उन बीते हुए दिनों में

>> 21 April 2010

- तुम मुझे बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते ।
-बिल्कुल भी नहीं ?
-ह्म्म्मम्म .....बिल्कुल भी नहीं ।
-इत्ता सा भी नहीं ?
-अरे कहा ना बिल्कुल भी नहीं फिर इत्ता सा कैसे कर सकती हूँ ।
-"मैं सोच रहा था कि इत्ता सा तो करती होगी ।" कहते हुए मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।

वो उठकर चल देती है । मैं सिगरेट फैंक देता हूँ और उसके पीछे चलने लगता हूँ ।
-अच्छा बाबा मान लिया कि तुम इत्ता सा भी प्यार नहीं करती । अब ठीक ....खुश

वो आगे बढ़ते हुए पत्थर उठाकर नदी में फैंकते हुए कहती है "तुम सिगरेट पीते हुए बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते । "
-बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता क्या ?
-नहीं, बिल्कुल भी नहीं
-अच्छा तो ठीक है, कल से बीड़ी पीना शुरू करता हूँ ।
-ओह हो...तुम ना...करो जो करना है मुझे क्या ?

मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-हाँ, तुम्हें क्या ? देखना कोई मुझे जल्द ही ब्याह के ले जायेगी और तुम बस देखती रहना ।

वो खिलखिला कर हँस पड़ती है ।
-जाओ जाओ बड़े आये ब्याह करने वाले । कौन करेगा तुम से शादी ?
-क्यों तुम नहीं करोगी ?
-मैं तो नहीं करने वाली ।
-क्यों ?
-क्यों, तुमने कभी कहा है कि तुम मुझसे शादी करना चाहते हो ।

मैं मुस्कुराते हुए कहता हूँ -
-क्यों, कभी नहीं कहा ?
-चक्क (अपनी जीभ से आवाज़ निकलते हुए वो बोली)
-कल, परसों या उससे पहले कभी तो कहा होगा (मुस्कुराते हुए)

वो नाराज़ होकर चल देती है ।
-"अच्छा ठीक है । नहीं कहा तो अब कह देता हूँ ।" (मैं उसका हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहता हूँ )

मैं उस बड़े से पत्थर पर चढ़ जाता हूँ और कहता हूँ
-सुनो ए हवाओं, ए घटाओं, ए नदी, पंक्षियों और हाँ पत्थरों । मैं अपनी होने वाली बीवी से जो मुझे इत्ता सा भी प्यार नहीं करती और जिसे मैं इत्ता सा भी अच्छा नहीं लगता, बहुत प्यार करता हूँ । मैं उससे और सिर्फ उसी से शादी करना चाहता हूँ । (कंधे ऊपर करते हुए मैं उसको देखकर मुस्कुराता हूँ !)
-होने वाली बीवी ? (वो बोली )
-हाँ (मुस्कुराते हुए )
-तुम ना टूमच हो कहते हुए वो मुस्कुरा जाती है ।

वो चल देती है । मैं पीछे चलते हुए सिगरेट जला लेता हूँ । वो पीछे मुड़कर देखती है और पास आकर सिगरेट छीनकर फैंक देती है । प्यार से "आई हेट यू" जैसा कुछ बोलती है ।

21 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे 21 April 2010 at 17:54  

बढिया कथानक, मंजी हुई भाषा और संतुलित शैली. शानदार लघु-कथा.

Bhavya.B 21 April 2010 at 18:03  

A comment after a long time....
Hilarious post Anilji....

दिगम्बर नासवा 21 April 2010 at 19:21  

padhte huve aisa laga jaise koi chal-chitr dekh raha hun ... bahut hi lajawaab ... pravaah mein aksar khud ko mahsoos karne lagta hun ...

M VERMA 21 April 2010 at 19:27  

बहुत खूब
मिसाल ही नहीं है

vandan gupta 21 April 2010 at 23:06  

andaz-e-bayan kabil-e-tarif hai.

Abhishek Ojha 21 April 2010 at 23:48  

काहे कुरेद रहे हो भाई :)

संजय @ मो सम कौन... 22 April 2010 at 07:04  

सच में टू मच हो जी आप।

मजा आ गया।

Shekhar Kumawat 22 April 2010 at 10:10  

बहुत सुंदर


bahut khub


shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

रंजू भाटिया 22 April 2010 at 11:46  

टू मच सही में ...बहुत मासूम लिखी है यह ..पसंद आई ..

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) 22 April 2010 at 13:18  

बहुत अच्छी कहानी.... एकdam baandh kar rakha .....

कविता रावत 22 April 2010 at 14:55  

मैं पीछे चलते हुए सिगरेट जला लेता हूँ । वो पीछे मुड़कर देखती है और पास आकर सिगरेट छीनकर फैंक देती है । प्यार से "आई हेट यू" जैसा कुछ बोलती है ...
...सिगरेट peena buri baat hoti hai na ..... isliye...."आई हेट यू" bol diya hoga....
Pyar manuhar ki achhi prastuti...
Bahut shubhkaamnayne

संगीता स्वरुप ( गीत ) 22 April 2010 at 14:58  

लिखने की शैली बहुत अच्छी लगी...मनभावन लघु कथा...

richa 22 April 2010 at 17:52  

cute conversation :)

kshama 22 April 2010 at 18:54  

Aankhon ke aagese tasveeren ghoom gayi..behad achhee shaili hai!

laveena rastoggi 23 April 2010 at 15:02  

masoom si rachna...umda hi likhte ho bhai ..ab har baar naya kya comment du...keep it up..!!

Ashish (Ashu) 27 April 2010 at 16:36  

सिगरेट कब से पीने लगे:)

रोहित 27 April 2010 at 19:19  

bhavnaao me ghuthi hui sundar rachna....bahut acch laga padhkar!!!!

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