होने और ना हो पाने के मध्य में

>> 25 September 2010

चौदह बरस की उम्र में यदि आप एकांत प्रिय हैं और दुनिया के गलत को सोचते रहते, कुछ का होना और ना होना खोजते रहते हैं । अर्थ ना निकालने पर भी यही निकलता है कि आप अपनी उम्र से पहले समझदार हो जाने का खतरा मोल ले चुके हैं । समझदार होना और बड़ा होना दो अलग बातें हैं । मुझे बातें बनाना पसंद नहीं । सोचना और उनसे उलझना पसंद है ।

आपके होने के माने तभी हैं जब आप दुनिया क्या और कैसे सोचती है की धुन पर नाचना सीख जाएँ । नाचना नहीं आता तो बजाना और नहीं तो राग अलापना अति आवश्यक है । बहस का मुद्दा शुरू से अंत तक वही रहता है । सीधी तो कुत्ते की पूँछ ही होती है ।

लड़कियों के चाहने, पाने, खोने और अंततः पच्चीस की उमर में दिलचस्पी ना रहने के कई खतरनाक पहलू हैं । आप पुनः चौदह की उम्र में पहुँच कर एकांत को नहीं पा सकते । सत्ताईस का अवसाद ही खुशनुमा बन सकता है । फिर इसे क्या कहेंगे जबकि आप पहली और अंतिम नज़र के दिलचस्प आदमी हैं । ढेरों दिलचस्प निगाहें आपकी चाह रखती हैं किन्तु आप हैं कि ऊब को पास नहीं आने देना चाहते ।

क्या होता होगा ऐसे इंसान का जो ना तो बड़ी खुशियों की चाह रखता और ना भद्र पुरुष होकर नई पीढ़ी उत्पन्न कर, उन्हें पुचकारने की ख़ुशी के लिये लालायित है । बावजूद इसके कि उसकी भी शारीरिक कमजोरियाँ हैं । शरीर से लड़ा जा सकता है किन्तु मन को हराना कैसे संभव होता होगा ? मन शरीर का हिस्सा नहीं होता शायद ? यदि होता तो शरीर और मन की चाहतें एक ना होती ? जो वासना के अँधेरे जंगल में मिलकर डुबकी लगाती रहती ।

कौन होते होंगे जो सालों साल अवसाद और रिक्त स्पेस के साथ जीते रहे होंगे । सत्तर की उम्र पर आकर चहचहाते हुए स्वंय के मर जाने की आत्मकथा लिख दें । होने और ना हो पाने के मध्य में, ना जी पाने की आत्मकथा लिखना कितना तो मुश्किल रहता होगा । सोचना है कि उस पहुँचने वाले समय में आत्मकथा शब्द अपने वजूद में ही रहेगा क्या ? रहा तो आत्मकथा लिखकर में अमर होना पसंद करूँगा ....

8 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 25 September 2010 at 14:59  

होने और ना हो पाने के बीच में, ना जी पाने की आत्मकथा लिखना कितना तो मुश्किल रहता होगा ।

बहुत सार्थक चिंतन ...

richa 25 September 2010 at 15:29  

"होने और ना हो पाने के बीच में, ना जी पाने की आत्मकथा लिखना कितना तो मुश्किल रहता होगा"

कभी सोचा नहीं इस बारे में... पर जीते हुए भी ना जी पाना वाकई बहुत मुश्किल होता होगा...

प्रवीण पाण्डेय 25 September 2010 at 15:32  

समय का अनुभव व गति, दोनो ही वैशिष्ट्य लिये हुये हैं। किसी के लिये उलझ कर जीने में समय का सही सदुपयोग है और किसी के लिये सरल जीने में। विचार उद्वेलित करता लेख।

हिमानी 25 September 2010 at 15:43  

jivan ka ek sach aur vicharon ke ek lahrati soch ki byan kiya hai apne ..
hon eaur na ho pane ke bich bas itna hi fansla hai ki vastav mein kya usse khush hai jo ap ho gaye hai kuch aur hone ki khwaish rakhne ke bavjood bhi

Priya 25 September 2010 at 19:20  

अनिल! हमें ये कांसेप्ट बहुत पसंद आया.....ये हकीक़त है खुद से जूझने की.....खुद का होना साबित होने के लिए सामाजिक नियमो को मानना एक परम्परा है और मन वैसा होना ही नहीं चाहता.....कुछ तलाश है उसे क्या ये भी नहीं जानता. इसे अवसाद कहना सही नहीं होगा....शायद कोई दूसरा शब्द सुझाये .......ये होता है दूर जाना है खुद से लोगों से......रवायतो से .....शायद! हम सही समझ पाए हैं आपके लेखन को..

आत्मकथा लिख कर भी क्या कोई अमर हुआ है ...प्रश्न फिर भी शेष है

अमित शर्मा 25 September 2010 at 19:57  

व्यक्ति खुद को मारकर ही आत्मकथा लिख सकता है...........................जिन्दा रहकर लिखेगा तो जिन्दगी की कहानी से न्याय नहीं कर पायेगा...............आत्मकथा लिखने के लिए तो खुद के वजूद को ख़त्म करना ही पड़ेगा, और तभी उसके माध्यम से अमर भी हो पायेगा.........

Neha 26 September 2010 at 14:13  

as usual...behtarin rachna...

Richa 16 April 2012 at 11:41  

kuch bhi hona na hona bhagwan ke hath hota hai...man ko humesha ache wicharon se yukt rakhte huye aane wale kal se nishank rah sakege....// shabdo ka sundar smayojan aur prastuti karn,bhawo ke uchit sammisran se rachit behtreen lekh

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