दिल आज भी तुम्हारी मोहब्बत की बारिश में भीगा हुआ है मेरी जाना.

>> 07 July 2015

वो यही कोई रूमानियत से लबालब बारिशों भरी दोपहर थी. यहाँ वहाँ अपने अपने बस्तों को अपने नाज़ुक कन्धों पर लादे बच्चे यहाँ वहां भर आये पानी पर छपा छप खेलने में उत्साहित से दिख जाते. पेड़ धुले धुले गर्मी से राहत की साँस भरते मुस्कुराते हुए किनारों पर खड़े हर आने जाने वालों पर चिढातेे से पानी की बौछारें फैंक दिया करते.
कहीं कोई जल्दी नज़र नहीं आती थी. यूँ लगता कि अभी अभी जो सुबह बीती है वो भी कह रही हो कि मुझे भी अपनी इस ठंडक में शामिल कर लो.
सवारियां ऑटो में लदी हुईं न जाने कहाँ से कहाँ को जाने में बेचैनी दिखा रहीं थीं. उसी किसी खूबसूरत क्षणों में वो भीगता रिक्शा न जाने कहाँ से कहीं को न जाने के लिए चलते चला जा रहा था. तब मैंने ही हाथ दिया था शायद उसको. हाँ मैंने ही दिया होगा. तब तुमने ही कहा था कि थोडा रुकते हैं. लेकिन तुम्हें बारिशें कितनी तो भाती हैं ये खबर थी मुझको.
बारिशों ने तब उस मौसम की पहली आमद दी थी. बिना छतरी वाला रिक्शा था और हम भीग जाना चाहते थे. तब तुमने कहा था कि कोई क्या कहेगा कि देखो तो भीग जाने के लिए रिक्शे पर बैठे हैं. और मैं मुस्कुराया भर था.
बारिश की नन्हीं नन्हीं बूँदें हमारे चेहरों को आ हमें शायद ये बता रही थीं कि अभी हम जीना भूले नहीं हैं. उन्हीं किन्हीं क्षणों में तुम्हारे गाल को चूमा था मैंने. और तुम शरमा कर रह गयीं थीं. तब तुमने कहा था कि किसी की भी फ़िक्र नहीं करते. और मैंने कहा था की सामने फिक्र करने वाला मुझे कोई आता दिखाई नहीं पड़ता. तब तुम मुस्कुराई थीं और हँसते हुए कहा था कि और पीछे. मैं पीछे आती स्कूल के बच्चों की साइकिल की कतार को देख कितना हँसा था.
उस भीगते दिन में मैंने कहा था कि मैं इस शहर में यूँ ही बेपरवाह अपनी सारी ज़िन्दगी तुम्हारे साथ इसी तरह रिक्शे पर बैठ घूमना चाहता हूँ. उस रोज़ उस बारिश ने भी उस खुदा से हमारे लिए दुआ माँगी होगी. और शायद उन रिक्शे वाली भैया ने कहा हो आमीन.
दिल आज भी तुम्हारी मोहब्बत की बारिश में भीगा हुआ है मेरी जाना.

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साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

उन ऊँघती शामों को जो धीमे धीमे अँधेरे की गिरफ़्त में चले जाने को हुआ करतीं किन्तु कहीं से भी उनकी उन क्षणों की आभा से लगता बिल्कुल नहीं था. सूरज गुलाबी हुआ करता और रात की देहरी पर टंगा हुआ सा जान पड़ता था. हाँ तमाम किस्म के पंक्षी अवश्य ही अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर दिखते. जैसे एक मजदूर सुबह से शाम तक की दिहाड़ी कर घर को लौट जाना चाहता हो.
वो किन्हीं दो बड़े शहरों के मध्य नाम के लिए बना दिया गया स्टेशन था. ऐसे जैसे कि सुस्ताने के लिए कहीं तपती दोपहरों में बीच राह में कोई झोंपड़ी या कोई पेड़ों का कोई छोटा बागीचा. जहाँ ठहरने वालों को कहीं से कहीं को नहीं जाना होता. हाँ राहगीर को वे सुस्ताने के लिए, ज़रा दम भरने के लिए सुकून भरी छाँव अवश्य देते हैं. उसी तरह का दूर से दिख जाने वाला वह स्टेशन मुस्कुराता सा खड़ा रहता. बड़ी गाड़ियाँ वहां जब तब सिग्नल पास होने के लिए सुस्ताती दिख जाती थीं. और छोटी गाड़ियों के लिए वहां बैठे बेफिक्र लोग बतलाते बतलाते अपने घरों की, अपने परिवारों की बातों में मशग़ूल हो कब अतीत में चले जाते मालूम ही न पड़ता.
उन्हीं दिनों में तुम मुझे बहुत बहुत याद आया करतीं. मैं उस स्टेशन के नाम के लिए कहे जाने वाले प्लेटफार्म नंबर दो पर बैठा तुम्हारे बारे में सोचा करता. सुबहें कट जाया करतीं लेकिन दोपहरें अक्सर शामों का इंतज़ार किया करतीं और मैं और मेरा भरा पूरा अकेलापन देर तलक उस प्लेटफार्म पर अटके रहते. कहीं से कहीं भी न जाने के लिए.
उदासियाँ अक्सर स्मृतियों में आ आकर झाँका करतीं. और मैं उन्हें परे धकेलने के अंतहीन प्रयत्नों में लगा रहता. यहाँ तक किन्हीं कमजोर क्षणों में मैं मरने के ख्यालों से घिर जाता.
कहीं कोई तो ऐसी डोर होगी जो हमें जोड़ती होगी. इन्हीं और ऐसी तमाम बातों और हो सकने वाली भविष्य की कामयाबियों के बारे में सोचा करता.
वो तुम्हारी मोहब्बत ही थी जिसने इतना कसकर मुझे मुझ तक पहुँचने वाली विश्वास भरी डोर से बांधेे रखा.
वो मेरी उदासियों का और कभी कभी मिल जाने वाली खुशियों का साथी प्लेटफार्म नंबर दो आज भी ज़ेहन में मुस्कुराता सा खड़ा है. जिस पर सुस्ताने के लिए या अपने ग़म साझा करने के लिए लोग और रेलें ठहर जाया करती थीं.
साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

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लिखना जैसे अपनी आत्मा को तराशना

लिखना असल में अपनी आत्मा को तराशना है. हम जितना भी लिखते चले जाते हैं उतना ही स्वंय के पास होते चले जाते हैं. हम कितनी ही दफा अपनी आत्मा का पोस्टमार्टम करते हैं. दुनियादारी में फँसी अपनी जान को किसी एकांत में ले जाकर कई कई दफा हम स्वंय से लड़ते हैं. स्वंय से ही हारते हैं और कई कई दफा स्वंय से ही जीतने के ये जतन चलते ही रहते हैं.
मैं जब भी जी भर कर लिख रहा होता हूँ तब स्वंय के सबसे पास होता हूँ. तब असल में मैं स्वंय को देख पाता हूँ.
जब किसी उपलब्धि के लिए या किसी यश कामना के लिए नहीं बल्कि जिसको लिखने में सुकून हासिल हो. तब आत्मा सुख के झरने में नहायी, धुली-धुली महसूस होती है.
कभी कभी लगता है कि बस लिखता रहूँ. जब जब जी चाहे. दिन-रात, सुबह-शाम की बंदिशों से परे.
लिखना मेरे लिए अपनी पीड़ाओं पर मरहम लगाने सा, लिखना अपनी प्यास को मिटाने सा.

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मोहब्बत के चक्कर-2

>> 01 July 2015

हाँ तो हम कहाँ थे. अरे हाँ तो बताया जा रहा था कि बिट्टू लड़की के न पहचाने जाने के कारण कि वो ही उनके बीते हर जनम के और आने वाले हर जनम के चाहने वाले हैं, घोर निराशा से घिरे हुए हैं. ऐसे जैसे किसी सरकारी स्कूल के मास्टर को स्कूल के लौंडों ने बाहर घेर लिया हो और पूछ रहे हों कि क्यों मास्साब तबियत पानी तो हरी भरी है कि हम  काट छाँट दे जो इधर उधर हाथ पैर निकल रहे हैं. माने कि बता रहे हैं कि एकदम एक्सपर्ट हैं अगर गाड़ी पटरी से उतर गयी है तो उसे चढाने में.

लेकिन वो मास्टर भी क्या मास्टर जो ऐसी मुसीबतों से घबरा जाए सो बिट्टू भी इस घोर निराशा को कह रहे हैं खरी खरी कि देखो जी बिट्टू किसी मजनू किसी छटी औलाद की औलाद न हुआ तो क्या हुआ. वो एक नया इतिहास बना अपना नाम मजनू को पीछे छोड़ इश्क़ की विकिपीडिया में डलवा के ही रहेगा.

छिछोरा, लुच्चा, लफंगा, आवारा जैसे नाम तो उसमें पहले से हैं लेकिन वो लड़की से एक नया नाम लेकर ही दम लेंगे जो इन सभी नामों की नाक काट दे और कहे कि देखो तुम भी कोई नाम हो. अरे नाम तो हम हैं जो बिटटू ने कमाया है और देखो हम इश्क़ की विकिपीडिया की टॉप सर्चिंग लिस्ट के टॉप पर विराजमान हैं.

