वक़्त इरेज़र है तो परमानेंट मार्कर भी ।

>> 20 September 2015

लाख कोशिशों के बावजूद भी आगरा की वो सरकारी पुलिस कॉलोनी मेरे ज़ेहन से नहीं जाती । और उस कॉलोनी का क्वार्टर नंबर सी-75 मेरे बचपन रुपी डायरी के हर पन्ने पर दर्ज़ है ।

फलांग भर की दूरी पर हुआ करती सरकारी अस्पताल कॉलोनी । उनके क़्वार्टरों की छतों से हमारे आँगन दिखा करते और हमारी छतों से उनके । और जो बीच की एक डिवाइडर दीवार खड़ी रहती वह तो दृश्य से सदैव ही अदृश्य सी बनी रहती । कभी लगता ही नहीं कि बीच में कहीं कोई एक दीवार भी है बरसों से ।

दीवार के एक हिस्से से आने जाने का रास्ता बना हुआ था । हम यहां से वहाँ और वे वहाँ से यहां बेरोकटोक आया जाया करते । दोस्तियां, यारियाँ खूब पनपतीं और चलती ही रहतीं । बाद के दिनों में बड़े हो जाने और शायद थोडी बहुत समझ के विस्तार से यह ज्ञान भी प्राप्त हुआ कि मोहब्बतें, इश्क़, प्यार का भी भरपूर आदान प्रदान हुआ ।

तब छतें सर्दियों की धुप सेंकने के काम में आया करतीं और आँगन का भी जब तब इस्तेमाल हो जाया करता । उन छतों पर से ही मोहब्बतें पैदा होतीं । उनमें दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हुआ करती और फिर उनकी खुशबू हवाओं को महकाया करती ।

उन्हीं दिनों में एक ही कॉलोनी का लव मैरिज किया हुआ जोड़ा बड़ों के लिए चर्चा और किशोरों के लिए रश्क़ का विषय हुआ करता । तीसरी मंज़िल पर मायका और पहली मंज़िल ससुराल । बड़ा ही दिलचस्प लगा करता ।

कुछ क्रिकेट के किस्सों में उलझे रहते तो कुछ इश्क़ की पेचीदगियों में । तब ना तो एमटीवी हुआ करता और नाही इश्क़ लव मोहब्बत के होने और न होने के लिए टीवी, रेडियो के चैनल बदलता यूथ । सुबहें शुरू होतीं । जो दोपहरों से गुजरती हुई शामों से जा मिलतीं । इन सबके मध्य में पसरा होता बच्चों, किशोरों का साम्राज्य । दिन क्रिकेट, महाभारत, जंगल जंगल बात चली है पता चला है चड्डी पहन के फूल खिला है या श्रीकृष्णा या शक्तिमान, चित्रहार, रंगोली या शनिवार रविवार की फिल्मों में मजे मजे में काट जाता ।

स्मृतियाँ रचती हैं एक अपना ही संसार । हम यात्रा करते हैं, जीते हैं उन स्मृतियों को । और बचपन लगने लगता है अपने जिए हुए समय का सबसे बेहतरीन हिस्सा ।

पहली मोहब्बत, बचपन, उनमें पकडे गए हाथ हम चाहकर भी नहीं छुड़ा पाते । वे हाथ हर बार ही हमें ले जाते हैं उन्हीं गलियों में । खेतों में, खलिहानों में । गाँवों में क़स्बों में और उनमें बसी हुई उन कॉलोनियों में जहां अब भी बसा हुआ है हमारा बचपन । क्रिकेट का बैट पकडे या कोई गेंद फैंकता सा बचपन । छत पर खड़ा पतंग उड़ाता बचपन । कंचों को हाथों में थामें निशाना बाँधती वो आँख । छतों से आँगन में निहारती वो महबूब की मोहब्बत भरी नज़र । सर्दियों की गुनगुनी धूप में अपनी गुलाबी रंगत को बढ़ाती पहली मोहब्बत । वो महबूबा । वो यार जो साइकिल से लगाया करता था रेस ।

वक़्त इरेज़र है तो एक परमानेंट मार्कर भी ।

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मोहब्बत तुम यूँ ही खिलते रहना । महकते रहना ।

>> 18 September 2015

तब तपती दोपहरें हुआ करतीं । दिन लंबे हो जाया करते । धूप हर वक़्त चिढ़ी चिढ़ी सी रहती । शायद एकाएक बढ़ गए तापमान से तालमेल ना बिठा पाने के कारण उसके साथ एक चिड़चिड़ापन आ जुड़ता. मैं तब रेलवे के उस क्वार्टर में किताबों में जी बहलाने के हज़ारों-लाखों प्रयत्न किया करता । कुछ पृष्ठ पढ़ लेने के बाद निगाहें बार बार सिरहाने पड़े फ़ोन पर चली जाया करतीं । मन में प्रतीक्षा की सुइयों का टिकटिकाना तेज़ होता चला जाता । हर बार फ़ोन को खोल देखता कि कहीं कोई मैसेज या मिस्ड कॉल तो नहीं । किन्तु वो ना हुआ करती और हर दफ़ा ही ऐसा हुआ करता ।

दोपहरें लंबी और उबाऊ हो जाया करतीं । फिर किसी बेहद मोहब्बत भरे क्षण में उसका कोई मैसेज आ जाया करता । तब लगता ही नहीं कि मैं यहाँ इस किराये के क्वार्टर में जून की किसी ऊबती दोपहर को खर्च कर रहा हूँ । तब लगता कि मैं उसके साथ हूँ । वो मेरे साथ है । ये मोहब्बत से भरे दिन हैं । जिनमें मैं जी रहा हूँ ।

कभी कभी वो अपने परिवार के लोगों से छुपते छुपाते कोई कॉल कर दिया करती । वो 2-4 मिनट की बात भी लगता कि जीने के लिए नई वजहें दे गयी है । उन मुश्किल भरे दिनों में कभी कभी हमारी मिलने की अंतहीन कोशिशों में कोई कोशिश कामयाब दिखती तो लगता कि जीवन खुशियों का समंदर है ।

इधर उधर उगी बबूल की झाड़ियों के बीच से निकलने वाले उस कच्चे रास्ते से जुडी हैं तमाम यादें. साथ चलते हुए खिलती थीं तुम्हारी मुस्कराहट की कलियाँ. और फिर वे फूल बन हर रोज़ ही मुझे मिलते उस राह पर.

नेशनल हाईवे नंबर दो पर खड़ा मैं तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में तका करता हर उस ऑटो को जो आया करता तुम्हारी ओर से. प्रत्येक क्षण में मैं जीता स्मृतियों के संसार को. भावनाओं का समंदर मुझे बार बार ही आ भिगोता. और जब तक तुम आ न जाया करतीं मैं देखता रहता उस नेशनल हाईवे पर आने जाने वाले हर उस ऑटो को जिसमें तुम मुझे ना दिखा करतीं.

तुम्हारा आना, ऑटो का रुकना और तुम्हारी मुस्कराहट के संसार में मेरा शामिल हो जाना. वे क्षण स्मृतियों के धरातल पर हर दिन ही एक नया पौधा अंकुरित कर देते हैं । हर दिन ही खिलते हैं उनमें मोहब्बत के रंग बिरंगे फूल ।

मोहब्बत तुम यूँ ही खिलते रहना । महकते रहना ।

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इतिहास जो नष्ट कर दिया गया

>> 05 September 2015

बहुत बार सोचता हूँ कि इतिहास के पन्ने इकतरफ़ा सोच, मनमर्ज़ियों, अंधेरों को दबाये हुए उजालों से ही क्यों पटे पडे हैं. क्योंकि जिस तरह की और जैसी शक्तियाँ आज काबिज़ हैं और जिन्होंने इतिहास के लिखे जा रहे पन्नों पर चलने वाली कलमों और विचारों को अपनी मुट्ठी में कैद कर रखा है. ऐसा ही पूर्व के वर्षों में होता रहा होगा.

उनकी समझ और सोच सीधी एक बात पर टिकी रही कि यदि आप वो नहीं लिखेंगे या वैसे नहीं रहेंगे जैसे हम चाहते हैं तो आप क़त्ल कर दिए जाएंगे और आपके क़ातिलों का ब्यौरा स्वर्ण अक्षरों में इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो जायेगा. फिर बाद के आने वाले वर्षों में लोग वही पढ़ेंगे जो उन्हें हम पढ़ाना चाहते हैं. लोग वही समझेंगे जो हम उन्हें समझाना चाहते हैं. जैसे आज के समय में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदियाँ लगाये जाने के सोचे समझे षणयंत्र रचे जा रहे हैं तो आप केवल इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि पूर्व के वर्षों में क्या रहा होगा.

इतिहास के कितने वे पन्ने जला कर राख कर दिए जाते रहे होंगे जिनमें उस समय की सच्चाइयाँ दर्ज़ रही होंगीं. जैसे आज के समय में दिन दहाड़े क़त्ल किये जा रहे हैं, लोगों को खरीदा जाता है, डराया धमकाया जाता है, ललचाया जाता है तो आप स्वंय सोचिये कि पूर्व के सैकड़ों हज़ारों वर्षों से क्या क्या होता आया होगा.

चन्द बचे खुचे, अधजले या संघर्षों के बीच संरक्षित रह गए इतिहास के पन्ने उस बीते समय की गवाही देते हैं तो हम स्वंय अनुमान लगा सकते हैं कि एक भरा पूरा सच्चाइयों से भरा इतिहास कैसा रहा होगा और यदि होता तो कितना कुछ भरा होता उसमें. शोषण की हज़ारों हज़ार साल चलती रहने वाली दास्तान. स्त्री, दलित, आदिवासी और शोषित वर्ग की लाखों करोड़ों अरबों पन्नों में भी ना समा सकने वाली दास्ताँ.

हमारे बीते समय का असल इतिहास जो दबा दिया गया, कुचल दिया गया, रौंद दिया गया, जला दिया गया और फिर जैसे जी चाहता गया वैसे लिखा जाता रहा अपनी मनमर्ज़ियों का सुनहरा इतिहास.

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शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस के आने पर बधाईयों का ढेर लग जायेगा.बधाइयां देने और लेने का यह खेल खूब चलेगा. कुछ लोग अपने शिक्षकों की याद में पोस्ट लिखेंगे. कुछ तस्वीरें लगाएंगे. कोई बुराई करेगा. कोई प्रशंसा करेगा. यह क्रम चलता ही रहेगा.

असल में हम सबने शिक्षकों के साथ ढ़ेर सारे सपने और ढ़ेर सारी आशाएँ जोड़ रखी हैं. और हम उनमें कोई कमी नहीं होने देना चाहते बल्कि उनमें दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि ही होती जाती है. हमने शिक्षा पद्धिति बदली, मार्किंग सिस्टम से ग्रेडिंग सिस्टम पर आ गए. विद्यालयों का मॉडर्नाइजेशन हो गया. ड्रेस का, किताबों का, लंच बॉक्स का, पेन-पेन्सिल का सभी का मॉडर्नाइजेशन होता ही जा रहा है या किया जा रहा है. फीस वृद्धि और उससे जुड़े अन्य मसलों के मॉडर्नाइजेशन की तो आप बात छोड़ ही दें. उसमें तो हम सबके बाप बनते जा रहे हैं.

असल में होना क्या चाहिए? क्या हमने शिक्षक से जुडी जरुरी बातों पर ध्यान दिया. शिक्षक के विकास, उसके अपने शैक्षिक स्तर में विकास के बारे में हम कभी कोई बात ही नहीं करते. उसके क्रमिक विकास से जुड़ी ट्रेनिंग्स, पढ़ाने के अलग अलग और नए तरीकों की ट्रेनिंग, उससे जुडी जानकारियों से सम्बंधित कहीं कोई बात ही नहीं होती. यदि कहीं कुछ ट्रेनिंग्स हैं भी तो वे खानापूर्ति ही सिद्ध होती हैं. अच्छे शिक्षाविदों का बहुत बड़ा आभाव है हमारे देश में और वह बीतते दिनों में बड़ा ही है. सकारात्मक वृद्धि की बात तो छोड़ ही दें.

असल में एक अच्छी शिक्षा पद्धिति और उसके क्रियान्वयन के लिए अच्छे शिक्षकों का होना बहुत आवश्यक है. हमें इसीलिए अन्य मॉडर्नाइजेशन की बातों से पहले शिक्षकों के विकास, उनकी अपनी ट्रेनिंग्स और बेहतर भविष्य के बारे में बात करनी होगी और उसके बारे में ज़मीनी तौर पर कुछ करना होगा. अन्यथा इन तमाम मॉडर्नाइजेशन के बावजूद हम अपने देश की शिक्षा व्यवस्था में समन्वय बनाने में पिछड़ते चले जायेंगे.

फिर एक शिक्षक दिवस बीतेगा और हम आने वाले शिक्षक दिवस को हर्षोल्लास से मनाने की योजनाओं पर मीटिंग्स कर, शामियाने का हिसाब चुकता करके, स्पीकर्स और कुर्सियों को वापस पहुँचाने के काम में स्वंय को व्यस्त कर लेंगे.

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जाति प्रथा, आरक्षण, आर्थिक पिछड़ापन, वैचारिक पिछड़ापन और बराबरी की बातें

>> 30 August 2015

मैं अक्सर देखता और सुनता हूँ कि आरक्षण के मुद्दे पर वो वर्ग जिसकी वजह से आरक्षण की नौबत आई बहुत ज्यादा बेचैन हो उठता है. कभी कोई स्टेटस ठेल रहा है, कभी कोई स्टेटस फॉरवर्ड कर रहा है, कभी कोई फ़ोटो शेयर कर रहा है. लेकिन कभी जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए इस वर्ग ने कभी कोई स्टेटस न तो लिखा और न ही फॉरवर्ड किया. एक नार्मल मनोरंजन वाले स्टेटस पर आपको इतने लाइक मिल जायेंगे और यदि आप जाति प्रथा से सम्बंधित कोई लेख, कोई फ़ोटो, कोई स्टेटस डालेंगे तो मज़ाल है कि उतने लाइक या कमेंट मिल जाएं.

यह है मानसिकता जो हज़ारों सालों से वहीँ की वहीँ जमी हुई है. उखड़ने का नाम ही नहीं लेती.

मैं अपने उन साथ में पढ़ने वाले लड़कों से पूंछना चाहता हूँ कि तुम्हारे साथ पढ़ने वाले उस वर्ग के सभी के सभी 75% लड़के क्या मुझसे बेहतर थे. मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहता किन्तु क्या वो फलाना लड़का क्या मुझसे हर मामले में बेहतर था. क्या ज्यादातर वे 75% लड़के कोचिंग करके नहीं आये थे. और शेष 25% बामुश्किल कोई कोई ने कोचिंग की शक्ल देखी होगी.

और आप खुद जानते हैं कि उन 75% में से बहुत से कान्वेंट और प्राइवेट स्कूल के पढ़े हुए थे. कुछ की अंग्रेजी दूसरों को inferiority complex पैदा करने के लिए काफी थी. और आप चाहते हैं कि आपके उन अस्त्र शस्त्रों से निहत्ते लोग लडें और जीत जाएं.

आपकी जाति प्रथा को ख़त्म करने की ललक तो उसी दिन दिख गयी थी जब आपमें से ही एक लड़का अपने बचपन से लेकर बड़े होने तक के संस्कारों के साथ शराब पीकर 'चमार' शब्द का हीनता के साथ प्रयोग कर रहा था. और दरवाजे पीट पीटकर गालियाँ बक रहा था. तब आपमें से कोई आगे नहीं आया. आपने उसको 25% के क्रोध से बचाने के लिए एक कमरे में बंद कर लिया था. आपने बाद के दिनों में भी कभी उसको नहीं समझाया कि उसने जो किया वो गलत था. उसकी सोच गलत है. वो अपने में सुधार कर ले.

उन 75% में से ज्यादातर जिनके पहले से नाते रिश्तेदार कंपनियों में बैठे हैं और जिनके नंबर, जिनका ज्ञान मुझसे कितना दूर था. वे सबके सब उन्हीं कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं. कोई क्षेत्रीयता की दुहाई देकर तो कोई जाति का उपयोग कर सबके सब चिपक गए. तो आप बताइये मेरे उनसे ज्यादा नंबर, ज्यादा ज्ञान किस काम का हुआ.

और आप जो दलितों, आदिवासियों के जलाये जाने, उनका शोषण किये जाने, उनकी बेटी बहुओं का बलात्कार किये जाने, उनको उनकी ज़मीनों से बेदखल किये जाने को एक सामान्य प्रक्रिया मानते चले आ रहे हैं और मान रहे हैं तो आप ये जान लीजिए कि आप कहीं से भी बराबरी की बात न तो सोच रहे हैं और ना ही कर रहे हैं.

न तो आप खबरें पढ़ते और ना ही उन ख़बरों का कोई संज्ञान लेते जिन ख़बरों को हमारी मेन स्ट्रीम मीडिया कभी नहीं दिखाती.

तो माफ़ करना आपके द्वारा आरक्षण के विरोध में स्टेटस ठेलना, फ़ोटो शेयर करना या किसी और की स्टेटस को शेयर करना मुझे आपके द्वारा कहीं से भी सभी को बराबरी पर लाने की बात नहीं लगती.

