लिखना जैसे अपनी आत्मा को तराशना

>> 07 July 2015

लिखना असल में अपनी आत्मा को तराशना है. हम जितना भी लिखते चले जाते हैं उतना ही स्वंय के पास होते चले जाते हैं. हम कितनी ही दफा अपनी आत्मा का पोस्टमार्टम करते हैं. दुनियादारी में फँसी अपनी जान को किसी एकांत में ले जाकर कई कई दफा हम स्वंय से लड़ते हैं. स्वंय से ही हारते हैं और कई कई दफा स्वंय से ही जीतने के ये जतन चलते ही रहते हैं.
मैं जब भी जी भर कर लिख रहा होता हूँ तब स्वंय के सबसे पास होता हूँ. तब असल में मैं स्वंय को देख पाता हूँ.
जब किसी उपलब्धि के लिए या किसी यश कामना के लिए नहीं बल्कि जिसको लिखने में सुकून हासिल हो. तब आत्मा सुख के झरने में नहायी, धुली-धुली महसूस होती है.
कभी कभी लगता है कि बस लिखता रहूँ. जब जब जी चाहे. दिन-रात, सुबह-शाम की बंदिशों से परे.
लिखना मेरे लिए अपनी पीड़ाओं पर मरहम लगाने सा, लिखना अपनी प्यास को मिटाने सा.

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