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वक़्त इरेज़र है तो परमानेंट मार्कर भी ।

>> 20 September 2015

लाख कोशिशों के बावजूद भी आगरा की वो सरकारी पुलिस कॉलोनी मेरे ज़ेहन से नहीं जाती । और उस कॉलोनी का क्वार्टर नंबर सी-75 मेरे बचपन रुपी डायरी के हर पन्ने पर दर्ज़ है ।

फलांग भर की दूरी पर हुआ करती सरकारी अस्पताल कॉलोनी । उनके क़्वार्टरों की छतों से हमारे आँगन दिखा करते और हमारी छतों से उनके । और जो बीच की एक डिवाइडर दीवार खड़ी रहती वह तो दृश्य से सदैव ही अदृश्य सी बनी रहती । कभी लगता ही नहीं कि बीच में कहीं कोई एक दीवार भी है बरसों से ।

दीवार के एक हिस्से से आने जाने का रास्ता बना हुआ था । हम यहां से वहाँ और वे वहाँ से यहां बेरोकटोक आया जाया करते । दोस्तियां, यारियाँ खूब पनपतीं और चलती ही रहतीं । बाद के दिनों में बड़े हो जाने और शायद थोडी बहुत समझ के विस्तार से यह ज्ञान भी प्राप्त हुआ कि मोहब्बतें, इश्क़, प्यार का भी भरपूर आदान प्रदान हुआ ।

तब छतें सर्दियों की धुप सेंकने के काम में आया करतीं और आँगन का भी जब तब इस्तेमाल हो जाया करता । उन छतों पर से ही मोहब्बतें पैदा होतीं । उनमें दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हुआ करती और फिर उनकी खुशबू हवाओं को महकाया करती ।

उन्हीं दिनों में एक ही कॉलोनी का लव मैरिज किया हुआ जोड़ा बड़ों के लिए चर्चा और किशोरों के लिए रश्क़ का विषय हुआ करता । तीसरी मंज़िल पर मायका और पहली मंज़िल ससुराल । बड़ा ही दिलचस्प लगा करता ।

कुछ क्रिकेट के किस्सों में उलझे रहते तो कुछ इश्क़ की पेचीदगियों में । तब ना तो एमटीवी हुआ करता और नाही इश्क़ लव मोहब्बत के होने और न होने के लिए टीवी, रेडियो के चैनल बदलता यूथ । सुबहें शुरू होतीं । जो दोपहरों से गुजरती हुई शामों से जा मिलतीं । इन सबके मध्य में पसरा होता बच्चों, किशोरों का साम्राज्य । दिन क्रिकेट, महाभारत, जंगल जंगल बात चली है पता चला है चड्डी पहन के फूल खिला है या श्रीकृष्णा या शक्तिमान, चित्रहार, रंगोली या शनिवार रविवार की फिल्मों में मजे मजे में काट जाता ।

स्मृतियाँ रचती हैं एक अपना ही संसार । हम यात्रा करते हैं, जीते हैं उन स्मृतियों को । और बचपन लगने लगता है अपने जिए हुए समय का सबसे बेहतरीन हिस्सा ।

पहली मोहब्बत, बचपन, उनमें पकडे गए हाथ हम चाहकर भी नहीं छुड़ा पाते । वे हाथ हर बार ही हमें ले जाते हैं उन्हीं गलियों में । खेतों में, खलिहानों में । गाँवों में क़स्बों में और उनमें बसी हुई उन कॉलोनियों में जहां अब भी बसा हुआ है हमारा बचपन । क्रिकेट का बैट पकडे या कोई गेंद फैंकता सा बचपन । छत पर खड़ा पतंग उड़ाता बचपन । कंचों को हाथों में थामें निशाना बाँधती वो आँख । छतों से आँगन में निहारती वो महबूब की मोहब्बत भरी नज़र । सर्दियों की गुनगुनी धूप में अपनी गुलाबी रंगत को बढ़ाती पहली मोहब्बत । वो महबूबा । वो यार जो साइकिल से लगाया करता था रेस ।

वक़्त इरेज़र है तो एक परमानेंट मार्कर भी ।

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मोहब्बत तुम यूँ ही खिलते रहना । महकते रहना ।

