अनिल कान्त :
मास्टर जी कक्षा में ब्लैक बोर्ड के सामने हाथ में डंडा पकड़े हुए किसी चुनाव में दिए जाने वाले भाषण के समय मंत्री की तरह दहाड़ रहे हैं और ख़ुद को शेर से कम नहीं समझते हुए पूँछ रहे है कि बताओ "कि सतहत्तर, अठहत्तर और उनहत्तर में से कौन सी संख्या बड़ी है ।" सब बच्चों को ऐसे सांप सूंघ गया जैसे कि जिला अधिकारी की बैठक में भाग लेने वाले नीचे के अधिकारी और बाबुओं को सूंघ जाता है.

मास्टर जी फिर से दहाड़ते हैं कि "क्यों खाने के वक्त तो ये मुंह बड़ी जल्दी खुल जाता है ? सबेरे सबेरे आ जाते हो अपनी अपनी नाँद भर भर के और अब देखो तो किसी का मुँह नहीं खुल रहा है ।" कक्षा में उपस्थित ज्यादातर बच्चे उंघाह रहे हैं, कुछ जम्हाई ले रहे हैं, जैसे कि किसी मंत्री के लंबे दिए जाने वाले भाषण में किए हुए वादों के वक्त उनके सहयोगी साथीगण ये सोच जम्हाई लेते रहते हैं कि कर दो भाई जितने वादे करने हैं, कौन सा पूरा करना है ? जो मन में आए बस बक दो फटाफट.

मास्टर जी एक बच्चे को खड़ा कर लेते हैं, इशारा करते हुए बोलते हैं "हाँ भाई तुम" उसके अगल बगल वाले बच्चे ख़ुद की तरफ़ देखते हैं फिर मास्टर जी की तरफ़ और ये सोच डरते हैं कि कहीं हमें खड़ा तो नहीं कर रहे । हाँ तुमसे ही कहा रहा हूँ " क्या नाम है तुम्हारा श्याम ?" वो लड़का खड़ा हो जाता है और बोलता है "नहीं मास्साब, रामभरोसे" सुनकर मास्टर जी बोलते हैं "अब जब तुम्हारा नाम ही रामभरोसे है तो तुम्हें क्या ख़ाक पता होगा, पर उस दिन तो तुमने अपना नाम श्याम बताया था" लड़का खड़ा खड़ा कहता है "नहीं मास्साब, मेरा नाम रामभरोसे ही है ।" मास्टर जी उसे घूरते हुए कहते हैं "अच्छा अच्छा, ठीक है-ठीक है । क्या नाम है तुम्हारे पिताजी का ?" लड़का बोलता है "जी रामलाल" मास्टर जी बोलते हैं "तुम रामभरोसे और वो रामलाल, बड़ा प्यार है राम से, तुम्हारी अम्मा का क्या नाम है ?" लड़का बोलता है "जी रामदुलारी और बाबा का रामदीन, चाचा का रामसनेही, रामकिशोर, रामदयाल, राम पाल" मास्टर जी चिढ़ते हुए बोलते हैं "रुक क्यों गया और कोई रह गया तो उसका भी बता दे" तो वो शुरू हो जाता है "रामकटोरी हमारी दादी, रामबिटिया, रामवती हमारी बहने" तब तक मास्टर जी चिल्लाते हैं "अब चुप बैठेगा कि दूँ एक खींच के, पूरा का पूरा घर राम से जुड़ा हुआ लगता है, जरूर ये उस शास्त्री का किया धारा होगा उसी के खानदान ने तुम लोगों के ये नाम धरे होंगे"

मास्टर जी फिर से एक बच्चे की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं "हाँ तुम बताओ, कौन सी संख्या बड़ी है ?" लड़का खड़ा खड़ा सिर खुजलाने लगता है, कभी ऊपर देखता है और फिर कभी नीचे। तब तक मास्टर जी कहते हैं "ऊपर क्या तुम्हारे दद्दा लिख कर छोड़ गए हैं कि कौन बड़ा है, आ जाते हैं बिना मुँह धोये पढने, रात का बचा हुआ जो भी होता है भर आते हो तेंटुये (गले) तक और यहाँ आकर सोते रहते हो दिन भर" कुछ देर में मास्टर जी के हाथों 4-6 बच्चे ठुक चुके होते हैं फिर मास्टर जी दहाड़ते हुए ऐसे बताते हैं कि ये सिर्फ़ उन्हें ही पता था कि "अठहत्तर बड़ी है गधों"