बिट्टू मन ही मन अपने तन का ख्याल छोड़ ये कसम खाते हैं कि उस लड़की उर्फ़ अपनी महबूबा कम भविष्य के लिए सोची अपनी माँ की बहू को पटा कर ही दम निकालेंगे या लेंगे. आप इसमें से कुछ भी एक सोच सकते हैं. बिट्टू की इससे घंटा फर्क नहीं पड़ता. आजकल बिट्टू वैसे भी फर्क पड़ने वाली बातों से इतने दूर चले गए हैं कि उनको कोई होशो हवाश नहीं कि पढाई नाम की भी कोई चिड़िया होती है जो उनके दिमाग के आँगन से कब की उड़ चुकी है.

ऐसी दशाओं में आपको पहले से ही आगाह कर देते हैं कि लड़कियों के भाई कहानी में किसी भी वक़्त कहीं से भी कूद पड़ते हैं. वे किसी भी मजनू की छटी सातवीं आठवीं जो भी और जैसी भी औलाद हो की ऐसी की तैसी करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. भले ही वो स्वंय किसी के लिए ऐसी हज़ारों और लाखों कसमें खा चुके हों.

पॉइंट पर अगर वापस आया जाये तो सीन कुछ ऐसा बनता है कि बिट्टू घोर निराशा से बहार निकल और साइकिल निकाल गली गली और सड़क सड़क बे मतलब और मतलब के मिले जुले जैसे कुछ इरादों सहित आवारा शब्द को चरितार्थ करते नज़र आ रहे हैं.

लड़की कोचिंग सेंटर के अंदर अंग्रेजी भाषा के अस्त्र शस्त्र चलने में पारंगत होने के दृण निश्चय के साथ बैठी है. और बिट्टू इसके बाहर निकल आ अपनी मोहब्बत की दुनिया अपने कंधे पे ढोते हुए खड़े नज़र आ रहे हैं. हर क्षण हर घडी उन्हें भारी पड़ता दिखाई दे रहा है और सोच रहे हैं कि इस अंग्रेजी की तो खैर हम बाद में जो करेंगे करते रहेंगे पहले वो बाहर आये और ये अपने नैनों के बीते दिनों में तोड़ दिए गए वाण फिर से जोड़ ऐसे चलाये की सीधा उनके दिल के पार हो जाये. जैसे उनका दोस्त रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर बनाता है.

तो बिट्टू इंतज़ार में है.

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मोहब्बत के चक्कर

तब यही कोई तकरीबन सत्रह बरस की उम्र रही होगी जनाब की. मोहब्बत ने तब नई नई एंट्री मारी थी उनके जीवन की स्टेज पर. कहीं किसी एक रोज़ मियाँ साइकिल से जा रहे थे और वो रिक्शे पर थीं. बस फिर क्या उनकी आँखें न मिल पाने के कारण आँखें चार होने से होते होते रह गयीं. लेकिन कमबख्त मुआं इश्क़ उनके दिल में बैक डोर एंट्री ना मार सीधा उन्हें अपनी गिरफ्त में ले उन्हें महबूब बना बैठा.

इस सत्रह वर्षीय स्वंय को किसी 25 वर्षीय युवक से कम न समझने वाले नायक का इंट्रोडक्शन कुछ यूँ है कि साहब का दिल अचानक से पढाई से जी चुराने लगा है, आप फिसड्डी न कहलाये जाएँ इसलिए दिखावा ही सही पर किताब को अपने रहमो करम से बेहद जटिल विषय बना उसमें घुसे रहने का भरपूर प्रदर्शन करने में कोई कोताही नहीं बरतते.

आपको घर वाले बिट्टू बुलाते रहे हैं और न जाने कब तलक बुलाते रहेंगे ये तो केवल घरवाले ही बता सकते हैं.

तो हम वापस पॉइंट पर आते हैं और वो यूँ है कि बिट्टू को मोहब्बत हो गयी. आप अपनी तसल्ली के लिए, अपनी आसान भाषा के लिए उसे इश्क़, प्यार, लव, वगैरह वगैरह जो चाहे सो कह सकते हैं.

तो साहब बात फिर आगे यूँ बढ़ती है कि बिट्टू जी उस लड़की को दिल ही दिल चाहने लगते हैं, प्यार करने लगते हैं, उस पर मरने लगते हैं और उनके दोस्तों की भाषा में कहें तो लट्टू हो जाते हैं. बस अपनी साइकिल लिए कभी इस गली तो कभी उस गली भँवरे की तरह मंडराते रहते हैं.

ये बात अलग है कि लड़की को अभी पता भी नहीं है की बिट्टू नामक भी कोई प्राणी है जोकि दिल ही दिल में उन पर जान छिड़कता है, उन पर मरता है. उनका पीछा करता है.

वो तो एक बहुत लंबा अरसा बीत जाने के बाद उन्होंने नोटिस किया कि यह रोज़ रोज़ मूंगफली की ठेल पर खड़ा खड़ा उनके ट्यूशन सेंटर के बाहर बिना मूंगफली खाये मूंगफली वाले का नुकसान करने वाला प्राणी हो न हो अंग्रेजी तो सीखने में उत्साहित दिखाई नहीं देता. तो फिर भला बात क्या है. एक दिन दो दिन तो अवॉयड किया भी गया किन्तु जब दिन महीने में बदल गए तब जाकर ख्याल आया कि हाय दईया ये लड़का तो पीछे पड़ने वाले काम में लगा है.

उधर बिट्टू के आधे अधूरे और कुछ पूरे दोस्तों ने ये अफवाह फ़ैलाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी कि ये तो बिट्टू की ही हैं और हमारी भाभी हैं. कुछ आधे अधूरों ने मुंह भी मसोरा लेकिन चूंकि स्वंय कुछ करने में नाकामयाबी सी महसूस कर रहे थे तो सोचा कि बिट्टू इसी में खुश है तो हम उसकी ख़ुशी का टेंटुआ दबाने वाले कौन होते हैं.

फिर क्या था बात फैलते फैलते रायता बन गयी. किसी एक रोज़ लड़की ने अपनी सायकिल रोक पीछे से फॉलो करते आ रहे बिट्टू से पूँछ ही लिया अपनी नई नई सीखी हुई अंग्रेजी में की भैया हु आर यू. कौन हो बताओगे भला या यूँ ही मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहोगे. बिट्टू जी का गला जहाँ कहीं से भी शुरू होता है से सूख कर जहाँ कहीं भी ख़त्म होता है वहां तक सूख कर छुआरा सा फील करने लगा.

अब ये भी कोई बात होती है भला कि आप लड़की के प्रेम में गिरफ्तार हैं और लड़की ये तक नहीं जानती कि हु इज़ दिस रोमांटिक छैल छबीला रंग रंगीला टाइप बॉय.

बस अपना कलेजा मुंह तक आया हुआ ले घर पर अपने भरे पूरे दोस्त के सामने दिल खोल रोये कि ये तो बेवफाई की इन्तेहाँ हो गयी. उनकी महबूबा को ये तक नहीं पता कि ये गली गली घूमता, घर से पैसे बचा साइकिल के पंचर जुड़ाता, मूंगफली के ठेल के आस पास खड़े हो ठेलेवाला सा दिखलाता, साइकिल की सम्पूर्ण रफ़्तार को नापता यह बाँका नौजवान सा लड़का उनका प्रेमी है.

उस शाम तन्हाइयों ने आ आ कर उन्हें इतना घेरा कि,  कितना घेरा. कि इसे नापना बेहद जटिल प्रक्रिया बनने में तब्दील होती दिखाई जान पड़ती है.

लेकिन बिट्टू इससे उभरेगा एक नायक की तरह और फिर एक नए जोश और उमंग के साथ अपने इस युद्ध रुपी कार्य के संचालन में लग जायेगा.

खैर तब तलक बिट्टू निराशा के बादलों से घिरा है और उसका भरा पूरा दोस्त उसके इस दुःख में शामिल है.

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खिड़कियाँ-2

>> 17 June 2015

बात वैसे तो कल की ही सी है लेकिन है तो. जब वह स्कूल के डिबेट कम्पटीशन में हिस्सा लिया करती और अक्सर जीत ही जाया करती. कितना कुछ तो पढ़ा हुआ होता था उसका. जब उसकी दोस्त पूंछा करती कि कहाँ से इतना सब लाती है दिमाग में. लेकिन उसे उन सब बातों पर हंसी सी आती. कितनी भोली और स्वच्छंद हँसी हुआ करती थी उसकी. ऐसा उसके चाहने वालों ने उसे कितनी दफा तो कहा था.

क्या वे दिन उसने भुला दिए हैं. नहीं नहीं भूली नहीं है वो. यदि भूल गयी होती तो आज यूँ स्मृतियों में कैसे आ धमकते. फिर ये कैसा अकेलापन है जो इतने बंद दरवाज़ों के भीतर भी अपने पैर पसार लेता है. क्या उसने बीते सात सालों में यही कमाया है. सात सालों का अकेलापन. ऐसी क्या वजहें हैं जो कि उसके अकेलेपन को और भी बढाती चली जाती हैं. पहले तो वो ऐसी कभी नहीं थी. फिर वह क्या था जो दिन ब दिन उसमें घुलता चला जा रहा था. एक अजीब सा नशा जो उसे अपनी गिरफ़्त में लेता ही चला जा रहा था.

