उनींदी रातें

>> 13 July 2015

तुम नहीं हो फिर भी हो. दिन भर महकता है ये घर. इसमें बसी है खुशब तुम्हारीू. मैं नहीं खोलता खिड़कियाँ सारीं और आहिस्ता से खोलता हूँ दरवाज़े इसके. कि तुम अब भी हो, यहाँ हर कोने में.
सुबहें दोपहरों तक खींच ले जाती हैं खुद को जैसे तैसे. शामें बहुत याद दिलाती हैं तुम्हारीं.
तुम जब थीं तो बरसता था गुस्सा , कि वक़्त ही नहीं है तुम्हारी जेबों में खर्च करने के लिए. अब जेबें फटी फटी सी हैं मेरी. कि वक़्त पुराने लम्हों में जीता है.
तकिये के नीचे रख छोड़ी थीं जो तुमने अनगिनत कहानी, वे पूरेपन में मेरी रातों में शामिल हो उठती हैं.
तुम दिन में, सुबह में, शामों में और उनींदी रातों में, हर लम्हे में बेइंतहा याद आती हो.

1 comments:

mera jahan 1 August 2015 at 02:41  

sahi hai sir,kisi k hone ka ahasas uske jane k baad hi hota hai






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