन आरक्षण ख़त्म होने का ऐलान होगा ...उसी दिन ये मानसिकता ख़त्म हो जायेगी ..." कि कैसा चमार सा लग रहा है "

कुछ का कहना है की आराक्षण की वजह से ही उच्च जाति के लोगों में घृणा भर गयी है ...वो जलते हैं चमारों से ...कि ये तो फायदा उठा रहे हैं ....अरे भाई जब आराक्षण नहीं था ..तब किस बात की घृणा करते थे ....किस लिए शोषण करते थे ...तब कौन सा हक़ छीन लिया था चमारों ने इन सवर्णों का ...अपने आप कुछ नहीं बदला ...बदला है तो खुद दलितों / चमारों ने लड़कर और मिले आरक्षण की सहायता से

जब कभी किसी ट्रेन में बैठे हो ... तो कोई ना कोई उच्च जातीय महानुभाव ये बकते हुए मिल जाएगा ....कि अब तो हीरो बनेंगे ही ये सब ...वो चमरिया मायावती कुर्सी पर जो बैठी है ...इनकी बुआ है ...इनकी बहिन है है ....वगैरह -वगैरह ...इतनी घृणा...भाई वाह ...मान गए उस्ताद ...आपकी बात कि आप जाति प्रथा बंद करना चाहते हैं .....आखिर इस बात का तात्पर्य क्या है .....इस बात का सीधा सीधा तात्पर्य है ...कि मानसिकता क्या है ...सोच क्या है समाज के लोगों की ...समाज की सोच में आज भी कितना बदलाब आया है ...हालात क्या है ...और अगर वो बढ़ रहे हैं तो क्यों ..और कही न कहीं ये सोच की दलित/चमार इतना क्यों बढ़ रहे हैं ....ये सोच भी कहीं न कहीं शामिल है .....

एक रोज़ मेरी ब्राहमण दोस्त बोलती है कि कल तो मैंने अपनी मम्मी को मजाक में बोल दिया मेरी शादी करा दो ....वो बोली लड़का तो मिले ...तो मैंने कहा ...कि किसी चमार चूट्टा से ही करा दो ....चलेगा ...और हंसने लगी ....मैंने कहा जानती हो कि चमार चूट्टा क्या होता है ...बोली नहीं ...तो मैंने कहा फिर ये सब क्यों बोलती हो ...बोलने लगी घर में और आस पास के लोग बोलते हैं तो मैं भी सीख गयी ...फिर मैंने उसे ठीक से समझाया तब उसको बात समझ आई

अभी दो रोज़ पहले की बात है ...दो जाट समुदाय के लोग ...मसखरी के मूड में थे ....एक अपनी कार में बैठा था ...दूसरा अपने अन्य दो दोस्तों से गप्पे लड़ा रहा था ....जो कार में बैठा था ...वो गप्पे लड़ाने वाले से बोलता है ...अबे ओ चमार ...चल बे ....चमार कहीं के चल रहा है कि नहीं ..... वो बोल रहा है क्या है बे ....और फिर जब वो ज्यादा परेशान करता है तो ...वो ईट फेंक कर कार में मार देता है ....वो कहता है कि तेरी इतनी हिम्मत हो गयी ...हाँ हो गयी ...चमार में इतनी हिम्मत आ गयी .....साले चमार ....अभी ले ....वो बोलता है अबे मैं चौधरी हूँ ...जाट ...मुझमें हिम्मत नहीं होगी तो किसमें होगी ...

अब आप इन सब बातों का क्या तात्पर्य लगायेंगे ....इसका क्या हल निकालेंगे .....क्या सोच है ...क्या भावना है ....कहाँ तक जाति प्रथा को ख़त्म कर देने की भावना है ...कहते हैं कि आजकल जाति प्रथा बहुत कम हो गयी है ...लेकिन जब भी प्रेम विवाह की बात आती है ...तब गाडी जाति पर ही आकर रूकती है ...टूटती है ...बिखरती है .....लड़की को लड़के को खूब धमकाया जाता है ...कहीं कहीं लड़के या लड़की की जान पर बन आती है ...अंततः होता क्या है लड़के या लड़की की कहीं और शादी

खासकर लड़कियों में एक आदत देखी है ...वो जब भी किसी लड़के से दोस्ती करती हैं ..और अगर उसमें इंटरेस्ट दिखाती हैं ...तो दूजे ही पल उसकी जाति पूँछने लग जाती हैं ...क्यों भला ...क्या बात है ..भाई दोस्ती तुम जाति से करोगे क्या ...या तुम अपनी शादी का प्लान बना रही हो ....ये फिट कर रही हो कि अगर सवर्ण ही है तो आगे चक्कर चलाया जाय ...नहीं तो छोडो .....वरना जाति पूँछने का क्या औचित्य बनता है ...

मुझसे खुद हर दोस्ती बढाने वाली कुंवारी लड़की ...दोस्ती आगे बढ़ाने से पहले मेरी जाति पूँछने बैठ जाती है ....हाँ भाई देखती होगी ....कि शादी वादी हो भी सकती है या नहीं ...जाति तो मैच करती है ना ...सवर्ण ही है कि नहीं

और हम समाज के लोग कहते हैं कि हम सुधर रहे हैं ...समाज अच्छा हो रहा है ...सोच बदल रही है ....जाति प्रथा की सोच बदल रही है .....फिर इस बनाये हुए मुहावरे का मतलब बताओ "कि कैसा चमार चूट्टा सा लग रहा है "
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वो तेरा ख्वाब था जिसे मैं देखा करता था

>> 29 April 2009

शहर के एक छोर पर बने हुए उस रेस्टोरेंट में बैठा वो खयाली बातें बुन रहा था ....यूँ ही अकेले घंटों बैठे रहना उसे भाता था .... कभी जब यूँ ही दिल करता है ....तो ये फुर्सत के लम्हात बहुत नेक और भले लगने लगते हैं ....पता नहीं आज ये बिन मौसम बरसात कैसे हो चली .....हल्की हल्की बूँदें गिर रही थीं ...कोई उससे बचना चाह रहा था ...तो कोई उन में भीगना .....तभी एक सुन्दर चेहरा ...हँसता खिलखिलाता रेस्टोरेंट में दस्तक देता है .....उसके साथ उसकी सहेली थी ....वो भी कम प्यारी ना थी ....

कॉफी जो अभी अभी उसकी टेबल पर रखी गयी थी ...उसको उँगलियों में फँसा ...उसका एक कतरा गले के नीचे उतारता है .....उसकी नज़र उस खूबसूरत चेहरे पर जाती है ......एक नज़र भर देखने के बाद ...वो नज़र हटा लेता है ....वो ठीक उसके सामने वाली टेबल पर बैठती है ..... ऐसे जैसे की दोनों की निगाहें न चाहते हुए भी टकरा जायें .....

वो एक खूबसूरत सूट पहने थी ..... जिसे देख मानो साफ़ साफ़ झलक रहा था ...कि कोई भी चीज़ बनावटी नहीं .... वो बार बार अपने हाथ में पहने हुए कड़े को घुमाये जा रही थी ...और हंसती खिलखिलाती बातें किये जा रही थी ..... उसकी आँखें भी उसकी बातों के साथ गतिमान होती थी ....ऐसा लगता मानों कि वो भी बातें किये जा रही हों ....बिल्कुल झील की तरह .... उसकी सहली ने भी शायद कॉफी का आर्डर दिया होगा ...तभी वहां दो कॉफी रखी जाती हैं ....एक पल तो लगा कहीं ये रेस्टोरेंट कॉफी के लिए तो नहीं जाना जाता ....

जब वो कॉफी उठा अपने होठों से लगा रही थी ...तभी उसकी निगाहें उस ख्यालों को बुनने वाले से टकराती हैं ...जो ठीक उसकी नज़रों के सामने था ....वो एक पल यूँ ही उसकी आँखों में देखती रहती है ....फिर न जाने क्या सूझती है ....कि दूजे ही पल ...अपनी नज़रों को घुमा कहीं और देखने लगती है .....

वो यूँ ही उस खूबसूरत झील सी आँखों वाली को देखता रहता है ...उसने यूँ इस तरह कभी किसी लड़की की आँखों को लगातार नहीं देखा था ...शायद ये एक इत्तेफाक ही था ...जो बारिश की बूंदों के दरमियान .... झील सी आँखें रेस्टोरेंट के अन्दर हों ....फिर वो खूबसूरत आँखें उसकी आँखों से टकराती हैं .....और दूसरी और देखने लगती हैं ....

फिर ना जाने उसे क्या सूझती है ...वो अपनी जगह अपनी सहेली को बिठा देती है .....उसकी सहेली जो एक्स्ट्रा स्मार्ट थी ....वो एक नज़र देखती है सामने वाली टेबल पर बैठे इंसान को ...और बक बक सी करने लगती है ....शायद कह रही हो कि आजकल के लड़के ...बस ऐसे ही हैं ....लड़कियों को घूरने के आलावा कोई काम नहीं .....चन्द मिनटों में कॉफी ख़त्म हो जाती है ....वो दोनों बाहर जाने लगती हैं .....पर जल्दबाजी में उस खूबसूरत झील सी आँखों वाली का बटुआ गिर जाता है .....जिसे वो जल्दबाजी में ध्यान नहीं देती ....


वो अपनी सीट से उठता है और बटुए को उठा उन्हें देने के लिए बाहर निकलता है ....वो दोनों छाते के अन्दर थीं ...हल्की हल्की बूँदें अब भी पड़ रही थीं ....वो जल्द से जल्द उन्हें बटुआ देना चाह रहा था .....बारिश उसे भिगोये जा रही थी ....वो अपनी रफ्तार तेज करता है .....और उनके पास पहुँच कहता है ...सुनिए ....तभी वो पीछे मुडती हैं ....एक्स्ट्रा स्मार्ट दोस्त बोलती है ...तुम लड़के लोगों के पास और कोई काम नहीं है ....बस लड़कियों का पीछा करना ...वो बात आधी काटता है ...पर मैं ... हाँ तुम कौन से अलग हो ...मुझे पता है वहां रेस्टोरेंट में कैसे टुकुर टुकुर देख रहे थे .....सब पता है .....वो बोला पर मैं आपका ये बटुआ देने आया हूँ ...जो आपका उधर रास्ते में गिर गया था .....ये सुन वो शांत हो गयी ....शायद अपनी बातों पर शर्मा रही थी ....वो खूबसूरत झील सी आँखों वाली थोडा मुस्कुरा जाती है ....बटुआ हाथ में लेते हुए ...थैंक यू ....वो मुस्कुरा जाता है ... वो कुछ और बोलना चाहती है ....इससे पहले वो मुस्कुराते हुए मुड़ता है ...और वापस रफ्ता रफ्ता चल देता है ....उन्हीं अपने ख्यालों में ....वो वहीँ उसी तरह खड़ी रहती हैं ....शायद कुछ कहना चाहती थीं पर ...वक़्त न मिला ....या शायद उसने दिया नहीं .....वो यूँ ही चला जाता है ...बिना कुछ बोले ...बिना कुछ सुने

अगले रोज़ वो एक लाइब्रेरी जाती है ...उसी शहर में बनी शांत ..और दिलचस्प जगह ...जहाँ तमाम विषयों ...विचारों की किताबें थीं ....जहाँ शोर नहीं था ....जहाँ उसकी खुद की पसंद थी ....वो लाइन से लगी लाइब्रेरी की किताबों के दरमियान ...अपनी पसंदीदा किताब खोजने लगती है ....उन्हीं किताबों की लाइन के दरमियाँ ...वो शख्स खडा दिखाई देता है ...वो भी अपनी पसंदीदा किताब खोज रहा होगा शायद ...

वो पलटता है ...तभी दोनों की निगाहें टकराती हैं ...एक पल यूँ ही वो उसकी आँखों में देखती रहती है ....फिर चुप्पी तोड़ बोलती है ...वो कल ...वो कल के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ ....हम लोगों ने बिना सोचे समझे आपको ना जाने क्या क्या बोल दिया ....वो फिर मुस्कुरा जाता है ....कोई नहीं ....कभी कभी हो जाता है ऐसा .... वो भी मुस्कुरा जाती है ....तो आप यहाँ रोज़ आते हैं ....वो हाँ में आँखें झुकाता है ....आपका नाम क्या है ....जी अभिमन्यु .....मेरा नाम नैना है कहकर वो हाथ आगे बढाती है .....अभिमन्यु मुस्कुराकर उससे हाथ मिलाता है ....तभी वहां सीट से चुप रहने का संकेत आता है ..... वो किताब लेकर बाहर चल देता है ..... वो बाहर जाकर अभिमन्यु से पूंछती है ... आप कल आयेंगे .....वो हाँ मैं सर हिलाता है ...और मुस्कुराता हुआ चल देता है
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दास्तान-ए-मोहब्बत बोले तो 'लव स्टोरी'

>> 27 April 2009

बिल्कुल सर्द मौसम ....ठंडी ठंडी हवा चल रही थी .....पर ऐसे में भी उसका दिल जल रहा था ....ये शायद चौथी सिगरेट होगी.... जिंदगी में पहली बार पी रहा था ....फिर भी किसी ऐसे इंसान की तरह ....जिसे सिगरेट की लत हो ..... उसका कलेजा तो जैसे जला जा रहा था .... हाँ आज उसके लिए सब कुछ ख़त्म था ....आज वो इसे कहकर गयी थी कि वो अपने माता- पिता के खिलाफ नहीं जा सकती .....हाँ वो जिसे उसने बहुत चाहा.....पर आज उसे लग रहा था कि उसकी जिंदगी का मकसद जैसे ख़त्म हो गया हो .....आज वो कसम खा कर आया था ...जैसे कि आज आखिरी रात है .....कल सवेरा किसे देखना है ....

कुछ सोचते हुए वो अगली सिगरेट जला लेता है ..... तभी पीछे की बैंच से आवाज़ आती है .... आप क्या यहाँ से दूर हटके सिगरेट पी सकते हैं .... मैं काफी देर से बर्दाश्त कर रही हूँ ...और आप हैं कि धुंआ उडाये जा रहे हैं .... आदित्य पीछे मुड़कर देखता है ....एक खूबसूरत चेहरा सामने था ....गौर से उसके चेहरे को देखता है ....तभी वो बोलती है जी आपसे ही कह रही हूँ ....

आदित्य का ध्यान टूटता है ...ओह माफ़ कीजिये ...मैंने ध्यान ही नहीं दिया ....हाँ आप क्यों ध्यान देने लगे ....आपको तो ये भी ध्यान नहीं कि ये रेलवे स्टेशन है ...और देर रात को आप सिगरेट पी रहे हैं ...आपको मालूम होना चाहिए ....कि सिगरेट पीना मना है ...ये नियम है. नियम तो बहुत बने हैं ...तो क्या सब माने जाते हैं ...या ये हमारा सभ्य समाज मानता है ....आदित्य बोला ..आज ये आदित्य नहीं उसके अन्दर भरा हुआ गुस्सा बोल रहा था ...इसके साथ ही वो सिगरेट फेंक देता है .....और अपनी बैंच पर सर झुका कर बैठ जाता है ....शायद उसे इंतजार था ...आने वाली ट्रेन का ....उसे खुद भी नहीं पता था कि ...आज क्या होगा .....