पीछे रह गए 21 बरसों में कितना कुछ तो था. क्या उसमें से कुछ पल चुरा कर वो अपने पास नहीं रख सकती. 21 बरस में वह कितना कुछ हो जाना चाहती थी. क्या से क्या बन जाना चाहती थी. एक पत्नी और एक माँ तो बनना ही था. इससे उसे कभी इंकार कहाँ था. लेकिन ख्वाब यूँ परिंदे बन उड़ जायेंगे, और किसी शाख पर जा बैठेंगे उसने कभी ना सोचा था.

क्या एक भली लड़की होना इतना भर है कि वह कंक्रीटों के जंगल के किसी उगा दिए पेड़ की शाख पर बिठा दी जाये. क्या इतनी भर है ज़िन्दगी कि सातवें माले पर रहकर अपना आने वाला पूरा का पूरा जीवन बिता दिया जाए. इस इंतजार में कि एक दिन होगा. उसमें सुबह होगी, दोपहर होगी, शाम और फिर एक रात. और इस तरह से एक नया दिन उग आएगा. पुराने किसी नए दिन को काट फैंक कर. वो नए दिन का इंतजार करेगी. और इस तरह का इंतजार कब तलक तो इंतजार कहलाता रहेगा. फिर एक दिन ऐसा भी तो आता है जब किसी भी बात का, किसी भी दिन का, किसी भी शख्स का, किसी भी ख़ुशी का, किसी भी सुबह का कोई इंतजार नहीं बचा रहता. बचा रहना भी कितना बचाए रखा जा सकता है. एक दिन खर्च हो ही जाता है. दिन, प्रतीक्षाएँ, प्रतीक्षाओं में बीतती दोपहरें, शामें और इसी तरह बीत जाते हैं सालों साल. और खिडकियों के इस पार से उस पार यूँ ही बदलता रहता है समय.

कभी कभी रतिका सोचती कि क्या उसे अरुण से कोई शिकायत है. नहीं ऐसा तो कहीं से भी ज्ञात नहीं होता कि वह अरुण से दुखी है. वह तो अपनी सीधी सपाट जिंदगी जी रहा है. जैसा इस संसार के अधिकतर लोग जी लेते हैं अपनी जिंदगी वह भी एक दिन पूरी कर ही लेगा इस उम्मीद में कि मैं भी किसी एक रोज़ खड़ी मिलूंगी उस आखिरी के पल की उस सीमा रेखा पर जहां कहा जाता है कि हाँ हमने जी ली है अपनी ज़िंदगी. क्या जीना इतना भर है.

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खिड़कियाँ

>> 16 June 2015

खिड़कियों से आती हवा ना जाने क्यों अब उसे ताज़ी नहीं लगती. वह वही बासीपन लिए हुई सी होती है. रात बीत जाने के बाद सुबह की दिनचर्या और फिर वही पुरानी पड़ गयी सी हवा. ऐसे जैसे कि उसने स्वंय को उससे जोड़ के देखा. क्या किसी एक रोज़ वह भी ऐसे ही बासीपन का शिकार हो जाएगी. रोज़ सुबह उठना, बैड टी देना, स्वर्णा को उठाना, नाश्ता बनाना, स्वर्णा को स्कूल बस तक छोड़कर आना, फिर अरुण का अपने ऑफिस चले जाना. फिर नहाना धोना, साफ़ सफाई और फिर प्रतीक्षा करना कि कब स्वर्णा वापस लौट आएगी और फिर वो उसके कपडे बदलवाएगी, उसको खाना खिलाएगी और उसको सुलाकर फिर शाम की प्रतीक्षा में स्वंय को इसी खिड़की के पार कहीं टांग देगी.

बीते सात सालों ऐसा कोई दुःख तो उसे महसूस नहीं होता किन्तु वह क्या है जो उसके इस खालीपन का कारण है. ये जो बीत गए साल हैं उनमें ऐसा क्या है जो बीतते हुए भी नहीं बीता. समय कहने को तो बीतता ही चला गया किन्तु शायद वह अभी वहीँ खड़ी मालूम होती है. जब वह यहाँ इस फ्लैट में शादी के बाद अरुण के साथ आई थी. अपनी नई गृहस्थी, नए जीवन का आरम्भ करने. और फिर दिन बीते, महीने बीते और धीरे धीरे कर सात साल खिडकियों के इस पार से उस पार देखने में बीत ही गए. इस बीच स्वर्णा ने जीवन में दस्तक दी. बहुत कुछ बदला. जीवन और उससे जुडी जिम्मेदारियां. फिर भी वो क्या है जो कहीं भीतर अधूरा सा जान पड़ता है. क्या उसे कुछ और हो जाना चाहिए था जो वो ना हो सकी थी. या यूँ ही कोई अधूरे मन की ख्वाहिशें थीं जो मन के भीतर रेंगती रहती हैं. कभी इस कोने से उस कोने तो कभी उस कोने से इस कोने. मन का धरातल दिन ब दिन बंज़र होता जान पड़ता है.

क्या उसका अपना कोई स्वंय का अपने जीवन में एक रोल है. या वह अपने जीवन की कहानी को केवल जिए जा रही है. क्या केवल जी भर लेना जीना कहलाता है. क्या वह वही रतिका है जो स्कूल और कॉलेज के दिनों में हुआ करती थी. नई उमंगों, सपनों और ऊर्जा से भरी हुई रतिका. पढने लिखने और संगीत की शौक़ीन रतिका. अचानक से उसे याद हो आया कि बीते बरसों में उसने कोई फिल्म नहीं देखी. कोई नई किताब नहीं पढ़ी और नाहीं अपना मनपसंद संगीत सुना. उसके पास समय का आभाव नहीं किन्तु फिर भी वह ये अपने पसंदीदा काम नहीं करती. उसकी जिंदगी इतनी बासी सी क्यों महसूस होती है उसे.

खिडकियों के पार दूर तलक देखने पर उसे बिल्डिंगों के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता. हो सकता है किसी बिल्डिंग के किसी फ्लैट की किसी खिड़की से झांकती कोई उसकी हम उम्र लड़की होती हो किन्तु उसको वह दिखाई ना पड़ती हो. क्या मालूम वह रतिका ना हुई हो या रतिका हो जाने की सीमा रेखा पर खड़ी हो. क्या मालूम कोई एक नई विवाहित लड़की किसी नई बिल्डिंग के नए फ्लैट में नई ऊर्जा और नए सपनों के साथ आई हो जिसे रतिका हो जाना हो. या क्या मालूम उसने इस बासी जिंदगी को ही असल जिंदगी समझ उसे जीना सीख लिया हो. हो ना हो खिडकियों के पार भी ऐसी बहुत सी ज़िंदगियाँ होंगी.

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शोक

"चित्र गूगल से लिया गया है"











मेरा सुख और पूरापन यही है कि मैं आपको यह सब बता दूँ । जो समय के साथ अब बीती बात हो गयी है किन्तु स्मृतियों में पतंग की तरह उलझी है । जो फडफाड़ाती है, मुक्त होना चाहती है किन्तु उतना ही अधिक उलझ जाती है । उसकी उलझी हुई डोर मुझे जकड़े रहती है ।

अभिमन्यु को वो रात स्मृतियों में आज भी ठहरी प्रतीत होती है । वह कभी उससे अलग ही नहीं हुई, जैसे कि उसके वजूद के लिबास पर नक्शित हो । उन दिनों वह हॉस्टल में था । बुझे-बुझे पीलेपन में डूबी उस शाम से एक विचित्र अज्ञात-सा, आभासित, भय छलक रहा था । फिर उसी शाम उसकी अपने एक घनिष्ट मित्र से बात हुई । उसने संकुचित लय में बताया कि "तेरे पिताजी चले गये हैं ।" यह केवल बताना भर नहीं था । एक अस्वाभाविक सूचना थी जिसने उसके भीतर तूफ़ान ला दिया था । जो अपने साथ सब कुछ ले उड़ा था । अवशेषित था तो केवल सूना एकांत ।

माँ ने अब तक इस बारे में उसे कुछ भी क्यों नहीं बताया ? यह प्रश्न कितना विचित्र था और प्रतिउत्तर में उसने क्या-क्या सोच लिया था । शायद पढ़ाई में बाधा न आना इसका सहज कारण रहा हो या शायद उनके लौट आने की आस, कि जैसे सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा । कितने अनगिनत ख्याल उसके मन में उमड़ पड़े थे । ख्यालों की रस्साकशी में उसे माँ का ध्यान आया । उस पल उसके ह्रदय से केवल एक ही आवाज़ निकली, माँ, ओह माँ, तुम कैसी होगी ? उसने निश्चय किया कि वह घर जायेगा ।