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स्मृतियों में बचा रहेगा शहर

अपना क्या है?
वो शहर या गाँव जहाँ पैदा हुआ और फिर जिसे पीछे छोड़ शहर में जा बसा मेरा भरा पूरा परिवार. या वो शहर जहाँ पिता साथ ले आये थे माँ, भाई और बहन के साथ. जहाँ पला बढ़ा, अपनी स्कूल ख़त्म की. या वो बाद का शहर जहाँ मैं अपने परिवार के साथ फिर से जा बसा और अपनी किशोरावस्था से युवावस्था की ओर चलते चले जाने वाले रस्ते पर भटकते हुए संभला. या वो शहर जहाँ अपना प्रोफेशनल कोर्स करने जा बसा और अपने तीन बरस बिताये. फिर बाद के बरसों में जहाँ ज़िन्दगी को जीने लायक बनाने के लिए संघर्ष करने के लिए जा पहुँचा वो बड़ा शहर. जहाँ भाग दौड़ मची रहती है. और जिस शहर से वापस में फिर से एक छोटे शहर जा पहुँचा ये सोच कि कम स कम वहां दो वक़्त की रोटी का इंतेज़ाम तो है. या ये शहर जहाँ आज में बिस्तर पर लेटा हुआ अपने बीत गए दिनों को सोच रहा हूँ.

आखिर अपना है क्या? वो बीत गया वक़्त जो अलग अलग शहरों में बंटा हैं. जिसके साथ बहुत से दुःख और कुछ सुख जुड़े हुए हैं. या वे चेहरे जो मिले और पीछे छूटते चले गए, उनके अपने अपने शहरों में. वो दोस्ती के किस्से, वो आरामतलबियां, वो ठहाके, वो उनका बुरे वक़्त में साथ न देना या कुछ भले चेहरों का आगे बढ़ गले लगा लेना.

वो हर शहर के साथ चिपकी माँ की याद, भाई बहन के साथ बिताये वक़्त की थपकियाँ या अपने इश्क़ की मीठी बातें-मुलाकातें.

बहुत कुछ है समेटने के लिए,  कहने के लिए और ये किस्सा यूँ ही चलता ही रहता है. एक तितली मन के आँगन के फूलों पर बार बार आती है और मैं हर बार ही विस्मय बोध से भर जाता हूँ. मेरे भीतर का रिक्त पड़ा संसार किसी पुराने दृश्य से बार बार भर उठता है. कोई पुराना बचपन का राग स्मृतियों में बज उठता है.

और बीत गए शहर हर दफा ही मेरे सामने आ खड़े होते हैं. कोई चौराहा, कोई किसी शहर की दुकान, किसी बस या ऑटो की सीट पर बैठा मैं, किसी शहर की दीवार पर लगे फिल्मों के पोस्टर, किसी शहर के ठेले पर खड़ा बिरयानी खाता मैं,  या किसी दुसरे शहर के किसी ठेले पर खड़ा छोले कुल्चे खा दिन का कोटा पूरा कर महीने को हाथों में समेटता मैं, किसी शहर के ढाबे में बैठा रूखे तंदूरी आलू परांठे खाता मैं.

किसी शहर में अपनी सरकारी नौकरी की खबर पाकर शाम के समय में झूमता मैं या अपने प्रोफेशनल दोस्तों द्वारा उनके किराये के कमरों से निकाल दिया गया रात के अँधेरे में खड़ा मायूसी में डूबा मैं.

असल में सब कुछ ही तो अपना है. कुछ कुछ हिस्सा हर शहर ने, हर ख़ुशी ने, हर गम ने स्मृतियों में ले रखा है. स्मृतियों का एक अपना संसार है. हम उसमें कुछ भी घटा बढ़ा नहीं सकते. मैं उसमें बसने वाले दुखों से पीछा नहीं छुड़ा सकता. मैं जब तब सामने आ खड़े होने वाले सुखों की लहरों से खुद को भिगोने से नहीं रोक सकता.

शहर दर शहर, हम असल में फ़िल्टर होते चले जाते हैं. हर शहर हम में से कुछ निचोड़ लेता है. शायद इंसान होते रहना ही बचा रह जाता है. यदि हम में बची रह गयी है चेतना तो हम खुद को थोडा बचा कर रख पाते हैं. और इन्हीं सब में कहीं बचा रह जाता है शहर थोडा थोडा. बचपन के पैदा हुए शहर से लेकर हमारे आज के शहर तक.

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क्रूरता (कहानी)

>> 23 August 2015

पिछले सालों से खेती में उसे कुछ भी नहीं दिख रहा था और कर्ज़ पर क़र्ज़ का बोझ चढ़ता ही चला जा
रहा था. और जो मुट्ठी भर अरमान थे वे सब पानी की तरह बह गए थे. आप समझते हैं कि गाँव के
आदमी के कितने मामूली अरमान होते हैं. और उसे मिलता क्या था कभी रोटी है तो सब्जी नहीं और
सब्जी है तो रोटी नहीं. तो उसने इस बरस सोच लिया था कि अब शहर जाना है. जहाँ कोई काम ढूँढ कर वो अपने परिवार का गुजारा कर लेगा. और वह अपनी पत्नी के साथ शहर चला आया था.

देश में जहाँ देखो वहां विकास की बातें हो रही थीं. समाचार चैनल, पत्र-पत्रिकाएं, टीवी की बहसें सभी
जगह विकास होता ही चला जा रहा था. मुट्ठी भर लोग बाकी के बचे लोगों की खातिर किसी भी क़ीमत पर विकास लाना चाहते थे. और काफी हद तक वे इसमें कामयाब होते जा रहे थे. देश के विकास के लिए बाहर कम्पनियाँ खोलने की अनुमति ली जा रही थीं, बैंकों को आदेश थे कि विकास की खातिर उन
चन्द मुट्ठी भर लोगों को कम से कम ब्याज़ पर ऋण दिया जाय और यदि पुराना बकाया कोई है तो
उसे माफ़ कर दिया जाय. हर संभव कोशिशें की जा रही थीं कि देश को उसके पिछड़ेपन से आज़ादी मिल सके.

आप जानते हैं कि दोपहरें जब शाम बनकर बीत जाती हैं, तब रात के अँधेरे में बनाये जाते हैं उस
विकास के रोड मैप और वे उँगलियों पर गिने जा सकने वाले लोग हमारे देश में नियमों को तोड़ते हैं,
मरोड़ते हैं और सुबह के उजाले में की जाती हैं उन पर बहसें और वे तब तक चलती हैं, जब तक झूठ को सच और सच को झूठ होता हुआ महसूस न करा दिया जाए. टीवी आपको दिन भर परोसता रहता है
पहले से तय की गयी योजनाएं. अख़बार के मुख्य पृष्ठ भर दिए जाते हैं उन विकास के रोड मैपों से.
बाकी के बचे हुए लोग देखते हैं, सुनते हैं और फिर किसी एक दिन वही सच लगने लगता है जो बीते
दिनों से आपको परोसा जाता रहा था.

वह पत्नी के साथ शहर चला तो आया था लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि आखिर उसे करना क्या है जिससे कि वह अपना, अपनी बीवी का और गाँव में रह रहे परिवार का पेट भर सके. शहर के ही एक
बहुत ही पुराने, मैले और सस्ते हिस्से में उसने अपने रहने का अस्थायी बंदोबस्त किया था. और अगर उसे यहाँ टिके रहना था तो उसके लिए उसे जल्द से जल्द कोई काम पकड़ना था. नहीं तो उसे देश में
जल्द से जल्द हो जाने वाला विकास टिके नहीं रहने देगा.

उसने हर नए दिन में कोशिशें कीं और हर बार ही वह थका हारा लौटता. शहर में सब कुछ था. ऊँची ऊँची इमारतें थीं, उनमें ऊँची ऊँची ईएमआई भर कर रहने वाले लोग थे. उन तक पहुँचने के लिए ईएमआई
पर ही ली हुई कारें थीं. जिनमें बैठा हुआ जीवन सड़क पर चलने वाले को विकसित और सुखद लगता था. रेस्त्रां थे, बार थे, उनमें नाचने-गाने वालियां थीं. कुछ मर्ज़ी से तो कुछ बिना मर्ज़ी के उस शहर की दौड़ में बने रहने के लिए उनमें आते-जाते थे. पक्के विकास के प्लान पर बनी कच्ची पक्की सड़कें थीं.
उन पर चलने वाली कुछ सरकारी और बहुत सी गैर सरकारी बसें थीं, गाड़ियाँ थीं. चौराहे पर चमकती लाल पीली हरी बत्तियां थीं. जो लोगों को रोक कर उन्हें सुरक्षित रखना चाहती थीं लेकिन लोग न जाने किस दौड़ में दौड़े जाने के लिए आतुर थे. सड़कों के इधर उधर लगे बड़े-बड़े बैनर थे. नयी-नयी वेल प्लांड कॉलोनियां, जिनमें विला, 2 बैडरूम, 3 बैडरूम फ्लैट के बेतहाशा विज्ञापन थे. उसके नीचे ठेले पर सोता नंगे बदन आदमी था. बगल से बहती कच्ची पक्की नाली थी. आगे चल कर शराब के नशे में सड़क के किनारे पड़ा आदमी था. जगमगाती रौशनी के साथ खुली हुयी अंग्रेजी शराब के ठेके की दुकान थी.
सड़क पर बने हुए जगह-जगह लोकल बस स्टॉप थे. उनमें से ही किसी बस स्टॉप की स्टील की बैंच पर सोता कोई भिखारी था. जो दिन भर भीख माँग कर थका मांदा वहां पड़ा हुआ था और जिसे सुबह उठकर फिर से वही प्रक्रिया दोहरानी होगी. कल सुबह उसे फिर से दयनीय से दयनीय होने की एक्टिंग करनी होगी. कहीं कहीं आयुर्वेदिक जड़ी बूटी का बोर्ड बाहर लगा, तम्बू गाड़े उसमें सोता आठ दस लोगों का
परिवार था.

फिर एक दिन उसकी आशाओं में पंख लगाने वाली उसकी पत्नी ने एक काम खोज निकाला था. उसने घरों में झाड़ू पौंछा का काम खोज लिया था. जो उसे पास में ही रहने वाली सुनीता ने दिलवाया था. वो
खुद भी बीते कई सालों से ये काम कर रही थी. जिन घरों में वो काम करती थी उन्हीं घरों में रहने वाली मालकिनो ने उससे किसी नयी काम वाली के लिए पूँछा था कि उनकी सहेलियों के घरों में काम करने वाली औरत ने काम छोड़ दिया है. और उन्हें नई काम वाली की जरुरत है. तब सुनीता ने उसे उन घरों में लगवा दिया था.

जब 2-3 महीने इसी तरह जैसे तैसे गुजर बसर करके बीत चुके थे तब उसे एक मॉल के बाहर चौकीदारी करने का काम मिल गया. ड्यूटी शाम के 8 बजे से सुबह के 8 बजे तक की थी और तनख़्वाह 4 हज़ार.
उसने उसके लिए बिना सोचे समझे एक पल बिना गवाए हामी भर दी थी. वैसे भी वह पिछले बीते
महीनों से बिलकुल बेरोज़गार था. ऐसा बेरोज़गार जिस पर पहले से भी कभी कोई काम नहीं रहा था.
और उसे शहर में टिके रहना था. आप समझते हैं कि विकसित होते शहर में टिके रहने के लिए आप पर स्वंय को विकासशील बनाये रखने का बोझ बढ़ता ही चला जाता है. आप ऐसी जगह खड़े होते हैं जहाँ से आप पीछे वापस नहीं लौट सकते. आप अपना अतीत छोड़ कर ही वर्तमान की जगह पर खड़े हुए थे और आपको वहां से आगे बढ़ना ही होता है. नहीं तो आप जहाँ खड़े हैं वहां तक पहुँचने के लिए आपको कोई धक्का देकर स्वंय को वहां खड़ा कर लेता है.

जिस मॉल में उसने चौकीदारी की नौकरी पकड़ी थी, उसी से कुछ दूर हटकर एक चाय, बीड़ी, गुटखा,
सिगरेट, पान, कोल्ड ड्रिंक, आलू के परांठे बेचने वाले की ढाबे की शक्ल की दुकान थी. जिसे ना तो आप पूरी तरह ढाबा कह सकते और नाहीं एक पूरी दुकान. उसी ढाबेनुमा दुकान पर मॉल के भीतर काम करने वाले लड़के और कभी-कभी लड़कियां चाय, सिगरेट पीने या परांठा खाने या ज्यादा हुआ तो पानी के
पाउच खरीदने चले आते थे. वही पानी जो मॉल के अंदर बने रेस्टोरेंट के अंदर 25 रुपये का मिलता था, उसी प्यास को वे बाहर आकर एक रुपये में बुझा लेते थे. वहां एक छोटा सा टीवी भी दीवार पर टँगा हुआ था. जिस पर कभी गाने, कभी क्रिकेट, कभी समाचार, कभी आधी अधूरी फिल्में चला करती थीं. और
वहां बैठे लोग अपना जी बहला लिया करते.

उसने भी वहां बैठ अपनी ड्यूटी से पहले का समय काटना शुरू कर दिया था. मॉल के साथ ही कारों,
मोटर साइकिलों की पार्किंग थी और उसे बताना होता था कि गाडी वहां पार्क कर दीजिए. या कभी कभी मॉल के अंदर से या बाहर से मॉल के अंदर माल पहुँचाने वाली गाड़ियाँ आ खड़ी होती थीं.  रात के 12 - 01 बजे तक का समय शहर की जगमगाती रौशनी में कट जाता था. मुश्किल होता था तो उसके बाद का समय. हालांकि वह बीच बीच में सुस्ता लेता था लेकिन फिर भी आप जानते हैं कि रात का एक अपना नशा होता है. गरीब के लिए भी उतना और अमीर के लिए भी उतना. विकसित और अविकसित सभी के लिए रात वही नशा लेकर आती है.

हालांकि उसे रात को जागने के अपने पुराने अनुभव थे जब वो रात को अपने खेतों में पानी लगाया
करता था. उसके गाँव में देर रात से बिजली आया करती थी और तब अलग अलग रातों में अलग अलग खेतों के मालिक अपने खेतों में खड़ी फसलों में पानी लगाया करते थे.


खेतों में लगाया जाने वाला पानी भी क़र्ज़ पर लगाया जाता था और उसको चुकाने के लिए फसल के
बिकने तक की मियाद दी जाती थी. फिर वह क़र्ज़ हर बरस दिन दूना, रात चौगुना बढ़ता चला जाता था और फसलें कभी सूखे में, कभी बाढ़ में, कभी ओले में, कभी बिन मौसम बरसात में बर्बाद हो जाती थीं. फिर उन पर सरकार के दिए जाने वाले सहायता कोष होते थे जो किसानों के नाम पर चन्द मुट्ठी भर लोग खाली कर देते थे. ये वे लोग थे जो चाहते थे कि फसलें बर्बाद हों और तब सहायता कोष बनाये
जाएँ. जिन पर इनका उनसे ज्यादा अधिकार था. किसान या तो मर जाते या क़र्ज़ में दबते चले जाते.

ऐसे ही किसी बीते दिनों की ड्यूटी से पहले के समय में टीवी पर उसने एक नेता के बयान सुने थे जिसमें नेता तमाम टीवी चैनलों को बता रहा था कि सभी किसान खेती के नुकसान से नहीं मरते. ज्यादातर तो अपने इश्क़ के चक्करों, मोहब्बत में नाकाम होने या अपनी पारिवारिक कलह के कारण मरते हैं.
वे अपने बयान ऐसे दे रहे थे जैसे उन्होंने कोई रिसर्च पेपर पढ़ कर सुनाया हो. उनके इस बयान पर
विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने तीखे तेवर अपनाये थे. और अपने रिसर्च पेपर के बारे में बताते हुए कहा था कि उनकी सरकार के समय में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े इतने बुरे नहीं थे. जिस पर
किसी अन्य विपक्षी पार्टी ने कहा था कि ये चोर चोर मौसेरे भाई हैं. इन्होंने सूखे से मरते किसानों को
पानी नहीं दिया था लेकिन क्रिकेट के मैदान को सींचने के लिए शहर भर के टैंकर ला खड़े किये थे. जिस खेल पर बाद में बदनामी के दाग लग गए. औरवे जो उस सरकार के समय में भी सुरक्षित थे और इस
सरकार के समय में भी सुरक्षित हैं जिन्होंने अवैध रूप से पैसा कमाया.

आज उसे पूरे 26 दिन हो गए थे और वो अपनी ड्यूटी से पहले उसी ढाबेनुमा दुकान में बैठा था. टीवी
चल रही थी. गानों के चैनलों से होती हुई. एम टीवी के आधुनिक शो जिसका प्रायोजक भी उन्हीं चन्द
मुट्ठी भर लोगों में से कोई था. और जिसमें आधुनिक होना सिखाये जाने की हर संभव कोशिश की जा रही थी, से होती हुई. समाचार के चैनल पर आ अटकी थी जिसमें देश के एक नेता अपने श्रीमुख से
किसी मंच पर खड़े हो सामने खड़ी और बैठी भीड़ को बता रहे थे कि गैंग रेप तो ही ही नहीं सकता. यह
प्रैक्टिकली संभव नहीं. और लड़कियां अपने आप किसी एक से सम्बन्ध बनाकर बाकी लड़कों को
बदनाम करती हैं. और कभी ऐसा इक्का दुक्का केस हो भी तो लड़के हैं, गलती हो ही जाती है. उसके
लिए किसी को फाँसी पर थोड़े चढ़ा दोगे. लड़के हैं, गलती हो ही जाती है. लड़कियां ऐसे कपडे पहनती हैं. जीन्स-टॉप पहन कर घूमती हैं, अपनी मर्यादा में नहीं रहतीं. तो ऐसे में लड़के क्या करें.

उसका मन खबर देखकर बेहद उखड गया था. आखिर हम विकसित होकर किस राह पर जा रहे हैं.
हमारी सोच, हमारी समझ कहाँ खड़ी-खड़ी अपना बदन खुजा रही है. वह उठ खड़ा हुआ और अपनी
ड्यूटी के लिए मॉल की ओर बढ़ गया.

