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आरजुओं के फूल मन के आँगन में खिलते हैं

>> 10 July 2015

आरजुओं के फूल हर रोज़ ही मन के आँगन में खिल उठते. और मन बावरा हो झूमता.

उन दिनों भावनाओं का समुद्र जो उमड़ता तो फिर ठहरने का उसमें सब्र ही न होता.दिल कहता कि ये जो मन की कोमल सतह पर हर रोज़ ही उग आती हैं और दिन ब दिन बढती है चली जाती हैं. इन्हें किस तरह से थामूं या कि उगने दूं और फिर किसी एक रोज़ उससे कह दूं कि "तुम जो पास होती हो तो फिर कुछ भी और पा लेने की इच्छा बची नहीं रह जाती".

मैं हर आने वाले नए दिन में अपने दिल को टोकता लेकिन वह तो जैसे पतंग बन हवाओं में उड़ता ही रहता. उन क्षणों में फिर उस अनुभूति को महसूसने के सिवा और कुछ नहीं होता. हरदम ही उसकी मुस्कराहट, उसका चलना, उसका बोलना सामने आ आ खड़ा होता. और फिर दिल चारों खाने चित्त हो जाता.

दिल पतंग सा, रखकर काँधे पे आरजुएं, उसके दुपट्टे सा फिजाओं में उड़ता फिरता. उड़ता ही फिरता.

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बारिशों का शहर

ये शहर बारिशों का सा शहर जान पड़ता है. जागती रातों में जब बाहर खिड़की के मुहाने पर खड़े केले के पत्तों पर बारिशों का संगीत बजता है तो लगता है तुम्हें यहीं होना चाहिए था. जो तुम होतीं तो मैं बाँट सकता अपने भीतर भर आये सुख के कुँए को पूरा पूरा.

जब सबका सवेरा सो जाता है तब उगने लगता है मेरे भीतर रचे संसार का सूरज. जो तुम होतीं तो मैं बाँटता अपने धूप का आँगन.

बारिशें थमतीं नहीं अक्सर. यहाँ पेड़ों की शाखों पर बजती है कोई धुन रह रहकर. कि जो तुम होतीं तो गीत कोई गुनगुनाता मैं.

मैं हूँ शामिल इन सब में लेकिन फिर भी मुस्कुराती नहीं आँखें, कि तुम बिन सब कितना अधूरा है.
यहाँ हर रोज़ ही बरसता है बादल, कि ये शहर बारिशों का सा शहर जान पड़ता है.

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इकरारे मोहब्बत

>> 09 July 2015

ठीक ठीक तो नहीं बता सकता कि कब उसे देख मेरे दिल की हार्ट बीट अपने नार्मल बेहवियर की शक्लो सूरत बदलना सीखी थी लेकिन इतना तय था कि वो फरवरी की धूप सी लगने लगी थी.
मैं जिस इंस्टिट्यूट में चन्द रोज़ पहले पढ़ाने के लिए दाखिल हुआ था. वो बाद के दिनों में उन्हीं क़तारों में शामिल हो गयी जिनका में हिस्सा था. बच्चों की वे कतारें हमें हमारा स्पेस देतीं. और तब उन्हीं क्षणों में एक छोर को छोड़ दूजे को पकड़ने के मध्य में हीं उसकी आँखें मेरी चोर निगाहों को पकड़ लेतीं. मैं जान कर ये जतलाता कि अभी के बीत गए क्षणों में जो भी और जितना भी भर हुआ था उसमें मेरा कोई कसूर नहीं है.
जब वो कॉरिडोर से गुजरती तो दिल अपनी नार्मल स्पीड छोड़ देता. वो सीधे सपाट हाईवे को छोड़ प्यार की पगडण्डियों पर चलने लगता. जिसके दोनों और दूर तक फैले बसंती सरसों के फूल खिल उठे हैं. और वो पगडंडियों से होता उनमें उसकी शक़्लें तलाशने लगता.
ये इतना भर होता तो भी दिल अपने आप को संभाल लेता लेकिन जब वो अपनी मुस्कुराहटों के फूल बिखेर देती तो लगता जीवन बस यही है. कितना सुखद और कितना मासूम.
जब घड़ी आखिरी के क्षणों के लिए टनटनाने लगती तो दिल उदासियों से भर उठता. फिर उसके बाद की दोपहरें कहीं किसी किताब के किसी पन्ने पर अटक जातीं और शामें बेवजह के ख्यालों से गुजरती हुई उसकी यादों को समेट लातीं. रातें बेचैनियों में शामिल ख़ुशी में करवटें बदलतीं. और जब सुबहें सिरहाने आ मेरे दिल को टटोलतीं तब वो उस कॉरिडोर में टहलने को चला जाता जहाँ किसी बीते दिन में वो मुझे देख कर भी न देखना जता रही थी.
दिन तब धीमे धीमे महीनों में तब्दील होते चल दिए थे और मेरा कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म होने की कगार पर था. वो वहां स्थायी थी और मैं अस्थायी. तब मेरे दिल ने मुझसे सवालात करने प्रारम्भ कर दिए थे. जिनके उत्तर मुझे उलझा दिया करते. और जब उलझने बहुत बहुत बढ़ गयीं तब मैंने स्वंय से ही जवाब जानना चाहा था. क्या इक़रार करना इतना दुरूह है.
और इन्हीं सवालों और जवाबों की कशमकश से जूझता में उसके सामने था. वे बिल्कुल आखिरी के दिन थे और तब उन्हीं क्षणों में मैंने दिल की राह पर चलते चलते उससे कहा था "तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो".
वो मुस्कुरायी थी और उन फ्रीज़ हो जाने वाले क्षणों में उसने कहा था "मैं जानती हूँ".
अबकी दफा मुस्कुराने की बारी मेरी थी.
वे क्षण स्मृतियों के धरातल पर बीज़ बनकर गिरे और बाद के दिनों में उनमें हर रोज़ ही नई नई किस्मों के तमाम फूल खिलते ही गए. खिलते ही गए.

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होना, होते रहना

>> 11 June 2011

-तुम मुझे बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते ।
-बिल्कुल भी नहीं ?
-ह्म्म्मम्म .....बिल्कुल भी नहीं ।
-इत्ता सा भी नहीं ?
-अरे कहा ना बिल्कुल भी नहीं फिर इत्ता सा कैसे कर सकती हूँ ।
-"मैं सोच रहा था कि इत्ता सा तो करती होगी ।" कहते हुए मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।

वो उठकर चल देती है । मैं सिगरेट फैंक देता हूँ और उसके पीछे चलने लगता हूँ ।
-अच्छा बाबा मान लिया कि तुम इत्ता सा भी प्यार नहीं करती । अब ठीक ....खुश

वो आगे बढ़ते हुए पत्थर उठाकर नदी में फैंकते हुए कहती है "तुम सिगरेट पीते हुए बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते । "
-बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता क्या ?
-नहीं, बिल्कुल भी नहीं
-अच्छा तो ठीक है, कल से बीड़ी पीना शुरू करता हूँ ।
-ओह हो...तुम ना...करो जो करना है मुझे क्या ?

मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-हाँ, तुम्हें क्या ? देखना कोई मुझे जल्द ही ब्याह के ले जायेगी और तुम बस देखती रहना ।

वो खिलखिला कर हँस पड़ती है ।
-जाओ जाओ बड़े आये ब्याह करने वाले । कौन करेगा तुम से शादी ?
-क्यों तुम नहीं करोगी ?
-मैं तो नहीं करने वाली ।
-क्यों ?
-क्यों, तुमने कभी कहा है कि तुम मुझसे शादी करना चाहते हो ।

मैं मुस्कुराते हुए कहता हूँ -
-क्यों, कभी नहीं कहा ?
-चक्क (अपनी जीभ से आवाज़ निकलते हुए वो बोली)
-कल, परसों या उससे पहले कभी तो कहा होगा (मुस्कुराते हुए)

वो नाराज़ होकर चल देती है ।
-"अच्छा ठीक है । नहीं कहा तो अब कह देता हूँ ।" (मैं उसका हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहता हूँ )

मैं उस बड़े से पत्थर पर चढ़ जाता हूँ और कहता हूँ
-सुनो ए हवाओं, ए घटाओं, ए नदी, पंक्षियों और हाँ पत्थरों । मैं अपनी होने वाली बीवी से जो मुझे इत्ता सा भी प्यार नहीं करती और जिसे मैं इत्ता सा भी अच्छा नहीं लगता, बहुत प्यार करता हूँ । मैं उससे और सिर्फ उसी से शादी करना चाहता हूँ । (कंधे ऊपर करते हुए मैं उसको देखकर मुस्कुराता हूँ !)
-होने वाली बीवी ? (वो बोली )
-हाँ (मुस्कुराते हुए )
-तुम ना टूमच हो कहते हुए वो मुस्कुरा जाती है ।

वो चल देती है । मैं पीछे चलते हुए सिगरेट जला लेता हूँ । वो पीछे मुड़कर देखती है और पास आकर सिगरेट छीनकर फैंक देती है । प्यार से "आई हेट यू" जैसा कुछ बोलती है ।

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किताब की नायिका एवं महत्वपूर्ण पात्र

>> 21 May 2011


मैं जब उनसे मिला था, तब सर्दियों के दिन थे. तब शुरू के दिनों में वह मेरे लिए अन्जाना शहर था. बाद छुट्टी के मैं रेलवे ट्रैक के किनारे बैठा सिगरेट फूँका करता था. और जब मन बेहद उदास हो जाया करता, तब मैं वापस अपने कमरे पर जा किसी उपन्यास के पृष्ठ पर निगाहें गढ़ा लेता. और विचार के खंडहरों में बेहद अकेला घूमता रहता.

वे सब एक-एक करके मेरी जिंदगी में आये या यूँ कहूँ कि उनकी जिंदगियों में मैं आया. कभी-कभी ऐसा होता है कि दुनियावी रौशनी में कोई एक शख्स आपको अलग ही रौशनी में नहाया दिखाई पड़ता है. उस झूठ के संसार में सच का दिया जलाए रखने वाला शख्स. वह हर उन पलों में आपको बेहद करीब और अपना लगता है, जितना आप उसे जानने और समझने लगते हैं.

वे तीनों मेरी जिंदगी के आकाश में गए बेशकीमती सितारे हैं. उन्हें पा लेने जितना हुनर मुझे नहीं आता, वे तो स्वंय ही मेरी किस्मत के दामन में गए. कैसे, क्यों और किस तरह से यह सब हुआ, इतना जानने समझने का वक़्त ही नहीं मिला. बहरहाल....

वे मेरी जिंदगी की किताब के बेहद महत्वपूर्ण पात्र हैं. उनके बिना यह किताब लिखी ही नहीं जा सकती. हाँ उनके होने से यह किताब अनमोल अवश्य हो जाती है.

प्रथम पात्र :

उनकी उम्र रही होगी यही कोई पैंतीस-सैंतीस साल. हाँ बाद के दिनोंमें जब उनका जन्म दिन आया तो उनकी उम्र में एक-आध बरस का इजाफा और हुआ होगा. बहरहाल......

सवाल उम्र का नहीं-समझ और विचारों का है. वे पहली नज़र में ही समझदार और सुलझी हुई महिला नज़र आती हैं. हाँ, जैसे-जैसे आप उनके करीब पहुँचते जाते हैं, और वे आपको मित्र के रूप में अपना लें तो उनके दिल की गिरहें खुलती चली जाती हैं. और उनके दिल में रह रही तमाम उलझनें आपसे रू--रू होने लगती हैं. हाँ इसके लिए आपका इंसान होना आवश्यक है. नहीं तो आप उनके दिल के बाहर खड़ी दीवार तक भी पहुँच सकें, ये आसान जान नहीं पड़ता.

वे दिमाग से सुलझी हुई और दिल से बेहद उलझी हुई स्त्री हैं- ऐसा मैंने हमारी पहचान के बाद दिनों में कहा था. और वे मुस्कुरा उठी थीं.

उनमें चुम्कीय आकर्षण है. जो आपको खींचे ही चला जाता है. जितनी वे बाहर से खूबसूरत दिखती हैं, असल में उससे कई गुना वे दिल से खूबसूरत हैं. किसी एक रोज़ मैंने उनकी आंतरिक खूबसूरती के मोहवश उनसे कहा था. यदि आप मेरी हम उम्र होतीं तो शायद मैं आपके प्रति प्रेमिका रूपी मोह में पड़ जाता. तब उन्होंने अपने मन के बेहद कोमल कोणों से इस बात को जाना और समझा था. और हम करीब से करीब गए थे.

वे मेरी बेहद प्रिय मित्र हैं. मेरी जिंदगी में उनका निजी और महत्वपूर्ण स्थान है.

जब वे साहित्यिक चर्चाएँ करती हैं, तब बेहद अच्छी लगती हैं. तब लगता ही नहीं कि हमारी उम्रों में एक दशक का फासला है. वे एकदम से अपनी उम्र से दौड़कर मेरी उम्र की सीमारेखा को भेदती हुई, मन की आंतरिक सतह को स्पर्श कर लेती हैं.

नवम्बर के वे बीतते दिन मेरे दिल की डायरी में सदैव जीवित रहेंगे. जिन दिनों में वे मेरी जिंदगी का अहम् हिस्सा बन गयी थीं.


किताब की नायिका :

इस शहर ने मुझे वो सब कुछ दिया, जिसके वगैर मेरी जिंदगी अधूरी थी.

दिसंबर के उन निपट निर्धन दिनों में उसने मेरे दिल पर दस्तखत किये थे. और एकाएक ही मेरी जिंदगी मुझे बेशकीमती लगने लगी थी. जो भी हो, उससे पहले मुझे जिंदगी से रत्ती भर भी प्रेम नहीं था.

सच
कहूँ तो ये वे दिन थे, जब उसको हमेशा के लिए पा लेने की चाहत ने दिल में जन्म ले लिया था. मेरे मन की निर्ज़ां घाटियों में वह इन्द्रधनुष बनकर छा गयी थी.

वो मेरी उम्र का दस्तावेज़ है . जिसका हर शब्द हमारी मोहब्बत की स्याही से लिखा गया है।

तब तलक मैं अपनी जिंदगी के प्रति जवाबदेह नहीं था. जब वह मेरी जिंदगी में आई, मेरे मन ने मुझसे जवाब मांगने प्रारम्भ कर दिए थे. क्या मैं इन लम्हों को यूँ ही ख़ामोशी से बीत जाने दूँगा ? क्या जो हो रहा है, या होना चाह रहा है, उसका ना होना जता कर, इस सबसे अंजान बना रहूँगा ?

और तब मेरे अपने स्वंय ने आवाज़ दी थी - नहीं

तभी मन में उस चाहना ने जन्म ले लिया था. जिसका दायरा उसी से प्रारम्भ होता और उसी पर ख़त्म. उन्हीं दिनों मन में एक ख़याल आया-
"उसकी मासूमियत और सादगी पर मैं अपनी जान दे सकता हूँ"

लेखन मेरे लिए प्रथम था, शेष सुखों के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं. उन्हीं बाद के दिनों में मुझे यह आंतरिक एहसास हुआ - जाने कबसे वह मेरे प्रथम के खांचे में जा जुडी है.