उस ठहरी, सुबकती रात को कब वह रेलगाड़ी में बैठा, उसे याद नहीं । वह स्वंय को उस अँधेरे बियावान जंगल में पाता जहाँ केवल उदासी में डूबी माँ की आत्मा नज़र आती और उनके कराहने के स्वर गूँजते । वह अपने कान बंद कर लेना चाहता किन्तु वे हर दीवार को भेदते हुए उस तक पहुँच जाते । वह तूफ़ान के बाद की तबाही के मंज़र को देखता । अपने घर की टूटी-गिरी दीवारों को टटोलता, चारों ओर चीखता, दौड़ता और गिर पड़ता । कभी उसे लगता कि सुर्ख, लाल, राक्षसी आँखें उसे घूर रही हैं और वो उनके सामने पिघलता जा रहा है ।

कब रात बीती और कैसे वह घर पहुँचा, उसे याद नहीं । उनींदी आँखों से राह के हर चेहरे को स्वंय पर हँसता पाता । लगता कि लोग पर्यावाचित प्रश्नों से उसे भ्रमित कर रहे हैं । कब ? कहाँ ? क्यों ? और कैसे ? एक क्षण तो लगा कि अपना सूटकेस फैंक वह चीखे, चिल्लाये और हर स्वर को शांत कर दे । फिर लगा जैसे उन चेहरों से दौड़ता हुआ वह घर जा पहुँचा है । उस घर में, जिसमें पिताजी कहीं नहीं ।

अँधेरे के विस्तार में डूबे उस कमरे में चार आँखें डबडबा रही थीं । ऐसे जैसे कि प्रश्न कर रही हों कि अब क्या होगा । उसे प्रतीत होता कि उसका कुछ भी कहना बाढ़ ला देगा । उन आँखों में क्रोध से अधिक भय था, उस आने वाले कल का, जिसमें पुराना कुछ भी शेष न था । यह क्रोध से पहले का समय था क्योंकि क्रोध वहाँ शुरू होता है जहाँ भय समाप्त होता है ।

अगले क्षणों में उसने माँ को स्वंय से लिपट कर रोते पाया । यह रोना फिर कई हफ़्तों तक जारी रहा । माँ और बहन अपने-अपने हिस्से का खूब रोयीं । उसने उन दोनों के साथ कभी अपना हिस्सा शामिल नहीं किया । वो जानता था कि उसका ऐसा करना उस उम्मीद को तोडना था जिसे माँ और तरुणा ने बचा कर रखा है ।

बाहरी दुनिया के लिए उसके पिताजी एक औरत के साथ फरार थे किन्तु अभिमन्यु के लिए वे उस अँधेरे जंगल में चले गए थे जिसके बारे में सोचने से डर लगता था । वे उस जंगल में खो सकते थे, बस सकते थे किन्तु लौट नहीं सकते थे ।

अभिमन्यु सोचता है । आदमी ऐसा करता क्यों है ? वह क्या है ? जिसके लिए वह यह सब कर गुजरता है । वासना ? नहीं, नहीं । सुख ? शायद हाँ, शायद नहीं । अकेलापन ? नहीं । लगाव ? नहीं । तो फिर प्रेम ? शायद हाँ, शायद नहीं । ऐसी कौन सी प्यास है जो बुझती नहीं ? जिसके लिए वह मारा-मारा फिरता है ।

फिर वह पिताजी को उन प्रश्नों से जोड़ कर देखता । क्या पिताजी वासना के लिए ऐसा कर सकते हैं ? नहीं । सुख के लिए ? दुखी तो वे यहाँ भी नहीं थे । अकेलापन ? उन्हें कौनसा अकेलापन था ? लगाव ? क्या हम से लगाव कम था ? तो फिर प्रेम ? शायद । फिर माँ का प्रेम ? क्या उसके कोई मानी नहीं ? क्या वह कम था ? उसे लगता कि वकील भी वो है और जज भी ।

माँ ने स्वंय को चाहरदीवारी में कैद कर लिया था । वे हँसती हुई प्रश्नात्मक आँखों का सामना नहीं करना चाहती थीं । जिनकी दिलचस्पी यह जानने में रहती कि उनका कुछ पता चला । कहाँ गए होंगे ? कहाँ रह रहे होंगे ? कैसे रह रहे होंगे ? जैसे प्रश्न शामिल रहते । जो दुहाई देतीं कि जो भी किया, उन्होंने अच्छा नहीं किया । यह बहुत बुरा हुआ । इतनी अच्छी बीवी और काबिल बच्चों को छोड़कर कोई जा सकता है भला । जो आत्मा को रुलाकर जाता है वो कभी सुखी नहीं रह सकता ।

अभिमन्यु के साथ कई दिनों तक यह बार-बार होता रहा । हर गली, हर मोड़, हर घर ने उसमें दिलचस्पी दिखाई । बार-बार दिखाई, कई बार दिखाई । उनके लिए यह दिलचस्प विषय था और उनकी दिलचस्पी एक लम्बे समय तक इसमें बनी रही । लोग राह चलते उसे रोक लेते और अपनी पवित्रता की महानता के बोझ तले अपना गुबार निकालते । वे बात की तह तक जाना चाहते कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो क्यों किया ? बिन माँगी टिपण्णी करते "ऐसा करते हुए उन्हें शर्म न आयी । उन्होंने ज़रा भी न सोचा कि इसका क्या अंजाम होगा । बच्चों का क्या होगा ? बीवी का क्या होगा ?" इन बातों से लोग उसकी एक दुखती रग पर हाँथ नहीं रखते थे बल्कि उसकी सभी नसों को एक साथ चटका देते ।


माँ को विश्वास था कि पिताजी लौटेंगे । अपने विश्वास को जिंदा रखने के लिए वो तमाम पंडित, मौलवियों, बाबाओं और फकीरों के कहे को मानती रहीं । इसके लिए वे कहाँ-कहाँ न गयीं ? क्या-क्या न किया ? जादू-टोना, ज्योतिष, वास्तु दोष से लेकर उन्होंने व्रत, पूजा तक सब किया । पहले दिन बीते फिर महीने किन्तु उनमें से कोई भी असरदार साबित न हुआ । फिर माँ का विश्वास धीमे-धीमे धुंधलाता गया ।

तरुणा के अपने दुःख थे जिनका अभिमन्यु से कोई सरोकार न था । अभिमन्यु के लिए तो यह एक चक्रव्यूह की तरह था । जिसमें वह प्रवेश कर सकता था, लड़ सकता था किन्तु बाहर आने का उसे कोई रास्ता न सूझता । जब कभी वह तरुणा के बारे में सोचता तो उसे लगता कि माँ की तरह तरुणा की भी अपनी एक दुनिया होगी । जिसमें केवल वो ही रह सकती है और वो जानता था कि उसकी बनायी हुई दुनिया में झाँकने पर तरुणा को दुःख ही देगा । अतः वह उसे उसकी दुनिया में अकेले ही रहने देता ।

कभी-कभी माँ रात के किसी भी क्षण अचानक से उठ जाती और घंटों अँधेरे में डूबे घर के रिक्त स्थानों को देखा करती । ऐसा भ्रम होता जैसे बीते हुए समय में वहाँ कुछ था । जिसे पिताजी अपने साथ लेकर चले गए हैं । उसे दुःख और सुख में नहीं बाँटा जा सकता । वह अपने में सम्पूर्ण था । कुछ अज्ञान सा जिसकी चाबी केवल माँ के पास हो ।

अभिमन्यु और तरुणा जब कभी माँ को इस तरह बैठा हुआ पाते तो उन्हें भ्रम होता, क्या सचमुच वहाँ कुछ है ? जहाँ माँ घण्टों देखा करती है । जो कहाँ से शुरू होता और कहाँ ख़त्म, वे नहीं जानते थे । माँ, अभिमन्यु और तरुणा को देखकर पूंछती "शायद सुबह हो गयी ?" किन्तु अभिमन्यु को बाहर निपट अँधेरा नज़र आता । घर अँधेरे के विस्तार में डूबा प्रतीत होता । कई बार लगता कि जैसे माँ उनकी बातों को नहीं सुनतीं, सुनती हैं उस निर्भेद्य मौन को जो घर के भीतर फैला हुआ है ।

कभी-कभी माँ उठकर अकस्मात दूसरे कमरे में चली जाती, पुराने संदूक को खोलती और चीज़ों को एक-एक कर बाहर निकालतीं, मानो किसी भूली हुई चीज़ को तलाश कर रही हों । अकस्मात रुक जातीं और साडी के पल्लू से पिताजी की पुरानी तस्वीर के फ्रेम पर जमीं हुई धुल को साफ़ करतीं । बार-बार फ्रेम को साफ़ करते हुए विगत दिनों की स्मृतियों में खो जातीं ।

दिन बीतते रहे । अभिमन्यु हॉस्टल जाता और वापस आ जाता । फ़ोन पर माँ की आवाज़ सुनाई देती किन्तु माँ कहीं नहीं होती । माँ से यह कहना कि सब कुछ ठीक हो जायेगा, उसे यह बताना था कि कुछ भी ठीक नहीं । यह एक अजीब भय था जो अभिमन्यु को आ घेरता । माँ से कुछ भी न कह पाने की लाचारी उसे अजगर की तरह लीलती जाती ।

एक दिन माँ ने कहा "सब ठीक हो जायेगा" । यह एक सुख था जो कई महीनों बाद अभिमन्यु और तरुणा को प्राप्त हुआ था । माँ का स्वंय यह कहना एक तरह से उनका दुःख से लड़ना था । जिसे वे सुख में बदलकर अभिमन्यु और तरुणा को दे रही थीं । जैसे कि वे छलनी हों जो दुःख और सुख को अलग कर दुःख को अपने पास रख लेंगी और सुख उन्हें दे देंगीं ।