>> 18 September 2015

तब तपती दोपहरें हुआ करतीं । दिन लंबे हो जाया करते । धूप हर वक़्त चिढ़ी चिढ़ी सी रहती । शायद एकाएक बढ़ गए तापमान से तालमेल ना बिठा पाने के कारण उसके साथ एक चिड़चिड़ापन आ जुड़ता. मैं तब रेलवे के उस क्वार्टर में किताबों में जी बहलाने के हज़ारों-लाखों प्रयत्न किया करता । कुछ पृष्ठ पढ़ लेने के बाद निगाहें बार बार सिरहाने पड़े फ़ोन पर चली जाया करतीं । मन में प्रतीक्षा की सुइयों का टिकटिकाना तेज़ होता चला जाता । हर बार फ़ोन को खोल देखता कि कहीं कोई मैसेज या मिस्ड कॉल तो नहीं । किन्तु वो ना हुआ करती और हर दफ़ा ही ऐसा हुआ करता ।

दोपहरें लंबी और उबाऊ हो जाया करतीं । फिर किसी बेहद मोहब्बत भरे क्षण में उसका कोई मैसेज आ जाया करता । तब लगता ही नहीं कि मैं यहाँ इस किराये के क्वार्टर में जून की किसी ऊबती दोपहर को खर्च कर रहा हूँ । तब लगता कि मैं उसके साथ हूँ । वो मेरे साथ है । ये मोहब्बत से भरे दिन हैं । जिनमें मैं जी रहा हूँ ।

कभी कभी वो अपने परिवार के लोगों से छुपते छुपाते कोई कॉल कर दिया करती । वो 2-4 मिनट की बात भी लगता कि जीने के लिए नई वजहें दे गयी है । उन मुश्किल भरे दिनों में कभी कभी हमारी मिलने की अंतहीन कोशिशों में कोई कोशिश कामयाब दिखती तो लगता कि जीवन खुशियों का समंदर है ।

इधर उधर उगी बबूल की झाड़ियों के बीच से निकलने वाले उस कच्चे रास्ते से जुडी हैं तमाम यादें. साथ चलते हुए खिलती थीं तुम्हारी मुस्कराहट की कलियाँ. और फिर वे फूल बन हर रोज़ ही मुझे मिलते उस राह पर.

नेशनल हाईवे नंबर दो पर खड़ा मैं तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में तका करता हर उस ऑटो को जो आया करता तुम्हारी ओर से. प्रत्येक क्षण में मैं जीता स्मृतियों के संसार को. भावनाओं का समंदर मुझे बार बार ही आ भिगोता. और जब तक तुम आ न जाया करतीं मैं देखता रहता उस नेशनल हाईवे पर आने जाने वाले हर उस ऑटो को जिसमें तुम मुझे ना दिखा करतीं.

तुम्हारा आना, ऑटो का रुकना और तुम्हारी मुस्कराहट के संसार में मेरा शामिल हो जाना. वे क्षण स्मृतियों के धरातल पर हर दिन ही एक नया पौधा अंकुरित कर देते हैं । हर दिन ही खिलते हैं उनमें मोहब्बत के रंग बिरंगे फूल ।

मोहब्बत तुम यूँ ही खिलते रहना । महकते रहना ।

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स्मृतियों में बचा रहेगा शहर

>> 30 August 2015

अपना क्या है?
वो शहर या गाँव जहाँ पैदा हुआ और फिर जिसे पीछे छोड़ शहर में जा बसा मेरा भरा पूरा परिवार. या वो शहर जहाँ पिता साथ ले आये थे माँ, भाई और बहन के साथ. जहाँ पला बढ़ा, अपनी स्कूल ख़त्म की. या वो बाद का शहर जहाँ मैं अपने परिवार के साथ फिर से जा बसा और अपनी किशोरावस्था से युवावस्था की ओर चलते चले जाने वाले रस्ते पर भटकते हुए संभला. या वो शहर जहाँ अपना प्रोफेशनल कोर्स करने जा बसा और अपने तीन बरस बिताये. फिर बाद के बरसों में जहाँ ज़िन्दगी को जीने लायक बनाने के लिए संघर्ष करने के लिए जा पहुँचा वो बड़ा शहर. जहाँ भाग दौड़ मची रहती है. और जिस शहर से वापस में फिर से एक छोटे शहर जा पहुँचा ये सोच कि कम स कम वहां दो वक़्त की रोटी का इंतेज़ाम तो है. या ये शहर जहाँ आज में बिस्तर पर लेटा हुआ अपने बीत गए दिनों को सोच रहा हूँ.

आखिर अपना है क्या? वो बीत गया वक़्त जो अलग अलग शहरों में बंटा हैं. जिसके साथ बहुत से दुःख और कुछ सुख जुड़े हुए हैं. या वे चेहरे जो मिले और पीछे छूटते चले गए, उनके अपने अपने शहरों में. वो दोस्ती के किस्से, वो आरामतलबियां, वो ठहाके, वो उनका बुरे वक़्त में साथ न देना या कुछ भले चेहरों का आगे बढ़ गले लगा लेना.