थोड़ी देर बाद मास्टर जी दूसरी कक्षा में पहुँच कहते हैं कि "दहेज़ प्रथा के ऊपर जो निबंध लिख कर लाने को कहा था वो सब अपनी अपनी कापियाँ दिखाओ" सब बच्चे अपनी अपनी कापियाँ जमा कर देते हैं । मास्टर जी यूँ ही कोई भी काँपी उठा कर देखने लग जाते हैं, थोड़ी देर पढ़ते हैं और फिर कहते हैं "किसकी है ये काँपी ?" नाम पढ़ते हैं और चिल्लाते हैं कि "खड़े हो जाओ", लड़का खड़ा हो जाता है । मास्टर जी कहते हैं "ये क्या लिख रहे हो तुम, कुछ भी अंट शंट, दहेज़ प्रथा बहुत जनम जनम पुरानी प्रथा है, मेरे बापू मुझे रोज़ उलाहना देते हैं कि तू जितना चाहे मौज उड़ा ले . तेरे ब्याह के बखत तेरे दहेज़ में सब वसूल लूँगा । रामदीन के लड़के को बहुत अच्छा दहेज़ मिला है । वो रोज़ अपनी फटफटिया पर बाजार जाता है । जिस किसी की शादी में जितना दहेज़ आता है उसके लगन में उतनी ही अधिक बन्दूक से गोलियां चलती हैं, पिछले साल ही रामधन के लड़के के लगन के बखत गोली चल जाने से छत पर खड़ा बिर्जुआ ढेर हो गया था । जब लगन के बखत दहेज़ न मिले तो फेरे के बखत नाटक करने से बचा हुआ दहेज़ मिल जाता है । पर रामकिशोर के लड़के की शादी के बखत पूरी बारात को बाँध के डाल लिया था, जैसे तैसे उन्होंने छोड़ा और शादी भी नहीं की । वो तो नाक कट रही थी इस कारण उसी गाँव की कोई दूसरी लड़की से चट मंगनी और पट ब्याह कर डाले। हम भी सोचत हैं कि जल्दी से हमारा भी लगन हो जाए तो हम भी फटफटिया घुमाए पूरे गाँव में । " मास्टर जी उस लड़के के मुँह पर काँपी फैंक कर मारते हैं और उसे पास बुलाकर 8-10 खींच खींच के रसीद करते हैं, थोड़ी देर में वो रोता, भुनभुनाता, चुपचाप होकर अपनी जगह बैठ जाता है ।

मास्टर जी दूसरी काँपी उठाते हैं, थोड़ी देर पढ़ते हैं और फिर नाम पुकार कर खड़ा करते हैं । उसकी शक्ल की तरफ़ देखते हैं और कहते हैं "तुम वही रामदीन दूधवाले के लड़के हो ।" वो मुँह फाड़ कर खुश होते हुए बोलता है "हाँ उन्हीं का हूँ ।" मास्टर जी कहते हैं "कि तुमने ये क्या बकवास लिखा है । दहेज़ प्रथा हमारी संस्कृति है । इस प्रथा की वजह से हमारा पूरे संसार में बहुत नाम है । दहेज़ लेकर रामलखन, रामपाल, रामसुंदर, रामनिवास सबके सब गुलछर्रे उड़ा रहे हैं । उन्हें दहेज़ में बहुत मोटी रकम मिली तो अब वो जी खोल के ताश पत्ता खेलते हैं, पिच्चर देखते हैं, फटफटिया घुमाते हैं और बीडी पीकर मस्त रहते हैं । बापू कहते हैं कि दहेज़ तो लेना पड़ता है, नहीं तो समाज में हमारी नाक न कट जायेगी, कि देखो तो रामसिंह के लड़के को फूटी कौड़ी नहीं मिली, पूरा नाम मिटटी में मिल जाएगा और फिर पूरी जिंदगी तुझे अपनी उस लुगाई को बैठालकर खिलाना भी तो पड़ेगा । तो दहेज़ तो लेना ही पड़ता है बेटा । बापू सोचते हैं कि मेरे लगन में फटफटिया तो मिलेगी ही मिलेगी और 4-6 भैंस भी मिल ही जायेंगी । मैं भी सोच रहा हूँ कि जल्द से जल्द लगन हो तो फटफटिया लेकर खूब मौज उड़ायें और उन भैंसों का दूध बेचने बाजार जाएँ।" मास्टर जी गुस्से में आकर उस लड़के के पास पहुँच कर उसकी डंडे से सुताई कर देते हैं।

