ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)-अंतिम भाग

>> 22 December 2009

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कहते हैं कि ख्वाहिशों का कोई छोर नहीं होता । कहाँ शुरू होती हैं और कहाँ ख़त्म ये पता ही नहीं चलता । कुछ ख्वाहिशें तो ऐसी होती हैं कि खुद ख्वाहिशों को ख्वाहिश करने वाले से प्यार हो जाता होगा । सोचती होंगी कि कितना नेक बन्दा है जो दिल से इतनी मासूम सी ख्वाहिश करता है ।

कुछ रोज़ बाद जब सब कुछ तय हो गया कि कब लगन है और कब शादी होनी है तो सिद्धांत अपने दोस्त साकेत को फ़ोन करके बताता है कि उसकी शादी तय हो गयी है और उसे जरूर आना है । जब साकेत को पता चलता है कि लड़की कोई और नहीं विद्या है तो पहले तो वो बिलकुल हतप्रद रह जाता है फिर कहता है "तूने सब कुछ सोच समझ लिया है न कि तू क्या करने जा रहा है । तू खुद अपनी मर्ज़ी से ही शादी कर रहा है ना ।" इधर से सिद्धांत फ़ोन पर साकेत को अपनी बात पूरी तरह समझा देता है और उसे शादी के दिन उपस्थित रहने के लिये वादा लेता है ।

शादी का दिन नजदीक आने से पहले के सभी दिन एक एक करके बीतते जाते और हर रोज़ कुछ न कुछ आभास करा जाते । इन बीते हुए दिनों में कभी ऐसा दिन नहीं आया कि सिद्धांत और विद्या की बात हुई हो । कभी सिद्धांत सोचता भी बात करने की लेकिन यह सोचकर रह जाता कि पता नहीं कहीं विद्या असहज महसूस ना करे और अगर विद्या बात करना चाहेगी तो फ़ोन कर ही लेगी । दिन थे कि बीते तो बीतते ही गये और अपने साथ लेते गये तमाम सवाल, तमाम यादें, तमाम एहसास जो सिद्धांत ने विद्या के बारे में सोचकर गुजारे थे ।

उधर विद्या कभी सोचती कि मैं सिद्धांत को फ़ोन करूँ कि ना करूँ । तो क्या हुआ जो हमने शादी से पहले बात ना की । हमारे माता-पिता भी ने तो शादी से पहले बात नहीं की थी । जितना किसी को जानना है वो शादी के बाद भी जाना जा सकता है । अब तो शादी हो ही रही है । जब किसी को जानकर भी कोई धोखा देकर चला जाता है तो फिर जान-पहचान से भी क्या हासिल ?

अंततः वह दिन आ ही जाता है जब मंडप में बैठकर पंडित सिद्धांत को विद्या के गले में मंगलसूत्र पहना देने के लिये कहते है । जब मंडप में अग्नि के सात फेरे लेते हुए दोनों आगे पीछे एक दूजे से जुड़े हुए चल रहे हैं । जब पंडित जी कहते हैं कि विवाह संपन्न हुआ और जब सभी बड़े-बुजुर्ग अपनी अपनी शुभकामनाएँ देते हुए फूलों की बारिश से उन दोनों का नये जीवन में स्वागत करते हैं ।

विद्या को अपने घर में पाकर सिद्धांत की माँ ख़ुशी से भावविभोर हो जाती हैं । घर के मुख्य दरवाजे पर ही दोनों की बालाएं लेती हैं और गृहप्रवेश की रस्म अदायगी के बाद विद्या को नये सजे हुए कमरे में ले जाया जाता है । एकपल तो सिद्धांत की माँ को विश्वास ही नहीं होता कि उसके बेटे की शादी हो गयी है और इतनी खूबसूरत चाँद सी बहू घर आ गयी है । उस रोज़ सिद्धांत की माँ के भावविभोर होकर आँखों से आंसू निकल आते हैं और वो विद्या से कहती हैं "बेटी मैं बहुत खुशनसीब हूँ जो तुम मेरे घर बहू बन के आयी । मेरे घर में एक बेटी की कमी थी जो तुमने आकर पूरी कर दी । मुझे हमेशा अपनी माँ ही समझना और देखना अगर कभी बेटी समझ कर गुस्सा करूँ तो बुरा मत मानना । विद्या भी उनकी डबडबाई आँखों को देख उनके गले लग जाती है और कहती है "खुशनसीब तो मैं हूँ माँ जो एक माँ को छोड़कर आयी तो मुझे यहाँ दूसरी माँ मिल गयी ।"