रोज़ की तरह ही गाड़ियाँ इकठ्ठा हुई और जब रात गहराने लगी तो एक एक कर वे जाने लगीं. बस
इक्का दुक्का गाड़ी ही खड़ी दिख रही थीं. रात गहराने लगी थी. एक बजे को पार कर रात सुबह की
तलाश में ऊँघने लगी थी. वह भी थोडा सा सुस्ताने लगा था. उसने कुर्सी की टेक लेकर अपने कंधे,
अपना सिर ढीला छोड़ दिया था. तभी कहीं से रोने और चीखने की आवाज़ आयी. उसने यहां वहाँ देखा. उसे कोई नहीं दिखा. वह आवाज़ का रास्ता पकड़ उसकी और बढ़ने लगा. मॉल से ही चिपके दबे छुपे
तहखाने जैसी जगह से रोने और चीखने की आवाज़ें तेज़ हो गयीं. वह दौड़ता भागता उधर की और
पहुँचा. शराब के नशे में धुत्त दो लड़के किसी बच्ची की ज़िन्दगी लेने पर आमादा थे. वो भागा और उसने एक लड़के को पकड़ना चाहा. लड़के ने हाथापाई करते हुए देशी कट्टा निकाल लिया और दहाड़ता हुआ बोला "भाग जा कुत्ते नहीं तो मारा जायेगा". उसने फिर कुछ कोशिश की और इस बार उसने कट्टे से
फायर कर दिया. वह वहां से भागत हुआ दूर हट गया. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. दिमाग बिलकुल सुन्न, शरीर पसीने और डर से भर गया. वह दौड़ता हुआ वहां से मॉल के बाहर आया. वहाँ से आधा
किलोमीटर की दूरी पर बनी पुलिस चौकी की ओर बेतहाशा भागा. और हाँफता हुआ पुलिस चौकी के
कांस्टेबल की कुर्सी पर गिरा. वो हाँफता जा रहा था और बोलने की कोशिश में लगा हुआ था.

-वो...वो लड़की को मार देंगे
-"कौन, क्या हुआ, क्या बके जा रहा है, ठीक से बोल क्या बात है" कुर्सी पर ऊँघता कांस्टेबल बोला
-मॉल....मॉल के पास वो लड़के उस बच्ची को कहीं से उठा लाये हैं...उसे बचा लो
-"अरे सांस ले ठीक से और फिर बता, क्या बात है" ऊँघता और खिसियता कांस्टेबल बोला
-साहब मैंने मॉल के पास में उन दो लड़कों को उस बच्ची का बलात्कार...साहब मैंने उन्हें रोकने की
कोशिश की लेकिन उनके पास हथियार है
-तुम कौन हो?
-साहब में वहां मॉल का चौकीदार, उसे बचा लो



अच्छा, अच्छा रुको, चलते हैं, उसने ऊँघते दरोगा को जगाया और अपनी गाड़ी उठाकर उसके साथ
मॉल की और चल दिए. गाडी रुकी और वे पुलिस वाले उसके बताये स्थान पर पहुँचे, वहाँ कोई नहीं था, हाँ कुछ खून के कतरे यहाँ वहां पड़े थे. पुलिस वाले थोडा सतर्क हुए और आपस में कहने लगे “ढूँढो सालों-कुत्तों को”. आस-पास ढूँढा लेकिन कोई नहीं मिला. उन्होंने गाडी घुमायी और आस पास की सड़कों को तलाशने लगे. थोडी दूरी पर ही सड़क के किनारे के अँधेरे में लहूलुहान अपनी ज़िन्दगी से जूझती वो
बच्ची पड़ी थी. पुलिस वालों ने उसे तुरंत उठाया. चौकीदार को मॉल पर छोड़ वे उस लड़की को ले
अस्पताल को भागे.

वो मॉल के उस गेट पर खड़ा मन ही मन उस बच्ची के बचने की प्रार्थनाएँ करता, उन लड़कों में से एक लड़के के चेहरे को याद करने लगा. जो गाडी वहाँ अब नहीं था उसका नंबर उसके दिमाग में आने लगा. फिर से पुलिस की गाड़ी मॉल के गेट पर आकर रूकती है. पुलिस वाले उसी गाडी में बैठाकर चौकी ले
जाते हैं. उससे पूँछताछ करके थानों में सूचना पहुंचा देते हैं. जो पुलिस की गाड़ियाँ गश्त पर थीं उनकी
रफ़्तार और तेज़ हो जाती है.

पुलिस को कुछ सूत्र पकड़ में आ जाते हैं. और वो रफ़्तार फिर कुछ धीमे पड़ जाती है. सुबह पुलिस मॉल के मालिकों और वहां की अंदर सजी संवरी दुकानों के किरायेदारों से पूछताछ करती है. उसे फिर सुबह
बुलाया जाता है. उसके नाम, पते, गाँव, खेत खलिहान के बारे में पूरी मालुमात की जाती है.

वे असल में आदमी की गहराई पकड़ना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि यह आदमी कमज़ोर निकले. कमज़ोर को फिर जिधर चाहे उधर मोड़ा जा सकता है. डराया, धमकाया, समझाया जा सकता है. उसके भले के बारे में उसे एक लंबा लेक्चर पिलाया जा सकता है और जो फिर भी ना माने तो उसे बताया जा सकता है कि अभी उसका विकास नहीं हो पाया है. वो इस विकसित होते जा रहे देश में खामखां रूकावट बन रहा है. क्राइम रेट बढ़ा रहा है. जिसको पुलिस दिन ब दिन रजिस्टर में दर्ज़ ना कर कम करती जा रही है उसमें वह बाधा उत्पन्न कर रहा है. और उसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है.

मॉल वाले उसकी इस बेवकूफी से सकते में आ गए हैं. वे समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या किया जाय.
उन्होंने अगले दिन के अख़बार में बहुत मामूली हिस्से में उस रात की खबर को पढ़ा है. वे उससे बहुत खिन्न हैं. मामूली ही सही लेकिन उनके मॉल का नाम तो ख़राब हुआ और हो रहा है. लोग क्या सोचेंगे. क्या कहेंगे. जिस काम के लिए उस चौकीदार को रखा वो अपना काम ठीक से नहीं कर रहा.
पिछले तीन चार रोज़ से पुलिस दिन रात उससे पूछताछ कर रही है. बच्ची की तबियत में ज्यादा सुधार नहीं है. अस्पताल सरकारी है और वहां किसी को कोई जल्दी नहीं होती. बच्ची के माँ बाप जो कि बहुत गरीब हैं और जो मॉल के आस पास ही सड़क से ज़रा सा दूर बसने वाली उस झोपड़ पट्टी वाली गली के रहने वाले हैं. जहाँ से या तो वे लड़के उसे उठा लाये थे या वो बच्ची रास्ता भूल कर मॉल की ओर आ
गयी थी.

आज 30 वां दिन है और उससे रहा नहीं गया. कुछ है जो उसके अंदर टूटता ही चला जा रहा है. उस टूटन से जो पीड़ा भीतर ही भीतर ज़हर की तरह फैलती चली जा रही है, उससे बच पाना उसे नामुनकिन लग रहा है. वह अस्पताल की ओर चल पड़ता है. वह अस्पताल के बाहर खड़ा हुआ अंदर ही अंदर काँप रहा है. स्वंय को धक्के देते हुए वह जनरल वार्ड के दरवाज़े पर ठिठक गया. वहाँ रोने की, सिसकियों की,
चीखने की, छाती पीटने की आवाज़ें चारों और फैली हुई हैं. पीछे से उसे धकियाते हुए टीवी चैनल के
पत्रकार अंदर घुसे चले जा रहे हैं. कैमरामैन को हिदायत दी जा रही हैं कि बच्ची के माँ बाप का पूरा
क्लोज अप आना चाहिए. उनके रोने, चीखने, चिल्लाने की आवाज़ें ठीक से रिकॉर्ड होनी चाहिए.

वह धड़ाम से गिरता पड़ता दरवाज़े के पास खुद को संभाल पाने में नाकाम साबित होता है. उसके भीतर के आंसुओं का सैलाब उसके भीतर ही जम गया है. उसका सांस लेना दूभर होता जा रहा है. वार्ड में एकाएक भीड़ बढ़ती चली जा रही है. और वह भीड़ से छिटकता हुआ अस्पताल के बाहर कब पहुँच गया उसे पता ही नहीं चला. वो पैदल चलता ही चला जा रहा है. वो दौड़ रहा है. दौड़ते दौड़ते उसकी साँसे फूल गयी हैं. वो पसीने से लथपथ सड़क के किनारे कभी भिखारी से टकराता है, कभी खोमचे वाले से टकराते-
टकराते बचता है. उसका दौड़ना रुक नहीं रहा. सड़क के किनारों पर नए होर्डिंग खड़े कर दिए गए हैं.
सरकार ने विकास की गति बढाई, महंगाई कम हुई, भ्रष्टाचार कम हुआ, क्राइम  पर पूरा कण्ट्रोल है,
महिलाओं की सुरक्षा सरकार की पहली प्राथमिकता है. दूसरी ओर टंगे होर्डिंग पर एक लड़की गोरे होने की नयी क्रीम का विज्ञापन करती हुई मुस्कुरा रही है.  किसी दूसरे होर्डिंग पर सप्ताहंत में मिलने वाली छूट का विज्ञापन है.

वो दौड़ते दौड़ते मॉल पहुँच गया है. वो बेतहाशा हांफ रहा है. लग रहा है जैसे अभी ही उसका दम निकल जायेगा. वो वहीँ गेट की कुर्सी पर बैठ जाता है. तभी जिस ठेकेदार ने उसे काम पर लगवाया था वो गेट
पर आ जाता है. वो हांफते हाँफते कहता है
- मुझे मेरी तनख्वाह दिलवा दो. मैं अपने गाँव वापस जाना चाहता हूँ.
-किस बात की तनख्वाह, काम तो तुमसे ठीक से होता नहीं और आ गए तुम यहाँ पैसे माँगने
-मैं हाथ जोड़ता हूँ मुझे मेरे पैसे दिलवा दो
-जाता है यहाँ से या बुलाऊँ अभी पुलिस को, मॉल का नाम मिट्टीमें मिलवा दिया और यहाँ आ गया
पैसे माँगने. तुझे पता है तेरी वजह से मुझे क्या क्या सुनना पड़ा मालिकों से

वो हाथ जोड़ कर घिंघियाने की मुद्रा अपने पैसे देने की गुहार लगाता है. ठेकेदार के साथ के 2-4 लड़के आ जाते हैं और उसे धक्के देकर मॉल के गेट से बाहर फैंक  देते हैं.

वो सड़क पर गिरा पड़ा है.

मॉल की जगमगाती रौशनियों में विज्ञापन की तस्वीरें चमक रही हैं. वीकेंड सेल धमाका "60% डिस्काउंट पर एक्स्ट्रा 20% डिस्काउंट"


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लड़की और शहर (भाग-2)

>> 13 August 2015



प्रारम्भ के दिनों में जब लड़की इस शहर आई थी तब उसका छोटा शहर उसके साथ चिपका रहता था.वहां की पहचान और आदतें उसके चेहरे पर जमी हुईं थीं. उनसे पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता. एक शहर आपके साथ चिपका हुआ चले और वो आपके चेहरे को भी न छोड़े. वक़्त उसे खुरच खुरच के आपसे अलग करता है. फिर भी उसकी थोड़ी बहुत कतरने यहाँ वहां चिपकी रह जाती हैं.

जब वो अपनी शिफ्ट में जाने के लिए कैब में बैठी होती तो भी ये पहचानें उसके साथ चलतीं. छोटे शहर का अनजान डर उसे हरदम घेरे रहता. फिर वो धीरे धीरे अभ्यस्त हो गयी थी. कैब ड्राईवर बदले, रास्ते बदले और इस तरह करते करते उसका बदलना भी होता चला गया.

शोभित से उसकी पहचान कैब में साथ आते जाते ही हुई थी. जब वो और शोभित एक ही शिफ्ट में जाते थे. प्रारम्भ के दिनों में वह खुद से ही खुद को बाँधे रहती थी. बाद के दिनों में उसने अपनी गाँठे धीरे धीरे ढीली कर दी थीं. और फिर शोभित की बातों और मुलाकातों ने उन गांठों को पूरी तरह खोल दिया था.

शोभित इंजीनियरिंग किया हुआ था और कॉल सेंटर की जॉब शहर में टिकने के लिए पकडे हुए था. जब वो कॉलेज से निकला निकला था तो उसने अपने मतलब की नौकरी की बहुतेरी खोजबीन की लेकिन उनका कोई सिरा उसके हाथ में नहीं आया था. तब थक हार कर उसने कॉल सेंटर की नौकरी पकड़ ली थी ताकि वो शहर में टिका रहे और कॉल सेंटर की नौकरी के साथ साथ अपने मतलब की नौकरी खोजता रहे. वो मिली नहीं थी और उसको पाने के लिए उसने छोटे मोटे अलग से कोर्स करने भी प्रारम्भ कर दिए थे.

एक साल उनकी पहचान को एक दूसरे के किराये के कमरों तक पहुँचा चुका था. वे उतने ही नज़दीक आ चुके थे जितना आया जा सकता था. किराये के कमरों को उनकी पहचान हो चुकी थी. दीवार की खूँटी से लटका कैलेंडर, खिड़कियों पर टंगे परदे और कमरे के बीचों बीच लटका पंखा वैसे ही झूलते रहते जैसे कोई वहाँ हो ही न. उनकी पहचान किचन के बर्तनों, बालकनी के गमलों, टेबल पर रखी घडी, मोबाइल, और यहाँ वहां बिखरे पड़े रहने वाले कपड़ों सभी को हो गई थी.

ऐसी ही किसी बीती शाम को शोभित उसको पहली बार अपने कमरे पे लाया था. वे उतरती सर्दियों के बचे खुचे दिन थे. फरवरी में पेड़ों की पत्तियां तब झड़कर सड़कों पर उतर रातों को शोर मचाया करतीं. दोपहरें धुप के टुकड़ों में खुद को सेंक लेने के बाद सुस्ताती हुईं शाम से जा मिलतीं और रातें तब थोड़ी सर्द हो जाया करतीं लेकिन फिर भी कहीं कहीं थोड़ी गर्माहट बची रह जाती.

जैसे कि उसकी माँ सोचा करती थी कि लड़कियां सालों में तब्दील होने लगती हैं. वो सचमुच दिन, महीनों से गुजरती हुई साल बनने लगी थी. उस की इच्छाओं पर साल दर साल चढ़ते ही चले गए थे. और फिर एक समय ऐसा आता है कि इच्छाएं अपना सर उठाने लगतीं हैं और उनके सर कुचलना बेहद मुश्किल होता चला जाता है. इंसान फिर धीरे धीरे कमजोर होता है और फिर इच्छाएं अपने रास्ते खुद बना लेती हैं. हम उनको सही गलत के तराज़ू में ज्यादा दिनों तक तोल नहीं पाते. फिर अच्छी और बुरी हर तरह की इच्छाएं एक सी दिखने लगतीं हैं.

ऐसी ही उसकी और शोभित की इच्छाओं ने एक दूसरे को पहली दफा छुआ था, चूमा था और वे एक होकर नदी होकर बहने लगी थीं. उस कमरे में फिर वो नदी खूब खूब बहती. और वे उस नदी में डूबते उतराते. कभी उसमें अपनी चाहतों की नाव बना उसे चलता हुआ छोड़ देते तो कभी किनारे पे बैठ उसको नदी की धारा की दिशा में बहता हुआ देखते.

~आगे की कहानी बाद में~

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देर रात की डायरी

>> 12 August 2015

अपनी बढ़ती उम्र के कच्चे अनुभवों में लिखी अपनी तमाम कहानियां अब मुझे मुँह चिढ़ाती सी महसूस होती हैं. उनका कच्चापन और अधूरापन मुझे बार बार सबक देता है, अब में देखता हूँ तो पाता हूँ कि उनमें से ज्यादातर तो प्रेमकहानियों को लिखने की मेरी असफल कोशिशें थीं.  सच कहूँ तो बड़ी कोफ़्त होती है.

फिर यह सोचकर दिल को तसल्ली दे समझाता हूँ कि शायद वे मेरे रचनात्मक विकास की ही कड़ी थीं. कि कोई भी कहानीकार अपने पहले ही प्रयास में एक पकी हुई कहानी कहाँ लिख पाता होगा.

बाद के दिनों में जाना कि पढ़ना तो आवश्यक है ही साथ ही साथ किस को पढ़ना है और किसको नहीं यह चुनाव भी बेहद महत्वपूर्ण है. यह हमारे विकास में नई समझ, नई रचना प्रक्रिया को जन्म देता है.

फिर हमारी उम्र पर चढ़े अनुभव हमें हर रोज़ ही एक नया संसार, नए पात्र, संवाद, कथा शिल्प, कथा कौशल देते हैं. तब कहीं जाकर हमारी रचनात्मकता में मजबूती आती है.

और शायद अब बाद की लिखी जाने वाली कहानियाँ कच्ची नहीं होंगीं और यदि उनमें से कुछ प्रेम कहानियां होती भी हैं तो वे सच्चाई के धरातल और जीवन से कदम ताल मिलाती दिखेंगीं.

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लड़की और शहर

>> 11 August 2015

गहरा काला नीम अँधेरा सड़कों पर उतरने लगा था. लैम्पपोस्ट की रौशनी सड़कों को धुंधलाती हुई रौशन कर रही थी. अभी घंटे दो घंटे पहले पडी बूँदा बांदी से सड़कों पर चहबच्चे जगह जगह उभर आये थे. कहीं कहीं राह में कुत्ते भौंकते दिख जाते. रात की शिफ्ट का जीवन अपनी सुबह देखने लगा था और गाड़ियाँ शोर मचाती हुईं रह रहकर सड़क से गुजर जाती थीं.