फिर एक दिन वह समय भी आ पहुँचा जब घर आर्थिक संकट से जूझने लगा । आय का कोई स्रोत न था । तंगहाली के दिनों में माँ और तरुणा ने सिलाई, कढाई और बुनाई का काम प्रारंभ कर दिया । उससे इतना हो जाता कि घर का खर्च और तरुणा की पढाई चल सके । उस दौर में अभिमन्यु कई बार सोचता कि वह किसी काम का नहीं । वह तो इतना भी नहीं कर सकता जितना तरुणा कर सकती है ।

वे गर्मियों की छुट्टियों के अंतिम दिन थे । अंतिम दिनों का समाप्त होना एक सहज सन्देश था कि अभिमन्यु को अपने अंतिम वर्ष की फीस का बंदोबस्त कर लेना चाहिए । सगे-सम्बन्धी बहुत पहले से अपने हाथ-पैर सिकोड़ चुके थे । भूलवश यदि सामना हो जाता तो वे अपने दुःख अलापना प्रारंभ कर देते । कहीं कोई सूरत नज़र नहीं आती । कई जगह हाथ-पैर मारने पर भी कुछ हासिल ना था ।

मदद के कहीं से कोई आसार नज़र नहीं आते और उधार उसे कोई किस संपत्ति पर देता ? जो परिचित, सगे सम्बन्धी एक-एक पाई का हिसाब रखने में अपना पूरा दिन जाया करते और अगर कहीं कोई पैसे फँसे होते तो उसके लिए फौजदारी तक कर आते, ऐसे लोगों से उधार तो दूर, उसके नाम पर वे दूर से सलाम कर जाएँ ।

अभिमन्यु रात को सोते महसूस करता कि उसका दम घुट रहा है । वह दलदल में फंसता जा रहा है । वह खुद को बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहा है । कभी उसे लगता कि वह एक कुँए में गिर गया है, जो लगातार गहराता जा रहा है और जोर-जोर से आवाज़ देने पर भी कोई उसे निकालने के लिए नहीं आ रहा । उसमें गिरने से उसकी साँस रुक रही है, घ़ुट रही है । फिर जब अचानक से घबरा कर उठता तो खुद को पसीने से तर-बदर पाता ।

जब फीस के बंदोबस्त की कोई भी सूरत नज़र ना आई तब वह अपने पुराने मित्र के घर गया । वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि उसके पिताजी का तबादला किसी दूसरे शहर हो गया है । वह किसी भी दशा में उससे मिलना चाहता था । पड़ोसियों से मित्र का नया पता लेकर वह उसी रात की रेलगाड़ी से निकल गया ।

रास्ते भर उसे यह ख्याल आते कि जो यहाँ भी कुछ न हुआ तो ? यदि वह न मिला तो ? एक पीछा छोड़ता नहीं तब तक दूसरा आ धमकता है । जो अजीब सी, असमंजस की स्थिति में लाकर उसे खड़ा कर देते । फिर सभी निरर्थक ख्यालों को वह खुद से दूर छिटक देता है और खिड़की के बाहर झाँकने लगता । बाहर उसे केवल निपट अँधेरा दिखाई देता । ख्यालों के इन्हीं सायों तले उसने रात बिताई ।

बीते हुए दिनों में दोस्त के पिताजी ने कई पते बदले थे । नए शहर में कई स्थानों की ख़ाक छान लेने के बाद वह आखिरकार अगली रात को अपने मित्र के घर की देहरी पर पहुँच गया । अभिमन्यु को देखते ही उसका मित्र बेहद प्रसन्न हुआ । वह देहरी से ही हाथ पकड़ कर उसे भीतर ले गया । बैठते ही कई घनिष्ठ, पुरानी बातें छिड़ गयीं । स्नान और भोजन कर लेने के पश्चात, मध्य में बिखरे हुए मौन को तोड़ते हुए मित्र ने आने का कारण पूँछा । संकुचित मन से अभिमन्यु ने अपनी सम्पूर्ण व्यथा कही । इस बार अभिमन्यु निराश न हुआ । उसके मित्र ने ना जाने कहाँ से और कैसे फीस का बंदोबस्त कर दिया ।

हॉस्टल का अंतिम वर्ष जिंदगी का नया मोड़ था । जहाँ से उसे मंजिल तलाशनी थी, नए रास्ते बनाने थे । उस अंतिम वर्ष ने अभिमन्यु को जिंदगी का नया रूप दिखाया था । वह जानता था कि वो यूँ ही मर जाने के लिए पैदा नहीं हुआ । उसे कामयाबी अवश्य मिलेगी । दुःख उसके शरीर की पगडंडियों से गुजर जीवन रूपी ढलान से उतरता हुआ धीमे-धीमे समाप्त हो जायेगा ।

माँ के बाल पकने लगे थे जो बीते हुए दिनों की याद दिलाते थे । कभी-कभी आभास होता कि माँ के बालों का सम्बन्ध बीते दिनों से है । सब कुछ तो अभिमन्यु की आँखों के सामने बदल गया था, माँ के रूखे-सफ़ेद बाल, पतले, कमज़ोर हाथ और चेहरे पर असंख्य झुर्रियाँ । माँ के रूखे-सूखे बालों की कर्कशता घर के स्याह गाढे मौन को और बढाती । सुखद कुछ भी नहीं था । न बीते हुए विलापित, अँधेरे दिन और न ये ठहरी हुई कर्कशता ।

हॉस्टल के बाद हर नया दिन अभिमन्यु के लिए नयी समस्याएँ उपजाता और पीड़ादायी साबित होता । वह हर दिन उतना ही खाली और बेकारी के विस्तार में डूबा हुआ होता । कभी-कभी उसे लगता कि उसका अस्तित्व हवा में उड़ने वाले उस तिनके की तरह है जो बेवजह यहाँ-वहाँ भटकता रहता है । आखिरकार उसके जीवन की सार्थकता क्या है ? वह इन्हीं ख़यालों में डूबा सुबह से शाम, इधर-उधर नौकरी की तलाश में घूमता रहता ।

काम की तलाश, हताशा और अवसाद से भरे वे संघर्ष पूर्ण दिन इस कहानी का हिस्सा नहीं लगते । उनका अपना एक अलग अस्तित्व है जो किसी भी तरह यहाँ वर्णित नहीं हो सकता । जिनकी समाप्ति पर डेढ़ बरस बाद अभिमन्यु को नौकरी मिलना भी शामिल है । एक तरह से नौकरी संघर्षपूर्ण दिनों का प्रमाणपत्र है, जो जीवन पर्यंत स्मृतियों में सुरक्षित रहता है ।

नौकरी के बाद के दिनों में अभिमन्यु माँ से कई बार अपने साथ चलने के लिए कहता रहा किन्तु माँ ने तो जैसे उस घर से गाँठ ही बाँध ली हो । तरुणा साथ आना चाहती किन्तु माँ के बिना यह संभव न था । तरुणा पढाई का बहाना कर माँ के साथ ही रहती । कभी-कभी अभिमन्यु को लगता माँ ने इस घर में अपनी अलग ही दुनिया बसा ली है । जहाँ माँ है, तरुणा है और विस्तार लेती उदासी ।

पहले दिन बीते फिर महीने और कब तीन बरस हो गए, इसका हिसाब अभिमन्यु के पास न था । वो सोचता शायद माँ के पास बीते समय का हिसाब होगा । जिसे उन्होंने क्षणों में जिया था । शायद तरुणा ने भी कुछ गिनती की हो । उनके बहीखातों के अपने-अपने पैमाने होंगे । जिनमें कब कौनसा क्षण जोड़ना है यह केवल वे ही जानती होंगी ।

छुट्टी की एक रात अपने रेंगते अकेलेपन को दूर छिटकते हुए तरुणा ने कहा था
-"भैया तुमने देखा है ?
-क्या ?
-यही कि माँ के भीतर एक रीतापन जन्म लेने लगा है ।
-"रीतापन ?" उसे लगा कि वह नींद से जाग गया है ।

तब उस क्षण उसने माँ को ऐसे महसूस किया जैसे वे घर का एकांत कोना हों । जहाँ केवल उसका अपना अस्तित्व है । सूना और उदासी में डूबा हुआ । जो दिन भर उदास रहता है और रात होते ही अन्धकार में डूब जाता है ।

उन दिनों अभिमन्यु ने पहली बार देखा कि माँ के अन्दर सब कुछ ख़त्म हो गया था । क्रोध, मोह, भय और पीड़ा जैसा कुछ भी, कहीं न था । था तो केवल, निपट अकेलापन । अकेलापन जो भीतर पनपता है और जिसे बाहर कोई नहीं देख सकता । इंसान के होने और न होने के मध्य पसरा हुआ । मृत्यु पश्चात के अकेलेपन से भी भयावह होता है यह, क्योंकि तब स्मृतियों से प्रेम और मोह जुड़ा रहता है ।