मास्टर जी फिर उन्हें समझाते हैं कि दहेज़ लेना बहुत बुरी बात है और ये हमारे समाज पर एक कलंक है । यह हमारे समाज को अन्दर ही अन्दर खोखला कर रहा है । इसी दौरान गाँव के रामसुख चाचा आ जाते हैं और वो मास्टर जी को इशारा करके बाहर बुलाते हैं । मास्टर जी बाहर जाते हैं तो रामसुख चाचा कहते हैं "कि पल्ले गाँव के कृष्णचंद जी आए है अपनी लड़की का रिश्ता आपके लड़के के लिए लेकर ।" मास्टर जी कहते हैं कि "वो तो पहले भी आ चुके हैं, मैंने उन्हें पहले ही इशारों ही इशारों में बता दिया था कि उतने कम पैसे में मैं अपने लड़के का लगन नहीं करूँगा, आख़िर हमारी भी कोई इज्ज़त है ।" रामसुख चाचा कहते हैं "अरे मैं इस बार उन्हें सब समझा लाया हूँ, वो सब मान गए हैं और जितना तुम चाहते हो उतना दहेज़ दे देंगे, बाकी चिंता काहे करते हो, हम हैं ना । " मास्टर जी मुस्कुरा जाते हैं ।
अनिल कान्त :
मैं यह पोस्ट ना ही तो ज्यादा ट्रैफिक पाने के लिए लिख रहा हूँ और ना ही ज्यादा टिप्पणियों की खातिर।

आज जब मैंने नंदनी महाजन जी का ब्लॉग जख्म परेशां है चुप्पी से...देखा तो मुझे बहुत दुःख हुआ यह जानकर कि नंदनी महाजन जी ने हिन्दी ब्लॉग जगत को अलविदा कहते हुए अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया।

मैं यहाँ किसी बात की व्याख्या नहीं करूँगा कि किसकी गलती थी, ये सब क्यों हुआ ? ना ही इन सब बातों में मुझे ज्यादा दिलचस्पी रहती है। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि हिन्दी ब्लॉग जगत में वैसे ही चन्द लोग अच्छा लिखने वाले हैं और अगर वो भी धीरे धीरे छोड़कर जाने लगे तो ये हिन्दी चिट्ठाकारी के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। यदि मैं हिन्दी चिट्ठा जगत को एक हार मानूं तो यकीनन नंदनी महाजन जी जैसे व्यक्ति उसका एक मोती जरूर हैं।

मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि वो अपने लेखन को सुचारू रूप से जारी रखें, भले ही वो टिपण्णी का विकल्प अपने ब्लॉग से हटा दें। मैं चाहता हूँ कि नंदनी जी आप लिखें, मैं और मेरे जैसे लोग आपका लिखा पढ़ना चाहते हैं ।
चूँकि न ही तो आपके ब्लॉग के अब एकमात्र पन्ने पर कोई मेल-आईडी है और ना ही कोई टिपण्णी करने का विकल्प तो मैं ऐसे में चाहूँगा कि यदि कोई उन्हें जानता है, चाहे किसी भी तौर पर, तो उनको मेरा यह आग्रह पहुँचा दें।

यदि नंदनी जी आप मुझे पढ़ती हों या पढ़ें तो मैं आपसे यही कहना चाहूँगा कि आप आगे निरंतर लिखती रहें ।