बावजूद इसके कि हमारे मध्य महज़ औपचारिक बातें हुई थीं. वह भी बामुश्किल दो-चार दफा. किन्तु उसके होने मात्र से वह आंतरिक चाहना मन की ऊपरी सतह पर तैरने लगती थी. और मैं उसके प्रेमपाश में हर दफा ही, उसकी ओर खिंचा चला जाता रहा.

तब मुझे इतना भी ज्ञात था कि वह मेरे बारे में कितना कुछ वैसा ही सोचा करती है, जितना कि मैं. हाँ, केवल इस बात का भरोसा होने लगा था कि वह इंसानी तौर पर मुझे पसंद अवश्य करती है. कभी-कभी उसकी आँखों से प्रतीत होता कि इनमें कितना कुछ छुपा है. वो सब जो शायद मैं नहीं देख पा रहा, या शायद वो सब जो वह दिखाना नहीं चाहती.

वे ठिठुरती सर्दियों के ख़त्म होने वाले जनवरी के दिन थे. जब उसकी आँखों में मैंने अपने लिए चाहत पढ़ी थी. फिर जब-जब वह मेरे सामने आई, उन सभी नाज़ुक क्षणों में मेरे मन में प्रेम का अबाध सागर उमड़ पड़ता. जो सभी सीमारेखाओं को तोड़ता हुआ उसको अवश्य ही भिगोता रहा होगा. बहरहाल.......

फरवरी और मार्च के मिले जुले गुलाबी दिन बीत चुके थे. और मैं अपने दिल की बात, दिल में ही कैद करके रहता था. और वो जानती थी कि किसी एक रोज़ मैं उससे अवश्य कहूँगा- "तुम मेरी जिंदगी की किताब की नायिका हो"

उन दिनों उसकी आँखें बेहद उदास रहने लगी थीं. जबसे उसे पता चला था कि मैं इस कार्यस्थल को छोड़कर चले जाने वाला हूँ. उसकी गहरी उदास आँखों में मैं डूब-डूब जाया करता था. मन बेहद दुखी था और एक अजीब रिक्तता ने मुझे घेरा था. कई-कई बार मैंने उससे कुछ कहना चाहा और हर बार ही मेरे अपने स्वंय ने रोके रखा.

वे मार्च के बेहद उदास दिन थे.

मेरे लिए तब वह आत्मिक संघर्ष का दौर था. मन में संशय उपजता था कि कहीं यह खाली हाथ रह जाने के दिन तो नहीं और फिर अगले ही क्षण मैं मन को थपथपाता, समझाता और बहलाता. किन्तु वह केवल मुस्कुरा कर रह जाता. शायद कहना चाहता हो -"बच्चू इश्क कोई आसान शह नहीं"

और हुआ तब यह था कि अंततः जब वह स्वंय की भावनाओं पर नियंत्रण ना रख सकी थी . तब एक रोज़ वह मेरी दी हुई किताबों को मुझे वापस देने चली आयी थी.

वे बेहद भावुक क्षण थे.

वह मेरे इतने करीब थे, जितना कि पहले कभी नहीं रही थी. उसकी भावनाएं उसके चेहरे पर लकीर बनकर उभर आयी थीं. वह मेरे चले जाने की खबर से बेहद खफा थी- जबकि अब तक मैंने उससे अपनी भावनाओं को साझा भी नहीं किया था. शायद बात यही रही होगी. यहीं आत्मिक पीड़ा उपजती है. और मैं उस क्षण उसकी पीड़ा को महसूसने लगा था.

मैंने उससे इतना ही कहा था-"इन किताबों को वापस क्यों कर रही हो? इन्हें तो मैंने पढने के लिए ही दिया है" और तब उसने कहा था "जब आप ही जा रहे हैं, तो इन किताबों को मेरे पास छोड़कर चले जाने की कोई वजह नहीं बनती. मुझे नहीं पढनी आपकी किताबें."

हमारे बीच गहरी ख़ामोशी छा गयी थी.

फिर जाने कैसे मेरे दिल से ये शब्द निकले थे "तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो"
और उसने कहा था "जानती हूँ"

उसका चेहरा तब खिल उठा था.

फिर बीते दिनों की उसको हाथ देखने की बात याद हो आयी थी. जब उसने पूँछा था "क्या देख रहे हो ?" और मैंने टाल दिया था कि "फिर कभी बताऊंगा, वक़्त आने पर."

उसने जानना चाहा "उस रोज़ हाथ में क्या देख रहे थे" तब मैंने गहरी सांस ली थी और कहा था "तुम ही वो लड़की हो जिसके साथ मैं जिंदगी भर खुश रहूँगा."
शायद वह जान गयी होगी यह उन लकीरों की नहीं, मेरे दिल की आवाज़ है.

मेरी इस बात पर वह खिलखिला उठी थी.

और अगले दो रोज़ बाद उसने अपना दिल की बातों को किसी पवित्र नदी की तरह बह जाने दिया था. जिसका हर शब्द मेरे मन को स्पर्श करते हुए कह रहा था -"मैं तुमसे बेहद मोहब्बत करती हूँ."

सुनो आज मैं तुमसे एक बार फिर कहना चाहता हूँ - "तुम मेरे लिए इस दुनिया की सबसे खूबसूरत आत्मा हो."

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चम्पे की सुगंध सी तुम्हारी बातें

>> 11 April 2011

बसंत के दिन बहुत पीछे छूट चुके हैं, उन्हें याद करने जितनी फुर्सत खुदा ने अभी नहीं दे रखी . इन दिनों वो पूँछा करती है कि "उन दिनों में दिल की बात कहने का कभी मन नहीं हुआ ?" और मैं खामोश निगाहों से उसकी गहरी आँखों में देखने लगता हूँ . जो मुझे बीते दिनों की याद दिलाती हैं, जब मैं चोर निगाहों से उसे देखा करता था और वो जताना चाहकर भी कुछ नहीं जताती थी . प्रारम्भ के दिनों की जब वह कोई बात बताती है तो वे दृश्य सामने उभर आते हैं . जब मैं उसके मोहपाश में बंधा उसकी ओर खिंचता ही चला जा रहा था. और वो कोई डोर दिन-ब-दिन मजबूत होती ही चली गयी .

हमारे विश्वासों की दुनिया में खुदा की खुदाई थी, वहाँ तूफ़ान का नामोनिशाँ न था .

अक्सर मेरी आँखें वक़्त की दीवार लाँघकर, उन बीते हुए दिनों में चली जाती हैं, जहाँ उसकी मुस्कुराहट से मासूम कलियाँ झड़ा करती थीं . तब मेरे हिस्से इतनी समझ नहीं थी कि उससे कुछ कह दूं . इन दिनों उससे बार-बार कहने को मन करता है कि-

"तुम्हारी सादगी की पवित्रता मेरे मन में बसे तुम्हारे प्रेम को हर नए दिन बढ़ाती चली जाती है .

वो अक्सर पूँछा करती है कि "हम अब तलक क्यों नहीं मिले थे ?" और मैं मुस्कुराकर कहता हूँ "सच तो ये है कि ऊपर वाले ने हमारे हिस्से की मोहब्बत हमसे बचा कर रखी थी और अब वो सूद समेत हमें दे रहा है ." और जब वह इस बात पर मुस्करा दी तो मैंने कहा "या मेरे मौला मेरी मोहब्बत को मेरी नज़र ना लगे" .

अभी कुछ रोज़ पहले मैंने उससे कहा "तुम्हारी उजली हँसी की खनक, मन के वीरान अँधेरे को रौशन कर देती है". इस बात पर सारा घर सिक्कों की खनखनाहट सा गूँजने लगा . कई रोज़ वह संगीत कानों में बजता ही रहा .

सोचता हूँ अबके दफा उसकी कुछ कतरने कुर्ते की जेब में रख लाऊंगा और उसके बाद के अँधेरे में हाथों से उलट-पलट कर देख लिया करूँगा. जैसे बच्चे संभाले रहते हैं, अपनी जेबों में चन्द सिक्कों को .

सुनो मैं तुमसे आज, अभी, अपने मन की कोमल सतह पर उग आये उन शब्दों को कह देना चाहता हूँ, जो हर नए रोज़ बढ़ते ही चले जा रहे हैं -

"मैं तुमसे बेहद मोहब्बत करता हूँ. चम्पे की सुगंध सी तुम्हारी बातें, मुझे अपनी ओर खींचती ही चली जाती हैं ."

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भविष्य का अतीत

>> 20 February 2011

जब शाम ढलने लगती तब वे सड़क के किसी छोर पर सुस्ताते से चल रहे होते । दोनों के सिरों पर अँधेरा घिर आता, तब लड़की अपने बैग को टटोलने लगती । वह ऐसा लगभग हर बार करती और लड़का जान जाता कि अब उसके जाने का समय आ गया है । उसे लगता कि लड़की के बैग की भी अपनी एक पूरी दुनिया है । और जब उसने लड़की को एक बार कहा था कि "लड़की के बैग के अन्दर झाँकने में उसे डर लगता है । ना जाने उसमें कितने दुःख, कितनी पीडाएं कैद हों ।" और लड़के की इस बात पर वह एकाएक हँस दी थी और फिर अगले ही क्षण उसका चेहरा भाव शून्य हो गया था । यह अपने आप में एक पीड़ा थी, किसी का चेहरा भाव हीन हो जाना । ना दुःख, ना सुख, ना चिंता और ना ही कोई प्रश्न दिखे तो उसे देखकर एक पीड़ा उभरती है । त्वचा पर बनी सफ़ेद फुंसी के चारों ओर महीन नोक से कुरेदती सी ।

लड़की शाम की आखिरी बस पकडती ओर अपने हॉस्टल को चली जाती । और तब लड़के के पास करने को कुछ नहीं रह जाता । बीतती दोपहरों में उसके पास एक उद्देश्य होता कि अभी शाम होने को है, जब वह अपनी ऑफिस से निकलेगी ओर वे दूर जाती सड़कों पर चहलकदमी करते फिरेंगे । परिचय से पहले के दिनों में लड़की अपने ऑफिस से सीधे गर्ल्स होस्टल चली जाती थी । किन्तु बाद के इन दिनों में वे साथ-साथ घुमते रहते । और उनके क़दमों तले एक प्रश्न चलता रहता कि "लड़के के बीते दिन दिये हुए इंटरव्यू का क्या हुआ ?" किन्तु लड़की उस प्रश्न को कभी ऊपर तैरने नहीं देती । अपनी ओर से कोशिश करती कि वह जितना उसे नीचे धकेल सके, धकेल दे ।

शुरू के दिनों में जब वे मिलते थे तो किसी मॉल के, सिनेमा हॉल में, पर्दे के सामने की पिछली कुर्सियों पर बैठ कर सुस्ता लेते थे । लड़का, लड़की के बालों से खेलता और अपने गर्म ओंठ उसके कानों के पास रख देता । लड़की अपने पास की जमा बातों को स्वतंत्र करती रहती । किन्तु हर सुख अपने साथ पीड़ा लेकर आता है । जिसका आभास धीरे-धीरे होता है । बाद के दिनों में लड़का चुप-चुप सा रहता और ऐसे में लड़की उसे छोटे-मोटे खर्चे करने देती । तब लड़के के चेहरे पर नई लकीरें उभर आतीं । वह नये उत्साह से अपना प्यार, अपना हक़ जताता । लड़की इस मनोवैज्ञानिक कारणों को जानती थी । और अपने उन साथ के पलों में उसे बीते दिनों की पढ़ी हुई किताबों की बात याद हो आती । उसने रिश्तों को बचाए रखने की कोई किताब, बहुत पहले के बरसों में पढ़ी थी । जब वह अकेली होस्टल में पड़ी रहती थी और उसके पास कोई रिश्ता नहीं था । इस बात के याद हो आने पर वह मुस्कुरा देती थी । तब लड़का पूँछता कि वह क्यों हँस रही है और वह टाल जाती कि कोई खास वजह नहीं । उसे अपने बचपन की बात याद हो आयी थी । लड़का बचपन की देहरी के उस पार नहीं जाना चाहता था । क्योंकि उन दिनों में वह उसके साथ नहीं था । और जिन दिनों में हम किसी के साथ ना हों । उन दिनों की उसकी पीड़ा और आनंद की बातों को हम सुन भले ही लें किन्तु अपने मन के कोनों से बुहार देते हैं ।

देर रात लड़की का फोन आता और वह लड़के से और अधिक खुल जाती । लड़का उसके इस खुलेपन पर घबरा सा जाता और ऐसे सोचता जैसे कि वह बिल्कुल उसके पास है । एक ही बिस्तर पर, ठीक पति-पत्नी की तरह । या साथ रह रहे उन जोड़ों की तरह । जिनमें उन प्रेम के क्षणों में लड़की केवल अपने कपडे ही नहीं उतार फैंकती बल्कि अपने मन की सभी तहों को उधेड़ कर रख देती है । तब वह केवल वह होती है । केवल शरीर मात्र नहीं । उसका पवित्र अस्तित्व । और इसी लिये पुरुष उन आखिरी के क्षणों में जल्दी से अलग होकर स्वंय को सीमित कर लेते हैं । असल में वे या तो डरे हुए होते हैं या उस पहचान की सामर्थ्य नहीं होती । जिससे कि वे उस उधेड़े हुए सच को प्यार कर सकें । और जो भी पुरुष ऐसा कर पाते हैं उनकी स्त्रियाँ सुखी रहती होंगी ।

सोने से पहले के अंतिम क्षणों में जब लड़की कहती कि वह उससे बेपनाह मोहब्बत करती है । तब लड़का उस दिन भर के दबे हुए प्रश्न को ऊपर ले आता । और भविष्य की नींव के भीतर प्रवेश करके ऊपर मुँह ताक कर चिल्लाता "मैं तुमसे
मोहब्बत करता हूँ । तुम दुनियाँ की सबसे खूबसूरत लड़की हो ।"


नोट: अपने लिखे की चोरी होती है तो मन बेहद दुखी होता है. जब वह बिना लेखक का नाम दिए उसका उपयोग स्वंय की रचना बता कर करने लगता है . एक चोर यह है :
http://zindagiaurkuchbhinahi.blogspot.com

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देहरी से आगे का मकान

>> 27 January 2011

सर्द हवाएँ जब-तब अपना सिर उठातीं और कुछ ही क्षणों बाद दुबक कर सुस्ताने लगतीं . इस बात का बिल्कुल एहसास न होता कि अभी-अभी जो बीते हैं वे वही दिन थे, जब शहर दुबका पड़ा था, गलियारे सूने पड़े थे और बच्चे अक्समात घोषित छुट्टियों को, अनायास मिले सुख के तरह भोग रहे थे .

वे फरवरी के दिन थे .

वह धूप सेंकते आँगन से अपनी साइकिल निकालती और बाहर गली में दूर तक हैंडल थामे पैदल चलती रहती, जब तक कि मेरे घर की देहरी पीछे न छूट जाती . और तब वह पैडल घुमाती हुई दूर निकल जाती . हाँ इस बीच वह पलट कर देखती, उसकी आँखें देहरी के उस पार जातीं और कुछ ही क्षणों में देहरी लाँघ कर वापस अपने तक सीमित हो जातीं .

मैं उसे दूर तक टकटकी बाँधे खिड़की से जाते हुए देखता . इस तरह कि वह मेरा देखना न देख सके . उसके चले जाने पर, उसके पीछे रह गयी उसकी इच्छा को देखता, जो अभी तक देहरी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती . अपनी उदास आँखों से मुझे तलाशती कि मैं वहाँ हूँ या नहीं . देहरी के भीतर हूँ या उसी की तरह देहरी के बाहर . जब वह तलाशते-तलाशते थक जाती तो कुछ देर सुस्ताने बैठ जाती . वहीँ उसी गली के अंतिम छोर पर . और मैं होकर भी अपना न होना जताता रहता .