अभिमन्यु ने माँ से कई बार कहा कि वे उसके साथ चलकर रहे, किन्तु वे हर बार मना कर देतीं । अभिमन्यु हर बार की तरह थक हार कर नौकरी पर वापिस चला जाता । कभी-कभी वह भीतर ही भीतर उनके इस व्यवहार से खीज भी जाता किन्तु उससे होता कुछ भी नहीं । न पहले और न बाद में ।

उन दिनों सगे-सम्बंधियों ने माँ के दुःख में एक नया दुःख यह जोड़ दिया था, कि लड़की बड़ी हो गयी है और उसकी शादी कैसे होगी ? बाप के गुण क्या छिपे रहेंगे । अगर कहीं रिश्ता ले भी गए तो कोई क्या ख़ाक चुप रहेगा ? तमाम हैं बेवजह दूसरों के घरों में आग लगाकर हाँथ सकने वाले । किस-किस का मुँह पकड़ोगी । कई अपनी बेबाक राय देते और कई अफ़सोस जाहिर करते । कोई स्वंय ही इस मामले को प्रारंभ कर दया दिखाता, तो कोई आश्वासन देता ।

इसी तरह दिन, महीने और बरस बीतते गए । उन्हीं दिनों में तरुणा के लिए विवाह का प्रस्ताव आया । तरुणा और वो लड़का एक दूसरे से प्रेम करते थे । लड़का नौकरी करता था और अच्छे घर से था । अभिमन्यु ने तरुणा के विवाह के लिए हामी भर दी । विदाई के समय तरुणा अपने अन्दर का पूरा रोई । जाते हुए उसने माँ को बहुत कहा कि वे भैया के साथ चली जाएँ । तरुणा के विदा हो जाने पर, क्षण-भर के लिए भी उस उजाड़ अकेले घर में रहना दूभर लगता । तरुणा विदा हो गयी और अभिमन्यु नौकरी पर चला गया किन्तु माँ ने वह घर नहीं छोड़ा ।

उसके बाद के दिनों में भी तरुणा और उसके पति ने उन्हें अपने साथ चलने के लिए कहा किन्तु वे न गयीं । अभिमन्यु और तरुणा के सभी प्रयास विफल रहे । वे दोनों जान चुके थे कि माँ घर नहीं छोड़ेगी, किन्तु फिर भी माँ को वहाँ से ले जाना चाहते । अभिमन्यु सोच कर भी काँप जाता कि कोई कैसे इस उजाड़ घर में अपने अकेलेपन को काट सकता है ।

नौकरी के सिलसिले में अभिमन्यु ने कई शहर बदले । दिन बदले, ऋतुएँ बदली, कलैंडर बदले ।

फिर एक दिन तरुणा की शादी के कोई दो-तीन बरस बाद अभिमन्यु को एक फ़ोन आया । फ़ोन दूर के चाचा जी का था और उनका उतावलापन जता रहा था कि अवश्य कुछ घटित हुआ है । जब उन्होंने पूँछा, कैसे हो ? तो न जाने क्यों अभिमन्यु को विश्वास हो गया कि अवश्य कोई सूचना देने के लिए उसे फ़ोन किया है । कई भयावह विचार उसके मस्तिष्क में धीरे-धीर रेंगने लगे । अभिमन्यु जानता था कि हाल-चाल लेना उनकी फितरत में शामिल न था ।

अभिमन्यु का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा और उससे रहा न गया । उसने पूँछ ही लिया क्यों ? क्या बात है ? उन्होंने जब यह कहा कि "तुम्हारे पिताजी अब नहीं रहे ।" अभिमन्यु का दिल न जाने क्यों शांत सा हो गया । उस क्षण उसे लगा ही नहीं कि उसके कोई पिताजी भी थे, जो अब नहीं रहे । उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उस क्षण क्या सोचे । जब उसने स्मृतियों को खंगाला तो उसमें पिताजी कहीं भी न थे । वह स्थान माँ के सूने एकांत की तरह रिक्त था । एक अजीब सी लाचारी ने आकर उसे घेर लिया । उसे पिताजी याद करने पर भी याद नहीं आये । वह चाहकर भी दुखी न हो पाया ।

चाचा जी फ़ोन पर तब तक पिताजी का अतीत सुना चुके थे । जिसमें उनके फरार होने से लेकर अगले दो बरस बाद उस औरत का उन्हें छोड़ कहीं और चले जाना शामिल था । उसके बाद के दिनों में शराब, बेकारी और लाचारी ने उनकी जान ले ली । वे चाहकर भी कभी न लौट सके । वे जानते थे कि लौट सकने के लिए उन्होंने पीछे कुछ नहीं छोड़ा था । आज उनकी अनिच्छा के बावजूद उनका शरीर पुनः उसी घर में पहुँच गया था जिसे उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा ।

अभिमन्यु जब घर पहुँचा तो राह की हर आँख उसे ही देखती । किसी में कोई प्रश्न नहीं और न ही किसी में बीता हुआ कल । बीते हुए समय के साथ सब जाता रहा था । सगे सम्बन्धियों और पड़ोसियों से घर भरा हुआ था । तमाम अंजान चेहरे उदास और दुखी थे । औरते चीख-चीख कर रो रही थीं । न जाने उन्होंने क्या खोया था ? जिसका उन्हें इतना दुख था ।

सबसे पहले उसकी नज़र तरुणा पर गयी, वो सिसकियाँ ले रही थी । शायद उसके भीतर अभी भी आँसू बचे हुए थे जो उसने आज के लिए सुरक्षित रखे थे । उसकी आँखें लाल थीं और मालूम होता था कि वह अपने हिस्से का रो चुकी है । अभिमन्यु ने आज भी अपना हिस्सा तरुणा के साथ शामिल नहीं किया ।

अभिमन्यु की आँखें माँ को तलाश कर रही थीं । माँ चुप सी कहीं खोयी हुई बैठी थी । उनके पास बैठी हुई औरते शोर करती हुईं आँसू बहा रही थीं । वे माँ को बार-बार हिला रही थीं किन्तु माँ खामोश थी । उसे लगा माँ न जाने किस दुनिया में चली गयी है या शायद अपनी बसाई हुई दुनिया की देहरी के उस पार खड़ी है । उसका मन किया कि वो उस देहरी पर खड़ा हो चिल्लाये "देख माँ पिताजी लौट आये" और माँ भीतर से दौड़ती हुई आये । उस देहरी को पार कर पिताजी के गले लग जाए ।

अभिमन्यु जब माँ के पास बैठ गया और कुछ देर में अर्थी ले जाने की तैयारी होने लगी । तब माँ चीखी और उनके अन्दर का जमा अकेलापन फूट-फूट कर बाहर आने लगा । वे अभिमन्यु के गले से लिपट बीता हुआ पूरा रोयीं । उस क्षण अभिमन्यु ने माँ के साथ अपना हिस्सा शामिल कर लिया था ।

माँ का शोक उस दिन पूरा हुआ, जिसे वे बीते कई बरसों से खुद में शामिल किये हुई थीं । उस दिन माँ ने फिर से दुःख और प्रेम को महसूस किया था । उस दिन इतने बरसों बाद वे पिताजी से अलग हुईं थीं । पिताजी की अर्थी को लोग ले जा रहे थे । अभिमन्यु साथ-साथ चला जा रहा था ।

वो शोक का अंतिम दिन था...

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उस शहर में....

>> 14 February 2014



ये वही दिन थे जबकि देश में नयी सरकार हर हालत में हर एक पार्टी अपनी ही बनाना चाहती थी. जब फेसबुक पर हर कोई अपनी हर संभव कोशिश करता हुआ बुद्धिजीवी होने की कामयाब और नाकामयाब कोशिश में लगा हुआ था. जब एकाएक नयी और पुरानी सभी पीढ़ियों की चर्चाओं में राजनीति मुख्य मुद्दा थी. जब राजनीतिक पार्टियों को प्याज के दाम बढ़ने पर डर इसलिए लगता था कि होने वाले चुनाव बहुत जल्द आने वाले हैं. जब डीज़ल और पेट्रोल के दाम समय के मुताबिक़ घटाए और बढाए जाते थे.

ये वही दिन थे जबकि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आये दिन मोमबत्तियां जलायीं जाती थीं. और दिल्ली छोड़ दूर प्रदेशों में लुटती, पिटती, बलात्कार से पीढित औरत समाचारों में नहीं आ पा रही थी. ये वही दिन थे जबकि वेलेंटाइन डे, फादर्स डे, मदर्स डे और ना जाने कौन कौन से डे मनाने के लिए बाज़ार खड़े किये जा रहे थे और बाज़ार हर संभव कोशिश कर रहा था कि समाज को उनके सभ्य होने के तरीके अपने हिसाब से सिखाये जाएँ.

इन्हीं-किन्हीं दिनों में जबकि उत्तर प्रदेश बनाम उत्तम प्रदेश के सीने पर खड़े होकर हमारे समय के नेता खिलखिलाकर हँस-हँस कर अपना सम्मान करा रहे थे. और प्रदेश के किसी एक कोने में बसे शहर के पाक दामन में कई सौ दाग लगे थे. जिन्हें कोई नेता नहीं कहना चाहता था “कि दाग अच्छे हैं”. हाँ इन दागों को कोई आसानी से साफ़ नहीं होने देना चाहता था. इन दागों को कोई डिटर्जेंट पाउडर, कोई नेता, कोई अभिनेता, कोई मंत्री ना तो साफ़ कर सकता था और ना ही करने देना चाहता था. हर कोई उसे अपने फ़ायदे के लिए किसी और पर लगा देना चाहता था.