सड़क के एक हिस्से से जो गली निकलती थी और दूर जाती हुई ख़त्म हो जाती थी . वो उसी पर चलती हुई मुड़ी और अपने किराये के घर में घुस गयी. उसकी शिफ्ट ख़त्म हुई थी और अब उसे एक नए दिन के लिए तैयार रहना था. जब वो सुबह जल्दी उठेगी, अपने सभी काम ख़त्म कर, अपना नाश्ता बना खाकर, अपनी जरुरत का सामान अपने साथ ले अपनी शिफ्ट पर चली जायेगी.

वो जिस शिफ्ट में काम करती थी उसमें उसकी ही तरह की तमाम लड़कियां जिनके नाम आप कुछ भी रख सकते हैं या पुकार सकते हैं, उसके साथ काम करती थीं. असल में उनका नाम इतना महत्वपूर्ण नहीं था. नाम तो कोई भी रखा जा सकता है और पुकारा जा सकता है. किन्तु जिस कंपनी में वे काम करती थीं वह महत्वपूर्ण थी. कुछ संख्या लड़कों की भी थी लेकिन लड़कियों की अपेक्षा में यह संख्या बहुत कम थी.

यह एक कॉल सेंटर कंपनी थी. उसका काम किसी विदेशी कंपनी के देशी ग्राहकों को उसके प्रोडक्ट से सम्बंधित सूचना मुहैया कराना था. या कोई तकनीकी जानकारी प्राप्त करने के लिए यदि कोई ग्राहक कॉल करे तो जवाब देना होता था.

लड़कियों की संख्या ज्यादा होने के कई कारणों में से एक कारण यह था कि कॉल करने वाले ग्राहक ज्यादातर पुरुष हुआ करते थे. और वे लड़कियों से बात करना पसंद करते हैं. कभी कभी ऐसा होता कि कोई ग्राहक यदि ऊब रहा है तो अपना समय व्यतीत करने के लिए वहां कॉल कर देता और बेसिरपैर के अनगिनत सवाल पूँछा करता और समय को खींचने की कोशिश में रहता. या कोई ग्राहक अपनी खिसियाहट निकालने के लिए कॉल कर देता और भली बुरी सुनाता. कभी कभी कई पुरुष एक साथ मिलकर कॉल करते और भद्दी भद्दी बातें करने की कोशिशें किया करते. और जब थक जाते या अपने अंदर के पशु को थोडा बहुत चारा मिल जाने पर वे जैसे तैसे कॉल रख देते.

यह घटनाएं किसी भी लड़की के लिए अब नयी नहीं रह गयी थीं. वे अब अभ्यस्त हो चुकी थीं. वे जानती थीं कि उन्हें इसी लिए रखा गया है कि इस सभ्य समाज की सभ्यता बची रहे.
और महीने के अंत में उन्हें इसकी एवज में तनख्वाह मिलती थी. जिससे उनकी अपनी सभ्यता और उनके होने और बने रहने का सुनिश्चित होना तय हो पाता था.

उसे याद है जब वह अपने छोटे शहर से इस शहर में आयी थी तब उसकी माँ ने उसे रोकना चाहा था कि वह इतने बड़े शहर में कैसे रहेगी. और कॉल सेंटर के बारे में उन्होंने थोड़ी बहुत जो बातें सुन रखी थीं कि लड़कियां फिर लड़कियां नहीं रहतीं. वे धीरे धीरे सालों में तब्दील होती चली जाती हैं. शुरू के दिनों में वे उत्साह के साथ काम करती है और फिर उनका उत्साह धीरे धीरे मरने लगता है. बोरियत उन्हें आकर घेर लेती है. आवाज़ में झूठापन और बनावटीपन आ जाता है. आँखों के नीचे काले घेरों को छिपाने के लिए कंपनी से मिले पैसे खर्च होने लगते हैं. यह एकदम नहीं होता. बहुत बारीकी से , बहुत धीरे धीरे होता चला जाता है.

वह फिर भी चली आई थी. दो और छोटी बहनें थीं और उनकी पढाई भी अभी बची हुई थी. उसे माँ का हाथ बाँटना था. वो कब तलक उस छोटे शहर में बनी रहती वहां ज्यादा से ज्यादा 2 हज़ार 3 हज़ार पर पढ़ाना होता था या इसी तरह का कोई और काम. यह बहुत कम था और उसे आगे बढ़ना था.

शोभित उसे यहीं मिला था. इसी कंपनी में. शुरू शुरू में अजनबीपन के बादल छाये रहे थे लेकिन वह भी कब तक रहते. धीरे धीरे वह छटते चले गए. और वे एक ही आकाश के नीचे एक साथ आ खड़े हुए.

लेकिन यह कहानी इतनी आसान दिखती है उतनी है नहीं. इसमें तमाम गुत्थियां हैं. जो आपस में उलझी हुई हैं. और फिर लड़की की उम्र जब बढ़ती है तो एकदम से बढ़ती ही चली जाती है. और ये उलझन फिर सुलझती नहीं बल्कि और अधिक उलझती चली जाती है.

~आगे की कहानी बाद में~

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रचना प्रक्रिया

रात के तीसरे पहर आपके मन के भीतर एक राग छिड़ता है. दुनिया जहाँ ख़ामोश नींद की गहराइयों में कहीं अटकी पड़ी है. मैं अपने भीतर के सच और झूठ से लड़ता. अपनी  स्मृतियों का बहीखाता खोले बैठा. रात को रात न समझ दिन की तरह जिए जा रहा हूँ. और रात की ख़ामोशी का एक अपना ही संगीत बजता हुआ. बरसाती रातों का संगीत.

मौन का संगीत. गहरा और स्मृतियों में पसरता हुआ. कभी उनमें उजाला भरता है तो कभी दुखों को दूर छिटक सुख को अपने पास खींचता हुआ.

उम्र के साथ साथ अनुभवों का हर एक दिन जो नया संसार रचता चला जाता है. उसी संसार से मिलती है रचनात्मकता की लौ. जो हर नए दिन में और भी अधिक प्रकाश बिखेरती है. और मैं हर रोज़ ही इस रचनात्मक उजाले को अपने में भरता चला जाता हूँ.

मेरे भीतर चमकते हैं हज़ारों नए प्रकाश पुंज. और रूह को तराशती चली जाती है ये रचना प्रक्रिया. मन के भीतर आ आ ठहरती हैं स्मृतियाँ और आज के वर्तमान की रातों में प्रकाश फैलाता सूरज.

मैं हर इक नए दिन में बदलता ही चला जाता हूँ थोड़ा थोड़ा. वक़्त की लकीरें खिंचती चली जाती हैं. चेहरे में भर जातें हैं कई कई रंग. सुख, दुःख, प्रताड़ना, अकुलाहट, आवेग, एक धीमा धीमा बहता दरिया. कितना कुछ तो समां जाता है इन रंगों में.

जीवन के विभिन्न अर्थों को तलाशती यह रचना प्रक्रिया प्रतिदिन ही मुझे एक नई राह दिखा जाती है. और मैं इसके अर्थों, रंगों, आवाज़ों, रागों में डूब डूब जाता हूँ.

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सुख क्वालिफिकेशन देख कर नहीं आता

>> 18 July 2015

दुःख न तो कोई क्वालिफिकेशन देख कर आता और नाहीं किसी एक को डिसक्वालिफाई करता. जैसे मेरे स्कूल के प्रिंसिपल के लड़के का दुःख हुआ करता कि वो अपने स्कूल के प्रिंसिपल का लड़का है.

असल में टीचर और प्रिंसिपल के लड़कों की दो प्रजातियाँ होती हैं. एक वो जो बार बार गुस्ताखियाँ कर स्कूल के बाकी लड़कों को पीछे छोड़ टीचरों और अपने बाप यानि कि प्रिंसिपल की नाक में दम कर टॉप रैंक हासिल कर लेते हैं. दूसरी वो जो अपने अरमानों को दबाते, कुचलते अपने बाप के प्रिंसिपल होने का बोझ अपने कन्धों पर लादे घूमते रहते हैं. फींकी हँसी, बनावटी बिहेवियर लिए स्कूल ख़त्म कर लेते हैं जैसे तैसे ये सोच कर कि कॉलेज जैसी चीज़ बची रह गयी है इस दुनिया में.

लेकिन एक पट्ठा इन्हीं दोनों संधि और विच्छेदों को जोड़ बना था. शरारतें ऐसी कि आप करने से पहले सोचो कि इसने ये इजाद कब की और भोलापन मासूमियत की डेफिनिशन को बोल दे कि बहना अपने आप को रीडिफाइन कर लो जाकर.

तो असल बात पर आते हैं. वो ये कि इन्हें प्यार हो जाता है. जब भी कॉन्वेंट की लडकियाँ ग्रुप में निकला करतीं तो ये महाशय किसी के गालों के गड्ढों में डूबते उतराते. वे पूरी तरह क्लीन बोल्ड हो पवेलियन के बाहर से ही हसीं सपनों में खोये पड़े रहते. बाकी के लौंडे भँवरे बन कभी इस फूल तो कभी उस फूल के सपने बुना करते. और डिसाइड ना कर पाते कि कौनसी किसकी भाभी है.

ऐसे ही तमाम रोज़ों के बाद एक अंतिम निर्णय लिया गया कि इजहारे मोहब्बत होना ही चाहिए. कब तलक दर्दे दिल की तकलीफ़ सहेंगे. कब तलक होठों को सिले रखेंगे.

उन्हीं बाद के किसी दिन की खिलती धूप में किसी मोहल्ले के पास के बगीचे के खिले गुलाब को हाथ में लिए शाहजहाँये मोहब्बत सब कुछ लुटा देने को तैयार मैदान में कूद पड़े.

जिन वाक्यों के अंत में ता है, ती हैं, ते हैं आते हैं वे प्रेजेंट इन्डेफीनिट टेन्स के वाक्य होते हैं पढ़ाने वाले मास्साब से सीखी अंग्रेजी के बूते वे साइकिल के सामने आ तो गए लेकिन उसकी रगों में दौड़ती अंग्रेजी के सामने टिक ना सके और अपना क़त्ल खुद क़ातिल अपने हाथों से कर रन आउट हो गए.

बाद में दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है की तर्ज़ पर दोस्तों ने उनको उनके दुखयारे संसार से ये कह बाहर निकाला कि जोड़ी जमी नहीं, कहाँ तो ये और कहाँ वो, यार ये कॉन्वेंट वालियाँ, वगैरह वगैरह करते करते पायथागोरस प्रमेय के अंत जैसा इति सिद्धम लिख दिया.

दोस्ती कुछ हासिल कराये न कराये खुश रहने और रखने के हज़ार बहाने ढूँढ लेती है और बना लेती है.

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ज़िन्दगी बड़ी कलरफुल होती है बर्खुरदार

हम ऐसे स्कूल में थे जहाँ लड़कियों का नामो निशां नहीं था. और जब स्कूल के गेट पर हम अपने ठेले और खोमचे वालों के पास खड़े रह समय को धकेल रहे होते कि भाई अब बहुत हुआ ज़रा आगे बढ़ो. वह बीतता रहता और हम बेमतलब, बिना कुछ खाए दूर से ही ठेलों पर की चीज़ों को ऐसे महसूसते जैसे ये तो खायी हुई चीज़ है. हमें उनसे कोई आसक्ति न होती. असल में बात दूसरी ही होती जोकि हमारे घरों से शुरू हो हम तक ही ख़त्म हो जाती. उन दिनों सभी घरों में 3-3, 4-4 भाई बहन हुआ करते और तब न तो जेब खर्च जैसा चलन था और नाहीं उसके प्रारंभ होने की कोई सम्भावना दिखती. तब जेबें पहले से ही छोटी सिलाई जाया करतीं. और कई दफा तो गुप्त जेबें भी हुआ करतीं जिनमें हथेली भर पैसे किसी गुप्त ज्ञान से बसा करते. कभी कोई भूला भटका रिश्तेदार जाते वक़्त कोई चवन्नी या अठन्नी दे जाया करता तो लगता कि सपनों का एक पूरा संसार दे गया हो. और जब वो एक रूपया होता तो लगता इससे दुनिया का हर सुख हासिल किया जा सकता है. हम उस एक रुपये से मन ही मन ना जाने क्या क्या खरीद लिया करते.

उसी गेट के सामने से जब हमारे स्कूल की आखिरी घंटी टनटनाने को हुआ करती तब किसी कान्वेंट स्कूल की लड़कियों का ग्रुप निकला करता. वे अपनी अपनी साइकिलों पर हुआ करतीं और उन दिनों जबकि हम लड़की और उनके हर किस्म के स्वभाव से अनभिज्ञ थे, उन्हें स्कर्ट पहने साइकिल चलाते हुए जाते देखा करते. और तब लगता कि यह एक सुख है जो उन्हीं लड़कों को हासिल है जो उनके साथ पढ़ा करते हैं. वे अपने अपने ब्लेज़रों और टाईयों में सीलबंद से रिक्शों पर या अपनी अपनी साइकिलों पर आते जाते दिखा करते. उनसे बड़ी जलन हुआ करती. और जब तक वो आगे बढ़ पीक पर पहुँचने को हुआ करती तो हमारे स्कूल के मास्टर अपने हाथों में डंडा लिए हमें गुस्से से पुकारा करते. एक मिनट लेट होना हमें दो तीन चोटें तो खिला ही दिया करता. परन्तु यह हर रोज़ का सा एक बना बनाया खेल सा हो गया.

हममें से कुछ एक्स्ट्रा स्मार्ट एक बिलकुल देशी स्कूल के होने वाले प्रोडक्ट, उन लड़कियों को ताड़ते हुए हदें पार कर सीटियाँ मारते या कोई मोहब्बत भरी बात कह दिल जीतने की कोशिशें किया करता. मोहब्बत से तो हर कोई देखा करता लेकिन सबकी मोहब्बतों में फर्क हुआ करता.

फ्यूचर तब दूर से हम वैदिक विद्यावती इंटर कॉलेज के लड़कों को देख मुस्कुराता हुआ हमारे बचपने पे कभी लाड़ तो कभी तंज कसता होगा. और कहता जरुर होगा मन ही मन खुद से कि अमाँ छोडो यार कर लेने दो दिल्लगी. ज़िन्दगी खुद ही दे देगी तज़ुर्बे. तुम क्यों कॉलर ताने खड़े हो मियां. तुम्हारा क्या छीन रहे हैं.

और क्या पता कल को पाला बदल जाये और कोई शोख हसीना मोहब्बत कर बैठे और बन जाये कोई फ़साना.

जिंदगी बड़ी कलरफुल होती है बर्खुरदार.

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उनींदी रातें

>> 13 July 2015

तुम नहीं हो फिर भी हो. दिन भर महकता है ये घर. इसमें बसी है खुशब तुम्हारीू. मैं नहीं खोलता खिड़कियाँ सारीं और आहिस्ता से खोलता हूँ दरवाज़े इसके. कि तुम अब भी हो, यहाँ हर कोने में.
सुबहें दोपहरों तक खींच ले जाती हैं खुद को जैसे तैसे. शामें बहुत याद दिलाती हैं तुम्हारीं.
तुम जब थीं तो बरसता था गुस्सा , कि वक़्त ही नहीं है तुम्हारी जेबों में खर्च करने के लिए. अब जेबें फटी फटी सी हैं मेरी. कि वक़्त पुराने लम्हों में जीता है.
तकिये के नीचे रख छोड़ी थीं जो तुमने अनगिनत कहानी, वे पूरेपन में मेरी रातों में शामिल हो उठती हैं.
तुम दिन में, सुबह में, शामों में और उनींदी रातों में, हर लम्हे में बेइंतहा याद आती हो.

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ज़िंदगी के साइड इफेक्ट्स

कहीं किसी रोज़ में मिलूँगा तुमसे किसी अजनबी की तरह. हम जानते हुए भी नहीं बोलेंगे एक लफ्ज़ भी. तुम मुझे भुला दिए हुए किसी ख्वाब सा सोचोगी फिर भी. मैं जानकार भी अनजान बना रहूँगा तुम्हारी उपस्थिति से. क्या इतने पर भी भुला दी जाएँगी चाँदनी रात में तेरी गोद में सर रखकर जागी रातें. क्या भुला दोगी तब तक, तेरे गालों की हँसी पे लुटाया था हर दिन थोडा थोडा, क्या मेरे सीने में तब भी धड़केगा दिल वैसे ही.
क्या चाहकर भी नहीं जानोगी उस कही कविता के हश्र के बारे में. जिसे किसी एक रोज़ सिरहाने पर रखी किताब में पढ़ना चाहा था तुमने. क्या याद होगा तुम्हें वो नाम अब तक जो पुकारा करती थीं मोहब्बत भरे दिनों में. क्या साँसे वैसी ही चलती होंगी या सीख लिया होगा तुमने कोई नया कैलकुलेशन.
जब हम मिलेंगे फिर से कभी कहीं. क्या तुम उधार दे सकोगी अपनी मुस्कराहट उस पल के लिए. या सिमट जाओगी खुद में ही और कहोगी कि तुम बेहतर हो. और पूँछ कर तुम मिटा देना चाहोगी कि तुम कैसे हो, पुरानी सभी संभावनाओं को.
मैं फिर भी उस दिन को भर लूँगा अपनी आँखों में और सोचूँगा कि तुम अब भी नहीं उबरी हो जिंदगी के साइड इफेक्ट्स से.