आपका प्रशंसक एवं ब्लॉग परिवार का सदस्य
अनिल कान्त
अनिल कान्त :
कभी कभी मन करता है कि कई दिनों तक और कई रातों तक सोता रहूँ । इतना कि इस सोते रहने की सोच से निजात मिले । हर गम और हर परेशानी उस सोते हुए दिन रात में घुल जाए, चाहे कितने भी बुरे से बुरे स्वप्न आयें और मैं उन्हें देखूं, ख़ुद को मरते हुए, जीते हुए, तडपते हुए, सहमते हुए, सकुचाते हुए, लड़खड़ाते हुए, घबराते हुए । जब मैं उठूँ तो वह फिर से रह रहकर मुझे याद न आए ।

मन करता है कि किसी पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ कर वहाँ खड़ा हो जाऊँ और ज़ोर ज़ोर से चिल्ला चिल्ला कर अपना गला फाड़ लूँ । उस चिल्लाहट में मैं अपना वो सब गुस्सा, आक्रोश निकाल देना चाहता हूँ जो इतने सालों से मेरे अन्दर भरा हुआ है । जो लावा की तरह मेरी रगों में बह रहा है । मैं चाहता हूँ कि दूसरी पहाड़ों की चोटियाँ भी मेरे वह दर्द भरे, रोते हुए, चिल्लाते हुए स्वर सुनें और मुझे वापस करें । मैं चाहता हूँ उन्हें सुनना कि कैसे लगती है वो घुटन, वो आक्रोश, वो तड़प सुनने में, जो भरी है कई बरसों से मेरे अन्दर।

चाहता हूँ कि दौड़ता रहूँ-दौड़ता रहूँ और जब तक दौड़ता रहूँ जब तक कि मेरे कदम थक कर चूर नहीं हो जाते । चाहता हूँ कि साँसों के हाँफने की आवाज़ सुनूँ । मैं उसमें भी वो बसी हुई सहमी सी, दबी हुई सी बातें सुनना चाहता हूँ, जो मैंने कभी किसी कारण तो कभी किसी कारण न कह पायी ।

मैं जी भर के रोना चाहता हूँ, कई बरसों का जमा किया हुआ रोना । जो मैंने अपने बड़क्क्पन में, ये जताते हुए नही रोया कि मैं कमजोर नहीं हूँ, कि मैं बड़ा हूँ सबसे तो मैं कैसे रो सकता हूँ, कि मेरा रोना इन सबसे सहन नहीं होगा । पर मैं रोना चाहता हूँ बेतहाशा, इतना कि जो कभी फिर से रोने का मन ना करे ।

हाँ माँ मैं थक कर चूर हो जाता हूँ तो मन करता है कि फिर से बच्चों जैसा बनकर तुम्हारे गले से लिपट खूब रोयूं और कहूँ कि माँ "आई एम सॉरी" मैं तुम्हारे लिए इतना भी ना कर सका । मैं तुम्हारे हाथों से ढेर सारी मार खाना चाहता हूँ, कम से कम वो दर्द तो उस मार में जाता रहेगा । मैं चाहता हूँ कि कई कई दिन यूँ ही तुम्हारे पास रहूँ, तुम से ढेर सारी बातें करूँ, बचपन से लेकर अब तक की सभी बातें। वो बातें जो आज तक मैंने किसी से नहीं की । वो बातें जिन्हें कहने से मैं डरता हूँ, जो मैंने अपने "बेस्ट फ्रैंड" से भी नहीं कह पायीं ।

मन करता है माँ कि उस पुलिस अफसर के सामने खड़ा होकर उसे अपने दिल की सारी बातें कह डालूं और कहूँ कि बिना सहारे के जिंदगी जीने का सहूर क्या होता है ज़रा बताये । कैसे जी जाती है जिंदगी बिना पैसे, एक एक रोटी के लिए मोहताज़ होकर । मैं जानना चाहता हूँ उससे कि कैसे अच्छी अच्छी बातें कर सकता है कोई बुरे वक्त में भी । मैं उसी के लहजे में उसे एक लंबा भाषण देना चाहता हूँ, उसे घंटों अपने ऑफिस के बाहर खड़ा करके फिर अन्दर आने पर ढेर सारी उसूलों की बातें बताना चाहता हूँ।