ऐसे ही समय में इसी प्रदेश के किसी श्रीकृष्ण भक्त संपन्न शहर में रहने वाले मोहित पाण्डेय और दीप्ति की प्रेम कहानी जन्म लेती है. उनका मिलना भी किसी अन्य प्रेम कहानी में मिले जोड़े की तरह ही बेहद सामान्य तरीके से हुआ था. हुआ असल में ये था कि उन दिनों में बी.टी.सी. और बी.एड. के द्वारा नौकरी पाने की बाढ़ सी आई हुई थी. हर बार की तरह इस बार भी लगता था कि इस बार जब फॉर्म जमा हो जायेंगे तो नौकरी लग जाएगी. हालांकि पिछली बीते सालों से लगातार यह प्रक्रिया दोहराई जाती थी और फिर हाई कोर्ट में फंसकर रह जाती थी. किन्तु इस बार ऐसा नहीं होगा की सोच को दिमाग में बिठाकर युवक-युवतियां हज़ारों रुपये खर्च करके फॉर्म भरकर जमा करने में लगे थे.

तो ऐसे ही समय में मोहित पाण्डेय और दीप्ति की मुलाक़ात पोस्ट ऑफिस में हुई थी. दीप्ति के पास लिफाफा चिपकाने के लिए गोंद नहीं था तो उसने पास में ही खड़े और अपने लिफ़ाफ़े को चिपकाते मोहित से गोंद माँगी. उस दिन उस गोंद ने केवल लिफ़ाफ़े को ही नहीं चिपकाया बल्कि मोहित और दीप्ति की दोस्ती को भी चिपका दिया था. और उनकी बातचीत के आरम्भ में ही दोनों को पता चला कि मोहित राधापुरम में रहता है और उससे कोई पांच किलोमीटर दूर बसे कृष्णापुरम में दीप्ति रहती है. फिर कुछ मामूली बातों के बाद दोनों ने एक दूसरे से विदा ले लिया था.

आपको क्या लगता है कि ऐसे समय में जबकि “हॉट लगदी मैनू”, “शीला, शीला की जवानी” और “लुंगी डांस” जैसे गाने किशोर-किशोरियों के ज़बान पर चढ़े हुए हैं. हर किशोर-किशोरी मोबाइल गर्ल फ्रेंड-बॉय फ्रेंड ढूढ़ता है. क्या मोहित और दीप्ति भी एक ही झटके में चाँद मुलाकातों में मोहब्बत उर्फ़ इश्क़ में पढ़ जायेंगे.

मोहित एक ऐसे परिवार से था जहाँ हर शख्स अपने ब्राह्मण होने पर गुमान करता था. जहाँ आये दिन कैसे चमार सा लग रहा है, कैसा भंगी सा लग रहा है जुमलों का इस्तेमाल बिना किसी डिस्क्लेमर के प्रयोग होता था. और दीप्ति जिस परिवार से थी वो मोहित के परिवार को डिस्क्लेमर का इस्तेमाल करने के लिए विवश नहीं कर सकता था. 

ऐसे में दोनों लोगों की फिर से एक बार मुलाक़ात होनी थी और जो हुई. इस बार वे दोनों किसी स्टेशनरी की दुकान पर नौकरियों से सम्बंधित टंगे हुए विज्ञापन और फॉर्म को देखते हुए टकरा गए. जहाँ पहचान बढ़ते बढ़ते यहाँ तक पहुँच गयी कि पता चला दीप्ति किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती है और सरकारी नौकरी की तलाश में है. वहीँ मोहित पाण्डेय अपना वक़्त कोचिंग लेने में और नौकरी की तैयारी करने में बिताता है........        

           

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KARNATAKA DIARY

>> 29 January 2014

बरस २०१२, मेरी शादी का बरस. ऐसा प्रतीत होता था जैसे अभी कुल जमा चार दिन भी नहीं हुए विवाह को. और उन्हीं दिनों में मुझे सुबह ४ बजे उठ तैयार होकर मथुरा से आगरा पार हज़रतपुर के केन्द्रीय विद्यालय में पेट की खातिर जाना होता था. और श्रीमती जी की तैनाती मथुरा के ही केन्द्रीय विद्यालय में थी. हम दोनों की नौकरी के मध्य एक ख़ास अंतर था . अंतर हमारी नौकरी स्थल की दूरियों का न होकर, नौकरियों के स्वभाव का था. मैं प्राइवेट शिक्षक के रूप में कार्यरत था और हमारी मोहतरमा स्थायी शिक्षक के रूप में पिछले दो बरस से कार्य कर रही थीं.

ऐसे में दिल में बस एक ही ख़याल आता था कि मेरी मेहनत कब रंग लाएगी. पिछले एक बरस से मैंने दिन रात एक करके तैयारी की थी सरकारी नौकरी के लिए और कई नौकरियों के इंटरव्यू भी दे रखे थे . मुझे प्रतीक्षा थी तो केवल ईश्वर की कृपा दृष्टि की. कब मेरे दिए हुए साक्षात्कार के परिणाम आयें. और फिर एक दिन वो शुभ घड़ी आई.

हमारा विवाह १ मई को हुआ था और लगभग डेढ़ माह बीत चुका था. मेरे ही एक परिचित ने मुझे ईमेल करके सूचना दी कि मेरा चयन नवोदय विद्यालय में पीजीटी शिक्षक के रूप में हो चुका है. कि मैं उसकी वेबसाइट पर जाकर अपना नाम और रोल नंबर भी देख सकता हूँ. यह ईमेल पढ़कर एकाएक मेरी धड़कने बढ़ गयीं और जब वेबसाइट पर अपना नाम और रोल नंबर पाया तो एक सुकून दिल में गहराता चला गया.

पास के ही दूसरे कमरे में किसी कार्य में व्यस्त राखी को बुलाया और सबसे पहले उसे गले लगाया और उसे सुखद सूचना से अवगत कराया. पहले ही क्षण उसका चेहरा ख़ुशी से चमक उठा और फिर धीरे-धीरे उसमें चिंता की रेखाएं भी उभर आयीं. मेरा चयन हैदराबाद रीजन में हुआ था. और जिसका साफ़ साफ़ मतलब था कि मुझे यहाँ से कोसों दूर जाना होगा. उसे मुझसे और मुझे उससे दूर रहना होगा. इस मिली जुली प्रतिक्रिया और ख़ुशी के मध्य हमें अपने वे बीते दिन याद हो आये जब सरकारी नौकरी ही हमारी शादी के बीच की खाई थी. जो आज शादी के डेढ़ महीने बाद पट गयी थी.

हम दोनों को ही पता था कि मेरी नौकरी बहुत जल्द लगने वाली है किन्तु केवल डेढ़ महीने में सुखद परिणाम आ जायेंगे, ऐसा सोचा न था. अगले दो रोज़ बाद मेरा बैंक क्लर्क के लिए भी चयन हो गया और कुछ दो एक रोज़ बाद बैंक पीओ की लिखित परीक्षा के परिणाम में भी मेरा रोल नंबर सबको साफ़ साफ़ दिखाई पड़ा. एक साथ मेरा पास इतने विकल्प उपलब्ध हो गए. कि राखी सबको एक बार कह देना चाहती थी कि देखो मैं जो कहती थी वो सच साबित हुआ. किन्तु ना तो अब वे बीते हुए दिन थे और ना ही वे क्षण. जबकि लगता था कि यदि हम दोनों की शादी न हुई तो फिर शायद यह जीवन भी न रहे. किन्तु परेशानी का सबब अब वो सब नहीं था. अब परेशान यह बात कर रही थी कि मुझे दूर जाना है. हजारों किलोमीटर दूर.

अगले कुछ रोज़ बाद सभी चयनित प्रतिभागियों के नाम के आगे विद्यालय, शहर और प्रदेश वितरित कर दिए गए. मुझे कर्नाटक का नवोदय विद्यालय दिया गया था. और फिर कशमकश इस बात की थी कि बैंक की नौकरी की जाए या विद्यालय में शिक्षक की. और यह द्वन्द अगले एक सप्ताह चलता रहा. अंततः यही सूझा कि शिक्षक की नौकरी करनी चाहिए क्योंकि मुझे पढ़ना-पढ़ाना अच्छा लगता है.

और इस तरह कर्नाटक के लिए मेरा बोरिया बिस्तर बंधने लगा...........


जिस पल तय हुआ कि कर्नाटक जाना है. बस उसी एक पल से दिल ख्यालों के महल खड़े करने लगा. कभी एक ख़याल आता तो उसे पीछे से धकेलता मुआं दूसरा आ धमकता. वे बेहद भावुक क्षण थे. प्रतिदिन, प्रत्येक क्षण एक नयी ख़ामोशी, एक नयी हलचल, एक नया रूप, एक नया दुःख, शेष रह गयी तमन्नायें लेकर आता. और दिल करता कि बस सब कुछ छोड़ दूँ, यह ख़याल कि कहीं जाना है और बस यहीं रहूँ राखी के पास. और इस तरह शेष रह गए ५-६ दिन बीते और फिर वह इन सबका अंतिम दिन जब भावनाएं अपनी शीर्ष पर थीं और मैं कहीं धरातल के भीतर. कुछ न चाहते हुए भी राखी ने धकेला और कुछ स्वंय के किसी कोने में बचे रह गए अरमानों ने, और इस तरह अपने साले साहबों और राखी के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचा. रेलगाड़ी रात ११ के बाद की थी जो पहले से ही अपनी आदत मुताबिक़ देरी से आने को थी. और उन क्षणों में मैंने और राखी ने आँखों ही आँखों में कितना कुछ महसूसा और भोगा. यह व्यक्त नहीं किया जा सकता.