तभी सिद्धांत के पिताजी बाहर से मजाक के लहजे में आवाज देते हैं "अपनी बहू के आ जाने के बाद, क्या इस बूढ़े की भी सुनोगी ।" सिद्धांत की माँ कहती है "खबरदार जो खुद को बूढा कहा तो । तो क्या हुआ जो बेटे की शादी कर ली । अभी तो अच्छे अच्छे तुम्हारे आगे कुछ नहीं ।" और हंसती हुई चली जाती हैं । विद्या दोनों की बातें सुनकर मुस्कुरा उठती है । यहाँ अपने माँ-बाप की ही तरह के इंसान पाकर वो एक पल को अपने घर को भूल जाती है ।

सूरज के ढलने के साथ ही रात करवट बदलती है और अपनी चाँदनी बिखेर देती है । सिद्धांत को उसके कमरे में भेजा जाता है । दरवाजे पर क़दमों की आहट पाकर बिस्तर पर बैठी विद्या कुछ सकुचा सी जाती । सिद्धांत कमरे में प्रवेश करता है तो देखता है कि विद्या घूँघट डाले हुए बैठी है । साथ ही ये भी देखता है कि विद्या बहुत ही असहज महसूस कर रही है । ख़ामोशी तोड़ने के लिये सिद्धांत खड़े हुए ही बोलता है "ये घूँघट क्यों डाला हुआ है तुमने ? मैं तो तुम्हें बहुत पहले से देखता आ रहा हूँ ।" विद्या घूँघट के अन्दर से ही कहती है " वो माँ ने कहा है कि ये रस्म है और वो ही घूँघट डाल गयी हैं, कह रही थी कि आप आकर घूँघट उठाओगे तो रस्म पूरी होगी ।"

सिद्धांत हँसता है "अच्छा, बड़े रस्मों-रिवाज माने जा रहे हैं । क्या बात है । तो माँ का कहना माना जा रहा है । ठीक है लीजिये घूँघट उठा देते हैं ।" कहता हुआ सिद्धांत विद्या का घूँघट उठा देता है और कहता है "शुभान-अल्लाह, आज चाँद सीधे मेरे कमरे में निकल आया है, देखूँ तो कहीं बाहर काली रात तो नहीं ।" विद्या इस बात पर थोडा मुस्कुरा सी जाती है । साथ ही साथ विद्या का दिमाग तमाम सवालों में उलझा हुआ था । कभी इस उधेड़बुन में वो अपने पैरों की उँगलियों को सिकोड़ती तो कभी अपनी गर्दन नीचे कर लेती । सिद्धांत विद्या की उधेड़बुन को भाँप लेता है और उठता हुआ कहता है "तुम्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं विद्या, ये एक रस्म अदायगी थी जो मैंने पूरी कर दी । इसके आगे में जानता हूँ कि मेरी अभी सीमा कहाँ तक है । मैं जानता हूँ कि मैं भी चाहूँ तो और पुरुषों की तरह इस रात उसी तरह का बर्ताव कर सकता हूँ लेकिन मैं वैसा इंसान नहीं हूँ । दो जिस्मों के मिलन से ज्यादा पाक होता है दो आत्माओं का मिलन और जिस दिन तुम अपनी आत्मा से मुझे कबूल कर लोगी उस रोज़ तुम सहज महसूस करोगी । तब मुझे न तो कुछ कहने की जरूरत पड़ेगी और ना ही कुछ करने की । सब कुछ सहज रूप से हो जाएगा ।"