वे हमारे शीतयुद्ध के दिन थे .

कभी-कभी ऐसा होता कि वह मनु से मिलने का बहाना कर मुझसे मिलने आती . कुछ क्षण देहरी पर ठिठकी रहती, जैसे वह कोई लक्ष्मण रेखा हो, जिसको लांघने से हमारे बीच के वनवास के दिन और बढ़ जायेंगे . और उस एक क्षण मैं उसके ठिठके कदमों पर नज़र गाढ़ देता तो वह एक ही झटके में भीतर प्रवेश कर जाती . जैसे कि अभी बीते क्षण वह यहाँ थी ही नहीं - केवल मेरा भ्रम था . किन्तु वह होती, अपने में पूर्ण, मुकम्मल .

और मैं वहाँ से उठकर अपने भीतर के कमरे में चला जाता . किन्तु वह केवल दिखावा होता - बाहरी आडम्बर . अपना रूठा हुआ जताने की खातिर, किया हुआ प्रयत्न . उस एक बच्चे की तरह, जिसे जब तक न मनाओ, वह रूठा ही रहता है . यदि आप अपना ध्यान उससे हटा लेते हैं तो वह ऐसी हरकतें करने लगता है कि आपका ध्यान उस पर जाए .

वह कई-कई घंटे मनु से चिपकी रहती . उससे न बात करते हुए भी बात करती रहती . प्यास न लगने पर भी घूँट-घूँट पानी पीती . और बरामदे में रखे घड़े से मनु तक का सफ़र इतनी आहिस्ता से तय करती कि वह हिमालय की चढ़ाई चढ़ रही हो . फिर मनु से कोई ऐसी चीज़ माँगती जो केवल मेरे कमरे में हो . और तब मनु मेरे कमरे में आती, एक नज़र मुझे देखती और मैं अपनी निगाहें किताबों में गढ़ा लेता . ऐसे दिखाता कि मैंने जाना ही ना हो कि वह अभी यहाँ खड़ी है . ठीक देहरी के भीतर, मेरे कमरे में, जहाँ मैं न होना दिखाते हुए भी हूँ -किताबों से झूठ-मूठ का चिपका हुआ . जाते हुए वह कहती "कुछ चाहिए" . मैं गर्दन ऊपर उठता, उसके चेहरे को देखता और तब वह चली जाती - फिर से आने के लिए .

जब शीत युद्ध के दिन लम्बे हो जाते . तब मैं ऊबने लगता . उससे मिलने के लिए, बात करने के लिए तड़पने लगता . भीतर ही भीतर अपने पर फट पड़ता . दिल रोने को करता और अपने किए को कोसता . वह ना जाने कैसे जान जाती . जैसे उसके पास कोई यन्त्र हो, जिसे उसने मेरी परिधि के चारों और लगा रखा हो . जो मेरी पीड़ा, मेरी तड़प को भाँप लेता हो - अब कम है, अब ज्यादा . और जब वह सीमा रेखा को लाँघ जाती, तब वह आती किसी बुझती शाम को रोशन करने .

माँ कहीं बाहर होती और मनु रसोई में . वह बिना कोई आहट किए, मेरी देहरी को लाँघकर, कब मेरे सिरहाने आ खड़ी होती, पता ही न चलता . उस एक क्षण यह भ्रम होता कि वह केवल कोई बासी याद है . जब वह गुलाबी सूट पहने है और कनखियों से मुझे निहार रही है . किन्तु वह वहाँ होती - सचमुच . एक नए दिन में बीती यादों के साथ . मैं करवट बदल लेता और तब उसकी सिसकियाँ कमरे में बहने लगतीं . एक कोने से दूसरे कोने तक .

तब अगले ही क्षण हम एक दूसरे के गले से लिपटे हुए होते . लगता ही नहीं कि अभी बीते क्षण, एक हफ्ते की दूरियों को ओढ़े हुए हमने अपनी-अपनी दुनिया बना रखी थी . बीते हफ्ते का जुदा स्वाद उसके ओठों पर आ जमा होता और मैं उसे अपने ओठों से वर्तमान में ले आता . तब वे धुले-धुले से नज़र आते . गीले, चमकते हुए . अपनी नई पहचान के साथ पुनः मेरे ओठों से आ मिलते .

वे पहली मोहब्बत के दिन थे .

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रात, चाँद, वो और मैं

>> 30 July 2010

-"एक बात पूछूँ ?" मैं उससे कहता हूँ ।
-"ह्म्म्म..." वो जवाब देती है ।
-इस शहर को कितना जानती हो ?
-"ये सवाल क्यों ?" वो मुझसे सवाल करती है ।
-मैं उससे कहता हूँ "तुम सवाल बहुत करती हो ।"
-वो मुस्कुरा कर कहती है "तुम जवाब जो नहीं देते ।"
-अच्छा बताओ । "कितना जानती हो इस शहर को ?"
-ह्म्म्म.....सच कहूँ । उतना ही जितना कि तुम्हें ।
-मतलब
-मतलब ये कि ठीक वैसे ही जैसे कि तुम्हें जानती हूँ ।
-"वो कैसे ?" मैं फिर से सवाल करता हूँ ।
-क्योंकि ....हर बार ही तो ये शहर मुझे नया सा मालूम होता है । कभी-कभी तो लगता है जैसे कि मैं इसे बिल्कुल भी नहीं जानती और कभी यूँ लगता है जैसे कि सब कुछ जान लिया हो । अब कुछ भी जानना बाकी नहीं । हर बार मुझे अपना सा मालूम होता है ।

मैं उसकी इन बातों पर मुस्कुरा जाता हूँ । वो मेरी ओर देखकर इशारे से पूंछती है "कि मैं क्यों मुस्कुराया ।"
तब मैं उससे कहता हूँ "कितना अच्छे से जानती हो तुम मुझे ।"

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-अच्छा अगर जो मैं ना होता तो क्या होता ?
-तो मैं भी ना होती ।
-वो क्यों ?
-क्योंकि जब तुम्हारा होना तय हुआ होगा तो मेरा होना भी तय हो गया होगा ।
-तुम बातें बहुत बनाती हो ।
-जानती हूँ ।
-वो कैसे ?
-क्योंकि तुम मेरे पास जो हो ।

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-"आई हेट यू " वो बोली ।
-रियली !
-हाँ....आई हेट यू ......आई रियली हेट यू ।
-क्यों भला ?
-सुना है जो लोग बहुत प्यारे होते हैं उन्हें नज़र लग जाती है ।

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-"चाँद मियाँ कल शिकायत के मूड में थे ।" मैं उससे कहता हूँ
-"क्यों, किसने खता की है ?" उसने पूँछा
-कह रहे थे कि तुम उसे सोने नहीं देती । सुबह तक जगाये रखती हो ।
-"लो भला अब हम क्यों जगाये रखते हैं । उल्टा वो ही हमें सोने नहीं देते और तुम्हारी शक्लों में बदल बदल कर हमारे सामने आ जाते हैं । तो बोलो खता किसकी हुई ?" उसने कहा
-"ह्म्म्म.....अब साहब यह तो बड़ा कठिन सवाल है । चलो चाँद मियाँ से पूंछते हैं कि आखिर बात क्या है ? क्यों चाँद मिंयाँ क्या कहते हो ?" मैंने कहा ।
-"अच्छा तो साहब अब आप भी उनकी ओर हो लिये । ये खूब रही । हम तो कहेंगे कि ना उनकी खता है ना हमारी खता है ....ये सब आपकी खता है ।" चाँद मियाँ तपाक से बोले ।
-"सही कहा आपने चाँद मियाँ ....ना आपकी खता है और ना हमारी ....ये सब तो इनका ही किया धरा है ....और दिन-ब-दिन रंगत हम अपनी खोते जा रहे हैं ।"वो चाँद की ओर देखकर बोली
-"लो ये अच्छी बात हुई । अब आप भी उनकी ओर हो लिए ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा ।

चाँद मियाँ मुस्कुराते हुए उसकी ओर देख रहे हैं ......

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वो एक लड़की !!

>> 14 July 2010

कुछ धुंधले अक्स स्मृतियों में ऐसे जमा हो जाते हैं जैसे वजूद का एक अहम् हिस्सा हो गये हों । जिनका होना और ना होना उतना मायने नहीं रखता जितना कि उनका स्मृतियों में बने रहना । तमाम कोशिशों के बावजूद वो वजूद से अलग नहीं होते ।

उन दिनों में जबकि ना ही तो मोबाइल थे और ना ही इंटरनेट का प्रचलन । चाहने वालों के लिये ऐसा कुछ भी आधुनिक नहीं था जिससे वे चल रहे वक़्त को बदला हुआ आधुनिक समय कहते । सब कुछ तो वैसा ही था उनके लिये । वही चाहत जताने के खामोश फ़साने, खामोश निगाहें और आँखों ही आँखों में पढ़ ली जाने वाली प्रेम की भाषा । अंततः कुछ भी ना जता पा सकने पर लिखे जाने वाले वे गुपचुप प्रेम सन्देश जिन्हें साधारण भाषा में ख़त और चाहने वालों की भाषा में प्रेम पत्र कहते । जो कि कभी डाकिया के हाथ में नहीं उलझता था । उसके भी अपने तरीके हुआ करते थे । जो कि भेजने वाले और पाने वाले ही जान पाते ।

वो कॉलेज में इंग्लिश पढ़ा करती थी और मैं हिंदी । एक पल को तो लगता था कि बीच में एक लम्बी खाई है जिसे हिंदी और अंग्रेजी ने मिलकर बनाया है । वो मुझे अक्सर लाइब्रेरी में पढ़ते हुए मिला करती । शुरू में लगता कि यह महज इत्तेफ़ाक है कि हम टकरा जाते हैं लेकिन फिर ना जाने ऐसा क्या हुआ कि हम अक्सर एक ही समय पर मिल जाया करते । वही समय और किताबों की लम्बी कतार के आखिरी छोर पर खड़ी वो अंग्रेजी के किसी नॉवेल में आँखें गढ़ाए मिलती । अक्सर वह मेरी सामने की कुर्सी पर ना बैठकर किसी आखिरी छोर की कुर्सी पर बैठती । कई बार मैंने उसकी आँखों की चोरी को पकड़ा । जो कि अक्सर एकांत मैं बैठे हुए मुझे निहारा करती थीं । जो उसने कभी ना कहा उसकी आँखें अक्सर कहती रहती । फिर वक़्त यूँ ही गुजरता गया । हमारे बीच सब कुछ अनकहा होते हुए भी ऐसा लगता कि जैसे कि हम एक दूसरे को कितना जानते हैं ।

उस एक रोज़ जब मैंने उससे किताबों की कतार के आखिरी छोर पर खड़े हुए उसके हाथ में लिये हुए नॉवेल के बारे में पूंछा था । तब उसने कहा था 'जी' । मैं उसके उस 'जी' पर मुस्कुरा भर रहा गया था । शायद उसने मुझे ठीक से सुना नहीं था । वो कहीं खोयी हुई थी । जैसी कि वह अक्सर खो जाया करती थी अपनी ही दुनिया में । मैं जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया था । तब उस दफा वो मेरे सामने की कुर्सी पर बैठी थी और बोली थी "आप कुछ पूँछ रहे थे ?" .....मैंने मुंह से "चक्क" की आवाज़ निकालते हुए ना में सर को हिलाया । तभी 'शश्श्श्स ....' की आवाज़ सुनाई दी थी । कोई हमें शांत रहने के लिये कह रहा था । हमारे दरमियाँ एक लम्बी चुप्पी आ गयी थी ।

कुछ रोज़ के बाद के सालाना जलसे में उसका पहली बार नाम जाना । हालांकि उसका नाम जानना बहुत आसान था लेकिन कभी मेरे मन ने सोचा ही नहीं कि उसका नाम क्या होगा । जब कविता सुनाने के लिये उसका नाम पुकारा जा रहा था । तब उसका चेहरा सामने पाकर पता चला कि 'अनुराधा' वही है जिसकी कवितायें कॉलेज की पत्रिका में छपती रहती हैं । जब अनुराग कहकर मुझे वहाँ बुलाया गया तब शायद उसको मेरा नाम पता चला हो या शायद उसे पहले से मालूम हो । क्या पता मेरे मन के विपरीत उसके मन ने ये जानना चाहा हो कि मेरा नाम क्या है । उस रोज़ के बाद से वह कब अनुराधा से अनु हो गयी पता ही नहीं चला ।

सालाना जलसे के बाद से शायद हम एक दूसरे से अच्छी तरह परिचित हो चले थे । तब कई पहलुओं पर हमारी बात हुई थी । वो बहुत कम बोलती थी । उसे सुनना ज्यादा पसंद था । अक्सर वह चुप्पी जो हम दोनों के दरमियाँ आ खड़ी होती । वह बहुत लम्बे समय तक वक़्त को पीछे धकेल कर हमें आगे ले जाती । कहाँ ? नहीं पता लेकिन जहाँ भी ले जाती थी, वहाँ वो चुप्पी नहीं होती थी । ना जाने यह कैसा लगाव था कि अनकहे तरीके से सब कुछ कहा सा लगता था । कभी कभी मालूम होता कि हम ना जाने कितने बरसों से एक दूजे को जानते हैं । एक दूजे से किसी डोर से बंधे हैं । उन दिनों ख़ामोशी की गहराई ही शायद लगाव का पैमाना थी ।

कॉलेज खत्म हो चले थे और मुझे भविष्य की चिंता और नई नौकरी के साथ नये शहर जाना था । उन गुजरते हुए दिनों में उसने कभी कुछ ना बोला । कभी कभी लगता कि सब कुछ कह देना चाहिए । लेकिन फिर यह सोच रुक जाता कि क्या कहना चाहिए ? कि "अनु मैं जा रहा हूँ एक अनिश्चित सफ़र पर और क्या तुम मेरा इंतज़ार करोगी " या फिर "क्या तुम्हारा और मेरा भविष्य एक साथ जुड़ सकता है ?" या फिर "क्या तुम मुझ से प्रेम करती हो ?" .....नहीं यह सवाल गलत था । जबकि सब जानते हुए कि वह मुझे चाहती है । या शायद उस एक पल को मुझे वे सभी प्रश्न कर लेने चाहिए थे ।

शहर छूटा बिना कुछ कहे और बिना कुछ सुने । पहले दिन बीते फिर महीने और फिर एक ख़त मिला जो कि पिछले तीन पतों के कटे होने के बाद मेरे इस चौथे बदले हुए पते पर रीडायरेक्ट होकर पहुंचा था । कुछ चन्द पंक्तियाँ थीं जो आज भी वजूद के लिबास पर उभरी हुई हैं ....