मैं हर उस इंसान से उसी की वाली चालाकी की अदा से उसे चालाकी दिखाना चाहता हूँ और फिर उसे जी भर कर मुंह चिढाना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ कि वो बुरा माने और फिर दिखाने के लिए ये करे कि उसे बुरा नहीं लगा । मैं देखना चाहता हूँ उसके चेहरे पर उसी के जैसी चालाकी चलने के बाद के भाव ।

मैं आत्महत्या करने की सोचना चाहता हूँ और वो डर भी महसूस करना चाहता हूँ, मैं ये भी बताना चाहता हूँ कि बिना सफलता पाये मर जाने से मैं बहुत डरता हूँ । मैं डरता हूँ कि लोग मुझे डरपोंक, भगौड़ा और हारा हुआ कहेंगे । इस बात को अच्छी तरह जानते हुए भी मैं आत्महत्या के बाद के हालात देखना चाहता हूँ । लेकिन इन सबके बावजूद मैं आत्महत्या नहीं करना चाहता । मैं कोई भी ऐसी मौत नहीं चाहता जिसके बाद मैं कमज़ोर कहलाऊं ।

मैं तुमसे कह देना चाहता हूँ कि मैं तुमसे बहुत बहुत प्यार करता हूँ, उतना ही जितना कि बचपन में किया करता था । उतना हीं जितना कि तुम्हारा पल्लू पकड़ पीछे छुप जाने पर और खुशी से गले लग जाने पर जताता था । मैं कोई ऐसा ढंग खोजना चाहता हूँ जिससे मैं आसानी से सब कुछ बयाँ कर सकूँ...हर वो एहसास जो दबा कुचला है


मैं कहना चाहता हूँ माँ कि तुमने जितने भी ख्वाब देखे हैं, उन्हें पूरा करना चाहता हूँ । मैं कहना चाहता हूँ माँ, कि मैं कभी कभी बहुत उदास होता हूँ । हाँ माँ, मैं कह देना चाहता हूँ कि मेरे अन्दर बहुत कुछ ऐसा है, जो धीरे धीरे ज़मा होता रहा है-होता रहा है, पर आज तक दिल खोलकर किसी को भी नहीं कह सका...किसी को भी नहीं ।

जानती हो माँ मुझे ख़ुद को भी बताने में कभी कभी सोचना पड़ता है कि मेरे अन्दर क्या क्या है, जो बयाँ नहीं हुआ है । मैं दिल खोलकर बिना दिमाग की सुने, सब कुछ बयाँ कर देना चाहता हूँ...हर वो एहसास जो वर्षों से मेरे अंदर क़ैद है

* आतिशफ़िशाँ = ज्वालामुखी
अनिल कान्त :
कभी कभी लगता है कि दूर तलक चली जाती खामोश सड़क पर मैं तुम्हारे हाथों में हाथ डाल कर यूँ ही खामोश चलता चलूँ-चलता चलूँ । कभी कभी खामोश रहना भी कितना सुकून देता है, है न । तुम्हें पता है कि जब ख़ामोशी जुबां अख्तियार कर लेती है तो बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमारे सीने में दफ़न होती हैं, उन्हें ख़ामोशी ख़ुद-ब-ख़ुद दूजे के दिल तक पहुँचा देती है । कितना आसान है न ख़ामोशी की जुबां को समझना, या शायद हमें समझने की जरूरत कहाँ पड़ती है, वो तो ख़ुद-ब-ख़ुद हमारे कानों में संगीत बनकर गूंजती है ।

एक अर्सा हुआ जब से कुछ खोया-खोया सा जुदा-जुदा सा लगता है । लगता है कि कुछ है, जो यूँ ही समझ नही आएगा । मन करता है एक बार फिर से वही सब करूँ, वही सब सुनूँ, वही सब महसूस करूँ जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ होता रहा । तुम्हें याद है न वो सब...याद ही होगा...अभी जैसे कुछ रोज़ पहले की ही सी तो बात है । जब तुम मेरे साथ साइकिल के अगले हिस्से पर बैठ कितनी खुश हुआ करती थीं । उन भेड़ों को हांकने वाले को जबरन परेशान करने के लिए तुम घंटी बजा दिया करती थीं । कैसे खिलखिला कर हँसती थीं तुम, जब वो बोला करता कि क्या दीदी आप भी ।