सिद्धांत सामने रखी हुई कुर्सी पर बैठ जाता है और उपहार में मिले कार्ड देखने लगता है । तभी उसके हाथ से बिस्तर पर छूटी हुई दो टिकटों को उठाकर विद्या देखती है और कहती है " ये टिकट ?" सिद्धांत कहता है "हाँ वो साकेत ने ऊटी के दो हनीमून टिकट दिये हैं और वहाँ होटल में ठहरने का एक हफ्ते का इंतजाम किया है । मैंने उसे मना भी किया लेकिन वो माना ही नहीं । विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत बोला "मैंने सोचा पता नहीं तुम शायद न जाना चाहो ।" विद्या कुछ नहीं कहती और खामोश हो जाती है । सिद्धांत कहता है "चलना चाहोगी ?" विद्या कहती है "अब जब टिकट हैं ही तो फिर मना करने से क्या फायदा । आपके दोस्त का नुकसान ही होगा ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "ये भी खूब कही तुमने ।"

फिर दोनों के बीच ख़ामोशी छा जाती है । सिद्धांत रखे हुए कार्ड देखने लगता है और विद्या किसी सोच में चली जाती है । थोड़ी देर बाद विद्या कहती है "एक बात कहूँ " सिद्धांत कार्ड देखते हुए ही कहता है "ह्म्म्म, कहो ।"
विद्या कहती है "मैं अपने अतीत के बारे में सब कह देना चाहती हूँ ।" सिद्धांत कहता है "मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि मुझे तुम्हारे अतीत से कोई जान पहचान नहीं करनी और उसे जानकर होगा क्या ?" विद्या कहती है "अगर मैं कहूँ कि अब मैं ठीक झरने के गिरने के बाद से बनी हुई पवित्र नदी नहीं हूँ तो ?" सिद्धांत कार्ड को रखता है और विद्या की ओर देखकर कहता है "पवित्रता और अपवित्रता की परिभाषा किसी की वर्जिनिटी से नहीं दी जा सकती और ना ही मैं वो पुरुष हूँ जो ठीक झरने के गिरने के बाद से बनी हुई नदी में नहाने की चाह रखता हो । मैं तो कहूँगा कि पवित्र नदी की चाह रखने वाले और उसमें स्नान करने वाले स्वंय अपनी पवित्रता का आंकलन करना क्यों भूल जाते हैं ?क्यों पवित्र नदी में अपनी अपवित्रता धोकर पवित्र होना चाहते हैं स्नान करने वाले । चिंता मत करो मुझे तुम्हारी वर्जिनिटी से तुम्हारी पवित्रता का आंकलन नहीं करना । तुम अगर आत्मा से पवित्र हो तो ही तुम मेरे लिये पवित्र कहलोगी ।" विद्या सिद्धांत की ओर देखती ही रह जाती है ।

सिद्धांत कहता है "अब तुम सो जाओ थक गयी होगी ।" विद्या लेट जाती है और कुछ सोचती सी, किसी उधेड़बुन में कब सो जाती है उसे पता ही नहीं चलता । जब सुबह के समय उसकी आँख खुलती है तो देखती है कि सिद्धांत कुर्सी पर बैठा हुआ ही सो गया है । विद्या उठकर सिद्धांत के बाजू पर हाथ रखती है और कहती है "सिद्धांत आप सारी रात यहीं कुर्सी पर सोते रहे । वहाँ बिस्तर पर सो जाइए ।" सिद्धांत उठकर बिस्तर पर लेट जाता है और विद्या कमरे के बाहर चली जाती है । करीब दो घंटे बाद विद्या चाय लेकर आती है और सिद्धांत को जगाती है "चाय पी लीजिए" सिद्धांत उठता है और देखता है कि विद्या नहाने के बाद गीले बालों में उसके सामने चाय का प्याला लेकर खड़ी हुई है । एक भीनी-भीनी खुशबू से पूरा कमरा भर जाता है । विद्या खिड़की का पर्दा हटाती है तो सूरज खिलखिलाता हुआ मुस्कुराता है । सिद्धांत चाय के प्याले को होठों तक ले जाते हुए सूरज को देखता है तो उसे एक पल लगता है कि जैसे सूरज ने मुस्कुराते हुए एक आँख मारी हो ।

