साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

>> 07 July 2015

उन ऊँघती शामों को जो धीमे धीमे अँधेरे की गिरफ़्त में चले जाने को हुआ करतीं किन्तु कहीं से भी उनकी उन क्षणों की आभा से लगता बिल्कुल नहीं था. सूरज गुलाबी हुआ करता और रात की देहरी पर टंगा हुआ सा जान पड़ता था. हाँ तमाम किस्म के पंक्षी अवश्य ही अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर दिखते. जैसे एक मजदूर सुबह से शाम तक की दिहाड़ी कर घर को लौट जाना चाहता हो.
वो किन्हीं दो बड़े शहरों के मध्य नाम के लिए बना दिया गया स्टेशन था. ऐसे जैसे कि सुस्ताने के लिए कहीं तपती दोपहरों में बीच राह में कोई झोंपड़ी या कोई पेड़ों का कोई छोटा बागीचा. जहाँ ठहरने वालों को कहीं से कहीं को नहीं जाना होता. हाँ राहगीर को वे सुस्ताने के लिए, ज़रा दम भरने के लिए सुकून भरी छाँव अवश्य देते हैं. उसी तरह का दूर से दिख जाने वाला वह स्टेशन मुस्कुराता सा खड़ा रहता. बड़ी गाड़ियाँ वहां जब तब सिग्नल पास होने के लिए सुस्ताती दिख जाती थीं. और छोटी गाड़ियों के लिए वहां बैठे बेफिक्र लोग बतलाते बतलाते अपने घरों की, अपने परिवारों की बातों में मशग़ूल हो कब अतीत में चले जाते मालूम ही न पड़ता.
उन्हीं दिनों में तुम मुझे बहुत बहुत याद आया करतीं. मैं उस स्टेशन के नाम के लिए कहे जाने वाले प्लेटफार्म नंबर दो पर बैठा तुम्हारे बारे में सोचा करता. सुबहें कट जाया करतीं लेकिन दोपहरें अक्सर शामों का इंतज़ार किया करतीं और मैं और मेरा भरा पूरा अकेलापन देर तलक उस प्लेटफार्म पर अटके रहते. कहीं से कहीं भी न जाने के लिए.
उदासियाँ अक्सर स्मृतियों में आ आकर झाँका करतीं. और मैं उन्हें परे धकेलने के अंतहीन प्रयत्नों में लगा रहता. यहाँ तक किन्हीं कमजोर क्षणों में मैं मरने के ख्यालों से घिर जाता.
कहीं कोई तो ऐसी डोर होगी जो हमें जोड़ती होगी. इन्हीं और ऐसी तमाम बातों और हो सकने वाली भविष्य की कामयाबियों के बारे में सोचा करता.
वो तुम्हारी मोहब्बत ही थी जिसने इतना कसकर मुझे मुझ तक पहुँचने वाली विश्वास भरी डोर से बांधेे रखा.
वो मेरी उदासियों का और कभी कभी मिल जाने वाली खुशियों का साथी प्लेटफार्म नंबर दो आज भी ज़ेहन में मुस्कुराता सा खड़ा है. जिस पर सुस्ताने के लिए या अपने ग़म साझा करने के लिए लोग और रेलें ठहर जाया करती थीं.
साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

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