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मन का पोस्टमार्टम-1

हम सब एक दिन चले जाने के लिए ही आये हैं लेकिन क्या हम वो कुछ कभी कर पाए जो करने के लिए हमारा दिल आ आकर गवाहियाँ देता है. मन काउंसलर बना हमें बार बार समझाता है कि तुम ये नहीं, ये करने के लिए बड़े भले लगते हो.
कितनी दफा सुनते हैं हम अपने काउंसलर मन की आवाजों को. क्या अन्य तमाम तरह की आवाजों की तरह ये आवाजें भी गम हो जाने के लिए लगायी जाती हैं.
असल में हम हर रोज़ ही अपने आप से कितना दूर होते चले जाते हैं. अपनी पीतल पर सोने का झूठा रंग चढ़ाये जाते हैं और भूल जाते हैं कि ये कच्चे रंग एक दिन उतर जाने हैं.
जब हमारा मन पहली बारिश में नाचने का करता है तो क्या हम नाच पाते हैं. क्या हम दिल में अटकी किसी बात को होठों तक ला पाते हैं. क्या हम खुले रास्तों पर गाने का दिल होने पर गा पाते हैं.
फिर वे कौन से क्षण होंगे जब हम जी सकेंगे जिसे हम दुनियादारी में भुला आये हैं. क्या पानी का वो सोता हम दुनिया के सामने खोल सकेंगे.

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कस्बाई मोहब्बत

अभी दौड़ती भागती ज़िन्दगी ने वहां दस्तक नहीं दी थी. किसी को भी कहीं पहुँचने की बेताबी नहीं थी. इक छोटा सा क़स्बा था. अभी भी अपने होने की पहचान लिए खड़ा था.
ना तो उसे रफ़्तार का शऊर आया था और नाहीं उसे अपने सुस्ताने का कोई ग़म. चन्द दुकाने थीं कहने को, जिससे जीवन अपनी इच्छाएं पूरी करने में समर्थ था. नई इच्छाएं उग आने का फिलहाल कोई ख़ाद पानी डाला नहीं गया था.तो बंद मुट्ठी से जीवन में भी ख़ुशी कम नहीं आंकी जाती थी.
इन्हीं क़स्बाई दिनों में उसकी धड़कने संगीत सी बजने लगती थीं. जब जब वो बस की उस खाली सीट पर आ बैठती. जिसे कितने ही जतन से वो एक लम्बी दूरी से बचाए हुए आता. उस एक रूट की एक ही बस तो थी वो. जिसे वापसी में भी सवारियां भर उन्हें उनके गांवों और कस्बों में छोड़ना होता.
बाद के दिनों में धीरे धीरे बाकी की सवारियों ने उसके पास की सीट पर बैठना ही छोड़ दिया था. और जब उसके क़स्बे के जबरन बनाये गए बस स्टैंड नुमा जगह पर बस रूकती तो वह आती और उस सीट पर बैठ जाती.
कितना कुछ अनकहा था जो उमड़ता रहता मन के भीतर और हर रोज़ ही मोहब्बत का पौधा कुछ और बढ़ जाता.
अभी तक स्मार्ट फ़ोनों ने ठीक से दस्तक नहीं दी थी. कुछ शौक़ीन जबरन ले भलें आते थे लेकिन बिना इन्टरनेट उस पर खेले गेम ही जाते थे या जब मन ऊब जाये तो तसवीरें खीच लो और गाने सुन लो.
लड़के के पास एक पुराना मोबाइल तो था लेकिन वो उसके इश्क़ में कोई मददगार नहीं हो सकता था. लड़की कस्बों में मोबाइल नहीं रखा करती थीं. और नंबर की अदला बदली की नहीं जा सकती थी.
तब ऐसे ही किसी रोज़ बस के शहर में रुकते और लड़की के उतरते हुए. लड़का दौड़ा था फिर पास आकर लड़के ने लड़की का छूट गया बैग थमाया था. घबराहट और शर्माने की मिली जुली प्रतिक्रिया में लड़की धन्यवाद कहना भी भूल गयी थी. हाँ कुछ दूरी तक चलते हुए एक बार उसने मुड़कर देखा था. तब लड़का उसे वहीँ खड़ा हुआ दिखा था. उसे जाते हुए देखते हुए.
तब असल में उनकी उस प्रेम कहानी का पहला दिन था. शायद पहला क्षण. उस एक रोज़ के उस वाक्ये ने बीच की खायी को पाट दिया था. जिस पर चल वे दोनों मिल सकते थे. एक दूसरे की भावनाओं को महसूस सकते थे.
उसी इक दिन में कितना कुछ बदल गया था. अब लड़के की एक पहचान थी. उसका कोई एक नाम था जो जाना जा सकता था. और शायद मोहब्बत में पड़ वो नाम अपनी स्मृतियों में लिखा जा सकता था.

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आरजुओं के फूल मन के आँगन में खिलते हैं

>> 10 July 2015

आरजुओं के फूल हर रोज़ ही मन के आँगन में खिल उठते. और मन बावरा हो झूमता.

उन दिनों भावनाओं का समुद्र जो उमड़ता तो फिर ठहरने का उसमें सब्र ही न होता.दिल कहता कि ये जो मन की कोमल सतह पर हर रोज़ ही उग आती हैं और दिन ब दिन बढती है चली जाती हैं. इन्हें किस तरह से थामूं या कि उगने दूं और फिर किसी एक रोज़ उससे कह दूं कि "तुम जो पास होती हो तो फिर कुछ भी और पा लेने की इच्छा बची नहीं रह जाती".

मैं हर आने वाले नए दिन में अपने दिल को टोकता लेकिन वह तो जैसे पतंग बन हवाओं में उड़ता ही रहता. उन क्षणों में फिर उस अनुभूति को महसूसने के सिवा और कुछ नहीं होता. हरदम ही उसकी मुस्कराहट, उसका चलना, उसका बोलना सामने आ आ खड़ा होता. और फिर दिल चारों खाने चित्त हो जाता.

दिल पतंग सा, रखकर काँधे पे आरजुएं, उसके दुपट्टे सा फिजाओं में उड़ता फिरता. उड़ता ही फिरता.

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मैं लिखता हूँ क्यों

न लिखना जब गुनाह सा लगने लगे, तब तब लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ काले अँधेरे उजियारों में, मैं लिखता हूँ अधूरे दिनों की पूरी रातों में.

जब भरम पिघल जाये और कानों को गलाने लगे, तब तब लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ उगे हुए सूरज में जी सकने के लिए, मैं लिखता हूँ आत्मा से नज़र भर मिलाने के लिए.

जब रोना सुकूँ लगने लगे और हँसना एक बहुत बड़ा गम, तब तब लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ कि लिखा जा सके प्रेम में डूबे महबूब का गम, कि टूटे पंख लिए परिंदा कोई जब भरता है अपने दिल में उड़ने की अभिलाषाएं. मैं लिखता हूँ कि लिखना रचता है मेरी अभिलाषाओं का संसार.

जब तलब उठती हो और बुझायी न जा सके उसकी जलती लौ. मैं लिखता हूँ.

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बारिशों का शहर

ये शहर बारिशों का सा शहर जान पड़ता है. जागती रातों में जब बाहर खिड़की के मुहाने पर खड़े केले के पत्तों पर बारिशों का संगीत बजता है तो लगता है तुम्हें यहीं होना चाहिए था. जो तुम होतीं तो मैं बाँट सकता अपने भीतर भर आये सुख के कुँए को पूरा पूरा.

जब सबका सवेरा सो जाता है तब उगने लगता है मेरे भीतर रचे संसार का सूरज. जो तुम होतीं तो मैं बाँटता अपने धूप का आँगन.

बारिशें थमतीं नहीं अक्सर. यहाँ पेड़ों की शाखों पर बजती है कोई धुन रह रहकर. कि जो तुम होतीं तो गीत कोई गुनगुनाता मैं.

मैं हूँ शामिल इन सब में लेकिन फिर भी मुस्कुराती नहीं आँखें, कि तुम बिन सब कितना अधूरा है.
यहाँ हर रोज़ ही बरसता है बादल, कि ये शहर बारिशों का सा शहर जान पड़ता है.

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इच्छाओं का भंवर

>> 09 July 2015

इच्छा कहाँ से उपजती होगी. अधूरेपन से या पूरेपन से. पूरापन कभी किसी को कहाँ हासिल हुआ है और जब कभी जो हासिल ही नहीं हो सका उसे फिर पूरापन किन अर्थों में कहा जाये.

असल में अधूरापन इच्छाओं का दमन करके पूरा किया नहीं जा सकता तो फिर हम कहाँ से कहाँ को भाग रहे होते हैं.

ज़िन्दगी के एक छोर से उस दूसरे छोर तक जहाँ इन सबके न जाने क्या अर्थ बचे रह जाते होंगे.
या दोनों छोरों के मध्य पसरी दूरी को नापने की ज़िद. उस ज़िद को कोई दौड़कर करता है तो कोई सुस्ताता हुआ.

क्रिएटिविटी जिन किन्हीं खानों में रखी जाती हो. होती बड़ी भली भली है. वो इन छोरों को नापने का हौसला भरती है. नई ऊर्जा का संचार करती है और जो राहतों का समन्दर दिखता है कहीं मध्य में वो शायद इसी भली चीज़ की भलमनसाहत है.

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वक़्त और इंसान

एक वक़्त में इंसान कुछ हो जाना चाहता है. वो उस होने के लिए जूझता है, संघर्ष करता है. दूसरों से सुलझता है और खुद में उलझता है.

वो हो जाना असल में उस वक़्त में होता नहीं जिसमें उसके लिए तत्परता होती है.
और फिर जब वही सब एक-एक कर सामने होती हुई दिखती हैं. तब तक उनके लिए सोचा और महसूसने के लिए रखा सुख उड़नछू हो चुका होता है.

जिन पहले की सोची गयी बातों को आप गुजरे वक़्त से वर्तमान में ला स्वंय से भी बोलते हैं तो उनसे जुड़ा सुख बहुत पहले ही वाष्पित हो चुका होता है. और आप फिर फिर नया कुछ हो जाने के लिए स्वंय को उन्हीं संघर्षों में घसीट लाते हैं.

मन का होना मनमाफिक समय से तालमेल बिठाने में पिसड्डी खरगोश होता चला जाता है.

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इकरारे मोहब्बत

ठीक ठीक तो नहीं बता सकता कि कब उसे देख मेरे दिल की हार्ट बीट अपने नार्मल बेहवियर की शक्लो सूरत बदलना सीखी थी लेकिन इतना तय था कि वो फरवरी की धूप सी लगने लगी थी.
मैं जिस इंस्टिट्यूट में चन्द रोज़ पहले पढ़ाने के लिए दाखिल हुआ था. वो बाद के दिनों में उन्हीं क़तारों में शामिल हो गयी जिनका में हिस्सा था. बच्चों की वे कतारें हमें हमारा स्पेस देतीं. और तब उन्हीं क्षणों में एक छोर को छोड़ दूजे को पकड़ने के मध्य में हीं उसकी आँखें मेरी चोर निगाहों को पकड़ लेतीं. मैं जान कर ये जतलाता कि अभी के बीत गए क्षणों में जो भी और जितना भी भर हुआ था उसमें मेरा कोई कसूर नहीं है.
जब वो कॉरिडोर से गुजरती तो दिल अपनी नार्मल स्पीड छोड़ देता. वो सीधे सपाट हाईवे को छोड़ प्यार की पगडण्डियों पर चलने लगता. जिसके दोनों और दूर तक फैले बसंती सरसों के फूल खिल उठे हैं. और वो पगडंडियों से होता उनमें उसकी शक़्लें तलाशने लगता.
ये इतना भर होता तो भी दिल अपने आप को संभाल लेता लेकिन जब वो अपनी मुस्कुराहटों के फूल बिखेर देती तो लगता जीवन बस यही है. कितना सुखद और कितना मासूम.
जब घड़ी आखिरी के क्षणों के लिए टनटनाने लगती तो दिल उदासियों से भर उठता. फिर उसके बाद की दोपहरें कहीं किसी किताब के किसी पन्ने पर अटक जातीं और शामें बेवजह के ख्यालों से गुजरती हुई उसकी यादों को समेट लातीं. रातें बेचैनियों में शामिल ख़ुशी में करवटें बदलतीं. और जब सुबहें सिरहाने आ मेरे दिल को टटोलतीं तब वो उस कॉरिडोर में टहलने को चला जाता जहाँ किसी बीते दिन में वो मुझे देख कर भी न देखना जता रही थी.
दिन तब धीमे धीमे महीनों में तब्दील होते चल दिए थे और मेरा कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म होने की कगार पर था. वो वहां स्थायी थी और मैं अस्थायी. तब मेरे दिल ने मुझसे सवालात करने प्रारम्भ कर दिए थे. जिनके उत्तर मुझे उलझा दिया करते. और जब उलझने बहुत बहुत बढ़ गयीं तब मैंने स्वंय से ही जवाब जानना चाहा था. क्या इक़रार करना इतना दुरूह है.
और इन्हीं सवालों और जवाबों की कशमकश से जूझता में उसके सामने था. वे बिल्कुल आखिरी के दिन थे और तब उन्हीं क्षणों में मैंने दिल की राह पर चलते चलते उससे कहा था "तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो".
वो मुस्कुरायी थी और उन फ्रीज़ हो जाने वाले क्षणों में उसने कहा था "मैं जानती हूँ".
अबकी दफा मुस्कुराने की बारी मेरी थी.
वे क्षण स्मृतियों के धरातल पर बीज़ बनकर गिरे और बाद के दिनों में उनमें हर रोज़ ही नई नई किस्मों के तमाम फूल खिलते ही गए. खिलते ही गए.

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प्रेम में होना

सबसे मुश्किल है प्रेम में होकर प्रेम गीत लिखना या लिखना कोई एक प्रेम कहानी. प्रेम में होना बना देता है साधारण सी प्रतीत होने वाली भावनाओं को दुरूह. प्रेम फिर केवल प्रेम भर नहीं रह जाता.
वो हो जाता है हिमालय की चोटी पर पहुंचे उस नई नई उम्मीदों से भरे पर्वतारोही सा. वो दिखता है, सुनाई पड़ता है लेकिन फिर भी अंत में आकर महसूसना भर रह जाता है.
बावजूद इसके कि करते हैं आप लाख प्रयत्न प्रेम नहीं सिमट कर आता किसी प्रेम कविता में.
प्रेम जतलाया जाना भी हो जाता है धीरे धीरे स्वंय जैसा. और आप रीते खड़े असहाय से बोल देते हैं पहले से बोलते आ रहे शब्दों को.
प्रेम बेजुबान एक स्वाद है. प्रेम बिना आवाज़ों का कोई संगीत जो बजता है भीतर ही भीतर और आप महसूसते हो उसे हर इक नए क्षण.
प्रेम केवल होना ही भर नहीं है.

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प्रतीक्षा मन के धरातल पर रेंगती रहती

लड़का बेरोज़गारी से जूझते दिनों में घंटों उसकी प्रतीक्षा करता. घंटे पहले सेकंड से प्रारम्भ होते और फिर ऐसे कई कई सेकंड प्रतीक्षाओं के जुड़ मिनटों में तब्दील हो जाते और ये पहाड़ी रास्तों से दुर्गम मिनट ऐसे आगे बढ़ते जैसे घंटों की खोज़ की जानी हो. और ये काम इन्हीं को सौंपा गया हो.
सुबहें पहले दोपहरों में तब्दील होने में आनाकानी करतीं और फिर शाम तक पहुँचने में उन पर सुस्ती छा जाती. लड़का हर आने जाने वाली विभिन्न किस्मों की गाड़ियों को देखता और ये जानते हुए भी की शाम होने में अभी इतना समय है जितने में वो उस सामने के पार्क में उतनी ही बार बेवजह एक जगह से उठ चहलकदमी करता हुआ दूसरी जगहों पर बैठ सकता है जितनी दफा वो पहले ये सब कर चुका है. उन गाड़ियों में रह रहकर उसके होने का आभास होता.
वो दीवारों पर लगे फिल्मों के पोस्टर देखता और उनसे जोड़ मन ही मन नई नई कहानियां बुनता, उन्हें उधेड़ता और फिर से बुनने में लग जाता. हालाँकि उसने उनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं देखी थी फिर भी सोचता कि कभी किसी रोज़ अगर लड़की ने कहा कि चलो ये फ़िल्म देखते हैं तो फिर वो क्या करेगा. उसे किस तरह मना करेगा की वह यह फ़िल्म नहीं देख सकता क्योंकि वह अपने मन में इसे कई कई दफा पहले देख चुका है. यह एक तरह की पीड़ा है कि आप जैसा सोचते रहे हों वो वैसा न निकले. और वो इस नई पीड़ा से नहीं जुड़ना चाहता था.
कभी कभी लड़की जल्दी आ जाती तो लड़का वहीँ अपनी उसी बनायीं हुई दुनियां में अटक रहता. जब लड़की उसे बाहर हाथ पकड़ वापस अपनी दुनिया से ला जोड़ती तब उसे एहसास होते कि पीछे वो प्रतीक्षाओं की अंतहीन लड़ियाँ तोड़ कर बाहर लाया गया है.
वो होता इस संसार में किन्तु पीछे रह गए रचाये हुए संसार की स्मृतियाँ उसका पीछा करती ही रहतीं.
कहते हैं प्रतीक्षा मन के धरातल पर रेंगती हुई दूरियां नापती है.

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उलझा उलझा बचपन

>> 07 July 2015

मन पर बने घावों के निशाँ कभी नहीं मिटते. बचपन की स्मृतियों में उलझा वो बच्चा रह रहकर याद हो आता है जिसे कभी ये समझ नहीं आता था कि वो कौनसी बातें रहती होंगीं जिनको लेकर उसकी माँ आये दिन पिटा करती है. वो बच्चा भरे हुए स्कूल में बेहद अकेला डरा डरा घूमा करता. न जाने कौनसी उधेड़बुन में लगा रहता. उसे घर जाने से डर लगा करता. वो असल में स्कूल की चाहरदीवारी में खुद को कैद कर लेना चाहता.
जहाँ बच्चे स्कूल की टनटन से ख़ुशी में झूम झूम उठते वो सहम जाया करता. वो पतंगों को देख पतंग बन कहीं दूर उड़ जाना चाहा करता. लेकिन ये उसकी चाहना भर ही रह जाया करती जो कभी पूरी न हुआ करती.
वो सोचा करता कि तीसरी मंज़िल से अपने हाथ फैलाये चिड़ियों की तरह कूदे और यहाँ से कहीं दूर निकल जाये और जब वापस आये तो माँ के पास कोई दुःख न हो और नाहीं घावों के निशाँ.
वो मन भर रो लेना चाहा करता किन्तु उसका मन कभी न भरता. हर जगह थी तो केवल रिक्तता. और मन पर बने उसके घावों के निशाँ दिन ब दिन गहरे होते ही चले जाते. होते ही चले जाते.
बचपन कभी धुन्धलाता नहीं वो केवल बड़प्पन में पीछे से रह रह झाँकता रहता है.