सिद्धांत चाय ख़त्म हो जाने के बाद उठता है और तौलिया उठाकर नहाने चल देता है । नहा लेने के बाद अपने गीले बाल झाड़ता हुआ कमरे में आता है और विद्या से पूँछता है "तुम्हारी कब तक की छुट्टी है ?" विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत तौलिया रखते हुए कहता है "वो ऊटी वाला किस्सा याद है या भूल गयीं ?" विद्या कहती है "ओह, हाँ, अभी 10 दिन की छुट्टी और है ।" सिद्धांत कहता है "तब ठीक है । वैसे हमें कल ही निकलना होगा ।"

अगले रोज़ सिद्धांत और विद्या हवाई जहाज से सफ़र कर ऊटी की धरती पर कदम रख देते हैं । वहाँ के मनमोहक दृश्य, खूबसूरत आसमान, ताज़गी और खुशनुमा माहौल दिल में बस जाता है । होटल मैं पहुँच जब विद्या खिड़की खोलती है तो उसके सामने दूर तक फैले बादल ही बादल दिखाई दे रहे थे । सफ़ेद, ऐसे जैसे आच्छादित होकर अपने होने का एहसास करा रहे हों । विद्या उन्हें देखकर खुश हो जाती है । सिद्धांत कमरे में सामान रखकर बैठ जाता है । कुछ देर में कमरे का रख रखाव करने वाला नौकर आता है और कहता है "सर कुछ चाहिए ?" सिद्धांत विद्या की ओर देखकर कहता है "मेरे लिये एक कॉफी और मेमसाहब से पूँछो ।" विद्या कहती है "मैं भी कॉफी ही लूंगी ।"

थोड़ी देर में कॉफी आ जाती है । विद्या खिड़की के पास खड़े हुए ही कॉफी पीने लगती है और कभी बादलों को देखती है तो कभी दूर तक फैली हरियाली को । सिद्धांत कहता है "अभी कुछ घंटे में हमे बाहर घुमाने ले जाने वाले आएगा । तब तक चाहो तो आराम कर लो । मैं नहा लेता हूँ । तुम भी चाहो तो नहा लेना ।" विद्या कहती है "ठीक है ।"

थोड़ी देर में ही सिद्धांत नहा कर बाहर आ जाता है । विद्या नहाने चली जाती है और जब उन भीगे बालों और नन्ही नहीं बूंदों से भीगे हुए सूट को पहने बाहर निकलती है तो सिद्धांत की नज़र ना चाहते हुए भी उस पर टिकी ही रह जाती है । विद्या की नज़रें जब सिद्धांत को देखती हैं तो सिद्धांत कुछ झेंप सा जाता है और खिड़की के बाहर की ओर देखने लगता है । विद्या आईने के सामने खड़ी होकर अपने बाल सुखाने लग जाती है । सिद्धांत खिड़की के बाहर दूर तक फैले बादलों को देखकर कहता है "कितने खूबसूरत बादल है ? है ना" विद्या जवाब देती है "ह्म्म्म"

फिर सिद्धांत विद्या की ओर देखता है और कहता है "तुम्हें पता है कि बादल इतने सफ़ेद क्यों दिखाई देते हैं ? उजले उजले से, दूर तक फैले से ।" विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत कहता है "क्योंकि ये बहुत नेक दिल होते हैं, स्वार्थी नहीं होते और हमेशा देते हैं, कभी किसी से कुछ नहीं माँगते । अपने को फना कर देते हैं और इस प्यासी जमीन को अपना सर्वस्व दे देते हैं ।" विद्या सिद्धांत को एकपल देखकर मुस्कुरा जाती है और अपने बाल बाँध लेती है ।