क्या आपको पता है कि ये ट्रेन कितनी देर में आएगी ...पीछे से फिर एक आवाज़ आती है .... जी नहीं ...मुझे नहीं पता ....आदित्य बोला. आप हमेशा ऐसे ही गुस्से में रहते हैं क्या ....लड़की बोली ...आदित्य कुछ नहीं बोलता ....शांत , चुपचाप.....खुद से बेखबर .....इतनी सर्द ....कपकपा देने वाली हवा ...और उस पर सिर्फ एक पतली शर्ट ही पहन कर ही तो निकला था ....खुद को संभालता हुआ .....वो बैंच पर से उठा और चहल कदमी करने लगा .....उसे कुछ सूझ नहीं रहा था

तभी आने वाली ट्रेन की खबर दी जाती है ....आवाज़ आती है ....कि फलां स्टेशन से चलकर फलां स्टेशन को जाने वाली गाड़ी प्लेटफोर्म नंबर ... पर आएगी ....लड़की अपना सामान समेटने लगती है ....तभी आदित्य वापस आ अपनी बैंच पर बैठ जाता है.... लड़की पूंछती है ...आपको कहाँ जाना है ? ....पता नहीं ...आदित्य बोला.
कमाल है ...जो भी बात पूँछो आपको पता नहीं ....
शायद जब जिंदगी में कोई वजह न रहे कुछ भी पता रखने की .....तो हमे कुछ पता नहीं रहता ...आदित्य बोला
देखिये मैं ये तो नहीं जानती कि आखिर क्या वजह है ....कि आप इतने परेशान हैं .... लेकिन हो सकता है जिंदगी ने आज आपको कुछ भी पता रखने की कोई वजह नहीं छोड़ी हो ....वही आपको वजह भी दे दे .....हाँ यही तो जिंदगी है ....

तभी ट्रेन के आने की आवाज़ आती है ....शोर मचाती हुई ट्रेन प्लेटफोर्म पर खड़ी हो जाती है .... लड़की अपना सामान ले ट्रेन में चढ़ जाती है ....ट्रेन चली जाती है ....आँखों से ओझल होने में कुछ ही देर लगती है .... कुछ सोचते हुए आदित्य उठता है और फिर बैठ जाता है ....सिगरेट निकालता है .....जलाता है और फिर धुंआ उडाता है .....शायद वो अब अगली ट्रेन का इंतजार करेगा ....उसकी जल्दबाजी सिगरेट का पैकेट ख़त्म कर देती है .....अगली ट्रेन आने की खबर दी जाती है .....वो उठता है ....

वो फिर चहल कदमी करने लगता है ....अचानक उसकी नज़र पीछे की बैंच पर पड़ती है ....एक फाइल दिखाई देती है ....वो उसे उठाता है .... उसमे उस लड़की के डिग्री, सर्टीफिकेट थे .....नाम पढता है ...प्रेरणा ...हाँ प्रेरणा नाम था उसका ....क्या अजीब इत्तेफाक है ....वो एक अजीब हंसी हँसता है ....फिर हौले से मुस्कुराता है ....अब फाइल उसके हाथ में है ...वो धीरे धीरे क़दमों से प्लेटफोर्म के अंतिम छोर पर पहुँच जाता है .....फिर पटरियों पर .....ठीक बीचों बीच पटरियों के खडा है .....सामने से कोई रौशनी चमक रही है ....उसकी आँखों को अब कुछ दिखाई नहीं दे रहा ....

आवाज़ और तेज़ आने लगती है ...शायद अब ट्रेन और पास आने लगी ...अचानक से ही वो दूर उछल कर गिरता है ....ना जाने क्यों अब मरने का उसका मन नहीं है .....फिर वो फाइल खोलता है ....फिर बंद करता है .....फिर खोलता है ...पता देखता है .....फिर हौले से मुस्कुराता है ... शायद चन्द पल और जीने की उसे वजह मिल गयी थी ...शायद अब उसे पता था कि अब उसे क्या करना है .....उस लड़की की बातें उसके कानों में गूंजती हैं .....वो फिर सिगरेट की डिब्बी निकालता है ....पर उसमें सिगरेट नहीं ....वो खाली है .....
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हाँ माँ मुझे एहसास है तेरे दर्द का

>> 26 April 2009

माँ तुझे क्या दर्द है ....इसका इल्म है मुझे....तुमने बस बचपन से खोना ही तो जाना है ....बस खोना .....तुमने किया तो सिर्फ त्याग ....हाँ यही तो सिखाया गया था तुम्हें ....जब बचपन के उन सुहाने दिनों में भी ...तुम अपने परों को बांधकर जीती रही होंगी .....जब तुमने अपने ही घर में ...अपने भाई के लिए ढेर सारी कुर्बानियाँ दी होंगी .....हाँ यही तो सिखाया गया होगा तुम्हें .....औरत होना ही कुर्बानी का दूसरा नाम है .....मगर क्यूँ ...तुम हर पल ही सोचा करती होगी ...आखिर औरत ही क्यूँ .....आखिर ऐसा क्या है जो सिर्फ और सिर्फ औरत को ही त्याग की देवी बना दिया गया ....

जब तुम पढना चाहती होगी तब तुम्हें ये कह पढने से रोक लिया गया होगा ....कि भाई का पढना जरूरी है ....तुम्हें तो चूल्हा चौका ही करना है ....खाना ही तो बनाना है ....तुम तुमने खुद से ही सवाल किया होगा ...क्या मैं सिर्फ एक बावर्ची बनने के लिए बड़ी हो रही हूँ ....और आगे चल कर भी सिर्फ और सिर्फ मुझे ही त्याग करना होगा ...अपनी इच्छाओं का ....अपनी भावनाओं का ....मेरा कोई निर्णय नहीं होगा ...इस सम्पूर्ण व्यवस्था में ....हाँ माँ ...तुमने सोचा जरूर होगा ....

फिर जब तुम थोडी बड़ी होने लगी होगी ...तब हर पल ही तुम्हें ये एहसास कराया गया होगा ...कि तुम एक बोझ हो जिसे तुम्हारा बाप जल्दी से जल्दी किसी घर में लादकर पटक आना चाहता है .....नहीं तो तुम्हारी शादी सही उम्र में होती .....हाँ माँ में अब समझता हूँ ...अब में जानता हूँ ...मैं महसूस करता हूँ ....

जब तुम ये सपने संजो कर आयी होगी कि मेरा जीवन साथी मेरे अरमानों का ख़याल करेगा ....तब तुम्हारा दूजे ही दिन ये भ्रम टूटा होगा कि ....एक औरत को लोग क्या समझते हैं .....वो क्या महसूस करते हैं ....हाँ माँ तुम न कहो भी तो क्या ...पर मैं अब समझता हूँ .....तुमने जो महसूस किया होगा तब से अब तक ...वो मैं सिर्फ और सिर्फ समझ ही तो सकता हूँ ....क्योंकि महसूस करने के लिए मुझे स्त्री होना होगा ....जो कि मैं नहीं हूँ

फिर हर पल ही तो इस चलते हुए जीवन के हर कदम पर ...खुद का त्याग ही किया है ...कभी भावनाओं का ....कभी इच्छाओं का ....कभी परिवार की खातिर ...कभी बच्चों की खातिर ...तो कभी उस पति की खातिर ....जिसकी तुम पूजा करती रही हो .....पर क्या दिया उसने तुम्हें ....सिर्फ और सिर्फ लाचारी ....बांध कर रहने की ....खामोश बने रहने की .....बस सिर्फ और सिर्फ उसकी सुनने की ...क्या यही जीवन है ....हाँ माँ मैं अब सोचता हूँ ....अब मैं समझता हूँ ...

तुम जब माँ बनी होगी ...तब भी इस खौफ से दो चार हुई होगी ...कि कहीं तुम्हारा अस्तित्व ..फिर से स्त्री बनकर जन्म न ले ...अगर ऐसा हुआ तो ....ये रहमोकरम करने वाले ...तुम्हें पल पल उलाहना देंगे ...तुम्हारा जीना मुहाल कर देंगे ....तुम्हें पुत्र ही पैदा करने के लिए ...कितना दबाया होगा ...जैसे कि इसके लिए तुम और सिर्फ तुम ही जिम्मेदार हो ....जैसे कि तुम एक मशीन हो ....जिसे पता है कि मुझे क्या पैदा करना है ....हाँ माँ अब मैं सोचता हूँ ये सब ...क्योंकि अब मैं समझता हूँ ..

और जब पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ ....तुम अपने पति को भगवान् मान चुकी हो .....तुम उसे पूजती हो ....तब एक दिन तुम्हें पता चलता है ....वो कहीं और मुंह मारने लगा है ....तुम तब भी शांत रही ....तुमने सोचा कि शायद वो सुधर जाये ...खुद ही संभल जाए ...पर माँ वो ऐसे गिरा कि गिरता ही चला गया .....

फिर तुमने झेली दुत्कार ....उसकी मार ...अत्याचार ...उसकी बेहूदगी ...शोषण ....और अंत में क्या मिला तुम्हें ...इन सबके बावजूद ....क्या ? ...सिर्फ और सिर्फ अकेलापन ....रुसवाई ......जब उसने किसी और का दामन थाम लिया ...तुम्हें छोड़ कर चला गया ...इस जंगल रुपी दुनिया में अकेला ....अपने हिस्से को उसने प्यार का नाम दिया ....और किसी और के साथ घर बसा ...वो गुलछर्रे उड़ा रहा है .....तुम और तुम्हारे बच्चे .....आखिर तुम फिर से उसी राह पर खड़ी हो ...जहाँ से तुमने शुरुआत की थी ....

हाँ माँ में सोचता हूँ .... एहसास को ....तुम्हारी भावनाओं को ....इस पल तुम सोच रही होगी ...कि काश मेरे बाप ने मुझे पढाया होता ...काश यूँ उसने भी मेरे साथ एक बेटे जैसा ही भरोसा किया होता ....मुझे बेटे की तरह ही पला होता ...तब आज मैं यूँ टूटी हुई ..बिखरी हुई न होती ...तब वो आज यूँ मुझ पर हँसता हुआ न चला जाता .....मुझे बेसहारा करके .....तब मैं भी उसे दे सकती वो जवाब ....दिखा सकती कि मैं क्या हूँ ...और क्या कर सकती हूँ ....पर काश कि बचपन में मुझे भी एक बेटे जैसे पाला गया होता ....हाँ माँ में अब समझता हूँ ....हाँ माँ में अब सोचता हूँ

तुम्हें देखा है मैंने पत्थर तोड़ते हुए ...ईटों को ढोते हुए ....बर्तनों को मांजते हुए ....हाँ माँ अब में सब समझता हूँ ....जब इतने सब के बावजूद दोषी तुम्हें ही समझा जाता होगा ....वो इस मर्द समाज का कहना कि ...कहीं न आखिर इसमें ही खोट होगा ....हाँ मैं अब समझता हूँ इस मर्द समाज को .....इन बनाये हुए जंजाल को ....

मैंने देखा है तुम्हारी रोती हुई आँखों को ....तुम्हारी फटी हुई साडी को ....तुम्हारे त्याग को ...तुम्हारे बलिदान को ....मैंने देखा है तुम्हें रातों को जागते हुए ...इस सोच में कि बच्चों को कैसे काबिल बनाया जाये ....कैसे उन्हें पैरों पर खडा किया जाए ...हाँ माँ मैं अब समझता हूँ ...हाँ माँ अब मैं देखता हूँ ..इस समाज को ...इस व्यवस्था को ....

हाँ माँ तुम ही तो हो जिसने सिखाया है ...एक सा फैसला करना ....दोनों को एक समझना ....शिक्षा के महत्व को तुमने ही तो बतलाया है ....हाँ माँ तुमने ही तो इस दुनियां के बारे में बतलाया है ...क्या झूठ है ...क्या है दिखावा .....कैसे लोग करते हैं ढोंग ...खुद को अच्छा जताने का .... हाँ माँ अब मैं सीख रहा हूँ ....तुमसे ....हाँ माँ अब मैं समझता हूँ ....

पर महसूस कर सकती हो तो सिर्फ तुम ...या तुम जैसी कोई एक ....क्योंकि मैं समझ भर सकता हूँ और सोच भर सकता हूँ ....क्योंकि महसूस करने के लिए मुझे तुम बनना पड़ेगा .....जो तुम कभी नहीं चाहोगी .....क्योंकि तुम माँ हो न ..... पर कर सकता हूँ मैं ये ...जो तुमने हमेशा ही मुझे सिखाया है ...कि देना भरपूर प्यार ...और कोई न करना भेद भाव ....बनाना उसे शिक्षित और मजबूत इतना कि दे सके इस दुनिया को जवाब .... अगर जो बनूँ में कभी बेटी का बाप ......
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इसे ख़त मत समझना ...क्योंकि ख़त में तो

>> 23 April 2009


तुम हमेशा कहती थी न कि मैं तुम्हें कभी ख़त क्यों नहीं लिखता ....पता है क्योंकि मुझे कभी तुम से प्यारा ख़त लिखना आया ही नहीं ...सच ही तो है ...तुम जब लिखा करती थी ....तो उस ख़त में वो रात होती थी ....जिसे जुदाई में तुमने मुझसे दूर बिताया होता ....वो ढेर सारी बातें होती ...जो तुम बिस्तर पर करवटें बदलते हुए मुझसे कहना चाहती थीं ...और देखो तुम कितनी खूबसूरती से अपने दिल का हाल बयां कर देती थीं ....सच ही तो है ....तुम्हारे ख़त में सब कुछ होता था ....दर्द, प्यार, एहसास, विरह की वेदना, साथ होने का एहसास, दूरियों का हिसाब किताब .....और तुम्हारी भीनी भीनी सी - मीठी सी मुस्कराहट .....

पता है कल ना जाने इस दिल को क्या सूझी ....दिल के दरमियाँ किसी पुराने ख़त का जिक्र आ गया ....जब हाथ तकिये के नीचे गया तो ...आँखों की नमी फैली हुई दिखी ....नहीं नहीं मैं रो कैसे सकता हूँ ....तुमने मना जो किया था .....फिर ना जाने क्या ख्याल आया .....तुम्हारी वो मासूम सी प्यारी सी जिद पूरी करने को मन किया .....आखिर तुम्हे ख़त लिखना चाहा ....तुम ही तो कहा करती थीं ....कि मुझे कभी ख़त लिखना .....सोचा कि क्या मैं लिख पाउँगा ....फिर ना जाने क्यूँ कदम उस डायरी तक गए और उसके किसी पन्ने पर मेरी कलम रुक सी गयी ....क्या लिखूं ....एहसास ...दर्द...ख़ुशी ....उन पलों की यादें ...मुलाकातें ...मुस्कुराहटें ....भीगी पलकें ....मिलन की ख़ुशी ....या तुम्हें दूर जाते देख ...दिल के टूटने की आवाजें ......क्या लिखूं

शायद तुम सोच रही होगी कितना बुद्धू है ...इसे इतना भी नहीं आता ....याद है तुम्हें जब एक बार तुम मेरे इंतजार में उस पार्क की बैंच पर बैठी थीं ....और मेरे आने पर तुम ने खफा होने का बहाना किया था ....उस रोज़ का दिया हुआ वो गुलाब .....तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद था ना .....कैसे मैं तुम्हें मना रहा था ....और कुछ ना सूझने पर ...तुमने कहा था कितने बुद्धू हो .....मैं तुमसे कभी खफा हो सकती हूँ भला .....और मैं मुस्कुरा दिया था .....