"दिल को समझाया बहुत
न ले नाम मोहब्बत का जालिम
कि
तूने बनाया था जिसको अपना खुदा
वो तो इंसान निकला"


जिनके ना तो आगे कोई नाम था और ना ही पीछे । पिछले कई कटे पतों से साफ़ जाहिर था कि ख़त आने में बहुत देर हुई है । समझने में देर न लगी कि यह खत किसी और का नहीं अनु का ही है । उस एक पल ने बीते कई पलों को सामने ला खड़ा कर दिया और जब घर पहुंचा तो मालूम हुआ कि उसकी शादी अभी दो दिन पहले ही हुई है । उसने मेरा रास्ता देखा होगा .....कि शायद मैं उसका खुदा निकलूं ।

दिन बीते फिर महीने और फिर बरस बीतते चले गये । शहर बदले, घर बदले और न जाने क्या क्या बदल गया लेकिन आज भी वे धुंधले अक्स स्मृतियों में उलझे हुए हैं । वजूद के साथ लिपटी एक अधूरी चाहत.... "काश कि मैं उसका खुदा रह पाता ......"

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उन बीते हुए दिनों में

>> 21 April 2010

- तुम मुझे बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते ।
-बिल्कुल भी नहीं ?
-ह्म्म्मम्म .....बिल्कुल भी नहीं ।
-इत्ता सा भी नहीं ?
-अरे कहा ना बिल्कुल भी नहीं फिर इत्ता सा कैसे कर सकती हूँ ।
-"मैं सोच रहा था कि इत्ता सा तो करती होगी ।" कहते हुए मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।

वो उठकर चल देती है । मैं सिगरेट फैंक देता हूँ और उसके पीछे चलने लगता हूँ ।
-अच्छा बाबा मान लिया कि तुम इत्ता सा भी प्यार नहीं करती । अब ठीक ....खुश

वो आगे बढ़ते हुए पत्थर उठाकर नदी में फैंकते हुए कहती है "तुम सिगरेट पीते हुए बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते । "
-बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता क्या ?
-नहीं, बिल्कुल भी नहीं
-अच्छा तो ठीक है, कल से बीड़ी पीना शुरू करता हूँ ।
-ओह हो...तुम ना...करो जो करना है मुझे क्या ?

मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-हाँ, तुम्हें क्या ? देखना कोई मुझे जल्द ही ब्याह के ले जायेगी और तुम बस देखती रहना ।

वो खिलखिला कर हँस पड़ती है ।
-जाओ जाओ बड़े आये ब्याह करने वाले । कौन करेगा तुम से शादी ?
-क्यों तुम नहीं करोगी ?
-मैं तो नहीं करने वाली ।
-क्यों ?
-क्यों, तुमने कभी कहा है कि तुम मुझसे शादी करना चाहते हो ।

मैं मुस्कुराते हुए कहता हूँ -
-क्यों, कभी नहीं कहा ?
-चक्क (अपनी जीभ से आवाज़ निकलते हुए वो बोली)
-कल, परसों या उससे पहले कभी तो कहा होगा (मुस्कुराते हुए)

वो नाराज़ होकर चल देती है ।
-"अच्छा ठीक है । नहीं कहा तो अब कह देता हूँ ।" (मैं उसका हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहता हूँ )

मैं उस बड़े से पत्थर पर चढ़ जाता हूँ और कहता हूँ
-सुनो ए हवाओं, ए घटाओं, ए नदी, पंक्षियों और हाँ पत्थरों । मैं अपनी होने वाली बीवी से जो मुझे इत्ता सा भी प्यार नहीं करती और जिसे मैं इत्ता सा भी अच्छा नहीं लगता, बहुत प्यार करता हूँ । मैं उससे और सिर्फ उसी से शादी करना चाहता हूँ । (कंधे ऊपर करते हुए मैं उसको देखकर मुस्कुराता हूँ !)
-होने वाली बीवी ? (वो बोली )
-हाँ (मुस्कुराते हुए )
-तुम ना टूमच हो कहते हुए वो मुस्कुरा जाती है ।

वो चल देती है । मैं पीछे चलते हुए सिगरेट जला लेता हूँ । वो पीछे मुड़कर देखती है और पास आकर सिगरेट छीनकर फैंक देती है । प्यार से "आई हेट यू" जैसा कुछ बोलती है ।

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मुझे तुम्हारी चाहना है !

>> 02 April 2010

उन खर्च होते हुए चन्द जमा दिनों में से, उस एक शाम को जब सूरज सुस्ताने लगा और पंक्षी वापस अपने घरों को लौट चले थे । मैंने कुछ कदम चल लेने के बाद उसकी हथेलियों को अपनी अँगुलियों से छूते हुए अपने होने का आभास कराया था । मेरे होने का, नहीं शायद उस एहसास को परे किया था जो मध्य के उस सन्नाटे में शामिल था । उन बचे हुए अंतिम दिनों में, मैं उसे सब कह देना चाहता था । लेकिन क्या वह समझ पाएगी उस चाहना को ? जब मैं उससे कहूँगा कि मेरे अन्दर एक चाहना ने जन्म ले लिया है । जो दिन ब दिन बढती ही जाती है । या उसे सीधे शब्दों में कह देना कि मुझे तुमसे प्रेम है । नहीं यह न्याय नहीं होगा उस चाहना के साथ । यह महज प्रेम नहीं है । यह प्रेम के साथ कदम से कदम मिलाकर बहुत कहीं आगे बढ़ गयी वह अनुभूति है जिसे मैं 'चाहना' नाम दे रहा हूँ । तो क्या मैं उससे उस चाहना को जता सकूँगा ? क्या वह चाहना शब्दों में सीमित होकर अपना विस्तार ले सकेगी ?

क्या मैं उसे बता सकूँगा कि वह चाहना रंग, रूप में कैसी है ? कह सकूँगा कि उस चाहना का तुम्हारे रंग, रूप से कोई सम्बन्ध नहीं । उस चाहना का तुमसे बहुत गहरे तक सम्बन्ध है । मेरे उन अकेले के सभी क्षणों का मिश्रित स्वरुप जब तुम्हें ना पा पाने के बाद का अनन्त दुःख मुझे आ घेरता है । मुझे घूरता है, मुझे तनहा और वीरान कर जाता है । वहीँ से उपजती है वो चाहना । उस चाहना का सम्बन्ध तुम्हे पा लेने और ना पा पाने से जुड़ा हुआ है । तुम्हें पा लेना ही उस चाहना की पहली और अंतिम इच्छा ।

उसने अपने कदमों को उस आखिरी के मोड़ पर रोकते हुए कहा था "अच्छा तो मैं चलूँ ।"

तब मैंने उसके हाथ को मजबूती से थामते हुए कहा था "कहाँ ? कहाँ जा सकोगी तुम । मेरी चाहना तुम्हें हर जगह खोज लेगी ।"

उसने मुस्कुराते हुए कहा था "क्या बोल रहे हो ?"

मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा था "मुझे तुम्हारी चाहना है । तुम्हें हमेशा के लिये पा लेने की चाहना । हर क्षण के लिये । जो उस प्रेम से भी कहीं गहरी है । जो प्रेम से शुरू होकर उस अनन्त को चली जाती है, जहाँ से उसका विस्तार होता है । हाँ वही चाहना है मुझे तुम्हारी ।"

उस पल उसने उस आखिरी के मोड़ पर बढ़ने से पहले मुझे गले लगा लिया था । कभी ना ख़त्म होने वाली उस चाहना के सफ़र में वह मेरी हमकदम हो चली थी ।

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अर्थ को खोजते हुए शब्द !

>> 24 February 2010

उसने मुझे हमेशा के लिये छोड़कर जाते हुए कहा "अपना ख़याल रखना !" वो चली गयी । फिर ना कभी आने के लिये । ये उसके कहे हुए अंतिम शब्द थे । तब लगा कि वह कुछ शब्द दे गयी है जो मुझे अपने पास रखने हैं और उनकी हिफाज़त करनी है । उन शब्दों के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिये एक लम्बी उम्र पड़ी थी । ऐसे सामने खड़ी थी कि जैसे वह मेरी नवविवाहिता हो और मुझे हर पल उसके साथ रहना है । मैं सोचता हूँ कि अथाह सागर जैसे उसके बिना इन पलों में एक छोर से तैरते हुए दूसरे छोर तक पहुँचने पर उन शब्दों के मायने शायद मिल जायें । वो जिन्हें इस आखिरी बार छोड़ गयी थी ।

मुझे याद आता है कि हू-ब-हू यही शब्द उसने मुझे अपने कॉलेज की सर्दी की छुट्टियों के लिये घर जाते वक़्त, ट्रेन के एक दुबके हिस्से में, अपनी तेज़ साँसों के साथ मुझे चूमने के बाद बोले थे । वो शब्द जो उसके गीले ओठों के साथ मेरे साथ सर्दियों की छुट्टियों के साथ चिपके चले आये थे । हाँ तब उसने ट्रेन से उतरते वक़्त हाथ हिलाते और ट्रेन के चल देने पर दौड़ते हुए फिर एक बार बोले थे । कई बार बोले थे कि "अपना ख़याल रखना !" तब उन शब्दों के साथ खुद का ख़याल रखने की परवाह ना थी । सर्दियों की छुट्टियों की हर सुबह, शाम, दोपहर और रात उसके वे गीले ओठ मेरे ओठों से आ चिपकते और साँसों की लय के साथ साँस मिलाते हुए सुनाई पड़ते कि "अपना ख़याल रखना !"


कोहरे भरी सर्द शामों के बाद मेरी बाहों से अलग हो वह जब अपने हाथों के अंतिम स्पर्श के साथ कह चल देती कि "अपना ख़याल रखना !" तब वे शब्द उसके जाने के बाद मेरे रोम-रोम में महसूस होते । तब वे उसके अंतिम स्पर्श के बाद मेरे साथ उसके अगले स्पर्श तक बने रहते । उसकी अंतिम महक के बाद की पहली महक के बीच के समय वे शब्द मेरा उससे कोई सिरा ख़त्म ना होने देते ।

एक अलसाई दोपहर को उसने कहा था :
-सुनो !
-"ह्म्म्म" मैंने उसकी गोद में सर रखे हुए ही बोला ।
-"एक बात पूछूँ ?" उसने मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा ।
-"नही" मैंने मुस्कुराते हुए कहा ।
-"ओ हो फिर मजाक ।" उसने मुस्कुराते हुए कहा ।
-"अच्छा ठीक है । पूँछो ।" मैंने बोला
-"तुम मेरे चले जाने के बाद या विदा लेने के बाद क्या करते हो ?" उसने ठीक शब्दों के साथ खुद को जोड़ते हुए पूँछा ।
-"ह्म्म्म !" मैंने गहरी साँस लेते हुए उसकी और मुस्कुराते हुए देखा ।
-"ऐसे क्या देख रहे हो ? बोलो ना " वो मेरी मुस्कराहट के साथ मुस्कुराते हुए बोली ।
-"मैं तुम्हारे उस अंतिम स्पर्श से लेकर नये स्पर्श तक के लिये उन आखिरी के शब्दों के साथ रहता हूँ जब तुम कहती हो "अपना ख़याल रखना !" जिससे कि तुम्हारे जाने के बाद के उस सिरे से अगले मिलने वाले सिरे तक मैं तुमसे जुड़ा रहूँ ।

तब मेरे उन कहे हुए शब्दों के बाद के उसके गीले ओठों की महक मेरे ओठों पर आज तक चस्पा हैं।


* चित्र गूगल से

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उस जानिब रूहानी तक़द्दुस चेहरे

>> 04 January 2010

उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....

-यह नीम की ही पत्तियाँ झड रही हैं न...
-हाँ, शायद पतझड़ का मौसम है ।
-नहीं ये अँधेरे का मौसम है...लगता है अँधेरा हौले हौले झड़ता हुआ गहरा रहा है ।

तब वो एकपल के लिये मद्धम से मुस्कुरा दी थी...फिर उसने कहा

-कितना अच्छा हो कि हम न कुछ पूँछे और न जाने...अपनी अपनी जिंदगी के जवाब एक दूजे से न माँगें । दिमाग को इसमें शामिल न करें और उसे जी लें जिसे ये दिल जीना चाहता है ।

तब वो ढेर सारे उसके बाद के खामोश पल कब और कैसे गुजर गये....कहाँ पता चला था
वक़्त जब पहलू बदलता है तो खामोश सा चुपचाप गुजर जाता है ।

तब रात चाँदनी थी । हवा गुनगुनाती सी कानों को छूकर जा रही थी । दिल की आहटें दूजे के दिल तक अपना सन्देश गुपचुप पहुंचा रही थीं ।

तब मैंने उससे कहा था
-लगता है आज पूरे चाँद की रात है !
-नहीं, आज चाँद कुछ अधूरा सा जान पड़ता है...कल पूरे चाँद की रात होगी !
उसकी इस बात पर चाँद उतरकर उसके गुलाबी गाल को थपथपा कर चल दिया था । मैंने मुस्कुराते हुए उस चाँद को जाते देखा...

उसने यूँ ही आहिस्ता से चाँद को जाते देखकर पूँछा
-आपको सपने देखना पसंद है...
-हाँ, बहुत...शायद मुझे उससे ज्यादा पसंद है, सपनों को जमा करना...रंग बिरंगे सपने, खूबसूरत सपने, अपनों के सपने, अपने सपने
-सच !
-हम्म्म्म....मैंने ठंडी साँस भरकर कहा
-क्योंकि जमा किये सपने याद बन जाते हैं और उन सुनहरी जमा यादों को मैं अक्सर थपथपा कर उनका हाल पूँछता हूँ । उन यादों में वो सपने बिलकुल अपने लगते हैं ।

यह कहते हुए मैं खामोश सा हो चला था । वो उस पल बोली थी...
-यादें पवित्र होती हैं...शायद इसी लिये जमा रह जाती हैं

-तब उन गहरी हो सकने वाली यादों को, जिनकी आहटें भी रूहानी संगीत छेड़ती हैं, संवारने के लिये हम एक सफ़र पर चल दिये थे...

उस खामोश फैली हुई चाँदनी में उसके ओंठ तितली के पंखों की तरह खुले और काँपे थे और उसकी पलकें सीपियों की तरह मुंद गयीं थीं...जिस पल दोनों के ओठों के स्पर्श ने उस यादगार गहराए हुए पल को एक खुशनुमा न भूलने वाली याद बना लिया था । खुलती और बंद होती सीपियों का वह संसार एक अध्याय बन जिंदगी से जुड़ गया...