सिद्धांत कहता है "कुछ खाना है तो नीचे चलते हैं या चाहो तो यहीं कमरे में मँगा लेते हैं ।" विद्या कहती है "प्लीज यहीं मँगा लो । वैसे भी बहुत थकान हो गयी है ।" सिद्धांत फ़ोन करके खाना लाने को कह देता है । दोनों खाना खाते हैं और खाना खाने के बाद सिद्धांत टीवी के चैनल बदल ही रहा था तभी उन्हें बाहर घुमाने ले जाने वाला दरवाजे पर दस्तक देता है । सिद्धांत उसे नीचे इंतज़ार करने के लिये कहता है और कुछ देर बाद विद्या को साथ लेकर पर्यटन के लिये निकल जाते हैं ।

दो-तीन रोज़ ऐसे ही गुजर गये । दिन बाहर घूमने में निकल जाता और रात उस बिस्तर पर एक दूसरे से दूरी बनाकर सोने में । उस चौथी शाम जब सिद्धांत किताब पढने में तल्लीन था और विद्या टीवी के चैनल बदलने में तो विद्या अचानक से कहती है "सिद्धांत, आप तो खूबसूरत भी हैं, दिल के भी नेक हैं और इतनी अच्छी बातें भी कर लेते हैं । क्या आपको कभी किसी से प्यार नहीं हुआ ?" सिद्धांत जो किताब में खोया हुआ था । विद्या के इस सवाल ने उसे अन्दर तक झकझोर कर रख दिया । सिद्धांत मन ही मन सोचने लगा कि विद्या को तो कुछ पता ही नहीं या कहीं ऐसा तो नहीं कि इसे पता हो लेकिन ये मेरे मुँह से सुनना चाहती हो ।

सिद्धांत कहता है "नहीं मैंने कभी किसी को नहीं चाहा" विद्या कहती है "पर गर्ल्स हॉस्टल में तो तमाम लडकियां आपके गुण गाती थीं। आपको पसंद करने वाली तमाम थीं ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "अच्छा, मुझे तो पता ही नहीं था । क्या वाकई ऐसा था ?" विद्या कहती है "हाँ, क्यों किसी ने आपके सामने अपने प्यार का इजहार नहीं किया ।" सिद्धांत कहता है "हाय री किस्मत" और फिर दोनों हँसने लगते हैं ।

अगले दो रोज़ भी बाहर घूमने में निकल जाते हैं जिसमें वो चर्च जाते हैं, कुछ कपडे खरीदते हैं, कई बार सिद्धांत विद्या से बार बार पूँछ पूँछ कर खाने की चीज़ें लेता है । विद्या का पूरा ख्याल रखता है और विद्या भी सिद्धांत के साथ घुलने मिलने सी लगती है । उस रात बिस्तर पर दोनों के बीच उतनी ही दूरियां थी जितनी कि पहले हुआ करती थीं । रात को सोते हुए ना जाने कैसे सिद्धांत का एक हाथ करवट लेते हुए विद्या के गले के नीचे पहुँच गया । जिसका ना तो सिद्धांत को होश था और ना ही उसका ऐसा कोई उसका इरादा था । अचानक से विद्या की नींद खुल जाती है और जब देखती है कि सिद्धांत का हाथ उसके सीने पर रखा हुआ है तो वो सिद्धांत का हाथ झटक कर फैंकती है । सिद्धांत की नींद खुल जाती है । विद्या उठ कर बैठ जाती है । सिद्धांत कहता है "क्या हुआ ? कैसे बैठी हो ?"