आज मैं अकेला हूँ ....फासले हैं हमारे दरमियाँ ....बस यादें हैं ....तुम्हारी दी हुई चीज़ें ....जो आज भी महफूज़ हैं ....जब दिल भर आता है तो उन्हें निकाल निकाल देखता हूँ ....कल रात को तुम्हारा दिया हुआ वो पहला गुलाब किताबों के दरमियाँ मिला ....वो सूखा हुआ गुलाब भी गीली गीली मुस्कराहट बिखेर रहा था .....जो उस रोज़ तुमने इस गुलाब के साथ मुझे दी थीं .....हाँ वो शर्माना तुम्हारा ....और कहना कि हाँ तुम मुझे बहुत चाहती हो ....कितनी क्यूट लग रही थीं तुम ....और मेरे कहने पर जब तुमने अपनी आँखों से मेरी आँखों में झाँखा था .....उस रोज़ की वो खूबसूरती ......तुम्हारी चाहत आज भी बयां करती है

और तुम्हारे कहने पर ....कि तुम्हें इजाज़त फिल्म बहुत पसंद है ....मैंने जब देखा उसे .....कितनी करीब लगी ....हाँ आज भी जब तब उसे देख लेता हूँ ....पर अब वो रुला देती है .....ना जाने क्यूँ ....पर चन्द रोज़ बाद फिर दिल कहता है ...और फिर देख इन पलकों को भिगोता हूँ .....हाँ मैं खुश तो हूँ .....खुश ही तो हूँ .....

हाँ जानता हूँ कि तुम्हें पसंद है मेरी मुस्कराहट ....मुस्कुराती हुई आँखें ....और वो जो लिखी थीं चन्द नज्में .....पर सच कहूं ....तुम्हारे चले जाने पर जैसे वो सब जाता सा रहा ....वो हंसी ...वो मुस्कराहट ...वो तराने ....सब कुछ .... याद है तुम्हारी कही हुई वो बात .... तुम खुश होती हो ये देख कि मैं खुश हूँ ....मेरी मुस्कराहट पर तुम फ़िदा हो ..... पर सच तुम्हारे कुछ ख़त हंसा देते हैं ....तो कुछ रुला देते हैं ....

उन खतों के दरमियाँ ....तुम्हारी यादें हैं ....ये सोच उन यादों को पढता हूँ ....तुम्हारे होठों की मुस्कराहट ...हर ख़त पर अपना जादू बिखेरे हुए है ....वो तुम्हारे होठों के निशान आज भी वैसे ही हैं .... जैसे इस दिल पर हैं ....पर इसे ख़त न समझना ...क्योंकि ख़त में लिखना होता है हाले दिल ....हर रोज़ के एहसास ....फासलों की कहानी ....यादों की रौशनी ....और भी बहुत कुछ ....तुम्हें तो पता ही है ....कि मैं खुश हूँ तो तुम खुश हो ....तुमने ही कहा था ...तो कैसे लिख दूं फासलों की दास्ताँ ....दिल की कहानी...आँखों का हर रोज़ गीला होना ..इन लबों का सच ....
कैसे धड़कता है अब ये दिल ....कैसे वो सब ख़त ...वो यादें ....रोज़ रोज़ आकर दरवाजा खटखटाती हैं .....हर रोज़ उन्हें साथ लेकर घर से निकलता हूँ ....और रोज़ देर रात ...फिर से एक नयी याद आ जाती है इस जहन में .....

हाँ इसे ख़त मत समझना ....क्योंकि ख़त में तो लिखना होता है .....
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तुमसे पहली मुलाक़ात और तुम्हारी वो मुस्कराहट

>> 22 April 2009

बुझता नहीं चिराग मोहब्बत का
जब से जला है इस सीने में

कमबख्त दिल आज भी उसके नाम पर धड़कता है


कुछ मुलाकातें अपना असर छोड़ जाती हैं ...जो इस दिल पर हमेशा अपना कब्जा किये रहती हैं ....यादें भी ना खूब होती हैं ...बस दिमाग की हार्ड डिस्क में एक बार स्टोर हो जाती हैं ....तो बस हो जाती हैं ...कमबख्त इन्हें फोर्मेट भी नहीं मारा जा सकता ....शायद कहीं तुम अगर मेरी ये बातें सुन रही होगी ...तो बहुत जोरों से हँस रही होगी ....पर सच तुम्हें हँसते देख दिल को सुकून मिलता है ....मुझे तुम्हारी हँसी गिरते हुए झरने सी लगती है ....या उस बच्ची की मुस्कराहट की तरह ....जिसे चोकलेट देने पर वो मुस्कुराती है ...खुश होती है .....बिल्कुल मासूम हँसी ....हाँ तुम तुम ऐसे ही तो मुस्कुराया करती थीं

याद है तुम्हें जब तुम मुझसे पहली बार मिली थीं ....उस रोज़ तुमसे मिलने के लिए क्या नहीं किया था .....तुम भी ना ...जब चलती ट्रेन में तुम्हारा एस.एम.एस. मिला था ...और तुम पुँछ रही थीं ...कि मेरा बोगी नंबर और सीट नंबर क्या है .....और मैं कैसे बिना सोचे समझे ...उस बीच स्टेशन पर उतर गया था ....भोपाल स्टेशन की वो शाम मुझे आज भी याद है ....जब मैं अपना सूटकेस ले बाहर तुम्हारे आने का इंतज़ार करने लगा था ...कि बस तुम अब आओगी ...और तुम्हारे आने पर तुम्हारे मुस्कुराते चेहरे को देख दिल को जो राहत मिलेगी ...वो सचमुच बहुत कीमती होगी ...और कैसे मैंने उस रोज़ अपने सामने से उस ट्रेन को जाने दिया था ...वो ट्रेन जिसमें मेरा रिज़र्वेशन था ....बिना कुछ सोचे समझे

और कैसे जब मैंने तुम्हें फ़ोन किया था ....उस रेलवे स्टेशन के टेलीफोन बूथ से ...और पूँछा था कि तुम आई क्यों नही ...और तुमने कैसे कहा था ...कि वो तो मैंने ऐसे ही पूँछा था ...उफ़ तुम्हारी अदा ...मेरी तो साँस अटक गयी थी .....पर तुम कितनी क्यूट निकली ...तुमने कैसे बहाना बना अगले रोज़ आने का वादा किया था ...सच तुम्हारी वो अदा आज भी मुझे बहुत प्यारी लगती है ....तुम मेरे लिए ...कैसे बिना परवाह किये ...उस बस के लम्बे सफ़र से ...मुझसे मिलने आयीं थी ....उस रोज़ तुम मुझे दिल के बेहद करीब मालूम हुई थीं ...हाँ वो एहसास ही तो है ...जो आज भी जिंदा है

मैं कैसे चश्मा लगाये ...स्टाइल मारता हुआ ...अपनी अटैची पर बैठ तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था ....और जब तुम वहाँ पहुँची थी ...तुम्हारी वो मुस्कराहट ...तुम्हारी वो सादगी ....और तुम्हारे होठों के साथ तुम्हारी वो मुस्कुराती आँखें ...आज भी मेरे जेहन में हैं ....लाख कोशिश करने पर भी पल पल मेरी आँखों के सामने ...तुम्हारी वो आँखें आ जाती हैं ...और दिल को एक सुकून दे जाती हैं ...और कभी कभी इन पलकों को गीला कर जाती हैं

उस रोज़ का दिया हुआ तुम्हारा वो कागज़ मैंने आज भी संभाल कर रखा है ....पता नही क्यों अब वो बहुत कीमती हो गया है ...और सच में उसकी कीमत बढती ही जा रही है .....याद है मुझे जब तुम मेरे सामने बैठी थीं ...कितनी खुश थीं तुम ....आज तक मुझसे मिलकर उतना खुश कोई नही हुआ ...जितना उस रोज़ तुम हुई थीं ....और तुम्हारे माथे पर वो हल्की हल्की बूँदें बहुत प्यारी लग रही थीं ...जो मुझसे मिलने की चाह में ....तुम्हारी जल्दबाजी ने पैदा कर दी थी

और वो मुस्कुराते हुए कहना तुम्हारा कि स्टाइल बहुत मारते हो ....अब तो अन्दर हैं हम ...अब तो चश्मा उतार दो ...और जब मैंने चश्मा उतार दिया था ....तो तुम कैसे शरमा रही थीं ...कैसे बार बार मेरी नज़रों से अपनी नज़रें चुरा चुरा कर ...मेज पर रखे उस फूलदान को देखे जा रही थीं ....और मेरे कहने पर कि क्यों इतनी शरमा रही हो ....तो तुम कैसे शर्माते हुए मुस्कुरायी थीं ....उफ़ तुम्हारी वो मोहक मुस्कराहट कैमरे में कैद कर लेने का मन किया था ....तुम्हें पता है आज भी मेरे दिल की एक अलमारी में वो मोहक मुस्कराहट छुपा कर रखी हुई है ....और दूजी अलमारियों में तुम्हारी तमाम यादें छुपा कर रखे हुए हूँ

और जब तुमने कहा था कि आज की इस मुलाक़ात पर ...कुछ याद रखने वाली बात लिख कर दो ...तुम्हें पता है उस रोज़ की ...मेज से उठाये हुए उस कागज़ पर बनी तुम्हारी पेंटिंग आज भी मेरे पास रखी हुई है ....जब बहुत याद आती है तो उसे देख जी बहला लेता हूँ ....और जब चलते हुए हम दोनों साथ थे ...पता है मुझे किस तरह तुमने मुझे इस बात का एहसास भी नही होने दिया ...और 400 रुपये मेरी जेब में ये कहकर रखे थे कि तुम्हें जरूरत होगी इसकी ...मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पास पैसे ख़त्म हो गए होंगे ....

उस रोज़ जब तुमसे बिछड़ रहा था.... तो सच दिल बहुत जोरों से धड़क रहा था ....पता नही क्यों .....और कैसे मैंने तुम्हारे गालों पर हाथ रख कहा था ....कि अपना ख्याल रखना ...और तुम मुस्कुरा दी थीं ....पता है मुझे तुम्हारे वहाँ से चले जाने पर तुम बहुत रोयी होगी .... जानती हो ....मैं उस मोड़ पर अटैची पर बैठ ...तुम्हारे इन आँखों से ओझल हो जाने तक तुम्हें देखते रहा था ......जब कभी ख्वाबों में खुद को वहीँ उसी मोड़ पर बैठा हुआ देखता हूँ ....
मैं तुम्हें आज भी बहुत याद करता हूँ ....
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बचपन का सपना और 20 रुपये

>> 19 April 2009

कुछ सपने सबसे प्यारे और सबसे नेक लगते हैं ....बिल्कुल ओस की बूंदों की तरह ....नन्ही मुस्कान की तरह ....माँ के दुलार की तरह ....पहले प्यार की तरह ....और मुझे भी बहुत प्यारा था वो सपना ....सच बहुत प्यारा ...एक दम दिल के करीब ...कि जो सच हो जाये तो समझो कि दिल का मयूर नाचने लग जाए

मैं भी कितना पागल था अजीब अजीब से सपने देखने लग जाता था ...कि अगर ऐसा हो जाए तो कैसा हो ....अगर मैं ये कर सकूँ ......तो आह मज़ा आ जाये ..... ऐसे ही मन में एक प्यारी सी ख्वाहिश पैदा हो गयी ....माउथ आर्गन बजाने की .....कि काश मेरे पास माउथ आर्गन हो तो मैं भी बजाना सीखूं .....कितना अच्छा लगेगा ...जब मैं माउथ आर्गन बजाऊंगा .....बस यही सोचते हुए कभी कभी तो दिल घंटो ख़ुशी से झूमता रहता ....

बस एक बार किसी फिल्म में देख लिए किसी को बजाते हुए ....तो हो गए लट्टू ...कि अरे वाह जब वो बजा सकता है तो हम क्यों नहीं .....और ये बात हमारा छोटा भाई बहुत खूब जानता था ...बचपन ....बड़ा ही अजीब होता है ...कैसी कैसी प्यारी प्यारी ख्वाहिशें पैदा कर लेते हैं हम ....मुझे याद है कि बचपन में मेरा छोटा भाई बहुत जिद्दी हुआ करता था ...अगर किसी बात की ठान ले तो मजाल है कि उसे पूरा किये बिना मान जाये ...फिर तो चाहे उसको मार लो पीट लो ...कुछ भी कर लो ...पर वो मानने वाला नहीं ....

मुझे अच्छी तरह याद है कि जब महीने के अंतिम दिन हुआ करते थे ...तो कैसे हाथों को रोक कर मम्मी घर का खर्चा चलाती थीं ....आखिर एक मध्यम वर्गीय परिवार के हालत महीने के अंत में ऐसे ही हो जाते हैं ......एक बार जब स्कूल में मैडम ने रंग लाने के लिए कहा था ...कि अगर अगले रोज़ जो बच्चे रंग नहीं लाये तो ...उसे सजा मिलेगी .....

मेरा छोटा भाई कैसे जिद पकड़ कर बैठ गया था ...कि अगर स्कूल जायेगा तो रंग लेकर जायेगा ...नहीं तो जायेगा नहीं ....उस दिन घर में पैसे नहीं थे ...शायद महीने का अंतिम दिन होगा ....लाख समझाया कि अगले दिन ले देंगे ...पर नहीं जी ...हमारे छोटे भाई नहीं माने ....बात इतनी बढ़ गयी कि पिताजी ने गुस्से में आकर उसकी मार लगा दी ....तब भी वो स्कूल जाने के लिए राजी न हुआ ...तब कहीं जाकर माँ ने अपने संदूक में खोज बीन कर चन्द पड़े हुए सिक्के जमा कर ..उसके रंगों के पैसों का बंदोबस्त किया था .....और मैं बिना रंगों के गया था ....ऐसा था मेरा छोटा जिद्दी भाई ....

पर एक बार की बात है ...जब राम नवमी के दिन थे ....माँ ने हम दोनों को पास के ही भैया के साथ झाँकियाँ देखने भेज दिया था ...माँ ने दोनों भाइयों के लिए कोई 20 रुपये दिए होंगे .....तब मैंने वो अपने छोटे भाई को ही रखने के लिए दे दिए थे ....जब हम वहाँ पहुँचे तो वो अपने दोस्तों के साथ मस्त हो गया ...और मैं उस में रम गया जहाँ लोग अपने अभिनय से लोगों का दिल बहला रहे थे ....मुफ्त में ...शायद कुछ ऐसा रहा हो ....सब कुछ देखने के बाद हम घर वापस आ गए ....

अगले दो रोज़ बाद 10 अक्टूबर को मेरा जन्म दिन था .... घर पर जन्म दिन मनाया गया ....और जब केक काटने के बाद सभी लोग कुछ न कुछ गिफ्ट दे रहे थे ...तब मेरे भाई ने चमकीली पन्नी में लिपटा हुआ एक तौहफा दिया .....और कहा भैया अभी नहीं खोलना ...बाद में खोलना ....मैंने कहा ठीक है ...पर ये तुम लाये कहाँ से .....वो बस मुस्कुरा भर रह गया .....

जब सब कुछ ख़त्म हो गया और सब के जाने के बाद मैंने वो खोला तो उसे देख के मैं उछल पड़ा ...अरे ये तो माउथ आर्गन है .....कहाँ से ...मतलब कैसे लाये तुम ....किसने दिलाया .....मैंने अपने भाई को बोला .....वो बोला उस दिन मैंने पूरे 20 रुपये का यही खरीद लिया था ....उस पल मुझे लगा ...कि हाय ...मेरा जिद्दी भाई भी इस कदर सोच सकता है ...बेचारे ने ना कुछ खाया ...और न ही अपने लिए कुछ लिया ...पूरे के पूरे पैसों से ...अपने इस बड़े भाई के सपने को पूरा करने के लिए सारे के सारे पैसे इसी में खर्च कर दिए ....उस पल मैं बयां नहीं कर सकता कि मुझे कैसा महसूस हो रहा था ...मैंने अपने भाई को बाहों में भर लिया .....सच वो पल भुलाये नहीं भूलता ....