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दिल आज भी तुम्हारी मोहब्बत की बारिश में भीगा हुआ है मेरी जाना.

वो यही कोई रूमानियत से लबालब बारिशों भरी दोपहर थी. यहाँ वहाँ अपने अपने बस्तों को अपने नाज़ुक कन्धों पर लादे बच्चे यहाँ वहां भर आये पानी पर छपा छप खेलने में उत्साहित से दिख जाते. पेड़ धुले धुले गर्मी से राहत की साँस भरते मुस्कुराते हुए किनारों पर खड़े हर आने जाने वालों पर चिढातेे से पानी की बौछारें फैंक दिया करते.
कहीं कोई जल्दी नज़र नहीं आती थी. यूँ लगता कि अभी अभी जो सुबह बीती है वो भी कह रही हो कि मुझे भी अपनी इस ठंडक में शामिल कर लो.
सवारियां ऑटो में लदी हुईं न जाने कहाँ से कहाँ को जाने में बेचैनी दिखा रहीं थीं. उसी किसी खूबसूरत क्षणों में वो भीगता रिक्शा न जाने कहाँ से कहीं को न जाने के लिए चलते चला जा रहा था. तब मैंने ही हाथ दिया था शायद उसको. हाँ मैंने ही दिया होगा. तब तुमने ही कहा था कि थोडा रुकते हैं. लेकिन तुम्हें बारिशें कितनी तो भाती हैं ये खबर थी मुझको.
बारिशों ने तब उस मौसम की पहली आमद दी थी. बिना छतरी वाला रिक्शा था और हम भीग जाना चाहते थे. तब तुमने कहा था कि कोई क्या कहेगा कि देखो तो भीग जाने के लिए रिक्शे पर बैठे हैं. और मैं मुस्कुराया भर था.
बारिश की नन्हीं नन्हीं बूँदें हमारे चेहरों को आ हमें शायद ये बता रही थीं कि अभी हम जीना भूले नहीं हैं. उन्हीं किन्हीं क्षणों में तुम्हारे गाल को चूमा था मैंने. और तुम शरमा कर रह गयीं थीं. तब तुमने कहा था कि किसी की भी फ़िक्र नहीं करते. और मैंने कहा था की सामने फिक्र करने वाला मुझे कोई आता दिखाई नहीं पड़ता. तब तुम मुस्कुराई थीं और हँसते हुए कहा था कि और पीछे. मैं पीछे आती स्कूल के बच्चों की साइकिल की कतार को देख कितना हँसा था.
उस भीगते दिन में मैंने कहा था कि मैं इस शहर में यूँ ही बेपरवाह अपनी सारी ज़िन्दगी तुम्हारे साथ इसी तरह रिक्शे पर बैठ घूमना चाहता हूँ. उस रोज़ उस बारिश ने भी उस खुदा से हमारे लिए दुआ माँगी होगी. और शायद उन रिक्शे वाली भैया ने कहा हो आमीन.
दिल आज भी तुम्हारी मोहब्बत की बारिश में भीगा हुआ है मेरी जाना.

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साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

उन ऊँघती शामों को जो धीमे धीमे अँधेरे की गिरफ़्त में चले जाने को हुआ करतीं किन्तु कहीं से भी उनकी उन क्षणों की आभा से लगता बिल्कुल नहीं था. सूरज गुलाबी हुआ करता और रात की देहरी पर टंगा हुआ सा जान पड़ता था. हाँ तमाम किस्म के पंक्षी अवश्य ही अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर दिखते. जैसे एक मजदूर सुबह से शाम तक की दिहाड़ी कर घर को लौट जाना चाहता हो.
वो किन्हीं दो बड़े शहरों के मध्य नाम के लिए बना दिया गया स्टेशन था. ऐसे जैसे कि सुस्ताने के लिए कहीं तपती दोपहरों में बीच राह में कोई झोंपड़ी या कोई पेड़ों का कोई छोटा बागीचा. जहाँ ठहरने वालों को कहीं से कहीं को नहीं जाना होता. हाँ राहगीर को वे सुस्ताने के लिए, ज़रा दम भरने के लिए सुकून भरी छाँव अवश्य देते हैं. उसी तरह का दूर से दिख जाने वाला वह स्टेशन मुस्कुराता सा खड़ा रहता. बड़ी गाड़ियाँ वहां जब तब सिग्नल पास होने के लिए सुस्ताती दिख जाती थीं. और छोटी गाड़ियों के लिए वहां बैठे बेफिक्र लोग बतलाते बतलाते अपने घरों की, अपने परिवारों की बातों में मशग़ूल हो कब अतीत में चले जाते मालूम ही न पड़ता.
उन्हीं दिनों में तुम मुझे बहुत बहुत याद आया करतीं. मैं उस स्टेशन के नाम के लिए कहे जाने वाले प्लेटफार्म नंबर दो पर बैठा तुम्हारे बारे में सोचा करता. सुबहें कट जाया करतीं लेकिन दोपहरें अक्सर शामों का इंतज़ार किया करतीं और मैं और मेरा भरा पूरा अकेलापन देर तलक उस प्लेटफार्म पर अटके रहते. कहीं से कहीं भी न जाने के लिए.
उदासियाँ अक्सर स्मृतियों में आ आकर झाँका करतीं. और मैं उन्हें परे धकेलने के अंतहीन प्रयत्नों में लगा रहता. यहाँ तक किन्हीं कमजोर क्षणों में मैं मरने के ख्यालों से घिर जाता.
कहीं कोई तो ऐसी डोर होगी जो हमें जोड़ती होगी. इन्हीं और ऐसी तमाम बातों और हो सकने वाली भविष्य की कामयाबियों के बारे में सोचा करता.
वो तुम्हारी मोहब्बत ही थी जिसने इतना कसकर मुझे मुझ तक पहुँचने वाली विश्वास भरी डोर से बांधेे रखा.
वो मेरी उदासियों का और कभी कभी मिल जाने वाली खुशियों का साथी प्लेटफार्म नंबर दो आज भी ज़ेहन में मुस्कुराता सा खड़ा है. जिस पर सुस्ताने के लिए या अपने ग़म साझा करने के लिए लोग और रेलें ठहर जाया करती थीं.
साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

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लिखना जैसे अपनी आत्मा को तराशना

लिखना असल में अपनी आत्मा को तराशना है. हम जितना भी लिखते चले जाते हैं उतना ही स्वंय के पास होते चले जाते हैं. हम कितनी ही दफा अपनी आत्मा का पोस्टमार्टम करते हैं. दुनियादारी में फँसी अपनी जान को किसी एकांत में ले जाकर कई कई दफा हम स्वंय से लड़ते हैं. स्वंय से ही हारते हैं और कई कई दफा स्वंय से ही जीतने के ये जतन चलते ही रहते हैं.
मैं जब भी जी भर कर लिख रहा होता हूँ तब स्वंय के सबसे पास होता हूँ. तब असल में मैं स्वंय को देख पाता हूँ.
जब किसी उपलब्धि के लिए या किसी यश कामना के लिए नहीं बल्कि जिसको लिखने में सुकून हासिल हो. तब आत्मा सुख के झरने में नहायी, धुली-धुली महसूस होती है.
कभी कभी लगता है कि बस लिखता रहूँ. जब जब जी चाहे. दिन-रात, सुबह-शाम की बंदिशों से परे.
लिखना मेरे लिए अपनी पीड़ाओं पर मरहम लगाने सा, लिखना अपनी प्यास को मिटाने सा.

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मोहब्बत के चक्कर-2

>> 01 July 2015

हाँ तो हम कहाँ थे. अरे हाँ तो बताया जा रहा था कि बिट्टू लड़की के न पहचाने जाने के कारण कि वो ही उनके बीते हर जनम के और आने वाले हर जनम के चाहने वाले हैं, घोर निराशा से घिरे हुए हैं. ऐसे जैसे किसी सरकारी स्कूल के मास्टर को स्कूल के लौंडों ने बाहर घेर लिया हो और पूछ रहे हों कि क्यों मास्साब तबियत पानी तो हरी भरी है कि हम  काट छाँट दे जो इधर उधर हाथ पैर निकल रहे हैं. माने कि बता रहे हैं कि एकदम एक्सपर्ट हैं अगर गाड़ी पटरी से उतर गयी है तो उसे चढाने में.

लेकिन वो मास्टर भी क्या मास्टर जो ऐसी मुसीबतों से घबरा जाए सो बिट्टू भी इस घोर निराशा को कह रहे हैं खरी खरी कि देखो जी बिट्टू किसी मजनू किसी छटी औलाद की औलाद न हुआ तो क्या हुआ. वो एक नया इतिहास बना अपना नाम मजनू को पीछे छोड़ इश्क़ की विकिपीडिया में डलवा के ही रहेगा.

छिछोरा, लुच्चा, लफंगा, आवारा जैसे नाम तो उसमें पहले से हैं लेकिन वो लड़की से एक नया नाम लेकर ही दम लेंगे जो इन सभी नामों की नाक काट दे और कहे कि देखो तुम भी कोई नाम हो. अरे नाम तो हम हैं जो बिटटू ने कमाया है और देखो हम इश्क़ की विकिपीडिया की टॉप सर्चिंग लिस्ट के टॉप पर विराजमान हैं.

बिट्टू मन ही मन अपने तन का ख्याल छोड़ ये कसम खाते हैं कि उस लड़की उर्फ़ अपनी महबूबा कम भविष्य के लिए सोची अपनी माँ की बहू को पटा कर ही दम निकालेंगे या लेंगे. आप इसमें से कुछ भी एक सोच सकते हैं. बिट्टू की इससे घंटा फर्क नहीं पड़ता. आजकल बिट्टू वैसे भी फर्क पड़ने वाली बातों से इतने दूर चले गए हैं कि उनको कोई होशो हवाश नहीं कि पढाई नाम की भी कोई चिड़िया होती है जो उनके दिमाग के आँगन से कब की उड़ चुकी है.

ऐसी दशाओं में आपको पहले से ही आगाह कर देते हैं कि लड़कियों के भाई कहानी में किसी भी वक़्त कहीं से भी कूद पड़ते हैं. वे किसी भी मजनू की छटी सातवीं आठवीं जो भी और जैसी भी औलाद हो की ऐसी की तैसी करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. भले ही वो स्वंय किसी के लिए ऐसी हज़ारों और लाखों कसमें खा चुके हों.

पॉइंट पर अगर वापस आया जाये तो सीन कुछ ऐसा बनता है कि बिट्टू घोर निराशा से बहार निकल और साइकिल निकाल गली गली और सड़क सड़क बे मतलब और मतलब के मिले जुले जैसे कुछ इरादों सहित आवारा शब्द को चरितार्थ करते नज़र आ रहे हैं.

लड़की कोचिंग सेंटर के अंदर अंग्रेजी भाषा के अस्त्र शस्त्र चलने में पारंगत होने के दृण निश्चय के साथ बैठी है. और बिट्टू इसके बाहर निकल आ अपनी मोहब्बत की दुनिया अपने कंधे पे ढोते हुए खड़े नज़र आ रहे हैं. हर क्षण हर घडी उन्हें भारी पड़ता दिखाई दे रहा है और सोच रहे हैं कि इस अंग्रेजी की तो खैर हम बाद में जो करेंगे करते रहेंगे पहले वो बाहर आये और ये अपने नैनों के बीते दिनों में तोड़ दिए गए वाण फिर से जोड़ ऐसे चलाये की सीधा उनके दिल के पार हो जाये. जैसे उनका दोस्त रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर बनाता है.

तो बिट्टू इंतज़ार में है.

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मोहब्बत के चक्कर

तब यही कोई तकरीबन सत्रह बरस की उम्र रही होगी जनाब की. मोहब्बत ने तब नई नई एंट्री मारी थी उनके जीवन की स्टेज पर. कहीं किसी एक रोज़ मियाँ साइकिल से जा रहे थे और वो रिक्शे पर थीं. बस फिर क्या उनकी आँखें न मिल पाने के कारण आँखें चार होने से होते होते रह गयीं. लेकिन कमबख्त मुआं इश्क़ उनके दिल में बैक डोर एंट्री ना मार सीधा उन्हें अपनी गिरफ्त में ले उन्हें महबूब बना बैठा.

इस सत्रह वर्षीय स्वंय को किसी 25 वर्षीय युवक से कम न समझने वाले नायक का इंट्रोडक्शन कुछ यूँ है कि साहब का दिल अचानक से पढाई से जी चुराने लगा है, आप फिसड्डी न कहलाये जाएँ इसलिए दिखावा ही सही पर किताब को अपने रहमो करम से बेहद जटिल विषय बना उसमें घुसे रहने का भरपूर प्रदर्शन करने में कोई कोताही नहीं बरतते.

आपको घर वाले बिट्टू बुलाते रहे हैं और न जाने कब तलक बुलाते रहेंगे ये तो केवल घरवाले ही बता सकते हैं.

तो हम वापस पॉइंट पर आते हैं और वो यूँ है कि बिट्टू को मोहब्बत हो गयी. आप अपनी तसल्ली के लिए, अपनी आसान भाषा के लिए उसे इश्क़, प्यार, लव, वगैरह वगैरह जो चाहे सो कह सकते हैं.

तो साहब बात फिर आगे यूँ बढ़ती है कि बिट्टू जी उस लड़की को दिल ही दिल चाहने लगते हैं, प्यार करने लगते हैं, उस पर मरने लगते हैं और उनके दोस्तों की भाषा में कहें तो लट्टू हो जाते हैं. बस अपनी साइकिल लिए कभी इस गली तो कभी उस गली भँवरे की तरह मंडराते रहते हैं.

ये बात अलग है कि लड़की को अभी पता भी नहीं है की बिट्टू नामक भी कोई प्राणी है जोकि दिल ही दिल में उन पर जान छिड़कता है, उन पर मरता है. उनका पीछा करता है.

वो तो एक बहुत लंबा अरसा बीत जाने के बाद उन्होंने नोटिस किया कि यह रोज़ रोज़ मूंगफली की ठेल पर खड़ा खड़ा उनके ट्यूशन सेंटर के बाहर बिना मूंगफली खाये मूंगफली वाले का नुकसान करने वाला प्राणी हो न हो अंग्रेजी तो सीखने में उत्साहित दिखाई नहीं देता. तो फिर भला बात क्या है. एक दिन दो दिन तो अवॉयड किया भी गया किन्तु जब दिन महीने में बदल गए तब जाकर ख्याल आया कि हाय दईया ये लड़का तो पीछे पड़ने वाले काम में लगा है.

उधर बिट्टू के आधे अधूरे और कुछ पूरे दोस्तों ने ये अफवाह फ़ैलाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी कि ये तो बिट्टू की ही हैं और हमारी भाभी हैं. कुछ आधे अधूरों ने मुंह भी मसोरा लेकिन चूंकि स्वंय कुछ करने में नाकामयाबी सी महसूस कर रहे थे तो सोचा कि बिट्टू इसी में खुश है तो हम उसकी ख़ुशी का टेंटुआ दबाने वाले कौन होते हैं.

फिर क्या था बात फैलते फैलते रायता बन गयी. किसी एक रोज़ लड़की ने अपनी सायकिल रोक पीछे से फॉलो करते आ रहे बिट्टू से पूँछ ही लिया अपनी नई नई सीखी हुई अंग्रेजी में की भैया हु आर यू. कौन हो बताओगे भला या यूँ ही मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहोगे. बिट्टू जी का गला जहाँ कहीं से भी शुरू होता है से सूख कर जहाँ कहीं भी ख़त्म होता है वहां तक सूख कर छुआरा सा फील करने लगा.

अब ये भी कोई बात होती है भला कि आप लड़की के प्रेम में गिरफ्तार हैं और लड़की ये तक नहीं जानती कि हु इज़ दिस रोमांटिक छैल छबीला रंग रंगीला टाइप बॉय.

बस अपना कलेजा मुंह तक आया हुआ ले घर पर अपने भरे पूरे दोस्त के सामने दिल खोल रोये कि ये तो बेवफाई की इन्तेहाँ हो गयी. उनकी महबूबा को ये तक नहीं पता कि ये गली गली घूमता, घर से पैसे बचा साइकिल के पंचर जुड़ाता, मूंगफली के ठेल के आस पास खड़े हो ठेलेवाला सा दिखलाता, साइकिल की सम्पूर्ण रफ़्तार को नापता यह बाँका नौजवान सा लड़का उनका प्रेमी है.

उस शाम तन्हाइयों ने आ आ कर उन्हें इतना घेरा कि,  कितना घेरा. कि इसे नापना बेहद जटिल प्रक्रिया बनने में तब्दील होती दिखाई जान पड़ती है.

लेकिन बिट्टू इससे उभरेगा एक नायक की तरह और फिर एक नए जोश और उमंग के साथ अपने इस युद्ध रुपी कार्य के संचालन में लग जायेगा.

खैर तब तलक बिट्टू निराशा के बादलों से घिरा है और उसका भरा पूरा दोस्त उसके इस दुःख में शामिल है.