विद्या कहती है "सब मर्द एक जैसे ही होते हैं । कुछ बातें तो अच्छी अच्छी करना जानते हैं लेकिन अंततः चाहते वो भी वही हैं । स्त्री को भोगना ।" विद्या की बात सुनकर सिद्धांत को समझने में ज़रा भी देर नहीं लगती कि उसने उसका हाथ क्यों झटका था । सिद्धांत कहता है "सॉरी, मुझे कुछ पता नहीं चला और ना ही मेरा ऐसा कोई इरादा था । " विद्या कहती है "मैंने आप से कुछ हँस बोलकर बात क्या कर ली । आपसे घुल मिल क्या गयी । आपने सोचा कि चलो अब सब आसान हो गया ।" सिद्धांत बोला "क्या कहती जा रही हो तब से । मैंने बोला ना सॉरी, मैंने कुछ जान बूझ कर नहीं किया ।" विद्या कहती है "जानते हो मेरा पिछला अतीत क्या है ? मेरा पिछला अतीत यही था कि वो भी मुझे भोगना चाहता था । फर्क सिर्फ इतना है कि वो मुझे शादी से पहले ही प्यार का वास्ता देकर भोगना चाहता था । इसी लिये जब मैंने उसे मना किया तो उसने मुझसे रिश्ता ख़त्म कर कहीं और शादी कर ली ।" सिद्धांत बोला "देखो विद्या, मैं मानता हूँ कि मुझसे अनजाने में गलती हुई है । उसके लिये मैं माफ़ी चाहता हूँ ।" विद्या कहती है "मैं कल ही घर वापस जाना चाहती हूँ ।" सिद्धांत कहता है "ठीक है, जैसा तुम चाहो ।"

अगले रोज़ सिद्धांत विद्या को लेकर वापस अपने घर आ जाता है । सिद्धांत की माँ दोनों से बारी बारी पूंछती है कि वो दोनों दो दिन पहले कैसे आ गये । कोई बात है क्या ? मगर दोनों ने यही कहा कि "बस जी भर गया था और आपकी याद आ रही थी इसीलिए चले आये"

अगले रोज़ विद्या अपने माता-पिता के घर चली जाती है । वहाँ जाने से पहले सिद्धांत की माँ कहती है कि अपनी नौकरी पर जाने से पहले यहाँ होकर ही जाना और देख जल्द से जल्द कोशिश कर कि तेरा तबादला भी यहीं हो जाए, इसी शहर में ।" विद्या जाते हुए कहती है "ठीक है माँ"

सिद्धांत अपने कॉलेज के काम के सिलसिले में कुछ रोज़ के लिए दूसरे शहर चला जाता है । माँ के कई बार पूँछने पर भी वो माँ को कुछ नहीं बताता कि उन दोनों के बीच कुछ गड़बड़ है । उधर सिद्धांत के चले जाने और विद्या की छुट्टियाँ ख़त्म होने के दौरान विद्या अपनी ससुराल, माँ से मिलने आती है । उसे देखकर माँ बहुत खुश होती हैं ।
माँ कहती है कि "अब आज यहीं रुक जाना विद्या । कल सुबह यहीं से चली जाना । विद्या चाहते हुए भी माँ की बात नहीं टाल पाती और वहीँ रुक जाती है ।

रात के 2 बजे विद्या किसी उधेड़बुन में थी, कुछ सोचती सी, उसे नींद नहीं आ रही थी । उसे ऊटी की सिद्धांत के साथ की हुई बातें रह रह कर याद आ रही थीं । वो हंसी की गूँज, वो आपस में खेली अन्ताक्षरी, वो साथ घूमना और उसकी खुद की पसंद का खाना खाना और फिर अंततः उस रात का अंतिम दृश्य जो सामने आता तो विद्या परेशान हो उठती । तभी वो बिस्तर से उठ कमरे में टहलने लगती है । विद्या की नज़र उस डायरी पर जाती है । विद्या उसे उठकर पढने लगती है । एक एक अल्फाज़ , एक-एक पंक्ति पढ़ डालती है । हर अल्फाज़ अपनी कहानी कह रहा था । उस पहले रोज़ से लेकर जब सिद्धांत ने पहली बार विद्या को देखा था, उस आखिरी रोज़ तक जब सिद्धांत ने सारी रात उस रेस्टोरेंट के बाहर इतंजार में गुजारी थी ।