मेरा वो जिद्दी भाई ...मेरा वो प्यारा भाई ....अपनी सभी जिद ताक़ पर रख कर मेरे लिए माउथ आर्गन खरीद लाया .....सच उस पल ऐसा लगा कि ...मेरा सपना कुछ भी नहीं था ... ..उस ख़ुशी के आगे जो मेरे भाई ने उस पल मुझे दी थी .....हाँ मुझे याद है कि मैं माउथ आर्गन तो ज्यादा कुछ खास नहीं सीख सका ....लेकिन हाँ सीटी बजाना इतना अच्छा सीखा ....कि भाई क्या ...सब लोग कहते कि "दिल तो पागल है " का शाहरुख़ खान भी मेरे आगे पानी भरे आकर और कहे कि भाई मुझे ऎसी सीटी बजाना सिखा दो .....सच में बहुत सालों तक सीटी बजायी ....पूरी धुन के साथ ...हर गाने पर .....आज भी जब कभी धुन में होता हूँ तो सीटी बजाने लगता हूँ

फिर वक़्त ने धीरे धीरे मेरे भाई को जिद्दी ना रहने दिया ...अब वो भी समझने लगा था कि ...एक मध्यम वर्गीय परिवार का गुजारा कैसे चलता है .....जिंदगी कैसे जी जाती है ...... हाँ ये जिंदगी ही तो है ...जो इंसान को सब कुछ सिखा देती है .....पर एक बात जो मुझे जिस पल भी याद आ जाती है ...कि किस कदर मेरे भाई ने उस बचपन में भी मेरी चाहत के बारे में सोचा .....सच बहुत प्यार आ जाता है ...मुझे अपने भाई पर .....मेरा वो प्यारा सा जिद्दी सा भाई

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खुदा इस खामोशी की वजह क्या है

>> 16 April 2009

कहते हैं दुआओं में बहुत असर होता है ....और हर सच्ची दुआ और सच्चे दिल से माँगने वाले को तो जन्नत भी नसीब होती है ...ऐसा कहा करते थे ....मैं बचपन में सुना करता था ...ठीक उन प्यारी प्यारी राजकुमारियों की कहानी की तरह .....एक ख्वाब की तरह ...इस दुआ वाली बात को मैंने बिल्कुल सच मान लिया .....ठीक वैसे ही जैसे कि मैं माँ के प्यार को मानता था ....सच ...हाँ बिल्कुल सच मानता था

पर मैं बड़ा होने लगा ...मैंने देखा ....अध नंगे बच्चे, भूख से बिलखते बच्चे ....बेसहारा बच्चे ....भीख मांगते बच्चे ......कूड़े के ढेर में अपना जीवन बिताने वाले बच्चे ...और शायद कूड़े के ढेर पर ही एक दिन मर जाने वाले बच्चे .....तब कभी मैंने पहली बार सच्चे दिल से दुआ माँगी थी.... क्योंकि माँ कहा करती थी ...कि सच्चे दिल से माँगी दुआ पूरी होती है ......माँगी मैंने उनके लिए जिंदगी .....कूड़े के ढेर से अलग जिंदगी ....भर पेट खाने वाली जिंदगी .....शिक्षित जिंदगी ....किसी के प्यार तले जीवन बसर करने की जिंदगी .....पर पता नहीं क्यों ....मुझे हर रोज़ वो उसी कूड़े के ढेर पर ही जमा मिलते .....शायद खुदा को फुर्सत नहीं मिली होगी ....मेरी दुआ पर अमल करने की ....मैंने सोचा शायद मैं क्यू में हूँ .....पता नहीं क्यों विश्वाश था कि सच्ची दुआ तो पूरी होती है .....पर ना जाने क्यों... दो बरस बीत जाने पर भी कुछ न हुआ .....वो बात आज भी खटकती है दिल में ....कि शायद कहीं कोई कमी रह गयी होगी ....जो उस नन्ही सी दुआ का कोई असर ना हुआ ....


फिर कुछ घंटियों की आवाज़ सुनाई देती थी मेरे कानों में ...जब माँ मुझे हर सोमवार मंदिर ले जाया करती थी .....सुनाया करती थी मुझे साथ ले कुछ शंखनाद ...और हर मुंह से निकली तमाम दुआएं ....मैं देखा करता था .....एक लम्बी लाइन .....और अचानक से कार से उतरते वो चमकीले कपडों के अन्दर के सुन्दर चेहरे .....
बाद सबसे आ वो दुआ सबसे पहली माँगा करते थे ....बंद मुट्ठी में पुजारी की ...ना जाने क्या क्या रख जाया करते थे .....चन्द सिक्के जानवरों से लड़ते नंगे भूखे लोगों में उछाल जाया करते थे .....भूख से लड़ते वो नंगे कैसे आपस में भिडा करते थे ....कुछ असहाय और बेसहारा हर बार मुझे वहाँ मिला करते थे ....उनकी वो सूरत मेरी आँखों में समां गयी थी .....

एक रोज़ फिर से मुझमें चाह जागी .....दुआ माँगने की ....कि शायद अर्जियां यहाँ देने से काम बनता हो .....उस रोज़ झुक कर माँ के साथ मैंने भी सर झुकाया था .....पर कई सालों तक भी उसका जवाब मुझे नहीं मिला पाया था ..... जो झुका करते थे सर उनके क़दमों में ....उन गरीबों के लाचारों के ... बेसहारों के ....कोई भी फर्क उनमें नहीं आ पाया था .....

फिर एक रोज़ उस माँ को रोते देखा था मैंने .....हर रोज़ जो सर झुकाया करती थी उसकी चौखट पर .....रखती थी भूखा खुद को ...शायद व्रत कहते थे उसे .....अपनी दुआओं में असर लाने की खातिर... सब कुछ किया था उसने .....उस रोज़ उसके आँसुओं ने एक सवाल जहन में पैदा किया ....कि जो दुआ करते हुए अपनी उम्र गुजार दे ...क्या फिर भी उसकी अर्जियां यूँ ही ठुकरा दी जाती हैं ....उस रोज़ फिर उस माँ की खातिर मैंने एक दुआ माँगी थी .....कि मेरी इस माँ की दुआ कबूल क्यों नहीं कर लेता .....

उस रोज़ अपना सर झुकाया था मैंने ...कहते हैं जिसे खुदा उसको मनाया था मैंने .... कई बरस से जो सवाल रख छोडे थे ...उन्हें दोहराया था मैंने .....उस रोज़ भी खामोश था वो मंदिर ...वो मस्जिद और वो प्रार्थना घर .....
कहीं से कोई जवाब ना पा सका मैं ....उस रोज़ एक माँ के आँसुओं में बहता वो दर्द .....वो कभी न भुला सकने वाला मंजर ....और उस पर भी उस खुदा की खामोशी ...मुझे रास ना आई ....उस रोज़ वो आखिरी दुआ थी मेरी


कभी मिलेगा मुझे खुदा
तो फुर्सत से पूछूँगा उससे
आखिर इस खामोशी की वजह क्या है

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तुम्हारा एक गुमनाम ख़त

>> 15 April 2009

कभी जो उड़ती थी हवाओं के साथ तेरी जुल्फें
तो हवा भी महक जाया करती थी

अब तो साँस लेना भी गुनाह सा लगता है


याद है ना तुम्हे ...जब उस शाम रूमानी मौसम में ....चन्द गिरती बूंदों तले .... और उस पर वो ठंडी ठंडी सर्द हवा .....कैसे तुम्हारी जुल्फें लहरा रही थीं .....सच बहुत खूबसूरत लग रही थीं तुम .... वो बैंच याद है न तुम्हें ....वही उस पार्क के उस मोड़ पर ....जहाँ अक्सर तुम मुझे ले जाकर आइसक्रीम खाने की जिद किया करती थी .....हाँ शायद याद ही होगा ....कितना हँसती थी तुम .....उफ़ तुम्हारी हँसी आज भी मेरे जहन में बसी है ....उस पर से जब तुम जिद किया करती थी .....कि एक और खानी है ...बिलकुल बच्चों की माफिक .....उस पल कितनी मासूम बन जाया करती थीं तुम ....कि जैसे कुछ जानती ही न हो ....पगली कहीं की ....बिलकुल बच्ची बन जाती थी तुम .....

कल शाम उस मोड़ से गुजरा था मैं ....ना जाने क्यों मेरे कदम लडखडा से गए थे ....ना चाहते हुए भी एक पल को थम सा गया था मैं ..... कहीं तुम्हारी याद ना आ जाये ...ये सोच जल्दी से निकल जाना चाहता था...पर सच खुद को रोक ना सका ....ना जाने क्यों कदम रुक गए .....मैं पहली बार तुम्हारे बाद उस पर अकेला बैठा था ....ना जाने क्यों पलकें गीली हो गयी थीं ......


अचानक से ही उस रोज़ पर नज़र गयी मेरी ...जिस रोज़ तुम मुझसे " खुट्टा थी " ....हाँ जब तुम मुझसे बात ना करने की एक्टिंग किया करती थी ...तब तुम यही कहा करती थी ....जाओ मैं खुट्टा हूँ ....कट्टी ..कट्टी ....और मैं मुस्कुरा जाया करता था .....और उस दिन जब दूर दो बच्चे अपनी अपनी बोरी लिए हुए कुछ बीन रहे थे ...कूड़े के ढेर में ...... और दूर अपनी आँखों से आइसक्रीम की तरफ देख रहे थे ....उनकी नज़रें जो आइसक्रीम की चाह रखती थीं ...पर शायद मायूस थी ....तब कैसे तुमने उन्हें पास बुलाया था ....कौन सी आइसक्रीम खाओगे ...तुमने उनसे पूँछा था ...और कैसे वो ना नुकुर सा कर रहे थे .....पर तुमने जब उन्हें आइसक्रीम दिलवाई थी ....और मेरी जेब से पर्स निकाल आइसक्रीम वाले को पैसे दिए थे .....कैसे वो प्यार से निहारते हुए गए थे तुमको .....उस पल तुम उन्हें सबसे प्यारी लगी होगी ....और मुझे भी .....और मैं ने तुम्हारे गले में हाथ डाल कर कहा था .... कितनी क्यूट हो तुम ......

पर आज ये बारिश कुछ अच्छी नहीं लग रही .....वही बूँदें ....वही मौसम है ...पर फिर भी दिल वहीँ खोया सा है ....तुम्हारे नर्म हाथों की गर्मी ...जो आज भी मेरे जेब में रखी हुई है ...सोचता हूँ एक ये गर्मी ही तो है जो आज तक जिंदा है ....बिल्कुल तुम्हारी यादों की तरह ....
अब देखो छाता साथ ना लेकर चलने की बीमारी मुझे आज भी है ....तुम्हें बारिश में भीगने में मज़ा जो आता था ....ना जाने क्यों आज ...जी भर कर भीगने को मन करता है ....मन करता है ये बारिश ना थमे ....या फिर बहा ले जाए मुझे .....अरे नहीं नहीं मैं रो नहीं रहा हूँ ...ये तो बारिश ही है ....हाँ बारिश ही तो है ....तुम भी ना कैसे कैसे वादे ले गयी .....

चन्द रोज़ पहले एक ख़त मेरी किताबों के दरमियाँ मिला .... तुम भी ना ...हमेशा ऐसा ही करती थी ....ख़त लिख कर यहाँ - वहाँ रख छोड़ती थीं .....अब देखो चन्द रोज़ पहले मिला जाकर .....और ये क्या तुम ना फरमाइश बहुत करती हो ...ख़त में भी फरमाइश .....चन्द पल ख़ुशी के मेरी बाहों में ...एक मुट्ठी मेरी मुस्कराहट .....मेरे हाथों की गर्मी .....और वो नज्में जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी खातिर मैंने लिखी .......हाँ पता चला मुझे तुम्हारी ये फरमाइश थी .....पगली सब कुछ तुम्हारा ही तो था .....

तुम भी ना जब से खुट्टा करके गयी हो ...तब से वापस ही नहीं आयीं .... अब चलो बहुत कट्टी कट्टी खेल लिया ...और मैं तो हमेशा की तरह कब से हार मान चुका हूँ ..... हाँ जानता हूँ एक मुट्ठी मुस्कराहट की फरमाइश रोज़ पूरी करनी है मुझे .....पर फिर भी न जाने क्यूँ ये पलकें बार बार गीली हो जा रही हैं ...

अब देखो ये आइसक्रीम भी ....बह ही गयी .....ठीक मेरे आँसुओं की तरह .....

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जिंदगी, संघर्ष और तजुर्बा

>> 13 April 2009

बचपन में जब माँ के प्यार के छाँव तले फिल्म देखा करता था ...तो सब कुछ कितना आसान लगता था .... जब एक बच्चा छोटा है और सड़क पर भागता भागता एकदम से बड़ा हो जाता था ....और एक फिल्म का हीरो बन जाता था ....रईसी ठाट बाट...खुद का कारोबार ...नहीं तो कोई मोटर गैराज ही सही .....उसकी जिंदगी को चन्द पलों में समेट कर रख देते थे ....उसकी जिंदगी के संघर्ष को भी कितनी आसानी से दिखाते थे .....और उसकी जीत तो तय होती थी .....फिल्मों में कितना अच्छा लगता था वो संघर्ष .....हीरो का संघर्ष ....एक अलग छाप छोड़ जाता था ...और मन में और दिल में एक अलग छवि बना जाता था .....कि हीरो तो हर हाल में संघर्ष करके विजय पा ही जाता है .....लेकिन उस संघर्ष की जद्दोजहद को शायद ही कोई महसूस कर सके ...क्योंकि फिल्मों में तो सब बहुत खूबसूरती से फिल्माया जाता है ना ...सब कुछ अच्छा और हसीन लगता है .....

पर कहते हैं न कि अपनी दुनिया और अपनी जिंदगी फिल्मों से परे होती है ...यहाँ सुख और ख़ुशी दो पल की मेहमान होती है ....और एक लम्बी काली रात सा संघर्ष अपने पैर पसारे रहता है .....बिल्कुल थका देने वाला .....हरा देने वाला ...कमजोर कर देने वाला .....तब कोई हीरो याद नहीं आता ....तब लगता है कि जिंदगी और इसको जीने की जद्दोजहद क्या होती है ......सच कितनी अलग है ये जिंदगी .....

जब तक होश सँभालने लायक हुआ तब तक जिंदगी बहुत ठीक सी गुजरी ....जाना ही नहीं कि संघर्ष क्या होता है .....लड़ने की शक्ति कहाँ से आती है .....कहाँ से मिलता है हौसला ......कैसी जीत के लिए दिन रात एक करना होता है ......शायद जब तक नहीं ...जब तक कि उस संघर्ष से सामना नहीं होता ...तब तक हम और हमारा होश किसी खयाली दुनिया में रहता है ......