* तक़द्दुस = पवित्र, उस जानिब = उस ओर

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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)-अंतिम भाग

>> 22 December 2009

प्रथम एवं द्वितीय भाग पढने के लिये यहाँ ज़िक्र(एक प्रेम कहानी)-I तथा ज़िक्र(एक प्रेम कहानी)-II पर क्लिक करें

कहते हैं कि ख्वाहिशों का कोई छोर नहीं होता । कहाँ शुरू होती हैं और कहाँ ख़त्म ये पता ही नहीं चलता । कुछ ख्वाहिशें तो ऐसी होती हैं कि खुद ख्वाहिशों को ख्वाहिश करने वाले से प्यार हो जाता होगा । सोचती होंगी कि कितना नेक बन्दा है जो दिल से इतनी मासूम सी ख्वाहिश करता है ।

कुछ रोज़ बाद जब सब कुछ तय हो गया कि कब लगन है और कब शादी होनी है तो सिद्धांत अपने दोस्त साकेत को फ़ोन करके बताता है कि उसकी शादी तय हो गयी है और उसे जरूर आना है । जब साकेत को पता चलता है कि लड़की कोई और नहीं विद्या है तो पहले तो वो बिलकुल हतप्रद रह जाता है फिर कहता है "तूने सब कुछ सोच समझ लिया है न कि तू क्या करने जा रहा है । तू खुद अपनी मर्ज़ी से ही शादी कर रहा है ना ।" इधर से सिद्धांत फ़ोन पर साकेत को अपनी बात पूरी तरह समझा देता है और उसे शादी के दिन उपस्थित रहने के लिये वादा लेता है ।

शादी का दिन नजदीक आने से पहले के सभी दिन एक एक करके बीतते जाते और हर रोज़ कुछ न कुछ आभास करा जाते । इन बीते हुए दिनों में कभी ऐसा दिन नहीं आया कि सिद्धांत और विद्या की बात हुई हो । कभी सिद्धांत सोचता भी बात करने की लेकिन यह सोचकर रह जाता कि पता नहीं कहीं विद्या असहज महसूस ना करे और अगर विद्या बात करना चाहेगी तो फ़ोन कर ही लेगी । दिन थे कि बीते तो बीतते ही गये और अपने साथ लेते गये तमाम सवाल, तमाम यादें, तमाम एहसास जो सिद्धांत ने विद्या के बारे में सोचकर गुजारे थे ।

उधर विद्या कभी सोचती कि मैं सिद्धांत को फ़ोन करूँ कि ना करूँ । तो क्या हुआ जो हमने शादी से पहले बात ना की । हमारे माता-पिता भी ने तो शादी से पहले बात नहीं की थी । जितना किसी को जानना है वो शादी के बाद भी जाना जा सकता है । अब तो शादी हो ही रही है । जब किसी को जानकर भी कोई धोखा देकर चला जाता है तो फिर जान-पहचान से भी क्या हासिल ?

अंततः वह दिन आ ही जाता है जब मंडप में बैठकर पंडित सिद्धांत को विद्या के गले में मंगलसूत्र पहना देने के लिये कहते है । जब मंडप में अग्नि के सात फेरे लेते हुए दोनों आगे पीछे एक दूजे से जुड़े हुए चल रहे हैं । जब पंडित जी कहते हैं कि विवाह संपन्न हुआ और जब सभी बड़े-बुजुर्ग अपनी अपनी शुभकामनाएँ देते हुए फूलों की बारिश से उन दोनों का नये जीवन में स्वागत करते हैं ।

विद्या को अपने घर में पाकर सिद्धांत की माँ ख़ुशी से भावविभोर हो जाती हैं । घर के मुख्य दरवाजे पर ही दोनों की बालाएं लेती हैं और गृहप्रवेश की रस्म अदायगी के बाद विद्या को नये सजे हुए कमरे में ले जाया जाता है । एकपल तो सिद्धांत की माँ को विश्वास ही नहीं होता कि उसके बेटे की शादी हो गयी है और इतनी खूबसूरत चाँद सी बहू घर आ गयी है । उस रोज़ सिद्धांत की माँ के भावविभोर होकर आँखों से आंसू निकल आते हैं और वो विद्या से कहती हैं "बेटी मैं बहुत खुशनसीब हूँ जो तुम मेरे घर बहू बन के आयी । मेरे घर में एक बेटी की कमी थी जो तुमने आकर पूरी कर दी । मुझे हमेशा अपनी माँ ही समझना और देखना अगर कभी बेटी समझ कर गुस्सा करूँ तो बुरा मत मानना । विद्या भी उनकी डबडबाई आँखों को देख उनके गले लग जाती है और कहती है "खुशनसीब तो मैं हूँ माँ जो एक माँ को छोड़कर आयी तो मुझे यहाँ दूसरी माँ मिल गयी ।"

तभी सिद्धांत के पिताजी बाहर से मजाक के लहजे में आवाज देते हैं "अपनी बहू के आ जाने के बाद, क्या इस बूढ़े की भी सुनोगी ।" सिद्धांत की माँ कहती है "खबरदार जो खुद को बूढा कहा तो । तो क्या हुआ जो बेटे की शादी कर ली । अभी तो अच्छे अच्छे तुम्हारे आगे कुछ नहीं ।" और हंसती हुई चली जाती हैं । विद्या दोनों की बातें सुनकर मुस्कुरा उठती है । यहाँ अपने माँ-बाप की ही तरह के इंसान पाकर वो एक पल को अपने घर को भूल जाती है ।

सूरज के ढलने के साथ ही रात करवट बदलती है और अपनी चाँदनी बिखेर देती है । सिद्धांत को उसके कमरे में भेजा जाता है । दरवाजे पर क़दमों की आहट पाकर बिस्तर पर बैठी विद्या कुछ सकुचा सी जाती । सिद्धांत कमरे में प्रवेश करता है तो देखता है कि विद्या घूँघट डाले हुए बैठी है । साथ ही ये भी देखता है कि विद्या बहुत ही असहज महसूस कर रही है । ख़ामोशी तोड़ने के लिये सिद्धांत खड़े हुए ही बोलता है "ये घूँघट क्यों डाला हुआ है तुमने ? मैं तो तुम्हें बहुत पहले से देखता आ रहा हूँ ।" विद्या घूँघट के अन्दर से ही कहती है " वो माँ ने कहा है कि ये रस्म है और वो ही घूँघट डाल गयी हैं, कह रही थी कि आप आकर घूँघट उठाओगे तो रस्म पूरी होगी ।"

सिद्धांत हँसता है "अच्छा, बड़े रस्मों-रिवाज माने जा रहे हैं । क्या बात है । तो माँ का कहना माना जा रहा है । ठीक है लीजिये घूँघट उठा देते हैं ।" कहता हुआ सिद्धांत विद्या का घूँघट उठा देता है और कहता है "शुभान-अल्लाह, आज चाँद सीधे मेरे कमरे में निकल आया है, देखूँ तो कहीं बाहर काली रात तो नहीं ।" विद्या इस बात पर थोडा मुस्कुरा सी जाती है । साथ ही साथ विद्या का दिमाग तमाम सवालों में उलझा हुआ था । कभी इस उधेड़बुन में वो अपने पैरों की उँगलियों को सिकोड़ती तो कभी अपनी गर्दन नीचे कर लेती । सिद्धांत विद्या की उधेड़बुन को भाँप लेता है और उठता हुआ कहता है "तुम्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं विद्या, ये एक रस्म अदायगी थी जो मैंने पूरी कर दी । इसके आगे में जानता हूँ कि मेरी अभी सीमा कहाँ तक है । मैं जानता हूँ कि मैं भी चाहूँ तो और पुरुषों की तरह इस रात उसी तरह का बर्ताव कर सकता हूँ लेकिन मैं वैसा इंसान नहीं हूँ । दो जिस्मों के मिलन से ज्यादा पाक होता है दो आत्माओं का मिलन और जिस दिन तुम अपनी आत्मा से मुझे कबूल कर लोगी उस रोज़ तुम सहज महसूस करोगी । तब मुझे न तो कुछ कहने की जरूरत पड़ेगी और ना ही कुछ करने की । सब कुछ सहज रूप से हो जाएगा ।"

सिद्धांत सामने रखी हुई कुर्सी पर बैठ जाता है और उपहार में मिले कार्ड देखने लगता है । तभी उसके हाथ से बिस्तर पर छूटी हुई दो टिकटों को उठाकर विद्या देखती है और कहती है " ये टिकट ?" सिद्धांत कहता है "हाँ वो साकेत ने ऊटी के दो हनीमून टिकट दिये हैं और वहाँ होटल में ठहरने का एक हफ्ते का इंतजाम किया है । मैंने उसे मना भी किया लेकिन वो माना ही नहीं । विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत बोला "मैंने सोचा पता नहीं तुम शायद न जाना चाहो ।" विद्या कुछ नहीं कहती और खामोश हो जाती है । सिद्धांत कहता है "चलना चाहोगी ?" विद्या कहती है "अब जब टिकट हैं ही तो फिर मना करने से क्या फायदा । आपके दोस्त का नुकसान ही होगा ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "ये भी खूब कही तुमने ।"

फिर दोनों के बीच ख़ामोशी छा जाती है । सिद्धांत रखे हुए कार्ड देखने लगता है और विद्या किसी सोच में चली जाती है । थोड़ी देर बाद विद्या कहती है "एक बात कहूँ " सिद्धांत कार्ड देखते हुए ही कहता है "ह्म्म्म, कहो ।"
विद्या कहती है "मैं अपने अतीत के बारे में सब कह देना चाहती हूँ ।" सिद्धांत कहता है "मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि मुझे तुम्हारे अतीत से कोई जान पहचान नहीं करनी और उसे जानकर होगा क्या ?" विद्या कहती है "अगर मैं कहूँ कि अब मैं ठीक झरने के गिरने के बाद से बनी हुई पवित्र नदी नहीं हूँ तो ?" सिद्धांत कार्ड को रखता है और विद्या की ओर देखकर कहता है "पवित्रता और अपवित्रता की परिभाषा किसी की वर्जिनिटी से नहीं दी जा सकती और ना ही मैं वो पुरुष हूँ जो ठीक झरने के गिरने के बाद से बनी हुई नदी में नहाने की चाह रखता हो । मैं तो कहूँगा कि पवित्र नदी की चाह रखने वाले और उसमें स्नान करने वाले स्वंय अपनी पवित्रता का आंकलन करना क्यों भूल जाते हैं ?क्यों पवित्र नदी में अपनी अपवित्रता धोकर पवित्र होना चाहते हैं स्नान करने वाले । चिंता मत करो मुझे तुम्हारी वर्जिनिटी से तुम्हारी पवित्रता का आंकलन नहीं करना । तुम अगर आत्मा से पवित्र हो तो ही तुम मेरे लिये पवित्र कहलोगी ।" विद्या सिद्धांत की ओर देखती ही रह जाती है ।

सिद्धांत कहता है "अब तुम सो जाओ थक गयी होगी ।" विद्या लेट जाती है और कुछ सोचती सी, किसी उधेड़बुन में कब सो जाती है उसे पता ही नहीं चलता । जब सुबह के समय उसकी आँख खुलती है तो देखती है कि सिद्धांत कुर्सी पर बैठा हुआ ही सो गया है । विद्या उठकर सिद्धांत के बाजू पर हाथ रखती है और कहती है "सिद्धांत आप सारी रात यहीं कुर्सी पर सोते रहे । वहाँ बिस्तर पर सो जाइए ।" सिद्धांत उठकर बिस्तर पर लेट जाता है और विद्या कमरे के बाहर चली जाती है । करीब दो घंटे बाद विद्या चाय लेकर आती है और सिद्धांत को जगाती है "चाय पी लीजिए" सिद्धांत उठता है और देखता है कि विद्या नहाने के बाद गीले बालों में उसके सामने चाय का प्याला लेकर खड़ी हुई है । एक भीनी-भीनी खुशबू से पूरा कमरा भर जाता है । विद्या खिड़की का पर्दा हटाती है तो सूरज खिलखिलाता हुआ मुस्कुराता है । सिद्धांत चाय के प्याले को होठों तक ले जाते हुए सूरज को देखता है तो उसे एक पल लगता है कि जैसे सूरज ने मुस्कुराते हुए एक आँख मारी हो ।

सिद्धांत चाय ख़त्म हो जाने के बाद उठता है और तौलिया उठाकर नहाने चल देता है । नहा लेने के बाद अपने गीले बाल झाड़ता हुआ कमरे में आता है और विद्या से पूँछता है "तुम्हारी कब तक की छुट्टी है ?" विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत तौलिया रखते हुए कहता है "वो ऊटी वाला किस्सा याद है या भूल गयीं ?" विद्या कहती है "ओह, हाँ, अभी 10 दिन की छुट्टी और है ।" सिद्धांत कहता है "तब ठीक है । वैसे हमें कल ही निकलना होगा ।"

अगले रोज़ सिद्धांत और विद्या हवाई जहाज से सफ़र कर ऊटी की धरती पर कदम रख देते हैं । वहाँ के मनमोहक दृश्य, खूबसूरत आसमान, ताज़गी और खुशनुमा माहौल दिल में बस जाता है । होटल मैं पहुँच जब विद्या खिड़की खोलती है तो उसके सामने दूर तक फैले बादल ही बादल दिखाई दे रहे थे । सफ़ेद, ऐसे जैसे आच्छादित होकर अपने होने का एहसास करा रहे हों । विद्या उन्हें देखकर खुश हो जाती है । सिद्धांत कमरे में सामान रखकर बैठ जाता है । कुछ देर में कमरे का रख रखाव करने वाला नौकर आता है और कहता है "सर कुछ चाहिए ?" सिद्धांत विद्या की ओर देखकर कहता है "मेरे लिये एक कॉफी और मेमसाहब से पूँछो ।" विद्या कहती है "मैं भी कॉफी ही लूंगी ।"

थोड़ी देर में कॉफी आ जाती है । विद्या खिड़की के पास खड़े हुए ही कॉफी पीने लगती है और कभी बादलों को देखती है तो कभी दूर तक फैली हरियाली को । सिद्धांत कहता है "अभी कुछ घंटे में हमे बाहर घुमाने ले जाने वाले आएगा । तब तक चाहो तो आराम कर लो । मैं नहा लेता हूँ । तुम भी चाहो तो नहा लेना ।" विद्या कहती है "ठीक है ।"

थोड़ी देर में ही सिद्धांत नहा कर बाहर आ जाता है । विद्या नहाने चली जाती है और जब उन भीगे बालों और नन्ही नहीं बूंदों से भीगे हुए सूट को पहने बाहर निकलती है तो सिद्धांत की नज़र ना चाहते हुए भी उस पर टिकी ही रह जाती है । विद्या की नज़रें जब सिद्धांत को देखती हैं तो सिद्धांत कुछ झेंप सा जाता है और खिड़की के बाहर की ओर देखने लगता है । विद्या आईने के सामने खड़ी होकर अपने बाल सुखाने लग जाती है । सिद्धांत खिड़की के बाहर दूर तक फैले बादलों को देखकर कहता है "कितने खूबसूरत बादल है ? है ना" विद्या जवाब देती है "ह्म्म्म"

फिर सिद्धांत विद्या की ओर देखता है और कहता है "तुम्हें पता है कि बादल इतने सफ़ेद क्यों दिखाई देते हैं ? उजले उजले से, दूर तक फैले से ।" विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत कहता है "क्योंकि ये बहुत नेक दिल होते हैं, स्वार्थी नहीं होते और हमेशा देते हैं, कभी किसी से कुछ नहीं माँगते । अपने को फना कर देते हैं और इस प्यासी जमीन को अपना सर्वस्व दे देते हैं ।" विद्या सिद्धांत को एकपल देखकर मुस्कुरा जाती है और अपने बाल बाँध लेती है ।

सिद्धांत कहता है "कुछ खाना है तो नीचे चलते हैं या चाहो तो यहीं कमरे में मँगा लेते हैं ।" विद्या कहती है "प्लीज यहीं मँगा लो । वैसे भी बहुत थकान हो गयी है ।" सिद्धांत फ़ोन करके खाना लाने को कह देता है । दोनों खाना खाते हैं और खाना खाने के बाद सिद्धांत टीवी के चैनल बदल ही रहा था तभी उन्हें बाहर घुमाने ले जाने वाला दरवाजे पर दस्तक देता है । सिद्धांत उसे नीचे इंतज़ार करने के लिये कहता है और कुछ देर बाद विद्या को साथ लेकर पर्यटन के लिये निकल जाते हैं ।