विद्या बहुत रोती है । बहुत देर तक रो लेने के बाद बार बार उसके दिल में यही ख़याल आता कि मैंने उस इंसान का दिल दुखाया जिसने मुझे चाहने के अलावा अपनी जिंदगी में कुछ नहीं किया । कभी उसने दर्द से उफ़ तक नहीं किया । मैं उस आखिरी रोज़ भी उससे ना मिल सकी थी जब अचानक उसकी रूममेट की तबियत खराब हो गयी थी और ऊटी की आखिरी रोज़ का दिया हुआ दर्द भी तो कुछ कम नहीं । वो जानती थी कि सिद्धांत चाहता तो दूसरे पतियों की तरह अपनी पत्नी को हासिल कर सकता था लेकिन वो कितना नेक और शरीफ है । हर पल विद्या का सिद्धांत के बारे में ही सोचते हुए कट जाता है ।

सुबह विद्या खुद को कुर्सी पर पाती है । फ़ोन की घंटी बज रही थी । विद्या ने सोचा कि शायद सिद्धांत का फ़ोन हो । अगर उसका फ़ोन हुआ तो वो उससे माफ़ी माँगेगी । लेकिन जब फ़ोन उठाया तो उधर से साकेत की आवाज़ थी "कैसी हो विद्या ? तुम लोग इतनी जल्दी वहाँ से क्यों आ गये ? मैंने सिद्धांत से भी पूंछा उसने कुछ नहीं बताया । क्या बात है ? कोई अनबन तो नहीं हो गयी " और फिर बातों ही बातों में साकेत ने विद्या को सिद्धांत के दिल का सारा हाल कह सुनाया ।

अब विद्या खामोश चुपचाप माँ के पास जाती है और कहती है "माँ मैं अभी नहीं जाऊँगी कुछ रोज़ बाद जाऊँगी, जब सिद्धांत आ जायेंगे तब ।" सिद्धांत की माँ कहती है "जैसी तेरी मर्ज़ी बेटा, मुझे तो ख़ुशी मिलेगी जो तुम और दिन रुकोगी तो" विद्या फ़ोन करके अपने कार्यालय वालों से और छुट्टी माँग लेती है ।

इन चन्द दिनों मैं हर पल विद्या सिद्धांत के फ़ोन का इंतज़ार करती लेकिन सिद्धांत का कोई फ़ोन नहीं आया । विद्या में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे फ़ोन कर ले । विद्या तो बस इंतज़ार कर रही थी उस घडी का जब सिद्धांत आएगा और विद्या उससे माफ़ी माँगेगी और उसके सीने से लग कर जी भर कर रो लेगी । हर दिन आता और अपने साथ इंतज़ार की घड़ियाँ लेकर आता । अंततः 1 सप्ताह बाद सूरज के ढलने के साथ ही सिद्धांत के कदम घर के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।

रात का पहर अपने पाँव पसार चुका था और चाँद भी मानो जैसे मुस्कुरा रहा हो । सिद्धांत को उसकी माँ नहीं बताती कि विद्या अभी मौजूद है और अपने कमरे में ही है । विद्या ने माँ से मना कर रखा था और विद्या के कहने के अनुसार माँ ने सिद्धांत को कुछ नहीं कहा । सिद्धांत अपने कमरे में प्रवेश करता है तो सामने सजी-सँवरी विद्या को पाता है । सिद्धांत कहता है "विद्या तुम ? तुम अभी तक गयी नहीं ?" विद्या बिना कुछ बोले सिद्धांत के सीने से लग जाती है और रोने लगती है । रोते रोते कहती है "मुझे माफ़ कर दो सिद्धांत । मैं नहीं जानती थी कि आप मुझसे इतनी मोहब्बत करते हो । मुझे इतना चाहते हो । मैंने तो तब जाना जब आपकी वो डायरी पढ़ी और जब साकेत से बात हुई ।" सिद्धांत विद्या की पीठ पर हाथ रखता है और कहता है "रोती क्यों हो पगली ? अब तो मैं आ गया हूँ ना और मुझे तुमसे कोई गिला-शिकवा नहीं है ।" विद्या कहती है "नहीं मुझसे गलती हुई है । जब तक मुझे माफ़ नहीं करोगे तब तक मैं यूँ ही रोती रहूंगी ।" सिद्धांत कहता है "अच्छा बाबा, माफ़ किया अब खुश । अब तो चुप हो जाओ ।" विद्या हँस देती है और उसके सीने से कसकर अपनी बाहों को बाँध लेती है । सिद्धांत नियंत्रण सा खो देता है और विद्या को लेकर धडाम से बिस्तर पर गिरता है । विद्या सिद्धांत के होठों पर अपने होठ रख देती है ।