पर कहते हैं ना कि जब जिंदगी खुद सिखाने पर आती है तो ऐसा सिखाती है कि ......बच्चू पल्ला झाड़ कर ऐसे नहीं जाने दूंगी .....बिल्कुल पक्का बना कर छोडूंगी पत्थर के माफिक .....एक ही पल में होश ठिकाने आ जाते हैं जब पास कुछ नहीं होता ...खुद ही सब कुछ पाना होता है ......कल का पता नहीं होता ...आज की भी फिक्र होती है ....और जिम्मेदारी हो सो अलग .....पर कहाँ सीखा था तब तक मैं ... जब तक मेरा खुद सामना नहीं हुआ था जिंदगी से

याद है मुझे जब एक अंकल के संघर्ष की कहानी मुझे सुनाई जा रही थी ...कुछ सभ्य और बुजुर्ग लोगों के बीच बैठ ......कि वो एक ऐसे इंसान थे जिनके पास एक वक़्त खाने को निवाला नहीं था ...पढाई पूरी करनी थी ....कपडे नहीं थे ....ऐसा कुछ नहीं था कि कह सकें कि हाँ कम से कम मेरे पास ये है जो मुझे नहीं लेना होगा .....पर एक चीज़ थी उनके अन्दर हौसला ....जिंदगी से लड़कर उससे अपना सब कुछ छीन कर ..अपना बना लेने का हौसला और ताकत ...और वो हिम्मत अंत तक डटे रहने की ...

एक रात जब वो भूखे थे तो रिक्शे वालों के पास गए और बोले कि मुझे रिक्शा दे दो चलाने के लिए ...भूख इतनी लगी थी कि पेट को सापी (कपड़े) से बाँध रखा था .....तब रिक्शे वालों ने कहा था कि क्या करते हो ....पढता हूँ ....पर तुम ये सब क्यों .....अंकल के मुंह से निकला था ...कि ये सब न पूँछो ...उन्हें अब भी याद है कि किस तरह वो रात को रिक्शा चलाते थे और दिन में पढने कॉलेज जाते थे .....कॉलेज के साथियों ने जब एक दिन उन्हें देख लिया तब सबने उनकी मदद करनी चाही ...पर उन्होंने मदद न ली ....कहा कि तुम कब तक मदद कर सकते हो मेरी ...ये लड़ाई तो मुझे खुद लड़नी होगी .....आखिर ये संघर्ष ही तो मेरा जीवन है ...मुझे कमजोर मत बनाओ ......कैसे लड़ लड़ कर जिंदगी से ...वो एक बैंक मैनेजर बने थे .....और जब उनके खुद के बच्चे इंजिनियर और डॉक्टर बन गए ...तब भी वो अपना अतीत नहीं भूले ....वो जान चुके थे कि जिंदगी क्या है ...सत्य क्या है ...संघर्ष क्या है

कितना अच्छा लगा था उनके संघर्ष की कहानी को सुन कर ....पर अंदाजा नहीं था उस दर्द का ...उस दुख का ..उस मुसीबत का .....पर कहते हैं न कि जब जिंदगी सिखाने पर आती है तो एक झटके में सब कुछ सिखा देती है

मेरी जिंदगी ने अचानक से करवट ली ....जिंदगी ने अचानक से ही सब कुछ छीन लिया मुझसे .....इतना तोडा कि उठना भी मुश्किल था .....याद है मुझे जब में एम.सी.ए. द्वितीय वर्ष में था ....जब मेरे पास अगले सेमेस्टर की फीस भरने तक के पैसे नहीं थे .....कोई नहीं था ऐसा जहाँ से कोई आशा की किरण नज़र आती ...सब कुछ बिखरा हुआ था .....मैं समेट भी नहीं सकता था ...एक पल तो लगने लगा था कि कहीं मुझे एम.सी.ए. छोड़नी न पड़ जाए ..... किसी ने साथ नहीं दिया उस पल ...न कोई रिश्तेदार सामने आया .....कहीं से कोई आस नहीं दिखाई दे रही थी ...वजूद बिखर सा गया था ......तब सिर्फ और सिर्फ मेरे दोस्तों और मेरे सीनियरों ने मेरा साथ दिया था .....न भुला सकने वाले दिन थे वो ........जो जब बीत जाते हैं तो आसान से लगने लगते हैं ...पर उस पल सबसे ज्यादा मुश्किल होते हैं ...

याद है मुझे जब एम.सी.ए. के बाद में दिल्ली की सड़कों पर अपने जूते घिसा करता था ....रास्ते जो ख़त्म नहीं होते थे उन पर चले जाता था .....पर फ्रेशर समझ नौकरी ना देने वालों की कमी नहीं .....एक दिन जूता भी रो रो कर फट गया था ...आगे से मेरी दो उँगलियाँ बाहर निकल आयी थी .... मेरे पास सिर्फ इतने पैसे थे कि खाना भर खा सकूं .....उस रोज़ पूरे २० किलोमीटर पैदल चला था ....4-6 जूता सही करने वालों के चक्कर लगाये थे ...तब जाकर उस कीमत में जूता सही करने वाला मिला था ....जितने मेरे पास पैसे थे ...उस रोज़ में भूखा सोया था ....वैसे भूखा मैं सिर्फ एक रोज़ नहीं सोया ...पर वो रोज़ कुछ ख़ास याद रहता है मुझे .....

चिलचिलाती धूप और खाली पेट की भूख ...दोनों एक साथ ...दोनों ने दोस्ती कर ली थी ...और जिंदगी दूर खड़ी मुस्कुराती थी .....तब कभी कभी माँ के आँचल तले देखी वो फिल्में याद आ जाती थी ...जिनमें हीरो को भागते भागते बड़ा कर देते थे और अचानक से वो एक कारोबारी या बड़ा आदमी बन जाता था .....तब पता चलता था कि जिंदगी का कोई फ्लेश बैक नहीं होता और ना ही जिंदगी को फॉरवर्ड कर सकते....कि चलो यार ये बहुत ख़राब हिस्सा है ...इसे रिमोट पकड़ आगे बढाओ ...बहुत रुलाऊ है यार ...पका दिया इसने तो .....पर नहीं जी जिंदगी न फॉरवर्ड की जा सकती न बैक .....बस इस जिंदगी के हर पल को जीना पड़ता है ......अब ये जो संघर्ष होता है ना ...ये सुनने में प्यारा लगता है .....पर बिल्कुल नहीं साहब .....जब हर 5 वे दिन भूखा रहना पड़े तब पता चलता है ...जब जूते घिस जाएँ ...किसी आलीशान ऑफिस में घुस इंटरव्यू देना हो ....और जूता शर्मा रहा हो ...उस पर धूल चढी हो ....आप पसीना पोंछते हुए अन्दर घुसे हों .....लाइन में एक से एक सुन्दर हसीना हो ....एक पल भी रुके बिना अंग्रेजी को तलवार की माफिक चलाने वाली हाथ में लिए युद्ध में खड़ी हों ....और आप कहें अरे बाप रे ...ये अप्सरा ....और ये तलवार ....और जब शाम को मायूस लौटना पड़े ......और तो और जी जिस ढाबे पर खाना खाते हों ...गुजारे के लिए कम से कम पैसे में खाना खाना चाहें ...तो चन्द रोज़ बाद ढाबे वाला भी उल्टी निगाहों से देखने लगे ....जो शुरू में २ पराठों के साथ आपको सब्जी मुफ्त देता हो ....वो अब कहता हो कि इसका तो रोज रोज का है ...और प्लेट में सूखे पराठें लगभग पटकता हुआ सा जाये ......जब एक एक दिन को दोस्तों का सहारा ले ले कर काटना पड़े ...कभी इस दोस्त के यहाँ तो कभी उस दोस्त के यहाँ ....सच तब पता चलता है कि जिंदगी क्या है ...संघर्ष क्या है

संघर्ष की गाथा बहुत विचित्र होती है जी ...जब यही जिंदगी लगातार जीनी पड़े कई दिनों तक ...तब याद आता है वो हीरो का रोड पर भाग कर बड़े हो जाना ...एक बड़ा आदमी बन जाना ....और फिर मुझे वो अंकल याद आते हैं जिन्होंने रिक्शा भी चलाया था और पढ़े भी थे ......और फिर बैंक मैनेजर भी बने थे

हाँ जिंदगी ने मुझे अब भूखा सुलाना बंद कर दिया है ...और इतना देने लगी है कि अपने परिवार को भी भूखा ना सोने दूँ .....पर अभी संघर्ष लम्बा है ......देखो कब पिक्चर वाले हीरो की माफिक बड़ा आदमी बन पाता हूँ ...या फिर वो अंकल जो मैनेजर बन अपनी सभी जरूरतों को पूरा कर रिटायर हुए थे ........देखें जिंदगी कहाँ ले जाती है
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मोहब्बत और वो भूली बिसरी यादें

>> 12 April 2009

"मोहब्बत" नाम आते ही एक शक्ले सूरत अख्तियार कर लेते हैं हम ....शायद एक ऐसा चेहरा जिसे स्कूल की चाहरदीवारी के उस पार छोड़ आये हो हम ...उस बचपन के साथ जो बीत गया ....जो बीती बात हो गया ....जिसकी याद जहन में हमेशा मिठास घोल जाती है ...या कॉलेज की कैंटीन में दोस्तों की हँसी के दरमियाँ वो ख़ास नज़रें जो छुप छुप के हमें देखा करती थी .....उन छुपती छुपाती नज़रों को वहीँ कहीं छोड़ आये हम ...पर सच में वो नज़रें जब तब याद आ ही जाती हैं ....शायद एक हसीन ख्वाब की तरह .....जो शाम को रूमानी बना जाता है

हाँ शायद मोहब्बत ऐसा ही नाम है ...जो ना जाने कितने जवां दिलों में बसी एक मीठी सी धुन है ....या उस किचिन में अपने पुराने रूमानियत के दिनों में खोयी उस रूह की ...जो कभी किसी मोटर साइकिल के पीछे बैठ अपना दुपट्टा उड़ाती थी ....एक आजादी में जीती लड़की की हँसी ...बिल्कुल प्योर ...शत प्रतिशत प्योर .....फिर वो याद करती है बस ....शायद जिंदगी भर ...या फिर वक़्त उन्हें धुंधला कर देता हो ...या फिर .....किसी टीवी चैनल को बदलते ....अचानक से उसे अपनी उस मोहब्बत के अल्फाज़ याद आ जाते हों .....जिस रोज़ उसके चाहने वाले ने ....एक लाल गुलाब दिया हो और कहा हो जानू तुमसे ज्यादा हसीन कोई नहीं , तुमसे ज्यादा खूसूरत कोई नहीं .....तुम जब हँसती हो तो लगता है ...जैसे उस हँसी को अपनी मुट्ठी में कैद कर लूं और ले जाऊँ उन हसीन वादियों में ...छोड़ दूं वहां जाकर .....तब देखूं कैसे गूंजती है वो ..कैसे वापस आती है ....और वापस आ कैसे कानों में मिठास घोलती है ....

लेकिन कभी कभी ये एक याद बनकर रह जाती है ....रिश्ते जो दिल को जोड़ते हैं ....तब रूह भी कितनी पाक साफ़ हो जाती है सच्ची मोहब्बत वालों की .....पर कहते हैं ना कि ये दुनियाँ और इसकी बनायीं हुई दुनियादारी में उलझ कर रह जाती है मोहब्बत ....

जब दिन रात रोती लड़की अपने माँ बाप से जिद करती है कि चाहे जो हो जाए वो जिससे मोहब्बत करती है उसी से शादी करेगी ...पर कहाँ ऐसा होता है ....ज्यादातर मोहब्बतें माँ बाप की झूठी मान मर्यादा और जिद के आगे कुर्बान हो जाती है ...अपनी बच्ची की हर ख्वाहिशें पूरी करने वाला बाप .....उसकी जिंदगी की सबसे प्यारी और जरूरी ख्वाहिश पूरी नहीं करता ....शायद यही तो है जिंदगी ...कुर्बानी तो मोहब्बत का दूजा नाम हो ....हर दूसरा बच्चा अपने माँ बाप के लिए कुर्बान हो जाता है ...पर कहाँ समझते हैं वो ....

पर क्यों ....क्या जाति, धर्म की दीवारें इसी लिए बनायीं गयी थी कि कोई सच्ची रूह जिंदा ना रह सके ....कोई मोहब्बत ना कर सके .....अगर करे भी तो उसे पा ना सके ....सच में कितने महान और प्रभावशाली रहे होंगे वो लोग ...जिन्होंने जाति, धर्म के बंधन बनाये होंगे ...और ऊँची ऊँची दीवारें खड़ी कर दी होंगी

अब तो नयी दीवारें इजात कर दी हैं दुनियाँ वालों ने ...चमक की दीवारें....रौशनी की दीवारें .....पैसे की दीवारें ...मोहब्बत तो शायद अब फीकी पड़ गयी इस चमक के आगे .....जिसमे लड़की अब हाई प्रोफाइल लड़के को ही अपना दिल देती है ....जिसमें उसके खर्चे का बिल चुकाने की क्षमता हो ....ना जाने क्यों "गिव एंड टेक" का नया चलन चल निकला है ...ना जाने कैसे और क्यों ये हाई प्रोफाइल मोहब्बत इजात कर दी जिसमें "बी प्रैक्टिकल" बड़े काम का जुमला हो चला है .......और लड़कों की क्या बात करें वो तो ......

कहीं सच्ची मोहब्बत और सच्ची मोहब्बत की बातें किताबी बातें बनकर ना रह जाएँ ...जिन पर बस पिक्चरें बनती हों ....या कोई लेखक किताब भर लिख सकता हो .....डर है कही किसी दिन म्यूजियम में सजाकर रखने वाली चीज़ ना हो जाए .....और लोग दूर दूर से देखने आये ........

पर फिर भी ना जाने क्यों किसी वादी से एक मीठी सी हँसी आती सुनाई दे रही है .....मेरे कानों में .....लगता है कहीं किसी ने सच्ची मोहब्बत की है .......या कोई मोहब्बत की वो पाक साफ़ हँसी ...उन वादियों में आजाद होकर गुनगुना रही हो .....हाँ शायद ....ऐसा ही होगा ....तभी मेरे कानों में रूमानियत भरी मीठी मीठी धुन बहती हुई आ रही है

शायद तभी किचिन में एक लड़की को अपनी भूली बिसरी मोहब्बत की कोई बात याद आ रही है .......शायद तभी फिर स्कूटी पर बैठी लड़की अपना दुपट्टा हवा में उड़ा रही है .....शायद ये मोहब्बत का ही असर है ...हाँ शायद मोहब्बत ही होगी ......
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तेरी साँसों को महसूस करता हूँ मैं आज भी

>> 10 April 2009

याद है तुम्हें जब तुम कहा करती थीं कि चाहे जो हो जाए ...हम दोनों यूँ ही एक दूसरे से प्यार करते रहे या न रहे ...हम मिले या बिछुडे ...लेकिन में तुम्हे यूँ ही हर रोज़ एक मेल जरूर करुँगी ....हाँ शायद याद हो तुम्हें ...हाँ याद ही होगा
और मैं थोडा सा मुस्कुरा जाता था तुम्हारी इस बात पर ....शायद वो प्यार था तुम्हारा मेरे लिए जो ये सब कहता था ....कितना चाहा तुमने मुझे ...सच बहुत ज्यादा ...