दो-तीन रोज़ ऐसे ही गुजर गये । दिन बाहर घूमने में निकल जाता और रात उस बिस्तर पर एक दूसरे से दूरी बनाकर सोने में । उस चौथी शाम जब सिद्धांत किताब पढने में तल्लीन था और विद्या टीवी के चैनल बदलने में तो विद्या अचानक से कहती है "सिद्धांत, आप तो खूबसूरत भी हैं, दिल के भी नेक हैं और इतनी अच्छी बातें भी कर लेते हैं । क्या आपको कभी किसी से प्यार नहीं हुआ ?" सिद्धांत जो किताब में खोया हुआ था । विद्या के इस सवाल ने उसे अन्दर तक झकझोर कर रख दिया । सिद्धांत मन ही मन सोचने लगा कि विद्या को तो कुछ पता ही नहीं या कहीं ऐसा तो नहीं कि इसे पता हो लेकिन ये मेरे मुँह से सुनना चाहती हो ।

सिद्धांत कहता है "नहीं मैंने कभी किसी को नहीं चाहा" विद्या कहती है "पर गर्ल्स हॉस्टल में तो तमाम लडकियां आपके गुण गाती थीं। आपको पसंद करने वाली तमाम थीं ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "अच्छा, मुझे तो पता ही नहीं था । क्या वाकई ऐसा था ?" विद्या कहती है "हाँ, क्यों किसी ने आपके सामने अपने प्यार का इजहार नहीं किया ।" सिद्धांत कहता है "हाय री किस्मत" और फिर दोनों हँसने लगते हैं ।

अगले दो रोज़ भी बाहर घूमने में निकल जाते हैं जिसमें वो चर्च जाते हैं, कुछ कपडे खरीदते हैं, कई बार सिद्धांत विद्या से बार बार पूँछ पूँछ कर खाने की चीज़ें लेता है । विद्या का पूरा ख्याल रखता है और विद्या भी सिद्धांत के साथ घुलने मिलने सी लगती है । उस रात बिस्तर पर दोनों के बीच उतनी ही दूरियां थी जितनी कि पहले हुआ करती थीं । रात को सोते हुए ना जाने कैसे सिद्धांत का एक हाथ करवट लेते हुए विद्या के गले के नीचे पहुँच गया । जिसका ना तो सिद्धांत को होश था और ना ही उसका ऐसा कोई उसका इरादा था । अचानक से विद्या की नींद खुल जाती है और जब देखती है कि सिद्धांत का हाथ उसके सीने पर रखा हुआ है तो वो सिद्धांत का हाथ झटक कर फैंकती है । सिद्धांत की नींद खुल जाती है । विद्या उठ कर बैठ जाती है । सिद्धांत कहता है "क्या हुआ ? कैसे बैठी हो ?"

विद्या कहती है "सब मर्द एक जैसे ही होते हैं । कुछ बातें तो अच्छी अच्छी करना जानते हैं लेकिन अंततः चाहते वो भी वही हैं । स्त्री को भोगना ।" विद्या की बात सुनकर सिद्धांत को समझने में ज़रा भी देर नहीं लगती कि उसने उसका हाथ क्यों झटका था । सिद्धांत कहता है "सॉरी, मुझे कुछ पता नहीं चला और ना ही मेरा ऐसा कोई इरादा था । " विद्या कहती है "मैंने आप से कुछ हँस बोलकर बात क्या कर ली । आपसे घुल मिल क्या गयी । आपने सोचा कि चलो अब सब आसान हो गया ।" सिद्धांत बोला "क्या कहती जा रही हो तब से । मैंने बोला ना सॉरी, मैंने कुछ जान बूझ कर नहीं किया ।" विद्या कहती है "जानते हो मेरा पिछला अतीत क्या है ? मेरा पिछला अतीत यही था कि वो भी मुझे भोगना चाहता था । फर्क सिर्फ इतना है कि वो मुझे शादी से पहले ही प्यार का वास्ता देकर भोगना चाहता था । इसी लिये जब मैंने उसे मना किया तो उसने मुझसे रिश्ता ख़त्म कर कहीं और शादी कर ली ।" सिद्धांत बोला "देखो विद्या, मैं मानता हूँ कि मुझसे अनजाने में गलती हुई है । उसके लिये मैं माफ़ी चाहता हूँ ।" विद्या कहती है "मैं कल ही घर वापस जाना चाहती हूँ ।" सिद्धांत कहता है "ठीक है, जैसा तुम चाहो ।"

अगले रोज़ सिद्धांत विद्या को लेकर वापस अपने घर आ जाता है । सिद्धांत की माँ दोनों से बारी बारी पूंछती है कि वो दोनों दो दिन पहले कैसे आ गये । कोई बात है क्या ? मगर दोनों ने यही कहा कि "बस जी भर गया था और आपकी याद आ रही थी इसीलिए चले आये"

अगले रोज़ विद्या अपने माता-पिता के घर चली जाती है । वहाँ जाने से पहले सिद्धांत की माँ कहती है कि अपनी नौकरी पर जाने से पहले यहाँ होकर ही जाना और देख जल्द से जल्द कोशिश कर कि तेरा तबादला भी यहीं हो जाए, इसी शहर में ।" विद्या जाते हुए कहती है "ठीक है माँ"

सिद्धांत अपने कॉलेज के काम के सिलसिले में कुछ रोज़ के लिए दूसरे शहर चला जाता है । माँ के कई बार पूँछने पर भी वो माँ को कुछ नहीं बताता कि उन दोनों के बीच कुछ गड़बड़ है । उधर सिद्धांत के चले जाने और विद्या की छुट्टियाँ ख़त्म होने के दौरान विद्या अपनी ससुराल, माँ से मिलने आती है । उसे देखकर माँ बहुत खुश होती हैं ।
माँ कहती है कि "अब आज यहीं रुक जाना विद्या । कल सुबह यहीं से चली जाना । विद्या चाहते हुए भी माँ की बात नहीं टाल पाती और वहीँ रुक जाती है ।

रात के 2 बजे विद्या किसी उधेड़बुन में थी, कुछ सोचती सी, उसे नींद नहीं आ रही थी । उसे ऊटी की सिद्धांत के साथ की हुई बातें रह रह कर याद आ रही थीं । वो हंसी की गूँज, वो आपस में खेली अन्ताक्षरी, वो साथ घूमना और उसकी खुद की पसंद का खाना खाना और फिर अंततः उस रात का अंतिम दृश्य जो सामने आता तो विद्या परेशान हो उठती । तभी वो बिस्तर से उठ कमरे में टहलने लगती है । विद्या की नज़र उस डायरी पर जाती है । विद्या उसे उठकर पढने लगती है । एक एक अल्फाज़ , एक-एक पंक्ति पढ़ डालती है । हर अल्फाज़ अपनी कहानी कह रहा था । उस पहले रोज़ से लेकर जब सिद्धांत ने पहली बार विद्या को देखा था, उस आखिरी रोज़ तक जब सिद्धांत ने सारी रात उस रेस्टोरेंट के बाहर इतंजार में गुजारी थी ।

विद्या बहुत रोती है । बहुत देर तक रो लेने के बाद बार बार उसके दिल में यही ख़याल आता कि मैंने उस इंसान का दिल दुखाया जिसने मुझे चाहने के अलावा अपनी जिंदगी में कुछ नहीं किया । कभी उसने दर्द से उफ़ तक नहीं किया । मैं उस आखिरी रोज़ भी उससे ना मिल सकी थी जब अचानक उसकी रूममेट की तबियत खराब हो गयी थी और ऊटी की आखिरी रोज़ का दिया हुआ दर्द भी तो कुछ कम नहीं । वो जानती थी कि सिद्धांत चाहता तो दूसरे पतियों की तरह अपनी पत्नी को हासिल कर सकता था लेकिन वो कितना नेक और शरीफ है । हर पल विद्या का सिद्धांत के बारे में ही सोचते हुए कट जाता है ।

सुबह विद्या खुद को कुर्सी पर पाती है । फ़ोन की घंटी बज रही थी । विद्या ने सोचा कि शायद सिद्धांत का फ़ोन हो । अगर उसका फ़ोन हुआ तो वो उससे माफ़ी माँगेगी । लेकिन जब फ़ोन उठाया तो उधर से साकेत की आवाज़ थी "कैसी हो विद्या ? तुम लोग इतनी जल्दी वहाँ से क्यों आ गये ? मैंने सिद्धांत से भी पूंछा उसने कुछ नहीं बताया । क्या बात है ? कोई अनबन तो नहीं हो गयी " और फिर बातों ही बातों में साकेत ने विद्या को सिद्धांत के दिल का सारा हाल कह सुनाया ।

अब विद्या खामोश चुपचाप माँ के पास जाती है और कहती है "माँ मैं अभी नहीं जाऊँगी कुछ रोज़ बाद जाऊँगी, जब सिद्धांत आ जायेंगे तब ।" सिद्धांत की माँ कहती है "जैसी तेरी मर्ज़ी बेटा, मुझे तो ख़ुशी मिलेगी जो तुम और दिन रुकोगी तो" विद्या फ़ोन करके अपने कार्यालय वालों से और छुट्टी माँग लेती है ।

इन चन्द दिनों मैं हर पल विद्या सिद्धांत के फ़ोन का इंतज़ार करती लेकिन सिद्धांत का कोई फ़ोन नहीं आया । विद्या में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे फ़ोन कर ले । विद्या तो बस इंतज़ार कर रही थी उस घडी का जब सिद्धांत आएगा और विद्या उससे माफ़ी माँगेगी और उसके सीने से लग कर जी भर कर रो लेगी । हर दिन आता और अपने साथ इंतज़ार की घड़ियाँ लेकर आता । अंततः 1 सप्ताह बाद सूरज के ढलने के साथ ही सिद्धांत के कदम घर के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।

रात का पहर अपने पाँव पसार चुका था और चाँद भी मानो जैसे मुस्कुरा रहा हो । सिद्धांत को उसकी माँ नहीं बताती कि विद्या अभी मौजूद है और अपने कमरे में ही है । विद्या ने माँ से मना कर रखा था और विद्या के कहने के अनुसार माँ ने सिद्धांत को कुछ नहीं कहा । सिद्धांत अपने कमरे में प्रवेश करता है तो सामने सजी-सँवरी विद्या को पाता है । सिद्धांत कहता है "विद्या तुम ? तुम अभी तक गयी नहीं ?" विद्या बिना कुछ बोले सिद्धांत के सीने से लग जाती है और रोने लगती है । रोते रोते कहती है "मुझे माफ़ कर दो सिद्धांत । मैं नहीं जानती थी कि आप मुझसे इतनी मोहब्बत करते हो । मुझे इतना चाहते हो । मैंने तो तब जाना जब आपकी वो डायरी पढ़ी और जब साकेत से बात हुई ।" सिद्धांत विद्या की पीठ पर हाथ रखता है और कहता है "रोती क्यों हो पगली ? अब तो मैं आ गया हूँ ना और मुझे तुमसे कोई गिला-शिकवा नहीं है ।" विद्या कहती है "नहीं मुझसे गलती हुई है । जब तक मुझे माफ़ नहीं करोगे तब तक मैं यूँ ही रोती रहूंगी ।" सिद्धांत कहता है "अच्छा बाबा, माफ़ किया अब खुश । अब तो चुप हो जाओ ।" विद्या हँस देती है और उसके सीने से कसकर अपनी बाहों को बाँध लेती है । सिद्धांत नियंत्रण सा खो देता है और विद्या को लेकर धडाम से बिस्तर पर गिरता है । विद्या सिद्धांत के होठों पर अपने होठ रख देती है ।

तब कमरे की सारी औपचारिक सुगंध कहीं और उड़ गयी थी । अब थी तो बस साँसों के उठने और गिरने की लय और एक दूजे के बदन की महक । शरीर अपनी कुदरती महकों के साथ, नदियों की तरह उमड़ कर एक होते हुए बहने लगे थे ।

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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)-भाग 2

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सर्दियों की गुनगुनी धूप थी, आसमान पंक्षियों के होने से और भी ज्यादा खूबसूरत लग रहा था । पेड़ों ने अपना पुराना लिबास उतारकर नया धारण कर लिया था और उसमें वो कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रहे थे । कहीं दूर से भीगी हुई धरती की भीनी-भीनी महक आ रही थी, जैसे हवाओं में घुल सी गयी हो ।

सिद्धांत एक कुर्सी पर अधलेटा सा पैरों को पसारे हुए, सीने पर किताब को उलट कर रखे हुए किसी सोच में उन पंक्षियों को निहार रहा था । छत पर क़दमों ने दस्तक दी । "सिद्धांत, बेटा क्या सोच रहा है ?" छत पर मिर्चों को पसारते हुए सिद्धांत की माँ बोलीं। सिद्धांत का ध्यान टूटता है और कहता है "ह्म्म्म, कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं ।"
"बेटा मुझे कुछ तुझ से बात करनी थी । कल रात ही कहना चाहती थी लेकिन तू जल्दी सो गया तो मैंने सोचा कि कल ही कहूँगी । " सिद्धांत की माँ उठकर उसके पास सामने की कुर्सी पर बैठ गयीं । सिद्धांत बोला "क्या बात करनी थी ? बोलिए ।" सिद्धांत की माँ ने सिद्धांत को एक नज़र प्यार से देखा और कहा "देख बेटा हम जानते हैं कि तुम फिलहाल शादी नहीं करना चाहते । लेकिन मेरे और अपने बाबू जी के बारे में भी तो सोच । माना वो तुझसे कुछ कहते नहीं लेकिन हर बाप का मन करता है कि उसके लड़के की शादी हो, बारात चढ़े, शहनाई बजे । एक माँ भी यही सब चाहती है । देख बेटा उनके किसी दोस्त के दोस्त की एक लड़की है । वो चाहते हैं कि हम सब वहाँ जाकर एक दूसरे को देख ले, समझ लें और सच तो यही है कि मैं भी चाहती हूँ । अच्छे लोग हैं तो बात चलाने में हर्ज़ ही क्या है ? बेटा अब हमारी खातिर ही लड़की देख लो और पसंद आने पर शादी कर लो ।" सिद्धांत अपनी माँ की ओर देखता है और मुस्कुराकर कहता है "बस इतनी सी बात । ठीक है कब चलना है, उनके यहाँ ?" सिद्धांत की माँ खुश होकर कहती है "कल चलना है । कल सोमवार है । कल दिन भी शुभ है ।"

कुछ एहसास जो बहुत कहीं पीछे छूट गये हों, वो अचानक से सामने आकर अगर दामन थामने लगे तो उस पल समझ नहीं आता कि आखिर वो रब चाहता क्या है ? आखिर उसकी मंशा क्या है ? उसने मुझे ही क्यों चुना इन सबके लिये ।

ऐसा ही तो महसूस कर रहा था सिद्धांत जब लड़की वालों के यहाँ पहुँचकर जो लड़की उसके सामने आयी वो कोई और नहीं विद्या थी । एक पल को सिद्धांत पिछली जिंदगी में चला गया । वो हॉस्टल, वो डायरी, वो क्लास, वो विद्या की मुस्कराहट, वो ढेर सारी रातें और वो ढेर सारे अल्फाज़, उसके चेहरे के सामने आकर खड़े हो गये । उसे लगा कि ये विद्या नहीं हो सकती । उसने फिर से कोशिश की, सामने आयी हुई लड़की को ठीक से देखने की । हाँ ये विद्या ही तो थी, जो उसके सामने खड़ी थी । ठीक उस रोज़ के बाद जब वो पुस्तकालय में मिली थी । जिंदगी भी क्या क्या अजीब मोड़ पर आकर रूकती है और ये ऊपर वाला भी ना जाने किन बीते हुए दिनों का ज़िक्र यूँ कर देता है, एक पल को तो विश्वास ही नहीं होता ।