तब कमरे की सारी औपचारिक सुगंध कहीं और उड़ गयी थी । अब थी तो बस साँसों के उठने और गिरने की लय और एक दूजे के बदन की महक । शरीर अपनी कुदरती महकों के साथ, नदियों की तरह उमड़ कर एक होते हुए बहने लगे थे ।

14 comments:

Udan Tashtari 23 December 2009 at 04:17  

पहले दोनों पढ़ लिए थे..इसी का इन्तजार था..जाने क्या बात है, इसे पढ़ने के बाद अब तीनों को एक साथ फिर पढ़ने का मन है......

वही करते हैं अब!!

गौरव मिश्रा 23 December 2009 at 04:27  

Pehle part se shuru kiya aur pata nahi kaise apne aap links pr click krte krte last part tk padh gaya...waqt to jaise ruk gaya tha...aur is ruke waqt ke chakkar me office se ghar aane me 1 hr. late ho gaya...bahut sundar kahaani...

वन्दना 23 December 2009 at 12:55  

ek saans mein poori kahani padh gayi aur prem ke is roop mein kho gayi.........bahut hi khoobsoorti se bandhe rakha .......shuru se aakhir tak..........tarif ke liye shabd bahut hi kam hain..........abhi to isi kahani mein dubey huye hain.

रश्मि प्रभा... 23 December 2009 at 14:09  

aaj phir se pooree kahani padhne ka anand liya maine

ज्ञानदत्त G.D. Pandey 23 December 2009 at 17:27  

एक अच्छी प्रेम कथा अन्तत: एक अच्छे बोर्डरूम नेगोशियेशन की दास्तान से अलग नहीं लगती! सही विन-विन सिचयुयेशन!

रंजना [रंजू भाटिया] 23 December 2009 at 17:48  

पसंद आई आपकी यह कहानी .सारे अंक अब एक साथ फिर से पढ़े अच्छा लिखी है आपने शुक्रिया

निर्मला कपिला 23 December 2009 at 19:54  

अज पूरी कहानी फिर से पढी बहुत अच्छी लगी। आपकी हर रचना सकारात्मक भाव लिये होती है जो रचना के लिये जरूरी भी है देर आये दुरुस्त आये । धन्यवाद

दिगम्बर नासवा 24 December 2009 at 15:51  

अनिल जी ........... लाजवाब प्रेम कहानी का बेहतरीन अंत ......... मज़ा आ गया ...... कहानी एक ही साँस में पढ़ गया ......... खो गया ...... फिर अब कॉमेंट लिखना भी याद आया .......... बस कतल कर दिया आपने .......

अनिल कान्त : 24 December 2009 at 15:58  

आप सभी ने अपना बहूमूल्य समय इस लम्बी कहानी को पढ़ने में दिया, उसके लिए आप सभी का शुक्रिया

गौतम राजरिशी 24 December 2009 at 19:15  

उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़....सिद्धांत तो बिल्कुल देखाभाला...अपने जैसा ही लगा।

कमाल कर दिया अनिल मियां। अभी पढ़ा तीनों पार्ट एक साथ....

Apanatva 28 December 2009 at 09:55  

mujhe happy ending walee kahaniya hee pasand aatee hai .isliye mazaa aa gaya aapakee kahanee pad kar.

अंतर्मन | Inner Voice 29 December 2009 at 02:29  

मज़ा आ गया! बहुत अच्छा लिखते हो। अगली कहानी का इंतज़ार है!

satish ravi 29 March 2010 at 06:26  

dost bahut hi khubsurat taike se kahani likhi hui hai,,,,tarif ke kabil ho aap...

MD. SHAMIM 23 May 2012 at 23:12  

ANIL JI,
AAP BAHUT ACHCHA LIKHTE HAIN.
DIL CHHOO LETI HAI AAPKI POST.

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