याद है मुझे जब तुम रो पड़ी थी ...कई दिन मुझ से न मिल पाने के कारण .... कैसे चुपाया था मैंने तुम्हें ...पास जो नहीं थी तुम .... उस पल तुम्हारी आँखों के आँसू महसूस किये थे मैंने ...दिल तो किया था कि तुम्हें सीने से लगा लूँ ...बाहों में भर लूँ ....और कहूँ ....पगली ऐसे भी कोई रोता है ....मैं तो हर पल तुम्हारे साथ हूँ ...तुम्हारी बातों में, यादों में ....उस नरमी में जो तुम महसूस करती हो हमेशा ...ऐसे जैसे तुम मेरे सीने से लिपटी हुई हो ....फिर तुम यूँ रोया न करो .....

उस पल कितना मुश्किल हो गया था तुम्हें मनाना ....शायद बहुत मुश्किल .....और तुम कहने लगी थीं ....तुम्हारे बिना कैसे जी पाऊँगी ....मुमकिन नहीं शायद तुम्हारे बिना जीना ....और उस पल तुमने मुझे भी रुला सा ही दिया था .....मुझे पता है कैसे झूठ मूठ का हँस दिया था मैं .....और तुम बोली थी जाओ मैं बात नहीं करती तुमसे ....तुम हमेशा ऐसे ही करते हो

याद है मुझे तुम्हें मुझसे एक दिन की भी दूरी बर्दाश्त नहीं होती थी ...आज यूँ लगता है कि सदियाँ गुजर गयी हों ...कहने को अभी 1 साल ही हुआ है ....ऐसा शायद ही कभी हुआ हो जब तुम बिना मुझसे बात किये रह पायी हो ....कितना गहरा था हमारा प्यार और हमारा रिश्ता ....मैं आज भी तुम्हारे हाथों की गर्मी महसूस करता हूँ अपने हाथों में ....और लगता है कि तुम यहीं कहीं हो मेरे पास ....अचानक से ही कोई हँसी गूंजती है मेरे कानों में .....क्या तुम आज भी खुश हो .....खुश हो न तुम ......तुम खुश हो अगर तो मैं समझूंगा कि में जी लूँगा यूँ ही इस कदर ...शायद तुम्हारी यादों को याद कर कर के .....तुम्हारी आँखें अभी भी मेरी आँखों में देखती नज़र आती हैं .....जब तुम आँखों से आँखों में देखते रहने का खेल खेलती थी ....कितना पसंद था तुम्हें वो खेल .....और तुम्हें जीत कर खुश होते देख मैं कितना खुश होता था ...हर बार तुमसे यही सोच हारा हूँ मैं .....

मोहब्बत अपने आप में एक सुकून होती है ...एक ऐसी चाहत जिसको पाने की चाहत एक नशा बन जाती है ...और हर रोज़ , हर पल हम उस नशे में रहते हैं ....मोहब्बत पा लेने भर का नाम नहीं ...मोहब्बत में जो हो उसे मोहब्बत लफ्ज़ से भी मोहब्बत होती है ....

इंसानी दुनिया शायद समझती भी है और नहीं भी ....ये मिलावटें और नासमझी दो लोगों को जुदा कर देती है ...कभी कभी खुद इंसान अपनी गलती से मोहब्बत खो देता है ...फिर उसके पास कोई नहीं होता पर जिसने सच्ची मोहब्बत की हो वो जिंदगी भर उस नशे को महसूस करता रहता है ...कभी ख़ुशी के रूप में तो कभी उसे गम बनाकर

याद है न तुम्हें... जब मैंने तुमसे ये बातें कही थीं ...और तुम बोली थी कि तुम्हें तो किसी फिल्म का डायलोग राईटर होना चाहिए था ...उस पल कितना हँसा था मैं ...फिर तुमने मेरा गला पकड़ लिया था ....

इस दुनिया में इंसान ने जाति और धर्म की दीवारें खड़ी कर दीं ...देखा तुम जिन बातों पर हँसती थी ....आज उन्हीं दीवारों को तुम पार न कर सकीं ....उन्ही दीवारों ने हमारे बीच एक फ़ासला तय कर दिया ....

मैं आज भी तुम्हारे किये हुए वादे के सच होने का इंतज़ार करता हूँ ...कल रात तुम आई थी मेरे ख्वाबों में हकीकत बन कर ...पर आँख खोलने पर तुम न थी ...आजकल तुमने ये नया खेल शुरू कर दिया है ... हर रोज़ ये सोच कर सुबह उठता हूँ कि कहीं तुम्हारा मेल तो नहीं आया ... किसी दिन अगर तुम्हारा सवाल आया तो ...कह सकूँ कि तुम्हारी साँसों को मैं आज भी महसूस करता हूँ

तुम्हें सर्दी में भी पंखा चलाकर सोने की बुरी आदत है ...आजकल मौसम बदल गया है .....अपना ख्याल रखना .....

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मैं जिस दिन भुला दूँ तेरा प्यार दिल से

>> 09 April 2009

आप सभी ने मेरी अब तक कवितायेँ और कहानियाँ पढ़ी .... आपको मैं ये बताना चाहता हूँ कि मैं गाने का भी शौक रखता हूँ ...मेरी आवाज़ में गया हुआ ये गीत सुनिए और अगर आ सके तो आनंद उठाइए ...जब भी समय मिले तब सुन लीजिये ....आप सभी की टिप्पणियों का इंतजार रहेगा कि आपको मेरी आवाज़ कैसी लगी ...नीचे के लिंक (बटन) पर क्लिक करके आप सभी ये गाना सुन सकते हैं .....हाँ आवाज़ थोडी ज्यादा करके सुनना ...धीमी आवाज़ में ज्यादा मज़ा नहीं आएगा :) :)
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suno na --suno na sun lo na
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मैं जिस दिन भुला दूँ
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पहली मोहब्बत के चक्कर में जब मार खायी

>> 07 April 2009

एक बार प्रेम पत्र पकडे जाने के बाद भी और १० वीं की परीक्षा में कम अंक आने पर भी हमारे प्यार का भूत नहीं उतरा ...हम यूँ ही उसे प्यार भरी नज़रों से देखते थे ....आखिर हमारे पहले प्यार का सवाल था ....हम बस उसे देखने के लिए कुछ भी करते थे ...हाँ उससे बात करने में हमारी दम निकलती थी ...उसके सामने पड़ते ही हमारा गला सूख जाता था ....और वो मुस्कुरा जाती थी हमे देख कर ...ऊपर से हमारे गला सूखने जैसी हालत पर शायद उसे ज्यादा मुस्कुराना आ जाता हो ...

बात ११ वीं कक्षा की आ गयी ..पढाई शुरू हो चुकी थी ....हमने नए स्कूल में दाखिला ले लिया था ....गणित से प्यार बरकरार था ...वहाँ हमारी मुलाकात एक दोस्त से हुई .....जो पढता कम था और खाता ज्यादा था ...जो ट्यूशन कम जाता था और ट्यूशन छोड़ पिच्चर देखने ज्यादा ....जिसका मन क्लास में रहने में कम और इस बात में ज्यादा कि स्कूल के बाहर छोले भठूरे वाला आया कि नहीं ...२ रुपये वाली कोल्ड ड्रिंक बनाने वाला आया कि नहीं ..... लेकिन कुछ ऐसा था कि वो हमारे नज़दीक वाली सरकारी कॉलोनी में रहता था ...तो साथ साथ स्कूल जाते जाते उससे हमारी दोस्ती हो गयी ....

मेरा आना जाना उसकी कॉलोनी में शुरू हो गया ....तभी कुछ दिनों बाद पता चला कि नम्रता और उसकी सहेलियों ने वहां रहने वाले रिटायर अंकल से ट्यूशन लगा ली है ...एक दिन मेरा ये छोले भठूरे प्रेमी दोस्त उनके साथ बाहर निकलता दिखा ....तभी नम्रता और उसकी सहेलियों की नज़र मुझ पर गयी ....वो मुस्कुरा गयीं ....

फिर नम्रता के चले जाने के बाद पता चला कि ये पट्ठा भी उनके साथ ट्यूशन पढता है ....वो बोला क्यों बे वो तुझे देख कर मुस्कुरा क्यों रही थी ...मैंने कहा कि कुछ नहीं हमारी कॉलोनी की लड़कियां हैं ...शायद इस लिए ...बोला बेटा हमसे ही छुपा रहे हो .....अबे बता ना ....मैंने कहा कुछ नहीं वो शायद मुझे पसंद करती है ....सही है बेटा ...बहुत सही ....हमे तो कोई पसंद नहीं करती ....हमने उसकी पेट की तरफ देखा ....मैंने बोला अबे पहले किसी को पसंद करने का मौका तो दे ....वो बोला क्या मतलब ...और मेरी मजाक में गर्दन जकड ली ....

अगले दिन उसने बताया कि ओये वो तेरे बारे में पुँछ रही थी ...कि क्या अनिल भी हमारे साथ पढेगा क्या ? ...मैंने कहा तूने क्या कहा ....बोला कि मैंने बोला कि वो बोल रहा था कि वो तुम जैसियों को घास भी नहीं डालता ....मैंने कहा ...अबे तेरी तो मैंने कब बोला ऐसा ....खामखाँ बनी बनायीं लव स्टोरी ख़राब कर रहा है ....बोलने लगा मैं तो ऐसा ही हूँ ...मैंने कहा बेटा तुझ जैसा अगर में बन गया तो तेरे लेने के देने पड़ जायेंगे ...तेरी मम्मी को सब कुछ बता दूंगा कि तू क्या क्या करता है ...बोला ओ भाई माफ़ कर दे आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा ....

जब मैं वापस लौट रहा था तभी मुझे नम्रता और उसकी सहेलियों का झुंड मेरी ओर आता हुआ दिखाई दिया ....आपस में फुसफुसा रही थी ...ना जाने लोग अपने आप को क्या समझते हैं ...ज़रा सी अक्ल नहीं है बात करने की .... मुझ से रहा ना गया ...मैंने बोला क्या हुआ क्यों जली भुनी जा रही हो ....तुम हमारे बारे में फालतू क्यों बोल रहे थे ...मैंने कहा मैंने तो कुछ नहीं बोला ...तभी पीछे से मेरा दोस्त भागता हुआ -चिल्लाता हुआ आया कि वो मैंने मजाक किया था ...इसने कुछ नहीं कहा था ...और तुंरत भाग गया ...पेटू कहीं का ...गूढ़ दिमाग ....तभी एक बुजुर्ग न जाने कहाँ से आया ...अपनी ही धुन में ...इन जैसों को चप्पल लागों चप्पल ...तभी सुधरेंगे कमबख्त कहीं के ...लड़कियां मुझे घेरे खड़ी थी ....अब वो संभाले न संभले ....ना जाने क्या क्या बके जा रहे ..तभी सुमन ने कहा आप जाओ बाबा ये हमारी जान पहचान का है ....अच्छा ऐसी बात है तो ठीक है ....जब वो चला गया ...तब मैंने कहा पड़ गया चैन ...मिल गयी ख़ुशी ....लड्डू बाटों जाकर जाओ ....फिर मैं चला आया वहां से

कुछ दिनों में उस रास्ते पर सड़क छाप मजनू टाइप लड़कों की एक जमात पैदा हो गयी जो उसी सरकारी कालोनी में रहते थे ...और जो राह में खड़े हो खीसे निपोरा करते थे ...आँखों के अजीब अजीब इशारे और बेवकूफी भरी बातें किया करते थे ....और अपना दिल हांथों में लिए फिरते थे ....कि कह रहे हों जैसे कि कुछ नहीं तो इसे क़दमों तले रोंद्ती ही जाओ ना .....

फिर एक दिन वो मेरा दोस्त बोला यार तू भी ट्यूशन लगा ले ना ....अच्छा रहेगा...मैंने कहा मुझे जरूरत नहीं ट्यूशन की ...बोला अबे जरूरत किसे है ....इसी बहाने तू उसको जी भर के देख तो लेगा ....मेरा भेजा भी ख़राब हो गया और उसके आईडिया को मान लिया ....एक आईडिया ना जाने क्या से क्या करा दे ....भाई मैंने सिर्फ 1 महीने की सोच ट्यूशन लगा लिया ...अब मुझे क्या पता था कि उस ट्यूशन में एक लड़का ऐसा है जिसने वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा है ...मतलब उसने अपनी होशियारी का डंका बजा रखा था और उस ग्रुप की एक हसीना को पटा रखा था ....मुझे इस बात का ज़रा भी इल्म ना था ....

जब मैं उस ट्यूशन में पहुंचा तो जो भी पूँछा जाये तो मैं बता दिया करूँ ...और टेस्ट में मेरे अंक भी सबसे ज्यादा आया करें ..अब ये बात उसे नागवार गुजरी ....उसने जबरन मुझसे लड़ाई मोल लेने की सोची ....और हमने भी कुछ कह दिया ...भाई वो तो बौखला गया ...और ट्यूशन छूटते ही हमसे लड़ने लगा ....उस दिन तो हम झगडा शांत कर चले आये ....अब अगले दिन उसने हमे ट्यूशन शुरू होने से पहले ही 4-6 लौंडों के साथ पकड़ लिया ...कि बहुत हीरो बनता है आज तेरी हीरोगीरी उन्ही लड़कियों के सामने निकालेंगे ....फिर उन लड़कियों के उस रास्ते पर आते ही एक हाथ एक लड़के ने पकड़ लिया ...दूसरा हाथ दूसरे लड़के ने और 2 लौंडे मुझे चांटे मारने लगे ....उन लड़कियों के आते ही ...मैंने लाख कोशिश की बचने की पर बच ना सका ....अब भाई किसी फिल्म का हीरो तो हूँ नहीं जो उछल उछल कर सबको मार पाता ...ऊपर से तब डेढ़ पसली हुआ करता था .....और उन लड़कियों के जाते ही मुझे छोड़ दिया ...मैं धमकी देकर आया कि तुम लोगों को छोडूंगा नहीं ....

अब हमारे पिताजी पुलिस में और उनके लड़के पर कोई इस तरह हाथ उठा कर चला जाए कैसे मुमकिन है ....मैं जैसे ही घर पहुंचा पिताजी को सब माज़रा पता चला कि लड़कों ने मुझे पीटा है .....वो तो भला हो ये नहीं पता चला कि ये इश्कबाजी भी करता है .....वो गुस्से में आग बबूला हो गए ....मेरा छोटा भाई थोडा लडाकू टाइप है ...मेरे पिताजी, मेरा भाई और कालोनी के 5-6 लड़के साथ गए ....उस कालोनी में पहुँच गए ...लेकिन वो लौंडे गायब हो गए ...अपने अपने घर से फरार ....मेरा छोटा भाई हाथ में चैन लेकर गया था ...खैर मेरे पिताजी वहां अच्छी तरह धमका आये ...उसका बड़ा भाई मिला वो दुम दबाये हुए था .....उसके पिताजी बोले कि हम उसे समझायेंगे ..आगे से ऐसा नहीं करेगा ....

ना जाने कैसे थाने के 2-4 पुलिस वालों को ये बात पता चल गयी ....उन्होंने खुद अपनी तरफ से उन लड़कों को पकड़ लिया और मुर्गा बनाया और 4-6 चांटे जड़ दिए .....तभी उनके पिताजी हमारे घर आ पहुंचे कि हम अपने बच्चों की तरफ से माफ़ी मांगते हैं ...आगे से ऐसा नहीं होगा ....उन्हें पुलिस पकड़ लायी है ....मेरे पिताजी ने कहा कि पर मैंने तो किसी से कुछ नहीं कहा ..खैर पिताजी ने जाकर सभी लड़कों को छुड़वाया ....और जाने दिया ..वो सब माफ़ी मांग रहे थे ....