जब उस हलकी हलकी उग आई हरी घास पर लेटे हुए आसमान में देखा करते और हमारे बीच कई कई बीत गये हुए पलों तक बात न हुआ करती । कैसे हम एक दूजे के दिल का हाल जान लेते थे बिना कहे, जैसे तुम कहना चाहती हो कि देखो तो वो वाला बादल दूल्हा सा लग रहा है और वो देखो वो टुकड़ा दुल्हन, कितनी खूबसूरत लग रही है न। देखो दूल्हा कैसे मुस्कुरा रहा है । ऐसी कितनी ही तो बातें थी जो हमारे दरमियाँ उस ख़ामोशी में हो जाया करती थीं।

जब तुम करवट बदल मेरे सीने पर अपने सर को रख लेती तो सच मानों उस पल लगता मैं जन्नत में हूँ । नहीं जानता कि कैसी होती होगी, लेकिन इससे अच्छी तो नही होगी न । तुम हो, मैं हूँ, हमारी बातें हैं, बेफिक्री वाला दिन, खुला आसमान, हरी घास, मदमस्त उड़ते से रंग बिरंगे पंछी, वो तितलियाँ और वो तुम्हारे झूठ बोलकर घर से बनाकर लाये हुए मेरे लिए परांठे । कभी तो लगता है कि जन्नत भी क्या ख़ाक होगी इसके आगे ।

जब तुम घास के तिनके को बार बार तोडा करतीं तो पता लग जाता कि कुछ सोच रही हो, किसी उलझन में हो । हर बार ही तो मैंने तुम्हें इसी तरह उलझन में पाकर तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर और तुम्हारी आंखों में झाँककर पूँछा, कि क्या बात है और तुम भी न कह देतीं कि कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं । लेकिन अगले ही पल कैसे तुम सभी बातें कह दिया करती । तुम्हारी वो बातें, ढेर सारी बातें, प्यारी प्यारी, अपनी सी, भोली सी, मासूम सी । जिनसे मुझे उतना ही प्यार हो चला था जितना कि तुमसे, तुम्हारी प्यारी आंखों से, तुम्हारी उस मुस्कराहट से, तुम्हारी उन बच्चों जैसी हरकतों से था । सच में वो ख़ामोशी भी बहुत खूबसूरत हुआ करती थी । अपने अपने हाले-दिल बयाँ करने के लिए सबसे खुशनुमा, सबसे संजीदा और बिल्कुल अपनी सी ।

तुम्हें पता है कि उस ख़ामोशी में हम अपने सारे गम, सारी खुशी बाँट लेते थे । वो ख़ामोशी हमारी दोस्त हो जाया करती थी । उस ख़ामोशी के बने हुए तमाम अफ़साने हैं, जो मेरे जहन में जब तब यूँ ही आ जाया करते हैं और मैं मुस्कुरा जाया करता हूँ । ठीक उसी मुस्कराहट के जैसे जो तुम्हें सबसे अज़ीज थी । क्या वो खामोश से अफ़साने तुम्हारे पास भी आते हैं गुफ़्तगू करने...
अनिल कान्त :
हमारे एक मित्र थे बिल्कुल लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत लिए हुए. वो अक्सर एक ज़ुमला इस्तेमाल किया करते थे " ये शरीफ़ हैं, इनकी शराफ़त की तो..." अब डैश-डैश पर मत जाइए. उसमें बहुत कुछ छिपा है, अजी मान लीजिए कि बहुत कुछ छिपा रहता है इस डैश-डैश में. मसलन... अजी गोली मारिए मसलन को. आप तो ख़ामाखाँ हमें पिटवाने पर तुले हैं मियाँ. अब जो कहीं हमारे उन नज़ाकत और नफ़ासत वाले भाई जान ने पढ़ लिया तो हमारी तो आ जाएगी ना शामत.
अब ये जिस तरह लोगों को शरीफ होने की ग़लतफहमी होती है ना, वो बहुत दूर तलक जाती है. अब कितनी दूर तलक जाती है, वो हमने कोई नापी थोड़े ना है! कमाल करते हैं आप भी. अब आप भी देखिए, आप आए थे हमारे यहाँ ब्लॉगिंग के बारे में जानने और हम भी क्या ले बैठे ? ना जाने क्यों शराफ़त के चोचले ले बैठे. तो ये शराफ़त की बात छोड़ते हैं फिर कभी फ़ुर्सत से करेंगे.