और फिर रेलगाड़ी का आना और राखी के हाथ का उस दिन का अंतिम स्पर्श, मेरा रेलगाड़ी में स्वंय को धकेला जाना और फिर रेलगाड़ी का चल देना.वह सीन स्मृतियों में आज भी फ्रीज़ होकर कहीं सुरक्षित रखा हुआ है.

कर्नाटक में जा रहा हूँ, यह सोचकर बचपन से दक्षिण भारत को लेकर जो स्मृतियाँ थीं कि वहाँ के लोग केवल काले होते हैं, उनका अपनी भाषा को लेकर दृढ होना. सांभर, चावलों की दुनिया, नारियल से लहलहाते रास्ते और खेतों में उगा हुआ धान. इन सबमें धीरे धीरे सुधार हुआ.

मैं बैंगलोर स्टेशन पर दोपहर में पहुंचा, जहाँ से मुझे फिर से अगले रेलगाड़ी में बैठना था. और बैंगलोर से शिमोगा को जाना था. बैंगलोर तक पहुँचते हुए ही मुझे ४० घंटे हो चुके थे. और फिर से अगले ६ घंटे. शाम ४:१५ की रेल से मैं शिमोगा के लिए निकल पड़ा. और फिर स्मृतियों में उलझी राखी की बात "यदि मन ना लगे तो वापस चले आना, तुम्हारे पास दूसरा विकल्प भी है." जो कि स्मृतियों को सुख देने के लिए काफी थी.

किन्तु मैं एकाएक वापस छोड़ कर चले जाने के लिए नहीं आया था.........


रेल का वह डिब्बा मेरे लिए तमाम किस्मों से अंजान चेहरों से भरा हुआ था. ये अंजान होना उत्तर भारत में सफ़र करते हुए साथ के बैठे अंजान होने वाले चेहरों से भिन्न था. यह एक नवीनतम एवं अलग किस्म का अनुभव था. वहाँ सभी लोग कन्नड़ भाषा में ही वार्तालाप कर रहे थे. और यह एक और बात जुड़ जाती थी उस नवीनता में.

आते हुए से एक दो रोज़ पहले राखी ने एक दफा हँसते हुए कहा था "परदेस जा रहे हो". और न जाने ये बात क्यों उस क्षण मेरी स्मृतियों के आईने पर अपनी शक्ल लेकर उभर आई. मैं उन चेहरों और आवाजों को विस्मय बोध के साथ देख और सुन रहा था. एक नस्ल दूसरे के अलग होने को किस तरह आसानी से पहचान लेती है. यह बात मैं अपनी ओर से उनके लिए भी सोच रहा था कि उनके लिए मैं शक्ल देखकर पहचान लिया जाने वाला उत्तर भारतीय होऊंगा. और हम अपनी भिन्न प्रकृतियों के बावजूद एक साथ, उसी एक डिब्बे में सफ़र कर रहे थे. उसी भारतीय रुपये को खर्च करके जिस पर गाँधी छपे हैं और जिन पर ना मैं ये मोहर लगा सकता कि यह उत्तर भारतीय रूपया है या दक्षिण भारतीय. और अगले ही क्षण में नवीन भावों से भर गया कि यह सीट जिसे में सुरक्षित समझ रहा हूँ, उस पर भी तो न जाने वे कौन कौन से लोग होंगे जिन्हें अपने लिए भी वही एहसास हुआ होगा जो मैं एक किसी पुराने क्षण में कर रहा था . किन्तु जो कितना झूठा और फरेबी एहसास था. वह सीट तो इसी रेल के इसी डिब्बे में रह जानी है. और हम अपने इस देश के अलग अलग हिस्सों से आये अपने हिस्से का रास्ता अख्तियार कर अपनी मंजिलों को तलाशेंगे.

मेरी पडोसी सीट पर जो शख्स बैठे हुए थे उन्होंने बातों ही बातों में बताया कि उनके पिता किसी पुराने समय में यहाँ राजस्थान से आये थे और फिर यहीं बस गए. और उनके लिए राजस्थान अब इतिहास की बात है. मैं सोचता हूँ कि यह नस्ल कहाँ की कहलाई जानी चाहिए. क्या मैं इसे भारतीय कहूँ. या कह दूं कि आप राजस्थानी रक्त हैं. या ये कह दूं कि आप तो बस इस इड़ली की तरह ही यहाँ के हैं. तो क्या हुआ जो इड़ली अब देश के हर कोने में उपलब्ध है.

रेलगाड़ी अपनी गति से आगे बढ़ती ही जा रही थी. उन रास्तों पर जिनसे होकर वापस एक दिन मुझे पुनः अपने मथुरा-आगरा-फिरोजाबाद के उसी नेशनल हाईवे के किसी प्लाजा में कोई हिंदी फिल्म देखनी है या किसी ढाबे पर खड़ी हुई बस में दाल तड़का खाकर पुनः बैठ जाना है.........


रेलगाड़ी अपनी तय समय सीमा से करीब आधा घंटा बाहर निकल चुकी थी. और यह जानते हुए भी कि शिमोगा अंतिम स्टेशन है, मैं चिंतित था कि वह कब आएगा. तीन चौथाई डिब्बा खाली हो चुका था और अंतिम स्टेशन किसी भी क्षण आने को था. यात्रीगण उसी एक क्षण की प्रतीक्षा में थे.

रेल की रफ़्तार ने आखिरकार दम तोड़ दिया और लोग धीरे-धीरे अपनी सीटों को असुरक्षित छोड़ कर जाने लगे. मैं किसी एक अनिभिज्ञ मुसाफिर की तरह स्टेशन से बाहर निकला. रेल अपने तय समय से १ घंटा देरी से पहुंची थी और मोबाइल रात ११ बजने की ओर इशारा कर रहा था.

मैंने प्रीपेड ऑटो की लाइन में लग पर्ची कटाई और जब ऑटो वालों से एक-एक कर अपने स्कूल जाने के लिए पूँछा तो कई ना सुन लेने के बाद मेरे कानों में हाँ का स्वर सुनाई दिया. जो कि देर रात के होने के अपने फायदे खोज़ रहा था. जो किराया मैंने पहले से स्कूल वालों से जानकर रखा था, यह स्वर १०० रुपये बढाकर मेरे कानों में गूँज रहा था.

देर काफी हो चुकने और पहुँचने की जल्दबाजी के चलते मैंने मोलभाव नहीं किया. अंततः मैं उस ऑटो में बैठ अपनी मंज़िल की ओर चल दिया. मेरे लिये रात के ग्यारह और बारह के बीच के समय का वह रास्ता बेहद स्याह काला, जंगली और कुछ कुछ डराने वाला प्रतीत हुआ. चारों और घने जंगल से प्रतीत हो रहे थे. डर इस बात का कि कहीं यह ऑटो चालक गलत इंसान ना निकले. मेरे मस्तिष्क में पहले से सुने सुनाये अपने उत्तर भारत के तमाम किस्से रह रह कर रिवाइंड होने लगे. वो करीब पंद्रह किलोमीटर का सफ़र मुझे बेहद लम्बा, उबाऊ प्रतीत होता रहा और साथ ही साथ ऑटो चालाक के गलत निकल आने की अपनी सम्भावनाओं ने मुझे आ घेरा.

अंततः जब वह स्कूल के समीप वाले कच्चे-पक्के रास्ते तक पहुँच गया तो उसने वहाँ ऑटो रिक्शा रोक ली. और वह अपनी प्राकृतिक आपदा से निपटने नहर के किनारे पहुँच कर खड़ा हो गया. मुझे कुछ संदेह प्रतीत हुआ तो मैं थोडा सतर्क होकर बैठ गया. और सोचा कि जो होगा सो देखा जायेगा. किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ. वह वापस आकर अपना ऑटो चलाने लगा और फिर कुछ २-३ मिनटों में हम स्कूल के मुख्या दरवाज़े तक जा पहुंचे. और भीतर प्रवेश करने के साथ ही यह खोज़ा जाने लगा कि कोई काम का आदमी मिले जिससे बात कर अतिथि गृह में रात बिताई जाए.

स्कूल के जिस कर्मचारी से मैंने अतिथि गृह के सिलसिले में पहले से बात कर रखी थी, उस भले आदमी को मैंने तकरीबन १२ बजे कॉल करके उठाया. और चंद बातों के बाद मैं अतिथि गृह मैं प्रवेश कर गया. और इस तरह रात का बंदोबस्त होने और सुबह की प्रतीक्षा की सुखद अनुभूतियों के साथ मैं बिस्तर पर सोने चल दिया......
 
 


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