वो बात वही ख़त्म हुई ...पर उन सड़क छाप आशिकों की आशिकी ख़त्म नहीं हुई ...एक का नाम था चुनमुन ....शक्ल से पैदल, अक्ल से पैदल और सड़क छाप गुंडे की जैसी हरकतें करने वाला ... और ख्वाब ऐश्वर्या को पाने के ...वो नम्रता के ग्रुप की सबसे सुन्दर लड़की पर लाइन मारता था ...और एक दिन परेशान करते करते उसने एक लव लैटर उसको थमा दिया .... उस लड़की ने उस वक़्त कुछ नहीं कहा ...

उस लड़की के भाई आगरा कॉलेज के माने हुए गुंडे थे .....उस लड़की ने अपने भाई से शिकायत कर दी ...वो 4-6 बाइक लेकर वहां पहुँच गया ....और उस चुनमुन को रोड पर घसीटता हुआ 1 किलोमीटर तक अपने घर ले गया ...वहां जाकर पटक दिया ......हॉकी और लातों से उसकी खूब मार लगायी .... वहाँ जाकर ये चुनमुन उस लड़की के पैरों पर गिर गया कि मुझे माफ़ कर दो बहन आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा ....जैसे तैसे उसे छोड़ दिया गया ...चुनमुन ने कसम खायी कि मैं इन लड़कियों के सामने क्या उस रोड पर नज़र भी नहीं आऊंगा

एक रोज़ हम उस कालोनी में गए वो रास्ते में अपने हाथ पर प्लास्टर चढाये हुए और माथे पर पट्टियां लगाए खडा हुआ था ....मैंने कहा हाँ चुनमुन भाई ये क्या हुआ ....ये कैसे हो गया ? ...कोई एक्सीडेंट हो गया क्या ? ...बोला यार मज़े ले रहे हो ....सब कुछ पता होते हुए भी हमारा मजाक उड़ा रहे हो ..... हमने कहा भाई जब तुम मजाक करते रहे तब नहीं सोचा था .....उस फूल सी नाज़ुक लड़की को परेशान करते थे ...तब ख्याल नहीं आया कि कहाँ तुम और कहाँ वो .... बोला यार तुमने कभी बताया नहीं कि उसके भाई गुंडे हैं ...मैंने कहा कि तुम सुनते कहाँ हो .....अब नशा उतर गया तो सबकी सुनोगे ....
फिर दूर से उसी रास्ते पर नम्रता और नम्रता की सहेलियां उधर से आती दिखाई दी तो चुनमुन वहां से कट लिया ....आखिर कैसे मुंह दिखाता :) :)
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पहला प्यार, बोर्ड एग्जाम और पहले प्रेम पत्र का पकड़ा जाना

>> 06 April 2009

इसको पढने से पहले कृपया पिछली पोस्ट मेरा पहला प्यार और बोर्ड एग्जाम पढ़ ले तभी इसका आनंद उठा पायेंगे

इधर हमारी आशिकी के दिन बढ़ते जा रहे थे और उधर बोर्ड परीक्षाएं नज़दीक आती जा रही थी ...और हम इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि परीक्षाओं का क्या होगा ? .....कहते हैं ना इश्क का भूत सारी दुनियां भुला देता है ...लेकिन कोई था जो हमारे इश्क पर नज़र रख रहा था .नम्रता की सहेली हमारी ही कालोनी में रहती थी जिसका नाम सुमन था ....एक दिन सुमन ने अपने घर बुलाया ...उसकी बड़ी बहन वहां थी और उसकी मम्मी कहीं गयी हुई थी ....सुमन की बड़ी बहन बोली ...क्या बात है आजकल बहुत पढाई कर रहे हो ....दिन भर छत पर रहते हो ...धूप नहीं लगती ....मैं उनके इस सवाल का आशय समझ गया लेकिन फिर भी .....हाँ पढाई तो करनी ही पढेगी ...और पूरी छत पर धूप थोड़े रहती है ...मैं छाया में पढता हूँ .....अच्छा चलो अच्छी बात है अगर ऐसा है तो ...[उनका साफ़ साफ़ मतलब था कि बच्चू ठीक से पढाई करो घर बैठकर और ये सब इश्कबाजी छोडो ....वरना बोर्ड परीक्षाओं में लेने के देने पड़ जायेगे ...पर मैं कहाँ उनकी बात मानने वाला था ...जानबूझकर बहाने मार रहा था मैं और वो सीधे कह भी नहीं सकती थी कि उन्हें पता है ...कि मैं छत पर खडा खडा नम्रता को लाइन मारता हूँ ]


और फिर बहुत जल्द समय बीत गया और १० वी कक्षा की परीक्षा प्रारम्भ हो चुकी थी और मैं दिसम्बर तक की अपनी तैयारी के आधार पर अपनी परीक्षा दे रहा था .....अब मुझे एहसास हो रहा था कि प्यार करना कितना महँगा पड़ रहा था मुझे .....और वो भी मेरा पहला प्यार .....जिसमे मैंने लड़की अर्थात नम्रता से सिर्फ़ एक बार बात की थी .....

बात भी क्या .... काफी अँधेरा हो गया है ....क्या मैं आपको आपके घर तक छोड़ दूँ ...नही मैं चली जाऊँगी....ये बात हुई थी अब तक सिर्फ़ हमारे बीच .....अपनी परीक्षा दे तो मैं रहा था लेकिन प्यार का बुखार मेरा कम नही हुआ था ...परीक्षा के दौरान भी मैं छत पर जाता और मेरी आँखें नम्रता को उसके आँगन में तलाश करती...
प्रेमिका की एक झलक पाने के लिए प्रेमी क्या नही करता ....ये तो बस एक प्रेमी ही समझता है और जानता है ....
खासकर किशोरावस्था में हुआ प्यार कुछ ख़ास होता है ....

प्यार के बुखार का असर मेरी परीक्षा पर तो कही न कही पड़ना ही था .... आलम यह था कि गणित की परीक्षा में मैं अक्सर सूत्र भूल रहा था ....मैंने पिछले २-३ महीने से कुछ दोहराया जो नही था ....
100 में से 100 अंक लाने वाले छात्र के मांथे से पसीना निकल रहा था ....और सोच रहा था कि अब क्या करुँ....
खैर जैसे तैसे 50 में से 35 अंको का प्रश्न पत्र किसी तरह मैंने हल किया ...
उस दिन घर आकर अपनी हालत पर मलाल हुआ कि ये क्या हुआ ... दूसरे गणित के प्रश्न पत्र के लिए अभी 4 दिन शेष थे .....उन 4 दिनों में सभी सूत्र दोहराए कि किसी तरह दूसरा प्रश्न पत्र तो सही हो ....हुआ भी वही दूसरे प्रश्न पत्र मैं 50 में से 50 अंको का हल करके आया ......दिल ही दिल में खुशी मिल रही थी ....उस प्रश्न पत्र के साथ ही परीक्षाएं समाप्त हो गयीं ....अब मेरे पास बस एक ही काम था कि नम्रता को देखना और बस नम्रता को देखना .....दिन भर छत पर चढ़ा रहता था ....

और आखिरकार वो समय आ ही गया जब हमने अपना पहला प्रेमपत्र लिख डाला ....हुआ यूँ कि लड़की को ताकते हुए हमे काफ़ी समय बीत चुका था ....हमारे ऊपर रहने वाले भइया ने हमे मुफ्त का सुझाव दे डाला कि कब तक यूँ ही देखता रहेगा कुछ लव लैटर लिख के दे ....आख़िर उधर से भी तो कुछ पता चले ....हमने सोचा कि ये तो प्यार के बहुत मंझे हुए खिलाड़ी हैं और ज्ञानी आदमी तो चलो इनकी बात मान ली जाए ....हमने हिम्मत इकट्ठी की और एक साफ़ और स्वच्छ कागज़ को अपने अरमानो के रंग से रंगीन कर दिया ....हमने अपने प्रेम को स्पष्ट शब्दों का सहारा लेकर लिख डाला और इजहारे मोहब्बत प्रेम पत्र के माध्यम से कर डाला ....अब हमने तो अपना काम कर डाला किंतु अब तनिक भय और चिंता का प्रश्न ये था कि इस प्रेम पत्र को लड़की तक पहुँचायेगा कौन ? इतने में हमारे भाई साहब ने प्रेम पत्र के नीचे हमारे हस्ताक्षर भी कर दिए ....तुम्हारा प्रेमी ...अच्छा हुआ कि हमारा नाम अंकित नही किया उसके नीचे .......

हमारे उन भाई साहब के छोटे भाई को डाकिये का काम सोंपा गया ....और उन्होंने अपने बाल्यावस्था की सबसे बड़ी गलती कर दी ....वो प्रेमपत्र नम्रता की बड़ी बहन को देकर आ गए और सीना चोडा करने लगे ...पर हमारी मति तो मारी ही गयी थी ... कि कभी भी लड़की को इस तरह से अपने प्यार का इजहार नही करना चाहिए .....न जाने क्यूँ हमे एहसास हो गया था कि कुछ अशुभ होने वाला है ....हमने अपनी ही कालोनी में रहने वाली सुमन की बड़ी बहन को सब कुछ समझाया और अपने किए हुए का झूठा पछतावा भी कर डाला और कहा कि किसी तरह इस बार हमे बचा लिया जाए ...वो बोली मैंने तुम्हे उस दिन समझाया था पर तुम तो माने नहीं थे ...मैं तो छाया में पढता हूँ ..वगैरह वगैरह ....हम मुंह लटका कर बोले कि गलती हो गयी आगे से ऐसा नहीं करेंगे ...बस इस बार बचा लिया जाय ...उन्होंने कहा ठीक है मैं देख लूंगी...अगर कोई घर पर आये तो मेरे पास ले आना

नम्रता की बड़ी बहन को हमारा प्रेम पत्र मिल गया तो उन्होंने पहले तो नम्रता की खबर ली कि यही सब करती हो तुम्हारी मम्मी से शिकायत करुँगी ..बहुत बिगड़ गयी हो ..वगैरह वगैरह ...नम्रता बोली मुझे कुछ नहीं पता ...मैं कुछ नहीं जानती इसके बारे में ....अच्छा अगर ऐसी बात है तो जाओ उसके घर शिकायत करके आओ ...सुमन को साथ ले जाना फिर वो हमारे यहाँ शिकायत करने के लिए आयी..आई क्या जबरन भेजी गयी ...वो तो भला हो हमारे पूर्ववत एहसास का कि हमने पहले ही सब कुछ संभाल लिया था ....

हमारे घर में उस समय सभी लोग अन्दर आँगन में बैठे हुए थे ...सब आपस में बातें कर रहे थे ....और ना जाने क्यों हमारे पिताजी का मूड बहुत ख़राब था उस दिन ....ऐसे में हमारी हालत ख़राब थी और हमारा ध्यान पूरा का पूरा दरवाज़े पर ही लगा हुआ था... वरना हमारी उस दिन तो शामत ही आ जाती .....न जाने क्या होता हमारा और हमारे दबे कुचले पहले प्यार का ....

दरवाज़ा खटका और हम दरवाज़ा खोलने गए जो ज्यादातर हम नहीं करते थे ...देखा सामने नम्रता और सुमन खड़ी हैं ...लैटर आगे बाधा कर दिखाते हुए ...ये सब क्या है ...सुमन बोली ..मैं सीधे बोला कि तुम्हारी बड़ी बहन बुला रही हैं ....पर ये सब है क्या ....और नम्रता का मुंह देखने लायक था उस समय ....मैं उन्हें सुमन की बड़ी बहन के घर ले गया ...वहां पहुँच कर सुमन ने खूब खरी खोटी सुनाई और सुमन की बहन ने भी २-४ बातें मुझे बोली ....और नम्रता रोये जा रही थी ...कि मेरी बहन ने अगर घर में कह दिया तो क्या होगा ....खामखाँ ये सब किया ...और भी ढेर सारी बातें ...मैं बस सुनता गया ..सुनता गया ...फिर सुमन की बहन ने मुझसे अलग ले जाकर कहा कि सॉरी बोल दो ....माफ़ी मांग लो ...मैं मरता क्या ना करता ....सॉरी आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा ....फिर उसने एक बात कही थी जो मुझे आज भी याद है ..."सॉरी बोलने से क्या दिल के अन्दर जो बात पहुँच जाती है वो खत्म हो जातीं हैं क्या "....पर मैं निरा गूढ़ दिमाग ...उस बात का मतलब नहीं समझा उस वक़्त

हमारा पहला और आखिरी प्रेम पत्र इस तरह पकड़ा जाएगा हमने कभी सोचा भी नही था .... खैर लड़की तक संदेशा तो पहुँच ही गया कि हम उसे चाहते हैं ....उसके बाद हमने कभी अपना प्यार जताने कि कोशिश नही की....करते भी तो कैसे करते ...डर जो लगता था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए ...खामखाँ हम लपेटे में आ जाए ....हाँ हम उसी तरह उसे देखते जरूर रहे थे ...उन्ही प्यार भरी नज़रों से ...

जून में हमारा रिजल्ट आया ....कुछ ठीक ठीक अंदाजा ही नहीं था कि क्या होगा ...हाँ इतना पक्का यकीन था कि पास जरूर हो जायेंगे ...पिताजी ने रिजल्ट देखा सबसे पहले ...तब अख़बारों में रिजल्ट आता था ....और वो ख़ुशी के मारे फूले नहीं समां रहे थे ...मैं प्रथम (1st)आया था ...मेरी जान में जान आई कि चलो बाल बाल बचे कहीं 2nd आते तो ना जाने क्या होता .....पूरी खबर ली जाती अच्छी तरह ...