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खिड़कियाँ-2

>> 17 June 2015

बात वैसे तो कल की ही सी है लेकिन है तो. जब वह स्कूल के डिबेट कम्पटीशन में हिस्सा लिया करती और अक्सर जीत ही जाया करती. कितना कुछ तो पढ़ा हुआ होता था उसका. जब उसकी दोस्त पूंछा करती कि कहाँ से इतना सब लाती है दिमाग में. लेकिन उसे उन सब बातों पर हंसी सी आती. कितनी भोली और स्वच्छंद हँसी हुआ करती थी उसकी. ऐसा उसके चाहने वालों ने उसे कितनी दफा तो कहा था.

क्या वे दिन उसने भुला दिए हैं. नहीं नहीं भूली नहीं है वो. यदि भूल गयी होती तो आज यूँ स्मृतियों में कैसे आ धमकते. फिर ये कैसा अकेलापन है जो इतने बंद दरवाज़ों के भीतर भी अपने पैर पसार लेता है. क्या उसने बीते सात सालों में यही कमाया है. सात सालों का अकेलापन. ऐसी क्या वजहें हैं जो कि उसके अकेलेपन को और भी बढाती चली जाती हैं. पहले तो वो ऐसी कभी नहीं थी. फिर वह क्या था जो दिन ब दिन उसमें घुलता चला जा रहा था. एक अजीब सा नशा जो उसे अपनी गिरफ़्त में लेता ही चला जा रहा था.

पीछे रह गए 21 बरसों में कितना कुछ तो था. क्या उसमें से कुछ पल चुरा कर वो अपने पास नहीं रख सकती. 21 बरस में वह कितना कुछ हो जाना चाहती थी. क्या से क्या बन जाना चाहती थी. एक पत्नी और एक माँ तो बनना ही था. इससे उसे कभी इंकार कहाँ था. लेकिन ख्वाब यूँ परिंदे बन उड़ जायेंगे, और किसी शाख पर जा बैठेंगे उसने कभी ना सोचा था.

क्या एक भली लड़की होना इतना भर है कि वह कंक्रीटों के जंगल के किसी उगा दिए पेड़ की शाख पर बिठा दी जाये. क्या इतनी भर है ज़िन्दगी कि सातवें माले पर रहकर अपना आने वाला पूरा का पूरा जीवन बिता दिया जाए. इस इंतजार में कि एक दिन होगा. उसमें सुबह होगी, दोपहर होगी, शाम और फिर एक रात. और इस तरह से एक नया दिन उग आएगा. पुराने किसी नए दिन को काट फैंक कर. वो नए दिन का इंतजार करेगी. और इस तरह का इंतजार कब तलक तो इंतजार कहलाता रहेगा. फिर एक दिन ऐसा भी तो आता है जब किसी भी बात का, किसी भी दिन का, किसी भी शख्स का, किसी भी ख़ुशी का, किसी भी सुबह का कोई इंतजार नहीं बचा रहता. बचा रहना भी कितना बचाए रखा जा सकता है. एक दिन खर्च हो ही जाता है. दिन, प्रतीक्षाएँ, प्रतीक्षाओं में बीतती दोपहरें, शामें और इसी तरह बीत जाते हैं सालों साल. और खिडकियों के इस पार से उस पार यूँ ही बदलता रहता है समय.

कभी कभी रतिका सोचती कि क्या उसे अरुण से कोई शिकायत है. नहीं ऐसा तो कहीं से भी ज्ञात नहीं होता कि वह अरुण से दुखी है. वह तो अपनी सीधी सपाट जिंदगी जी रहा है. जैसा इस संसार के अधिकतर लोग जी लेते हैं अपनी जिंदगी वह भी एक दिन पूरी कर ही लेगा इस उम्मीद में कि मैं भी किसी एक रोज़ खड़ी मिलूंगी उस आखिरी के पल की उस सीमा रेखा पर जहां कहा जाता है कि हाँ हमने जी ली है अपनी ज़िंदगी. क्या जीना इतना भर है.

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खिड़कियाँ

>> 16 June 2015

खिड़कियों से आती हवा ना जाने क्यों अब उसे ताज़ी नहीं लगती. वह वही बासीपन लिए हुई सी होती है. रात बीत जाने के बाद सुबह की दिनचर्या और फिर वही पुरानी पड़ गयी सी हवा. ऐसे जैसे कि उसने स्वंय को उससे जोड़ के देखा. क्या किसी एक रोज़ वह भी ऐसे ही बासीपन का शिकार हो जाएगी. रोज़ सुबह उठना, बैड टी देना, स्वर्णा को उठाना, नाश्ता बनाना, स्वर्णा को स्कूल बस तक छोड़कर आना, फिर अरुण का अपने ऑफिस चले जाना. फिर नहाना धोना, साफ़ सफाई और फिर प्रतीक्षा करना कि कब स्वर्णा वापस लौट आएगी और फिर वो उसके कपडे बदलवाएगी, उसको खाना खिलाएगी और उसको सुलाकर फिर शाम की प्रतीक्षा में स्वंय को इसी खिड़की के पार कहीं टांग देगी.

बीते सात सालों ऐसा कोई दुःख तो उसे महसूस नहीं होता किन्तु वह क्या है जो उसके इस खालीपन का कारण है. ये जो बीत गए साल हैं उनमें ऐसा क्या है जो बीतते हुए भी नहीं बीता. समय कहने को तो बीतता ही चला गया किन्तु शायद वह अभी वहीँ खड़ी मालूम होती है. जब वह यहाँ इस फ्लैट में शादी के बाद अरुण के साथ आई थी. अपनी नई गृहस्थी, नए जीवन का आरम्भ करने. और फिर दिन बीते, महीने बीते और धीरे धीरे कर सात साल खिडकियों के इस पार से उस पार देखने में बीत ही गए. इस बीच स्वर्णा ने जीवन में दस्तक दी. बहुत कुछ बदला. जीवन और उससे जुडी जिम्मेदारियां. फिर भी वो क्या है जो कहीं भीतर अधूरा सा जान पड़ता है. क्या उसे कुछ और हो जाना चाहिए था जो वो ना हो सकी थी. या यूँ ही कोई अधूरे मन की ख्वाहिशें थीं जो मन के भीतर रेंगती रहती हैं. कभी इस कोने से उस कोने तो कभी उस कोने से इस कोने. मन का धरातल दिन ब दिन बंज़र होता जान पड़ता है.

क्या उसका अपना कोई स्वंय का अपने जीवन में एक रोल है. या वह अपने जीवन की कहानी को केवल जिए जा रही है. क्या केवल जी भर लेना जीना कहलाता है. क्या वह वही रतिका है जो स्कूल और कॉलेज के दिनों में हुआ करती थी. नई उमंगों, सपनों और ऊर्जा से भरी हुई रतिका. पढने लिखने और संगीत की शौक़ीन रतिका. अचानक से उसे याद हो आया कि बीते बरसों में उसने कोई फिल्म नहीं देखी. कोई नई किताब नहीं पढ़ी और नाहीं अपना मनपसंद संगीत सुना. उसके पास समय का आभाव नहीं किन्तु फिर भी वह ये अपने पसंदीदा काम नहीं करती. उसकी जिंदगी इतनी बासी सी क्यों महसूस होती है उसे.

खिडकियों के पार दूर तलक देखने पर उसे बिल्डिंगों के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता. हो सकता है किसी बिल्डिंग के किसी फ्लैट की किसी खिड़की से झांकती कोई उसकी हम उम्र लड़की होती हो किन्तु उसको वह दिखाई ना पड़ती हो. क्या मालूम वह रतिका ना हुई हो या रतिका हो जाने की सीमा रेखा पर खड़ी हो. क्या मालूम कोई एक नई विवाहित लड़की किसी नई बिल्डिंग के नए फ्लैट में नई ऊर्जा और नए सपनों के साथ आई हो जिसे रतिका हो जाना हो. या क्या मालूम उसने इस बासी जिंदगी को ही असल जिंदगी समझ उसे जीना सीख लिया हो. हो ना हो खिडकियों के पार भी ऐसी बहुत सी ज़िंदगियाँ होंगी.

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शोक

"चित्र गूगल से लिया गया है"











मेरा सुख और पूरापन यही है कि मैं आपको यह सब बता दूँ । जो समय के साथ अब बीती बात हो गयी है किन्तु स्मृतियों में पतंग की तरह उलझी है । जो फडफाड़ाती है, मुक्त होना चाहती है किन्तु उतना ही अधिक उलझ जाती है । उसकी उलझी हुई डोर मुझे जकड़े रहती है ।

अभिमन्यु को वो रात स्मृतियों में आज भी ठहरी प्रतीत होती है । वह कभी उससे अलग ही नहीं हुई, जैसे कि उसके वजूद के लिबास पर नक्शित हो । उन दिनों वह हॉस्टल में था । बुझे-बुझे पीलेपन में डूबी उस शाम से एक विचित्र अज्ञात-सा, आभासित, भय छलक रहा था । फिर उसी शाम उसकी अपने एक घनिष्ट मित्र से बात हुई । उसने संकुचित लय में बताया कि "तेरे पिताजी चले गये हैं ।" यह केवल बताना भर नहीं था । एक अस्वाभाविक सूचना थी जिसने उसके भीतर तूफ़ान ला दिया था । जो अपने साथ सब कुछ ले उड़ा था । अवशेषित था तो केवल सूना एकांत ।

माँ ने अब तक इस बारे में उसे कुछ भी क्यों नहीं बताया ? यह प्रश्न कितना विचित्र था और प्रतिउत्तर में उसने क्या-क्या सोच लिया था । शायद पढ़ाई में बाधा न आना इसका सहज कारण रहा हो या शायद उनके लौट आने की आस, कि जैसे सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा । कितने अनगिनत ख्याल उसके मन में उमड़ पड़े थे । ख्यालों की रस्साकशी में उसे माँ का ध्यान आया । उस पल उसके ह्रदय से केवल एक ही आवाज़ निकली, माँ, ओह माँ, तुम कैसी होगी ? उसने निश्चय किया कि वह घर जायेगा ।

उस ठहरी, सुबकती रात को कब वह रेलगाड़ी में बैठा, उसे याद नहीं । वह स्वंय को उस अँधेरे बियावान जंगल में पाता जहाँ केवल उदासी में डूबी माँ की आत्मा नज़र आती और उनके कराहने के स्वर गूँजते । वह अपने कान बंद कर लेना चाहता किन्तु वे हर दीवार को भेदते हुए उस तक पहुँच जाते । वह तूफ़ान के बाद की तबाही के मंज़र को देखता । अपने घर की टूटी-गिरी दीवारों को टटोलता, चारों ओर चीखता, दौड़ता और गिर पड़ता । कभी उसे लगता कि सुर्ख, लाल, राक्षसी आँखें उसे घूर रही हैं और वो उनके सामने पिघलता जा रहा है ।

कब रात बीती और कैसे वह घर पहुँचा, उसे याद नहीं । उनींदी आँखों से राह के हर चेहरे को स्वंय पर हँसता पाता । लगता कि लोग पर्यावाचित प्रश्नों से उसे भ्रमित कर रहे हैं । कब ? कहाँ ? क्यों ? और कैसे ? एक क्षण तो लगा कि अपना सूटकेस फैंक वह चीखे, चिल्लाये और हर स्वर को शांत कर दे । फिर लगा जैसे उन चेहरों से दौड़ता हुआ वह घर जा पहुँचा है । उस घर में, जिसमें पिताजी कहीं नहीं ।

अँधेरे के विस्तार में डूबे उस कमरे में चार आँखें डबडबा रही थीं । ऐसे जैसे कि प्रश्न कर रही हों कि अब क्या होगा । उसे प्रतीत होता कि उसका कुछ भी कहना बाढ़ ला देगा । उन आँखों में क्रोध से अधिक भय था, उस आने वाले कल का, जिसमें पुराना कुछ भी शेष न था । यह क्रोध से पहले का समय था क्योंकि क्रोध वहाँ शुरू होता है जहाँ भय समाप्त होता है ।

अगले क्षणों में उसने माँ को स्वंय से लिपट कर रोते पाया । यह रोना फिर कई हफ़्तों तक जारी रहा । माँ और बहन अपने-अपने हिस्से का खूब रोयीं । उसने उन दोनों के साथ कभी अपना हिस्सा शामिल नहीं किया । वो जानता था कि उसका ऐसा करना उस उम्मीद को तोडना था जिसे माँ और तरुणा ने बचा कर रखा है ।

बाहरी दुनिया के लिए उसके पिताजी एक औरत के साथ फरार थे किन्तु अभिमन्यु के लिए वे उस अँधेरे जंगल में चले गए थे जिसके बारे में सोचने से डर लगता था । वे उस जंगल में खो सकते थे, बस सकते थे किन्तु लौट नहीं सकते थे ।

अभिमन्यु सोचता है । आदमी ऐसा करता क्यों है ? वह क्या है ? जिसके लिए वह यह सब कर गुजरता है । वासना ? नहीं, नहीं । सुख ? शायद हाँ, शायद नहीं । अकेलापन ? नहीं । लगाव ? नहीं । तो फिर प्रेम ? शायद हाँ, शायद नहीं । ऐसी कौन सी प्यास है जो बुझती नहीं ? जिसके लिए वह मारा-मारा फिरता है ।

फिर वह पिताजी को उन प्रश्नों से जोड़ कर देखता । क्या पिताजी वासना के लिए ऐसा कर सकते हैं ? नहीं । सुख के लिए ? दुखी तो वे यहाँ भी नहीं थे । अकेलापन ? उन्हें कौनसा अकेलापन था ? लगाव ? क्या हम से लगाव कम था ? तो फिर प्रेम ? शायद । फिर माँ का प्रेम ? क्या उसके कोई मानी नहीं ? क्या वह कम था ? उसे लगता कि वकील भी वो है और जज भी ।

माँ ने स्वंय को चाहरदीवारी में कैद कर लिया था । वे हँसती हुई प्रश्नात्मक आँखों का सामना नहीं करना चाहती थीं । जिनकी दिलचस्पी यह जानने में रहती कि उनका कुछ पता चला । कहाँ गए होंगे ? कहाँ रह रहे होंगे ? कैसे रह रहे होंगे ? जैसे प्रश्न शामिल रहते । जो दुहाई देतीं कि जो भी किया, उन्होंने अच्छा नहीं किया । यह बहुत बुरा हुआ । इतनी अच्छी बीवी और काबिल बच्चों को छोड़कर कोई जा सकता है भला । जो आत्मा को रुलाकर जाता है वो कभी सुखी नहीं रह सकता ।

अभिमन्यु के साथ कई दिनों तक यह बार-बार होता रहा । हर गली, हर मोड़, हर घर ने उसमें दिलचस्पी दिखाई । बार-बार दिखाई, कई बार दिखाई । उनके लिए यह दिलचस्प विषय था और उनकी दिलचस्पी एक लम्बे समय तक इसमें बनी रही । लोग राह चलते उसे रोक लेते और अपनी पवित्रता की महानता के बोझ तले अपना गुबार निकालते । वे बात की तह तक जाना चाहते कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो क्यों किया ? बिन माँगी टिपण्णी करते "ऐसा करते हुए उन्हें शर्म न आयी । उन्होंने ज़रा भी न सोचा कि इसका क्या अंजाम होगा । बच्चों का क्या होगा ? बीवी का क्या होगा ?" इन बातों से लोग उसकी एक दुखती रग पर हाँथ नहीं रखते थे बल्कि उसकी सभी नसों को एक साथ चटका देते ।


माँ को विश्वास था कि पिताजी लौटेंगे । अपने विश्वास को जिंदा रखने के लिए वो तमाम पंडित, मौलवियों, बाबाओं और फकीरों के कहे को मानती रहीं । इसके लिए वे कहाँ-कहाँ न गयीं ? क्या-क्या न किया ? जादू-टोना, ज्योतिष, वास्तु दोष से लेकर उन्होंने व्रत, पूजा तक सब किया । पहले दिन बीते फिर महीने किन्तु उनमें से कोई भी असरदार साबित न हुआ । फिर माँ का विश्वास धीमे-धीमे धुंधलाता गया ।

तरुणा के अपने दुःख थे जिनका अभिमन्यु से कोई सरोकार न था । अभिमन्यु के लिए तो यह एक चक्रव्यूह की तरह था । जिसमें वह प्रवेश कर सकता था, लड़ सकता था किन्तु बाहर आने का उसे कोई रास्ता न सूझता । जब कभी वह तरुणा के बारे में सोचता तो उसे लगता कि माँ की तरह तरुणा की भी अपनी एक दुनिया होगी । जिसमें केवल वो ही रह सकती है और वो जानता था कि उसकी बनायी हुई दुनिया में झाँकने पर तरुणा को दुःख ही देगा । अतः वह उसे उसकी दुनिया में अकेले ही रहने देता ।

कभी-कभी माँ रात के किसी भी क्षण अचानक से उठ जाती और घंटों अँधेरे में डूबे घर के रिक्त स्थानों को देखा करती । ऐसा भ्रम होता जैसे बीते हुए समय में वहाँ कुछ था । जिसे पिताजी अपने साथ लेकर चले गए हैं । उसे दुःख और सुख में नहीं बाँटा जा सकता । वह अपने में सम्पूर्ण था । कुछ अज्ञान सा जिसकी चाबी केवल माँ के पास हो ।

अभिमन्यु और तरुणा जब कभी माँ को इस तरह बैठा हुआ पाते तो उन्हें भ्रम होता, क्या सचमुच वहाँ कुछ है ? जहाँ माँ घण्टों देखा करती है । जो कहाँ से शुरू होता और कहाँ ख़त्म, वे नहीं जानते थे । माँ, अभिमन्यु और तरुणा को देखकर पूंछती "शायद सुबह हो गयी ?" किन्तु अभिमन्यु को बाहर निपट अँधेरा नज़र आता । घर अँधेरे के विस्तार में डूबा प्रतीत होता । कई बार लगता कि जैसे माँ उनकी बातों को नहीं सुनतीं, सुनती हैं उस निर्भेद्य मौन को जो घर के भीतर फैला हुआ है ।