उधर विद्या, सिद्धांत को देखकर कुछ असहज सी महसूस करने लगी थी । वही सिद्धांत जो कॉलेज के दिनों में हर लड़की को पसंद था । सभ्य, समझदार, शांत और बिलकुल नेकदिल । हाँ सभी तो जानते थे सिद्धांत के बारे में । लेकिन उसे तो कुछ और ही चाह थी । इन्हीं बातों में खोयी हुई विद्या लौटकर अपने घर बैठे उन लोगों के बीच खुद को पाती है ।

विद्या की माँ सिद्धांत से कहती है "बेटा कुछ लो, तुम तो तब से यूँ ही बैठे हुए हो । चाय ठंडी हो रही है, ये मिठाई भी खाओ बेटा " सिद्धांत चाय उठा लेता है । सिद्धांत के माता-पिता विद्या से बातें करते हैं । विद्या के पिताजी और माँ सिद्धांत से बातें करते हैं । कुछ समय यूँ ही गुज़र जाता है । सभी जानते थे कि विद्या खूबसूरत है और उसे नापसंद करने का कोई कारण नहीं हो सकता । तभी सिद्धांत के पिताजी के दोस्त, विद्या के पिताजी की ओर देखते हुए कहते हैं कि "लड़का-लड़की चाहे तो आपस में बात कर सकते हैं, क्यों गलत तो नहीं कहा ना मैंने किशोर जी"

"हाँ-हाँ क्यों नहीं, हमें कोई एतराज नहीं, आखिर जिंदगी भर का मामला है । आपस में लड़का-लड़की को बात तो करनी ही चाहिए ।" विद्या के पिताजी कहते हैं और फिर सब वहाँ से उठकर बाहर के बागीचे में चले जाते हैं ।

अब उस मेहमानों के कमरे में सिर्फ विद्या और सिद्धांत थे । दोनों को यूँ लग रहा था कि ये जिंदगी का सबसे कठिन दौर है जो अचानक से उनके सामने आ गया है । दोनों ही सोच रहे थे कि मैं क्या कहूँ ? क्या बात करूँ ? दो इंसान जो एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे, उनके पास आज शब्द नहीं थे इस ख़ामोशी को तोड़ने के लिये ।

तब सिद्धांत कमरे की पेंटिंग की ओर इशारा करते हुए कहता है "ये पेंटिंग बहुत खूबसूरत है, नहीं ?" विद्या पेंटिंग की ओर झिझकते हुए देखती हुई कहती है "हाँ" फिर मन ही मन सोचती है कि आखिर ये उसे क्या हो गया है ? ये पेंटिंग तो कभी उसने ही बनायीं थी और आज कोई उसकी प्रशंसा कर रहा है तो उसके पास शब्द नहीं है प्रतिउत्तर में कहने के लिये ।

फिर विद्या बोलती है "आप चाहो तो मैं ही मना कर दूँगी ताकि आपके घरवालो को बुरा न लगे कि आपने शादी के लिये मना कर दिया" सिद्धांत, विद्या की ओर देखकर कहता है "क्यों तुम शादी नहीं करना चाहती या मुझसे ही शादी नहीं करना चाहती ?" विद्या कुछ शांत सा हो जाती है फिर कहती है कि "नही, ऐसी तो कोई बात नही" सिद्धांत कहता है "कैसी ? कि शादी करना चाहती हो मगर मुझ से नही" विद्या कहती है "शादी तो करनी ही है । क्योंकि मैं नही चाहती कि मेरे माता-पिता मेरी वजह से परेशान रहे ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "ठीक मेरी तरह" विद्या एकपल को सिद्धांत की ओर देखती है ।

सिद्धांत कहता है "देखो विद्या मुझे नही पता कि तुम्हारा अतीत क्या रहा । लेकिन एक बात जानता हूँ कि तुम अगर चाहो तो साफ़ साफ़ मना कर सकती हो और मुझे बुरा नही लगेगा । मेरा क्या है, मुझे तो शादी करनी ही है । वो तो किसी भी सुन्दर, पढ़ी लिखी और अच्छे परिवार की लड़की को देखकर मेरे घरवाले करना चाहते हैं । तुम मना कर दोगी तो कहीं और हो जायेगी ।" विद्या, सिद्धांत की एक एक बात सुन रही थी और उसकी नज़र कहीं शून्य में गुम थी । वो वहीँ मौजूद होते हुए भी खुद को ना जाने कहाँ पा रही थी । तब तक उन दोनों के माँ-बाप वहाँ आ जाते हैं । सिद्धांत के पिता के दोस्त बोलते हैं "तो क्या बात हुई ? क्या निष्कर्ष निकला बात करके ?"

सिद्धांत थोडा सा मुस्कुराता है और विद्या उठकर खड़ी हो जाती है । सिद्धांत की माँ कहती है "बैठो ना विद्या ।" विद्या बैठ जाती है । सिद्धांत के पिता के दोस्त सिद्धांत से कहते हैं कि "तो महाशय क्या जवाब है आपका ?" सिद्धांत विद्या की और देखने लगता है । विद्या उठकर जाने लगती है । सिद्धांत की माँ कहती है "देखो जी हमें तो लड़की बहुत पसंद है । सिद्धांत के पिताजी की ओर देखते हुए कहती हैं "क्या कहते हो जी ?" सिद्धांत के पिताजी कहते हैं "हाँ जी बिलकुल । हमें तो लड़की पसंद है । हमें कोई ऐतराज़ नही । बाकी लड़का और लड़की जाने ।"

सिद्धांत की माँ कहती है "सिद्धांत, बेटा बताओ कुछ । तुम्हारा मन क्या कहता है ?" सिद्धांत सामने लगी पेंटिंग की ओर देखता है फिर अपनी माँ की ओर देखकर कहता है "माँ अगर विद्या को सब पसंद है, वो अगर शादी करना चाहती है तो मुझे कोई ऐतराज़ नही । आप विद्या से पूँछ कर जवाब दीजिएगा ।"

सिद्धांत के पिता सागर जी, विद्या के माता-पिता से कहते हैं "अच्छा तो फिर हमें चलने की इजाज़त दीजिये । आप विद्या से पूँछना कि वो क्या चाहती है । आप हमें फिर जवाब दे दीजिएगा ।" उसके बाद सिद्धांत और उसके माता-पिता वहाँ से चले आते हैं ।

सिद्धांत और सिद्धांत के माता-पिता के चले जाने के बाद विद्या के माता-पिता विद्या से कहते है "हमें तो लड़का बहुत पसंद है । सभ्य है, सुन्दर है, सुधील है, कामयाब है । कॉलेज में प्रोफ़ेसर है । उसके माता-पिता भी बहुत अच्छे हैं । ऐसा ही रिश्ता तो हमें चाहिए था । क्या कहती हो विद्या ? तुम्हें सिद्धांत कैसा लगा ?" विद्या जो अपने माता-पिता की बात सुन रही थी और कुछ सोच रही थी, कहती है " सिद्धांत ने क्या कहा ? क्या वो शादी के लिये तैयार है ?"
विद्या की माँ कहती हैं "बहुत खुशनसीब होती हैं वो लडकियां जिन्हें ऐसा पति मिलता है जो अपने से पहले अपनी पत्नी की इच्छा का ख़याल रखता है । उसने यही कहा कि अगर विद्या को कोई ऐतराज़ नही तो मुझे भी कोई ऐतराज़ नही ।" विद्या अपनी माँ की बात सुनकर कुछ खामोश सी हो जाती है और कहती है "मुझे कुछ वक़्त दीजिये सोचने के लिये । मैं एक-दो दिन में जवाब देती हूँ ।"

अगली शाम विद्या अपनी माँ से कहती है "माँ क्या में सिद्धांत से एक बार और बात कर सकती हूँ ?" विद्या की माँ कहती है "क्यों अब क्या बात करना चाहती है ? उस दिन क्या बात नही कि थी ? या उस दिन कुछ अधूरा रह गया था ।" विद्या अपनी माँ के हाथों को पकड़ कहती है "माँ, आखिर जिंदगी भर की बात है । इतना हक़ तो बनता है । कुछ निर्णय बहुत मुश्किल होते हैं । उन्हें लेना तो और भी ज्यादा मुश्किल होता है । मैं एक बार और सिद्धांत से बात करना चाहती हूँ ।" विद्या की माँ कहती है "ठीक है, अगर तेरी यही मर्ज़ी है तो मैं सिद्धांत की माँ से बात करती हूँ ।"

विद्या की माँ सिद्धांत की माँ से सारी बात कर लेती हैं और उसके बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि विद्या और सिद्धांत अगले रोज़ बाहर किसी रेस्टोरेंट में मिल लेंगे और जो बात करना चाहते हैं वो कर लेंगे।

सिद्धांत आज रेस्टोरेंट में बैठा हुआ विद्या का इंतज़ार कर रहा था तभी उसकी आँखों के सामने वो शाम आकर खड़ी हो गयी जब उसने विद्या से अपने दिल का हाल कहना चाहा था । जिस शाम के बाद की सारी रात उसने इंतज़ार करते करते वहीँ उस रेस्टोरेंट के सामने गुजार दी थी । अजीब इत्तेफाक है उस शाम का ज़िक्र भी ये आँखें अचानक आज यूँ इस तरह क्यों कर रही हैं । जो बहुत पहले कहीं पीछे छूट गया वो आज यूँ इस तरह सामने क्यों आ रहा है ? इसी सोच में डूबा सिद्धांत बैठा था कि तभी वहाँ विद्या पहुँच गयी । सिद्धांत की नज़र आती हुई विद्या पर पड़ती है ।
वही विद्या जिसके सामने पड जाने पर उसके दिल कि धड़कन तेज हो जाती थी, कलम अल्फाज़ लिखने को बेताब रहती थी । जिसको देख भर लेने से सिद्धांत को अपार ख़ुशी मिलती थी ।

विद्या सिद्धांत के पास पहुँच जाती है, सिद्धांत खड़ा होकर उसका स्वागत करता है और उसे बैठने के लिये कुर्सी देता है । अचानक से उनके बीच एक ख़ामोशी आ जाती है । तब न तो विद्या के पास कोई लफ्ज़ होते और ना ही सिद्धांत के पास पूँछने के लिये कुछ । तभी वेटर आकर उनकी ख़ामोशी तोड़ता है और कहता है "क्या लाना है सर ?" सिद्धांत उसकी ओर देखता है फिर विद्या की ओर और कहता है "मैं तो एक कॉफी लूँगा और तुम विद्या क्या लोगी ?"
विद्या ख़ामोशी तोड़ते हुए कहती है "ह्म्म्म, मैं भी कॉफी लूँगी ।"

वेटर के चले जाने पर सिद्धांत कहता है "माँ कह रही थी कि तुम मुझसे मिल कर और बात करना चाहती हो । पूँछो क्या पूँछना चाहती हो ? " विद्या सिद्धांत को एक नज़र देखती है और फिर कुछ सोचती है और कुछ कहना चाहती है तभी वेटर वहाँ आकर कॉफी रख जाता है । सिद्धांत कॉफी को विद्या की ओर बढाता है और अपनी कॉफी को होठों तक ले जाता है ।

विद्या, सिद्धांत को कॉफी पीते हुए देखती है फिर कहती है "सिद्धांत आप मुझसे शादी क्यों करना चाहते हैं ? मैं तो सोच रही थी कि आप मना कर देंगे ।" सिद्धांत कॉफी के कप को नीचे रखते हुए कहता है " क्योंकि मेरे पास मना करने का कोई कारण नही । मैं अगर किसी भी लड़की से शादी करूँगा तो क्या देखूँगा । कि वो सुन्दर है, पढ़ी लिखी है , उसके माता-पिता कैसे हैं ? अगर यह सब मुझे किसी भी लड़की में दिखता है तो मैं उससे शादी कर लूँगा अगर वो भी मुझसे शादी करना चाहती है तो ।"

विद्या बहुत ध्यान से सिद्धांत को सुन रही थी और फिर कहती है "आप मेरे बारे में जानते हुए भी शादी करना चाहते हो ?" सिद्धांत कहता है "क्या ? यही जानते हुए कि तुम्हारे पहले से प्रेम सम्बन्ध रहे हैं ।" विद्या, सिद्धांत को देखती है और हाँ में सिर हिलाती है फिर कॉफी की तरफ देखने लगती है ।" सिद्धांत कहता है "हाँ मुझे किसी की बीती हुई जिंदगी से कोई फर्क नही पड़ता । अब मान के चलो कि मैं तुमसे शादी न करके किसी और लड़की को देखकर शादी कर लेता हूँ और वो मुझे अपने अतीत के बारे में कुछ नही बताती, तो उससे ना ही तो मुझे फर्क पड़ता और ना ही उसमें मैं कुछ कर पाउँगा । इसी लिये मैं आज में जीते हुए निर्णय करता हूँ । अगर तुम मुझसे शादी करना चाहोगी तो मैं किसी भी अन्य लड़की की तरह तुमसे शादी करना चाहूँगा । वैसे भी तुम मेरे माता-पिता को कुछ ज्यादा ही पसंद हो ।"

विद्या कहती है "मगर मैं चाहती हूँ कि मैं पहले से ही सबकुछ बता कर रखूँ ताकि बाद में कोई समस्या ना आये ।"
सिद्धांत कहता है "मैंने कहा ना कि अगर अतीत बीत चुका है और तुम्हारा उस अतीत से अब अगर कोई सम्बन्ध नही तो मुझे कोई फर्क नही पड़ता ।" विद्या, सिद्धांत की आँखों में एक पल के लिये देखती है और फिर किसी सोच में चली जाती है । सिद्धांत चुटकी बजा कर कहता है "विद्या कॉफी ठन्डी हो गयी ।" विद्या पुनः अपने आप को उस रेस्टोरेंट में पाती है ।

विद्या कहती है "अब मैं चलूँ । वैसे भी अब काफी समय हो गया है ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए खड़ा हो जाता है । विद्या फिर वहाँ से चली जाती है । सिद्धांत अपनी आँखों से ओझल हो जाने तक उसे देखता ही रहता है ।

अगले रोज़ सिद्धांत की माँ को फ़ोन करके विद्या की माँ कहती हैं कि "समधिन जी, तो बताइए कब करनी है शादी ?"
सिद्धांत की माँ खुश होकर कहती हैं "तो क्या विद्या ने जवाब दे दिया ?" विद्या की माँ कहती हैं "हाँ, उसी की इच्छा जानने के बाद मैंने आपको फ़ोन किया है ।"

सिद्धांत की माँ कहती हैं "ठीक है, मैं आज ही पंडित जी से शादी की तारीख निकलवाती हूँ और आप भी पंडित जी को दिखा लीजियेगा" विद्या की माँ कहती है "ठीक है बहन जी, जो भी जल्द से जल्द तारीख निकले उसमें चट मंगनी और पट ब्याह कर दते हैं, नही तो ना जाने कब इन बच्चों का दिमाग बदल जाए" और फिर दोनों हँसने लगती हैं ।