उसके कुछ दिनों बाद जब अंकपत्र देखा तो कुल 73.16% नंबर आये थे हमारे ...सभी के सभी टीचर कह रहे थे तुम्हे क्या हुआ ...इतने ख़राब नंबर कैसे आये ...हमने तो सोचा था कि 85% नंबर तो तुम लाओगे ही ....तुमने तो सब कुछ उल्टा पुल्टा कर दिया ...तुमसे कितनी आशाएं थी ....स्कूल में तुम्हारा परफॉर्मेंस कितना अच्छा था ...वगैरह वगैरह...और हम बस सुन रहे थे ...और अपना अंकपत्र लेकर चले आये

अगले २ साल तक उसी तरह वो लड़की हमे देखती रही और हम उसे ....वही मुस्कुराना ...हमारे घर की ओर देखना ....हमारे घर की तरफ़ से निकलते हुए हमारे घर की तरफ़ निहारना ......ये सब सामान्य प्रक्रिया रही ...शायद वो मन ही मन चाहती हो की हम दोबारा उसे अपने प्यार का इजहार करे ...किंतु हमने ऐसा नही किया दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीटा है जैसी हालत हो गयी थी हमारी ....आख़िर मेरा पहला प्रेम पत्र पकड़ा जो गया था ..... वो दिन है और आज का दिन हमने कभी किसी को प्रेम पत्र नही लिखा ...शायद वो मेरा पहला और आखिरी प्रेम पत्र था ....
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मेरा पहला प्यार और बोर्ड एग्जाम

>> 03 April 2009

बात उन दिनों की है जब मैं 10 वी कक्षा में पढता था अर्थात सन् 1997 की सर्दियों की बात है ........ जनवरी का महीना था ...जिसका मतलब शायद बसंत आने वाला था ....मैं अपनी कॉलोनी की छत पर धूप में पढने के लिए जाता था .... हमारी पुलिस कॉलोनी के पड़ोस में ही अस्पताल कर्मचारियों की कॉलोनी थी ..... मैं अपनी छत पर काफी देर से पढाई में तल्लीन था ...कुछ थकान के बाद में अंगडाई लेने लगा और अपने हाथ को इधर उधर करने लगा ..... अचानक ही मेरी नज़र हॉस्पिटल कॉलोनी की छत पर गई .....एक लड़की मेरी नक़ल कर रही थी ...जिस तरह मैं अंगडाई ले रहा था और अपने हाथ इधर उधर कर रहा था ....वो भी उसी तरह कर रही थी.... उन दिनों मैं बहुत शर्मीले स्वाभाव का हुआ करता था ....मैं उस लड़की की ऐसी हरकत से शरमा गया .....हाय मैं शर्म से लाल हुआ ...जैसी हालत हो गयी थी हमारी

मैं चुपचाप अपनी किताब लेकर पढने लगा और उसकी ओर ध्यान नही दिया लेकिन चंचल मन तो आखिर चंचल होता है ...ऊपर से किशोरावस्था...कुछ समय बाद मैंने दोबारा उधर देखा तो वो लड़की फिर से मेरी नक़ल करने लगी .....अब वो अपने हाथ मैं किताब लेकर पढने की नक़ल करने लगी .....उसके साथ करीब 4-5 लड़कियाँ और भी थी जो कि उसके घर पर ट्यूशन पढने आती थी ...ये बात मुझे बाद में पता चली ....खैर मैं वहां से उठ कर नीचे दूसरी मंजिल पर रहने वाले भईया के पास चला गया ....उन्हें सारा माज़रा बताया .....उन्होंने कहा अच्छा अभी देखता हूँ .... उन्होंने लड़कियों से कहा क्या बात है जाओ चुपचाप अपनी पढाई करो ...वो ठीक उनके घर के सामने दिखने वाले घर में रहती थी...

बाद में भईया से पता चला कि उस लड़की का नाम नम्रता है ... करीब 5-10 दिन तक तो उसकी हरकतों पर मेरा ज्यादा ध्यान नही गया ...वो उसी तरह मेरी तरफ़ मुस्कुरा मुस्कुरा कर देखती और कभी कंकडी मारती या फिर कभी मेरी नक़ल करती ..... मैंने सारा वाक्या अपने ऊपर वाले भईया को बताया ....उन्होंने पहले तो ज्यादा ध्यान नही दिया .....लेकिन वो हमारी कालोनी में प्यार के मामले में बहुत मशहूर थे ...उनकी तब तक 4-5 प्रेम कहानियाँ चल चुकी थी ...

कुछ रोज़ बाद जब मैंने उन्हें फिर बताया तो उन्होंने कहा कि हो सकता है की वो लड़की तुझे पसंद करती हो ....चाहने लगी हो ....एक लड़के के लिए ये पोधीने के पेड पर चढाने वाली बात होती है .....मैं भी चढ़ते चढ़ते उस पेड़ पर चढ़ ही गया ...मैं भी धीरे धीरे शायद प्यार रुपी रोग का रोगी बनता जा रहा था .....

करीब 2-3 दिन वो लड़की जब दिखाई नही दी तो मेरा ध्यान इस बात पर गया ...शायद मुझे उसकी उल्टी सीधी हरकतों की आदत पड़ चुकी थी ...और प्यार का बुखार मुझे चढ़ चुका था ....मैंने छत से उस घर की तरफ़ देखा उसका आँगन वहां से दिखाई देता था ....एक दिन बाद वो अपने आँगन में दिखाई दी ....अब मेरा उसे देखने का सिलसिला शुरू हो चुका था .....

मैं अपने पहले प्यार के पहले पायदान पर पैर रख चुका था .... अब हर रोज़ दिन भर उसे देखने के सिवाय मेरे पास दूसरा काम नही था.... ये भी भूल चुका था कि मार्च में मेरे बोर्ड की परीक्षाएं हैं .....वो तो भला हो कि जनवरी से पहले ही मैं अपने सभी विषयों की तैयारी लगभग - लगभग पूरी कर चुका था ......स्कूल में सभी को मुझसे आशाएं थी कि मैं उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में टॉप २० में तो आ ही जाऊंगा ...किंतु उन्हें क्या पता था कि मैं प्यार में पड़ चुका हूँ ....और प्यार के गणित और इतिहास को समझने की कोशिश कर रहा हूँ ...प्यार के के लिए आस पास के भूगोल की जांच पड़ताल करता रहता कि कहीं मुझे कोई देख तो नहीं रहा ....

जनवरी के बाद मैंने कोई पढाई नहीं की ...अब एक ही काम हो सकता है ...या तो स्कूल की पढाई पढ़ लो या फिर भाई जान के प्यार के टिप्पस पर धयन दे उन्हें रटूं ..... मैं शायद वो विश्वामित्र था जिसकी पढाई रुपी तपस्या नम्रता ने भंग कर दी थी .....कुछ भी हो पर उस पहले प्यार के उन दिनों के मीठे एहसास को भुलाना आज भी मुमकिन नही ....

नम्रता भी बहुत चंचल थी.... अक्सर अपनी छत से मेरे आँगन में मेरे ऊपर कंकडी मारना या फिर मेरी ओर देख कर मुस्कुराना उसकी ख़ास आदत थी ....साफ़ साफ़ लगता था कि वो मुझे चाहती है ....कभी कभी तो मेरी माँ भी शक करने लगती थी कि ये लड़की हमारे घर की तरफ़ ही क्यों देखती रहती है ....

कुछ भी हो मेरे पहले प्यार की शुरुआत हो चुकी थी ....बिना बोले बिना कहे ....एक दूसरे को देखना ...मुस्कुराना ...
अच्छा लगता था वो सब कुछ ....

लेकिन बोर्ड की परीक्षाएं देते समय क्या क्या गुजरी मुझ पर ये में ही जनता हूँ ....क्या गुजरी वो अगले अंक में
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सच्चा प्यार बनाम बी प्रैक्टिकल

>> 02 April 2009

कहते हैं सच्चा प्यार कभी नहीं मरता ...वो हमेशा जिंदा रहता है ....इंसान मर जाता है लेकिन प्यार नहीं मरता ....कितना अच्छा लगता है ये सब सुनना .....हो सकता है ये संवाद (Dialogue) किसी फिल्म में बोले गए हों .....पर माफ़ करना ऐ दोस्त क्या वाकई ऐसा होता है

मैं तो चलो बहुत पीछे हूँ आशिकों की कतार में ...पर उनका क्या जिसे एक नहीं, दो नहीं पूरे तीन तीन बार सच्चा प्यार हुआ .....मतलब उनकी तीन सच्चे प्यार की कहानियाँ सुनी जाया करेंगी .....

जैसे कि जब उन्हें पहली बार सच्चा प्यार हुआ तो खूब जोरों से हुआ .....लड़की की एक झलक पाने की खातिर उन्होंने क्या क्या पापड नहीं बेले ....कॉलेज बस में तभी चढ़ते जब उनकी महबूबा उसमें होती ...वगैरह वगैरह .....और जब लाइब्रेरी की सुनसान गलियों और खामोश किताबों के दरमियान उन्होंने इजहारे मोहब्बत किया तो लड़की ने ये कह उनके प्यार को अमर कर दिया कि हम दोनों अलग अलग जाति के हैं तो ये संभव नहीं ...मैं अपने परिवार की ही मर्ज़ी या अपनी ही कास्ट के लड़के से शादी कर सकती हूँ ....तब हो सकता है कि किताबों की रूह पर एक नया अध्याय फिर से जुड़ गया हो कि प्यार तो मर सकता है किन्तु जाति प्रथा और जाति के बारे में विचार कभी नहीं मर सकते ....

चलो एक बार इंसान गलती करके सुधर जाता है ...लेकिन फूटी किस्मत उन्हें दोबारा सच्चा प्यार हो गया ...उस मोहल्ले की लड़की से जहाँ रह वो इंजीनियरिंग कर रहे थे .....चलो इस बार पूरी दीन दुनिया से बेखबर हो लड़की ने उनका प्यार कबूल किया और फिर दोनों ने प्यार के सागर में गोते लगाये .....पर बेचारी किस्मत, बेचारा आशिक इस बार भी मारा गया ...राजपूत लड़की से प्यार कर बैठा ....जिसके बाप की कंपनी भी थी ....उसके बाप ने अपनी पॉवर का इस्तमाल करते हुए वहां के कुछ लोकल गुंडों की सहायता ले ऐसा खदेडा कि जिंदगी भर वो प्यार याद रहेगा ....

वो तो भला हो हम जैसे दोस्तों का जिन्होंने वक़्त पर खबर मिलते आशिक दोस्त को रफूचक्कर कर दिया और बाद में आशिक दोस्त के बदले वो गुंडे हम जैसे दोस्तों को लपेटे में ले गए ...और हमे खूब धुना ...पर कसम से हमने जुबान नहीं खोली ...वरना ना जाने आशिक दोस्त का क्या होता ...एक दोस्त तो अपना सूजा हुआ गाल लेकर 15 दिन तक उस प्यार का शोक मनाता रहा .....बाद में लड़की ने ये कह दिया कि मेरे माता पिता की इज्जत है ...और उनके खिलाफ जाकर में तुमसे इस प्यार को आगे नहीं बढा सकती और न ही शादी कर सकती ......क्योंकि तुम्हारी और हमारी जाति अलग है .....

दोस्तों ने मिस्टर आशिक दोस्त को समझाया कि ओ भैये तुझे अपनी ही जाति में (लड़का अनुसूचित जाति का था) कोई लड़की नहीं मिलती मरण के वास्ते .....प्यार करने के वास्ते .....फिर ये दूसरे मामले ने इतना तूल पकडा कि मामला एम.एल.ए तक जा पहुंचा ...और जैसे तैसे लड़के के पिताजी ने अपने जिले के एम.एल.ए की सहायता ले मामला रफा दफा किया ...बेचारे इस प्यार के चक्कर में घर में थू थू हुई इज्जत की सो अलग ....

और फिर भी ना माने ये आशिक महोदय ...तीसरी बार भी ये सच्चा प्यार कर बैठे .....लड़की भी दिलो जान से फ़िदा थी इन पर और दोनों ने खूब दिल खोल कर प्यार किया ...खूब मिले ,फिल्में देखीं, साथ खाना खाया और प्यार की पींगें बढायीं .....पर गलती इस बार भी हो गयी ...भाई साहब इस बार भी दूसरी जाति की लड़की से प्यार कर बैठे .....अब हो गया न बेडा गरक ....लड़की के माँ बाप और भाइयों ने लड़की के मार पीट कर हाथ गोड इकट्ठे कर दिए .....और तमाम धमकियों के साथ मरने मारने की कसमें खा डाली .....लड़की को ऐन वक़्त पर याद आ गया कि वो अपने परिवार से ज्यादा प्यार करती है .... लड़के का सच्चा प्यार रोने लगा और खुद से ही कहने लगा ....ये तो कोई बात नहीं हुई .....फिर सच्चा प्यार कैसे करते हैं

एक मेरे अन्य मित्र हैं इन्होने चन्द दिनों में अपने ऑफिस की लड़की से प्यार की पींगें बढा ली ...और एक दिन लड़की को अपने कमरे पर ले जाकर उसकी रजामंदी सहित प्यार पूरा कर लिया ....और बी प्रैक्टिकल के कागज़ में लपेट कर कंडोम को कूडेदान में फेंक दिया .....कुछ दिनों तक बी प्रैक्टिकल के प्यार को चला दोनों ने एक दूसरे को भरपूर प्यार किया और कई सारे बी प्रैक्टिकल के कागज़ में लिपटे कंडोम कूडेदान में डाले .....फिर एक दिन बी प्रैक्टिकल के नाम पर दोनों ये कहकर अलग हो गए कि शायद हमारा रिश्ता चल नहीं सकता .....

एक दिन हमारे ये दोस्त उसी लड़की से एक मॉल में टकरा गए ...लड़की अपने नए बॉय फ्रैंड के साथ थी और ये अपनी नयी गर्ल फ्रैंड के साथ .....फिर दोनों ने एक दूसरे से मिल हाई हैलो किया ...एक दूसरे के गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रैंड से परिचय करा आगे बढ़ गए ......कमाल है भाई ये बी प्रैक्टिकल .....चलो इसमें जाति प्रथा तो नहीं आई ...ना ही लड़की को अपने माता पिता की इज्जत की चिंता हुई ......खूब प्यार किया बी प्रैक्टिकल के साथ

एक मेरे अन्य मित्र हैं जिनका पिछले 8 साल से अफेयर चल रहा है और उनकी अभी शादी नहीं हुई ...वो दोनों एक दूजे से ही प्यार करते हैं ...हालांकि जाति अलग अलग है ....पर रो पीट कर लड़की के घर वाले इस लड़के से शादी के लिए राज़ी हो गए .....अब कोई परेशानी भी नहीं फिर भी शादी नहीं हुई ....पहले लड़के पर जॉब नहीं थी तो परेशानी ....जब लड़के को जॉब मिल गयी तो लड़की अपनी जॉब के माध्यम से विदेश जाने की चाह की खातिर ....और अच्छी रकम कमाने की खातिर सच्चे प्यार को शादी का इंतज़ार करा पूरे 1 साल के लिए विदेश के टूर पर निकल ली .....सच्चे प्यार को छोड़ ऑस्ट्रेलिया चली गयी ....हाँ बात तो होती है दोनों की ...और लड़की ख़ुशी ख़ुशी वहां पर दोस्तों के साथ खिचाये फोटो भी दिखाती है ...बहुत खुश है वो ....

खुला माहौल है न वहां तो मिनी से भी मिनी स्कर्ट और जींस के ऊपर दिखने वाली चड्डी की फोटो भी खिंचाती है और ख़ुशी ख़ुशी फूली नहीं समाती है .....और अपने इस सच्चे प्यार को दिखाती है ....फिर इस लड़के को वो कही हुई बात याद आती है कि जब उसने इसी अपनी महबूबा से कहा था चलो 2-4 दिन के लिए शिमला घूम कर आते हैं ...तब बोली थी कि घरवाले क्या सोचेंगे ...वो क्या कहेंगे .....अब बार में जाकर दोस्तों के साथ वहां दारू भी पी लेती है ....डांस वगैरह ....अब भाई खुले माहौल में गए हैं तो लुत्फ़ तो उठाना चाहिए ......अब इंडिया में इतना आसान कहाँ ये सब .....फिर कभी कभी उसकी अपने सच्चे प्यार से बीच बीच में लडाई भी होती है ......और कह उठती है कि मेरी अपनी भी कोई प्राइवेट लाइफ है ....पर कोई गल नहीं जी ...8 साल का प्यार है तो टूटने वाला नहीं इतनी आसानी से .....कोई फिक्र नहीं जी शादी तो हो ही जायेगी ...जल्दी क्या है ..पहले दोस्तों के साथ प्राइवेट लाइफ तो जी लें ...आखिर सच्चा प्यार जो है ......

फिर एक दिन बैठा मैं इन सच्चे प्यार बनाम बी प्रैक्टिकल की थ्योरी समझने की कोशिश कर रहा था .....फिर वो पंक्ति याद आ गयी कि सच्चा प्यार कभी नहीं मरता .....हाँ हाँ भाई किसी फिल्म का संवाद (Dialogue) भी हो सकता है :) :).....पर क्या वाकई ऐसा होता है
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