कभी-कभी माँ उठकर अकस्मात दूसरे कमरे में चली जाती, पुराने संदूक को खोलती और चीज़ों को एक-एक कर बाहर निकालतीं, मानो किसी भूली हुई चीज़ को तलाश कर रही हों । अकस्मात रुक जातीं और साडी के पल्लू से पिताजी की पुरानी तस्वीर के फ्रेम पर जमीं हुई धुल को साफ़ करतीं । बार-बार फ्रेम को साफ़ करते हुए विगत दिनों की स्मृतियों में खो जातीं ।

दिन बीतते रहे । अभिमन्यु हॉस्टल जाता और वापस आ जाता । फ़ोन पर माँ की आवाज़ सुनाई देती किन्तु माँ कहीं नहीं होती । माँ से यह कहना कि सब कुछ ठीक हो जायेगा, उसे यह बताना था कि कुछ भी ठीक नहीं । यह एक अजीब भय था जो अभिमन्यु को आ घेरता । माँ से कुछ भी न कह पाने की लाचारी उसे अजगर की तरह लीलती जाती ।

एक दिन माँ ने कहा "सब ठीक हो जायेगा" । यह एक सुख था जो कई महीनों बाद अभिमन्यु और तरुणा को प्राप्त हुआ था । माँ का स्वंय यह कहना एक तरह से उनका दुःख से लड़ना था । जिसे वे सुख में बदलकर अभिमन्यु और तरुणा को दे रही थीं । जैसे कि वे छलनी हों जो दुःख और सुख को अलग कर दुःख को अपने पास रख लेंगी और सुख उन्हें दे देंगीं ।

फिर एक दिन वह समय भी आ पहुँचा जब घर आर्थिक संकट से जूझने लगा । आय का कोई स्रोत न था । तंगहाली के दिनों में माँ और तरुणा ने सिलाई, कढाई और बुनाई का काम प्रारंभ कर दिया । उससे इतना हो जाता कि घर का खर्च और तरुणा की पढाई चल सके । उस दौर में अभिमन्यु कई बार सोचता कि वह किसी काम का नहीं । वह तो इतना भी नहीं कर सकता जितना तरुणा कर सकती है ।

वे गर्मियों की छुट्टियों के अंतिम दिन थे । अंतिम दिनों का समाप्त होना एक सहज सन्देश था कि अभिमन्यु को अपने अंतिम वर्ष की फीस का बंदोबस्त कर लेना चाहिए । सगे-सम्बन्धी बहुत पहले से अपने हाथ-पैर सिकोड़ चुके थे । भूलवश यदि सामना हो जाता तो वे अपने दुःख अलापना प्रारंभ कर देते । कहीं कोई सूरत नज़र नहीं आती । कई जगह हाथ-पैर मारने पर भी कुछ हासिल ना था ।

मदद के कहीं से कोई आसार नज़र नहीं आते और उधार उसे कोई किस संपत्ति पर देता ? जो परिचित, सगे सम्बन्धी एक-एक पाई का हिसाब रखने में अपना पूरा दिन जाया करते और अगर कहीं कोई पैसे फँसे होते तो उसके लिए फौजदारी तक कर आते, ऐसे लोगों से उधार तो दूर, उसके नाम पर वे दूर से सलाम कर जाएँ ।

अभिमन्यु रात को सोते महसूस करता कि उसका दम घुट रहा है । वह दलदल में फंसता जा रहा है । वह खुद को बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहा है । कभी उसे लगता कि वह एक कुँए में गिर गया है, जो लगातार गहराता जा रहा है और जोर-जोर से आवाज़ देने पर भी कोई उसे निकालने के लिए नहीं आ रहा । उसमें गिरने से उसकी साँस रुक रही है, घ़ुट रही है । फिर जब अचानक से घबरा कर उठता तो खुद को पसीने से तर-बदर पाता ।

जब फीस के बंदोबस्त की कोई भी सूरत नज़र ना आई तब वह अपने पुराने मित्र के घर गया । वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि उसके पिताजी का तबादला किसी दूसरे शहर हो गया है । वह किसी भी दशा में उससे मिलना चाहता था । पड़ोसियों से मित्र का नया पता लेकर वह उसी रात की रेलगाड़ी से निकल गया ।

रास्ते भर उसे यह ख्याल आते कि जो यहाँ भी कुछ न हुआ तो ? यदि वह न मिला तो ? एक पीछा छोड़ता नहीं तब तक दूसरा आ धमकता है । जो अजीब सी, असमंजस की स्थिति में लाकर उसे खड़ा कर देते । फिर सभी निरर्थक ख्यालों को वह खुद से दूर छिटक देता है और खिड़की के बाहर झाँकने लगता । बाहर उसे केवल निपट अँधेरा दिखाई देता । ख्यालों के इन्हीं सायों तले उसने रात बिताई ।

बीते हुए दिनों में दोस्त के पिताजी ने कई पते बदले थे । नए शहर में कई स्थानों की ख़ाक छान लेने के बाद वह आखिरकार अगली रात को अपने मित्र के घर की देहरी पर पहुँच गया । अभिमन्यु को देखते ही उसका मित्र बेहद प्रसन्न हुआ । वह देहरी से ही हाथ पकड़ कर उसे भीतर ले गया । बैठते ही कई घनिष्ठ, पुरानी बातें छिड़ गयीं । स्नान और भोजन कर लेने के पश्चात, मध्य में बिखरे हुए मौन को तोड़ते हुए मित्र ने आने का कारण पूँछा । संकुचित मन से अभिमन्यु ने अपनी सम्पूर्ण व्यथा कही । इस बार अभिमन्यु निराश न हुआ । उसके मित्र ने ना जाने कहाँ से और कैसे फीस का बंदोबस्त कर दिया ।

हॉस्टल का अंतिम वर्ष जिंदगी का नया मोड़ था । जहाँ से उसे मंजिल तलाशनी थी, नए रास्ते बनाने थे । उस अंतिम वर्ष ने अभिमन्यु को जिंदगी का नया रूप दिखाया था । वह जानता था कि वो यूँ ही मर जाने के लिए पैदा नहीं हुआ । उसे कामयाबी अवश्य मिलेगी । दुःख उसके शरीर की पगडंडियों से गुजर जीवन रूपी ढलान से उतरता हुआ धीमे-धीमे समाप्त हो जायेगा ।

माँ के बाल पकने लगे थे जो बीते हुए दिनों की याद दिलाते थे । कभी-कभी आभास होता कि माँ के बालों का सम्बन्ध बीते दिनों से है । सब कुछ तो अभिमन्यु की आँखों के सामने बदल गया था, माँ के रूखे-सफ़ेद बाल, पतले, कमज़ोर हाथ और चेहरे पर असंख्य झुर्रियाँ । माँ के रूखे-सूखे बालों की कर्कशता घर के स्याह गाढे मौन को और बढाती । सुखद कुछ भी नहीं था । न बीते हुए विलापित, अँधेरे दिन और न ये ठहरी हुई कर्कशता ।

हॉस्टल के बाद हर नया दिन अभिमन्यु के लिए नयी समस्याएँ उपजाता और पीड़ादायी साबित होता । वह हर दिन उतना ही खाली और बेकारी के विस्तार में डूबा हुआ होता । कभी-कभी उसे लगता कि उसका अस्तित्व हवा में उड़ने वाले उस तिनके की तरह है जो बेवजह यहाँ-वहाँ भटकता रहता है । आखिरकार उसके जीवन की सार्थकता क्या है ? वह इन्हीं ख़यालों में डूबा सुबह से शाम, इधर-उधर नौकरी की तलाश में घूमता रहता ।

काम की तलाश, हताशा और अवसाद से भरे वे संघर्ष पूर्ण दिन इस कहानी का हिस्सा नहीं लगते । उनका अपना एक अलग अस्तित्व है जो किसी भी तरह यहाँ वर्णित नहीं हो सकता । जिनकी समाप्ति पर डेढ़ बरस बाद अभिमन्यु को नौकरी मिलना भी शामिल है । एक तरह से नौकरी संघर्षपूर्ण दिनों का प्रमाणपत्र है, जो जीवन पर्यंत स्मृतियों में सुरक्षित रहता है ।

नौकरी के बाद के दिनों में अभिमन्यु माँ से कई बार अपने साथ चलने के लिए कहता रहा किन्तु माँ ने तो जैसे उस घर से गाँठ ही बाँध ली हो । तरुणा साथ आना चाहती किन्तु माँ के बिना यह संभव न था । तरुणा पढाई का बहाना कर माँ के साथ ही रहती । कभी-कभी अभिमन्यु को लगता माँ ने इस घर में अपनी अलग ही दुनिया बसा ली है । जहाँ माँ है, तरुणा है और विस्तार लेती उदासी ।

पहले दिन बीते फिर महीने और कब तीन बरस हो गए, इसका हिसाब अभिमन्यु के पास न था । वो सोचता शायद माँ के पास बीते समय का हिसाब होगा । जिसे उन्होंने क्षणों में जिया था । शायद तरुणा ने भी कुछ गिनती की हो । उनके बहीखातों के अपने-अपने पैमाने होंगे । जिनमें कब कौनसा क्षण जोड़ना है यह केवल वे ही जानती होंगी ।

छुट्टी की एक रात अपने रेंगते अकेलेपन को दूर छिटकते हुए तरुणा ने कहा था
-"भैया तुमने देखा है ?
-क्या ?
-यही कि माँ के भीतर एक रीतापन जन्म लेने लगा है ।
-"रीतापन ?" उसे लगा कि वह नींद से जाग गया है ।

तब उस क्षण उसने माँ को ऐसे महसूस किया जैसे वे घर का एकांत कोना हों । जहाँ केवल उसका अपना अस्तित्व है । सूना और उदासी में डूबा हुआ । जो दिन भर उदास रहता है और रात होते ही अन्धकार में डूब जाता है ।

उन दिनों अभिमन्यु ने पहली बार देखा कि माँ के अन्दर सब कुछ ख़त्म हो गया था । क्रोध, मोह, भय और पीड़ा जैसा कुछ भी, कहीं न था । था तो केवल, निपट अकेलापन । अकेलापन जो भीतर पनपता है और जिसे बाहर कोई नहीं देख सकता । इंसान के होने और न होने के मध्य पसरा हुआ । मृत्यु पश्चात के अकेलेपन से भी भयावह होता है यह, क्योंकि तब स्मृतियों से प्रेम और मोह जुड़ा रहता है ।

अभिमन्यु ने माँ से कई बार कहा कि वे उसके साथ चलकर रहे, किन्तु वे हर बार मना कर देतीं । अभिमन्यु हर बार की तरह थक हार कर नौकरी पर वापिस चला जाता । कभी-कभी वह भीतर ही भीतर उनके इस व्यवहार से खीज भी जाता किन्तु उससे होता कुछ भी नहीं । न पहले और न बाद में ।

उन दिनों सगे-सम्बंधियों ने माँ के दुःख में एक नया दुःख यह जोड़ दिया था, कि लड़की बड़ी हो गयी है और उसकी शादी कैसे होगी ? बाप के गुण क्या छिपे रहेंगे । अगर कहीं रिश्ता ले भी गए तो कोई क्या ख़ाक चुप रहेगा ? तमाम हैं बेवजह दूसरों के घरों में आग लगाकर हाँथ सकने वाले । किस-किस का मुँह पकड़ोगी । कई अपनी बेबाक राय देते और कई अफ़सोस जाहिर करते । कोई स्वंय ही इस मामले को प्रारंभ कर दया दिखाता, तो कोई आश्वासन देता ।

इसी तरह दिन, महीने और बरस बीतते गए । उन्हीं दिनों में तरुणा के लिए विवाह का प्रस्ताव आया । तरुणा और वो लड़का एक दूसरे से प्रेम करते थे । लड़का नौकरी करता था और अच्छे घर से था । अभिमन्यु ने तरुणा के विवाह के लिए हामी भर दी । विदाई के समय तरुणा अपने अन्दर का पूरा रोई । जाते हुए उसने माँ को बहुत कहा कि वे भैया के साथ चली जाएँ । तरुणा के विदा हो जाने पर, क्षण-भर के लिए भी उस उजाड़ अकेले घर में रहना दूभर लगता । तरुणा विदा हो गयी और अभिमन्यु नौकरी पर चला गया किन्तु माँ ने वह घर नहीं छोड़ा ।

उसके बाद के दिनों में भी तरुणा और उसके पति ने उन्हें अपने साथ चलने के लिए कहा किन्तु वे न गयीं । अभिमन्यु और तरुणा के सभी प्रयास विफल रहे । वे दोनों जान चुके थे कि माँ घर नहीं छोड़ेगी, किन्तु फिर भी माँ को वहाँ से ले जाना चाहते । अभिमन्यु सोच कर भी काँप जाता कि कोई कैसे इस उजाड़ घर में अपने अकेलेपन को काट सकता है ।

नौकरी के सिलसिले में अभिमन्यु ने कई शहर बदले । दिन बदले, ऋतुएँ बदली, कलैंडर बदले ।

फिर एक दिन तरुणा की शादी के कोई दो-तीन बरस बाद अभिमन्यु को एक फ़ोन आया । फ़ोन दूर के चाचा जी का था और उनका उतावलापन जता रहा था कि अवश्य कुछ घटित हुआ है । जब उन्होंने पूँछा, कैसे हो ? तो न जाने क्यों अभिमन्यु को विश्वास हो गया कि अवश्य कोई सूचना देने के लिए उसे फ़ोन किया है । कई भयावह विचार उसके मस्तिष्क में धीरे-धीर रेंगने लगे । अभिमन्यु जानता था कि हाल-चाल लेना उनकी फितरत में शामिल न था ।

अभिमन्यु का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा और उससे रहा न गया । उसने पूँछ ही लिया क्यों ? क्या बात है ? उन्होंने जब यह कहा कि "तुम्हारे पिताजी अब नहीं रहे ।" अभिमन्यु का दिल न जाने क्यों शांत सा हो गया । उस क्षण उसे लगा ही नहीं कि उसके कोई पिताजी भी थे, जो अब नहीं रहे । उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उस क्षण क्या सोचे । जब उसने स्मृतियों को खंगाला तो उसमें पिताजी कहीं भी न थे । वह स्थान माँ के सूने एकांत की तरह रिक्त था । एक अजीब सी लाचारी ने आकर उसे घेर लिया । उसे पिताजी याद करने पर भी याद नहीं आये । वह चाहकर भी दुखी न हो पाया ।

चाचा जी फ़ोन पर तब तक पिताजी का अतीत सुना चुके थे । जिसमें उनके फरार होने से लेकर अगले दो बरस बाद उस औरत का उन्हें छोड़ कहीं और चले जाना शामिल था । उसके बाद के दिनों में शराब, बेकारी और लाचारी ने उनकी जान ले ली । वे चाहकर भी कभी न लौट सके । वे जानते थे कि लौट सकने के लिए उन्होंने पीछे कुछ नहीं छोड़ा था । आज उनकी अनिच्छा के बावजूद उनका शरीर पुनः उसी घर में पहुँच गया था जिसे उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा ।

अभिमन्यु जब घर पहुँचा तो राह की हर आँख उसे ही देखती । किसी में कोई प्रश्न नहीं और न ही किसी में बीता हुआ कल । बीते हुए समय के साथ सब जाता रहा था । सगे सम्बन्धियों और पड़ोसियों से घर भरा हुआ था । तमाम अंजान चेहरे उदास और दुखी थे । औरते चीख-चीख कर रो रही थीं । न जाने उन्होंने क्या खोया था ? जिसका उन्हें इतना दुख था ।

सबसे पहले उसकी नज़र तरुणा पर गयी, वो सिसकियाँ ले रही थी । शायद उसके भीतर अभी भी आँसू बचे हुए थे जो उसने आज के लिए सुरक्षित रखे थे । उसकी आँखें लाल थीं और मालूम होता था कि वह अपने हिस्से का रो चुकी है । अभिमन्यु ने आज भी अपना हिस्सा तरुणा के साथ शामिल नहीं किया ।

अभिमन्यु की आँखें माँ को तलाश कर रही थीं । माँ चुप सी कहीं खोयी हुई बैठी थी । उनके पास बैठी हुई औरते शोर करती हुईं आँसू बहा रही थीं । वे माँ को बार-बार हिला रही थीं किन्तु माँ खामोश थी । उसे लगा माँ न जाने किस दुनिया में चली गयी है या शायद अपनी बसाई हुई दुनिया की देहरी के उस पार खड़ी है । उसका मन किया कि वो उस देहरी पर खड़ा हो चिल्लाये "देख माँ पिताजी लौट आये" और माँ भीतर से दौड़ती हुई आये । उस देहरी को पार कर पिताजी के गले लग जाए ।

अभिमन्यु जब माँ के पास बैठ गया और कुछ देर में अर्थी ले जाने की तैयारी होने लगी । तब माँ चीखी और उनके अन्दर का जमा अकेलापन फूट-फूट कर बाहर आने लगा । वे अभिमन्यु के गले से लिपट बीता हुआ पूरा रोयीं । उस क्षण अभिमन्यु ने माँ के साथ अपना हिस्सा शामिल कर लिया था ।

माँ का शोक उस दिन पूरा हुआ, जिसे वे बीते कई बरसों से खुद में शामिल किये हुई थीं । उस दिन माँ ने फिर से दुःख और प्रेम को महसूस किया था । उस दिन इतने बरसों बाद वे पिताजी से अलग हुईं थीं । पिताजी की अर्थी को लोग ले जा रहे थे । अभिमन्यु साथ-साथ चला जा रहा था ।

वो शोक का अंतिम दिन था...

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