तो मियाँ ब्लॉगिंग तो बात ऐसी है ज़नाब, अच्छा चलो मोहतरमां भी, अब खुश सभी. कुछ ग़लतफ़हमियाँ ऐसी हैं जैसे कि :

1. लोग हमें सबसे ज़्यादा इसलिए पढ़ते हैं कि हम बहुत अच्छा लिखते हैं

रहने दीजिए ज़नाब/मोहतरमां अगर सभी लोग सबसे ज़्यादा अच्छा पढ़ने के चक्कर में आते हैं तो ऐसा नही है. ऐसे कई हैं जो बहुत बहुत अच्छा लिखते हैं और जहाँ गिनी चुनी दस्तक ही दिखाई देती हैं और फिर अच्छे लिखे हुए से तो किताबें भरी पड़ी हैं, पुस्तकालय भरे हुए हैं खचाखच.

किसी को पढ़ने लोग ज़्यादा इसीलिए आते हैं कि उसने पाठकों को महत्व दिया, उससे संबंध स्थापित किया, उनकी टिप्पणियो का जवाब दिया, उनके सवालों का जवाब दिया. धीरे-धीरे संबंधों को आत्मीय बनाया. समय समय पर, समय के हिसाब से विषय वस्तु बदली, पाठकों को काम की बातें भी बता कर चले. इन सबके साथ साथ मूल्यवान सामग्री भी प्रस्तुत की.

2. अगर मैं ये लिखूं तो लोग आएँगे

ऐसा कहाँ होता है जनाब. जब तक लोगों को पता ही नही होगा तब तक कहाँ पढ़ा जाएगा. आपकी उपस्थिति होना अनिवार्य है कि हाँ आप मौजूद हैं और आपने फलाँ बात लिख दी है. मान के चलिए अगर किसी जंगल में कोई पेड़ गिरता है और अगर वहाँ कोई नहीं तो क्या वो आवाज़ करेगा. या कोई अच्छी फिल्म आकर चली जाए बिना विज्ञापन के तो क्या आपको पता चलेगा कि वह अच्छी थी या बुरी. कई दिनों और महीनों बाद पता चलेगा कि वो अच्छी थी. देख लो भैया अब. अरे हाँ वो ज़नाब के साथ मोहतरमां भी जोड़ लें :)

3. आप बहुत सारा पैसा कमा लेंगे

अब ये ग़लतफहमी तो आप पाल ही नहीं सकते कि हिन्दी ब्लॉगिंग से आप पैसा कमा के अमीर बन जाएँगे. तो मियाँ इन सब चक्करों में अभी ना पड़ें और दिल खोलकर बिना किसी चक्कर के हिन्दी ब्लॉगिंग करके हिन्दी को बढ़ाने में योगदान दें. जो कुछ भी दे सकते हैं दे ही दीजिए, कम से कम आपके पास रखा रखा खराब तो नहीं होगा ना.

हाँ एक बार हमने अपने उन नज़ाकत और नफ़ासत वाले भाई जान को अनिल कांत के बचपन की प्रेमकहानी सुनाई. तो वो बोले "ये शरीफ हैं, इनकी शराफ़त की..." क्या कहा कौन अनिल कांत ? अमाँ यार रहने दो ऐसे ऐसे सवाल नहीं पूँछते, अच्छा नही लगता, अब ऐसे में वो बुरा मान गये तो. अब कुछ तो उनके बचपन की इस शराफ़त को जानते हैं, अरे मतलब पढ़ चुके हैं. अब जो जो रह गये हैं वो इस नन्ही सी गुमनाम मोहब्बत लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

बाकी जनाब/मोहतरमां ग़लतफ़हमियाँ तो ना जाने कितने कितने तरह की होती हैं. सब गिनायी नहीं जा सकती ना. कुछ एक आपकी नज़र में हों तो बतायें ताकि हम सबका भला हो सके. क्या कहते हैं ?
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