शाम को सिद्धांत के घर आने पर, सिद्धांत की माँ उसे बताती हैं कि वहाँ से जवाब आ गया है । सिद्धांत पूँछता है "क्या ?" वो बोलती हैं "और क्या आएगा, मुझे तो पहले से ही पता था । अब तो जल्द से जल्द तारीख निकलवानी पड़ेगी और एक लड्डू लाकर सिद्धांत के मुँह में रख देती हैं ।" ये बात सुनकर सिद्धांत की आँखों के सामने पुनः पुराने दिन आकर खड़े हो जाते हैं । पुरानी चाहत, पुराने दिन । सब कुछ आकर उसके दामन को थामने की कोशिश करने लगते हैं । सिद्धांत एक गहरी साँस लेता है । ढलते हुए सूरज को देखता है और अपने कमरे में चला जाता है ।


अपने कमरे मैं बैठा किसी सोच में डूबा था कि तभी कुछ सफ़हे नाचते से दिखते हैं । ये हवा का असर था या इतने बरस बाद उन अल्फाजों के दर्द को मिली राहत का असर । जो भी था लेकिन एक सुखद एहसास था । सिद्धांत उन सफहों को छूकर देखता है, अचानक से वो तस्वीर सामने आ जाती है जिसे हॉस्टल के दिनों में देखकर सिद्धांत खुश हो जाया करता था । आज फिर से सब कुछ सामने था । सिद्धांत तस्वीर को उठाकर देखता है, मुस्कुराता है और पुनः उसे डायरी में रखकर, डायरी को बंद कर देता है ।

कल का सूरज अपनी रौशनी के साथ कुछ गुनगुनी धूप लाने जा रहा था और बीच की ये रात तमाम खूबसूरत ख्वाब बुनने के लिये बाहें पसारे खड़ी थी... अंतिम भाग पढने के लिये यहाँ ज़िक्र(एक प्रेम कहानी)-अंतिम भाग पर क्लिक करें

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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)

कुछ रातें ऐसी होती हैं जो जिंदगी में अपना असर छोड़ जाती हैं । वो रात भले ही बीत जाए लेकिन उसके बाद उम्र भर कुछ अनकहे धुंधले-से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं । जो पानी के दाग की तरह वजूद के लिबास पर हमेशा के लिए नक्श हो जाते हैं ।

ऐसी ही उस रात जब सिद्धांत 2 बजे अपनी डायरी के चंद सफहों को देखता और उनके अल्फाजों पर अपनी उंगलियाँ रखता तो उसकी आँखें डबडबा जाती । एक एक अल्फाज़ उसने इन पिछले बरसों में दिल से लिखा था । आज भी जैसे हर अलफ़ाज़ अपनी एक अलग ही कहानी कहना चाहता है । फिर उस तस्वीर को निकालता है, बस यूँ ही उसे एकटक देखता है, अपनी भर आयीं आँखों के आँसू पौंछता है । तभी उसका दोस्त साकेत उसके कंधे पर पीछे से हाथ रखता है । "उसको बता क्यों नहीं देता कि तू उसे कितना चाहता है" कहते हुए साकेत उसके सामने आता है । सिद्धांत हँसते हुए फोटो को देखता है और कहता है कि "ऊपर वाला दिल क्यों देता है इंसान को ? न ये कमबख्त दिल होता और ना ही इस दिल की ये तमाम मुश्किलें होतीं ।"

साकेत कहता है " ताकि उसके दिये हुए दिल की वजह से इस धरती पर इंसानियत कायम रहे और तुझ जैसा दिल भी ना जाने उसने किस फुर्सत में बनाया होगा । जो हर रोज़ दर्द सहता है और उफ़ तक नहीं करता । उससे अपनी मोहब्बत का इज़हार क्यों नहीं कर देता । क्यों नहीं बता देता उसे कि तेरी रूह तक में उतर गयी है वो । अरे कोई जाने ना जाने पर मुझे एहसास है कि तेरे लिखे हुए वो अल्फाज़ भी दर्द से रो पड़ते होंगे । मैंने छूकर देखा है उन अल्फाजों को, बहुत आँसू बहाते हैं वो, जैसे कि अभी अपने दर्द की कहानी मुझसे कहना चाहते हों । अरे तूने उन सभी अल्फाजों को जमा कर रखा है । उन्हें आज़ाद क्यों नहीं कर देता ? कह क्यों नहीं देता उससे कि तू उसे कितना चाहता है । "

सिद्धांत डायरी में फोटो रखकर डायरी को बंद करते हुए गहरी साँस लेता है और कहता है " काश कि मैं जता सकता उसे कि मैं उसे कितना चाहता हूँ । मगर अफ़सोस ये मुमकिन नहीं । तू तो जानता है कि वो किसी और को चाहती है । " साकेत सिद्धांत की आँखों में देखते हुए कहता है " देख सिद्धांत मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि अगर तूने अपने दिल की बात उसे नहीं बतायी तो तू जिंदगी भर यूँ ही अन्दर ही अन्दर तड़पता रहेगा । कुछ एहसासों को शब्द देना बहुत जरूरी हो जाता है मेरे यार । नहीं तो वो ताउम्र वजूद के लिबास पर हमेशा चिपके रहते हैं । न तो जीने देते और न ही मरने देते । मोहब्बत को पा लेना ही मोहब्बत नहीं कहलाती । अरे जिसको तुमने चाहा अगर उसे उस चाहत, उस मोहब्बत का एहसास करा दिया, उसे अपने दिल का हाल बयाँ कर दिया तो उससे दिल को जो सुकूँ हासिल होगा, उससे बढ़कर कोई सुकूँ नहीं । मेरे दोस्त इन चन्द बचे हुए दिनों में तू अपने दिल का हाल बयाँ कर दे और सारी जिंदगी का सुकूँ हासिल कर ।"

सिद्धांत साकेत की बातें सुन अपनी आँखें बंद कर कुर्सी पर बैठा बैठा कुछ सोचने लगता है । साकेत, सिद्धांत का हाथ पकड़ अपने सर पर रखकर कहता है "तुझे मेरी कसम है कि तू इन चन्द बचे हुए दिनों में उसे अपने दिल का हाल बता देगा ।" सिद्धांत एक पल साकेत को देखता रहता है और कहता है "हाँ मैं कहूँगा ।"

अगले रोज़ कॉलेज के पुस्तकालय में किताबों की कतारों के दरमियाँ विद्या को पाकर सिद्धांत उसके पास जाकर पीछे से कहता है "विद्या मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ ।" विद्या, सिद्धांत की ओर मुड़कर कहती है "हाँ, कहो, क्या बात है ?"

"न-न यहाँ नहीं, यहाँ मुनासिब नहीं, क्या तू शाम को 6 बजे शहर के मंदिर के पास वाले रेस्टोरेंट पर मिल सकती हो ।" कहते हुए सिद्धांत विद्या के चेहरे को देखता है । विद्या, सिद्धांत से कहती है "ठीक है, मैं आ जाऊँगी और अगर ना आ सकी तो मैं फ़ोन कर दूंगी ।" सिद्धांत कहता है "पक्का ?"
"हाँ बाबा पक्का" कहती हुई विद्या चली जाती है ।

वो इंजीनियरिंग कॉलेज में सिद्धांत की विद्या से की हुई आखिरी बात थी । उस शाम न तो विद्या आयी और न ही उसका कोई फ़ोन आया । सिद्धांत इंतज़ार करता ही रहा, करता ही रहा । वो तो ना जाने कब तक इंतज़ार करता रहता । जब सुबह तक सिद्धांत हॉस्टल नहीं लौटा तो साकेत उसे वहाँ से जाकर ले आया । "पागल हो गया है क्या, सारी रात यहाँ रेस्टोरेंट के बाहर गुजार दी । अरे नहीं आयी तो नहीं आयी । अब ख़त्म कर ये किस्सा । गलती मेरी ही थी जो मैंने तुझे कसम दी ।" कहता हुआ साकेत हॉस्टल के उस कमरे में बैठा हुआ खुद को दोषी पा रहा था ।

उस रात ने ऐसा असर छोड़ा कि हमेशा जहन में बैठ गयी । अगले 5 साल तक उसका असर रहा । लेकिन कुछ किस्से आसानी से ख़त्म नहीं होते । शायद उन्हें अपना बाकी का हिस्सा जीना होता है । शायद उन्हें टुकड़ों में जिंदा रखकर ऊपर वाला कोई बात कहना चाहता है । ऐसा ही हुआ जब 5 साल बाद एक रोज़....
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ख़्वाहिशों की शाम ढलती है !!

>> 17 December 2009

अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों को लिख देने के दिन ।

ऐसे ही उन दिनों में कस्बाई सपने, जो सुबह सूरज के साथ उगते थे और ढलती हुई शामों के साथ छतों से कपड़ों की तरह उतार लिये जाते थे । कई आँखें थी आस पास जो मिल जाने पर शरमा कर झुक जाया करती थीं। कई आँखों में दबे-छुपे से प्रणय निवेदन तो कई आँखें जो भुलायी नहीं जा सकती । शराफत के दिन, नजाकत के दिन, मोहब्बत के दिन, आरजुओं के दिन ।

वो उसे बस यूँ ही एक रोज़ अपनी छुट्टियों के होने पर वापसी में घर जाते हुए उसी स्टेशन पर मिल गयी । तब ना यूँ किसी को 'फ्लर्ट' करने के तरीके आते थे और ना ही कोई किसी को 'इम्प्रेस' करने की कोशिश किया करता था । बहुत सादगी हुआ करती थी । एक दूजे के आमने सामने बैठे हुए भी कई घंटे बिना बात किये हुए बीत जाते थे और जो नज़रें मिल जाएँ तो अन्दर ही अन्दर अजीब सी हलचल सी मच जाया करती थी ।

अपर्णा, हाँ यही तो नाम बताया था उसने जब वो सिद्धार्थ को दूसरी बार फिर यूँ ही उसी रास्ते घर को जाने के लिये स्टेशन पर मिली थी । फिर हर बार ही उनमें कुछ ऐसी अनकही बातें सी हो गयीं थीं कि छुट्टियां होने पर वो स्टेशन पर एक दूजे का इंतज़ार किया करते और जब तक दूसरा ना आ जाता तब तक पहला ना जाता । बड़े सुहाने दिन थे, तब शायद वो रेलगाड़ियाँ भी दोस्त हुआ करती थीं । जो दोनों के साथ हो जाने तक वहीँ खड़ी रहती थीं।

अपर्णा को सिद्धार्थ से दो स्टेशन पहले ही उतरना होता था । तब आज की तरह उन कस्बाई रूहों में बाय बाय या टाटा-टाटा कहने का रिवाज नहीं हुआ करता था । बस सिद्धार्थ उसका सामान उसे उसके रेलगाड़ी से नीचे उतर जाने पर पकड़ा दिया करता था और अपर्णा "अच्छा" कहती हुई चली जाया करती थी ।

जब साथ हुआ करते तो उन्हें सब पता रहता था कि अब कौन सा स्टेशन आएगा या किस स्टेशन पर कौन सी खाने की चीज़ अच्छी मिलती है । दूसरे के बोलने से पहले ही कोई बोल पड़ता कि चलो ये खायें या फिर कभी कभी दोनों एक साथ ही बोल पड़ते, ये भी एक अजीब बात थी कि दोनों की जुबान से एक से ही लफ्ज़ निकलते थे ।

साथ वापस आते और फिर साथ ही दोबारा कॉलेज जाते हुए उस दूर बसे दूसरे शहर के लिये दिल में कुछ पैदा हो गया था । शायद ऐसा कुछ कि क्या ये नहीं हो सकता कि ये जिंदगी ऐसे ही सफ़र करते हुए कट जाए । कहने को तो ना ही अपर्णा ने कुछ कहा था और ना ही सिद्धार्थ ने कभी कुछ पूंछना चाहा ।

उन्हीं दिनों में जब "आई लव यू" कहने का रिवाज़ ना था । ना ही कोई अपने प्रेम का इजहार यूँ खुले रूप में करता था । मौन स्वीकृतियां ही प्रेम कहानी बन जाया करती थी । तब तो बस वही भोले भाले से प्रेम पत्र हुआ करते थे जो कि चाहने वालों के दिलों से निकली हुई आवाजें दूजे के दिल तक पहुँचाया करते थे ।

वो चेहरे के भाव, वो आँखें, वो ख़ामोशी और फिर रह रहकर कुछ बात कर लेने की आदत । सब कुछ तो याद हो गया था सिद्धार्थ को । एक दूजे की कई आदतें पता चल चुकी थीं, उन किये हुए सफरों के दौरान । दोनों ओर से मौन रहते हुए भी, कुछ भी ऐसा नहीं था कि जो कहने को बाकी था ।

तब उस रोज़ वो अकेली नहीं थी । एक बुजुर्ग चेहरा भी उस चेहरे के साथ था । साफ़ था, कि वो जाहिरी तौर पर उसके पिताजी ही थे । उस रोज़ रेलगाड़ी भी वही थी और सफ़र करने वाले भी वही, मगर आँखों में ख़ुशी नहीं थी । सवाल तो कभी उन आँखों ने पूंछे ही न थे । तब उस रोज़ की ख़ामोशी ने सब कुछ पहले ही बयाँ कर दिया था । ऐसी गहरी ख़ामोशी तो कभी न रही थी उस चेहरे पर जो कि सीधे दिल में उतर जाए और छा जाए एक खामोश पल बनकर ।

जब रेलगाड़ी से उतरते हुए उसने वो किताब उस बुजुर्ग चेहरे के सामने ही सिद्धार्थ को वापस की थी । तो बहुत कुछ तो बिना जाने ही उस दिल को आभास हो चला था ।

किताब का आखिरी सफ़हा जो कि अब अपर्णा की जुबाँ थी और जो कह रही थी । अब अगले बरस मैं नहीं आ सकूँगी, आगे की पढाई शायद अब मैं ना कर सकूँ । पिताजी अब यही चाहते हैं ।

उस आखिरी सफ़हे का साफ़ कहना था कि अब अपर्णा कभी फिर इस सफ़र पर नहीं आएगी और आगे की पढाई ना करने का मतलब था कि उसके पिताजी ने उसका रिश्ता कहीं तय कर दिया है । उस रोज़ वो अपर्णा का आखिरी सफ़र था जिसमें कब कौन सा स्टेशन गुज़र गया, ना ही तो अपर्णा ने जानना चाहा था और ना ही सिद्धार्थ ने ।

ट्रेन से उतर जब वो उस पुल पर पहुँची थी तब उसने पलट कर एक बार देखा था और जाते हुए अपना रुमाल गिराया था । सिद्धार्थ तब चाहते हुए भी वहाँ पहुँच वो रुमाल नहीं उठा सका था । रेलगाड़ी में उसका सामान रखा हुआ था । किताबें, पेन, कपड़े और वो आखिरी किताब भी जिसके आखिरी सफ़हे पर अपर्णा के लिखे हुए आखिरी लफ्ज़ थे । रेलगाड़ी चल दी थी और तब सिद्धार्थ के पास इतना वक़्त ना था कि वो दौड़कर जाकर उस रुमाल को उठा ले । उसकी आखिरी निशानी भी तो ना ले सका था सिद्धार्थ ।

इतने बरस बीत गये । पता नहीं कहाँ होगी अपर्णा । उस आखिरी रोज़ के आखिरी सफ़र में वो निशानी भी जाती रही ।





नोट : कहानी का विचार 'कितने पाकिस्तान' उपन्यास के चंद सफहों से लिया गया है ।

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