वो हर शहर के साथ चिपकी माँ की याद, भाई बहन के साथ बिताये वक़्त की थपकियाँ या अपने इश्क़ की मीठी बातें-मुलाकातें.

बहुत कुछ है समेटने के लिए,  कहने के लिए और ये किस्सा यूँ ही चलता ही रहता है. एक तितली मन के आँगन के फूलों पर बार बार आती है और मैं हर बार ही विस्मय बोध से भर जाता हूँ. मेरे भीतर का रिक्त पड़ा संसार किसी पुराने दृश्य से बार बार भर उठता है. कोई पुराना बचपन का राग स्मृतियों में बज उठता है.

और बीत गए शहर हर दफा ही मेरे सामने आ खड़े होते हैं. कोई चौराहा, कोई किसी शहर की दुकान, किसी बस या ऑटो की सीट पर बैठा मैं, किसी शहर की दीवार पर लगे फिल्मों के पोस्टर, किसी शहर के ठेले पर खड़ा बिरयानी खाता मैं,  या किसी दुसरे शहर के किसी ठेले पर खड़ा छोले कुल्चे खा दिन का कोटा पूरा कर महीने को हाथों में समेटता मैं, किसी शहर के ढाबे में बैठा रूखे तंदूरी आलू परांठे खाता मैं.

किसी शहर में अपनी सरकारी नौकरी की खबर पाकर शाम के समय में झूमता मैं या अपने प्रोफेशनल दोस्तों द्वारा उनके किराये के कमरों से निकाल दिया गया रात के अँधेरे में खड़ा मायूसी में डूबा मैं.

असल में सब कुछ ही तो अपना है. कुछ कुछ हिस्सा हर शहर ने, हर ख़ुशी ने, हर गम ने स्मृतियों में ले रखा है. स्मृतियों का एक अपना संसार है. हम उसमें कुछ भी घटा बढ़ा नहीं सकते. मैं उसमें बसने वाले दुखों से पीछा नहीं छुड़ा सकता. मैं जब तब सामने आ खड़े होने वाले सुखों की लहरों से खुद को भिगोने से नहीं रोक सकता.

शहर दर शहर, हम असल में फ़िल्टर होते चले जाते हैं. हर शहर हम में से कुछ निचोड़ लेता है. शायद इंसान होते रहना ही बचा रह जाता है. यदि हम में बची रह गयी है चेतना तो हम खुद को थोडा बचा कर रख पाते हैं. और इन्हीं सब में कहीं बचा रह जाता है शहर थोडा थोडा. बचपन के पैदा हुए शहर से लेकर हमारे आज के शहर तक.

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सुख क्वालिफिकेशन देख कर नहीं आता

>> 18 July 2015

दुःख न तो कोई क्वालिफिकेशन देख कर आता और नाहीं किसी एक को डिसक्वालिफाई करता. जैसे मेरे स्कूल के प्रिंसिपल के लड़के का दुःख हुआ करता कि वो अपने स्कूल के प्रिंसिपल का लड़का है.

असल में टीचर और प्रिंसिपल के लड़कों की दो प्रजातियाँ होती हैं. एक वो जो बार बार गुस्ताखियाँ कर स्कूल के बाकी लड़कों को पीछे छोड़ टीचरों और अपने बाप यानि कि प्रिंसिपल की नाक में दम कर टॉप रैंक हासिल कर लेते हैं. दूसरी वो जो अपने अरमानों को दबाते, कुचलते अपने बाप के प्रिंसिपल होने का बोझ अपने कन्धों पर लादे घूमते रहते हैं. फींकी हँसी, बनावटी बिहेवियर लिए स्कूल ख़त्म कर लेते हैं जैसे तैसे ये सोच कर कि कॉलेज जैसी चीज़ बची रह गयी है इस दुनिया में.

लेकिन एक पट्ठा इन्हीं दोनों संधि और विच्छेदों को जोड़ बना था. शरारतें ऐसी कि आप करने से पहले सोचो कि इसने ये इजाद कब की और भोलापन मासूमियत की डेफिनिशन को बोल दे कि बहना अपने आप को रीडिफाइन कर लो जाकर.

तो असल बात पर आते हैं. वो ये कि इन्हें प्यार हो जाता है. जब भी कॉन्वेंट की लडकियाँ ग्रुप में निकला करतीं तो ये महाशय किसी के गालों के गड्ढों में डूबते उतराते. वे पूरी तरह क्लीन बोल्ड हो पवेलियन के बाहर से ही हसीं सपनों में खोये पड़े रहते. बाकी के लौंडे भँवरे बन कभी इस फूल तो कभी उस फूल के सपने बुना करते. और डिसाइड ना कर पाते कि कौनसी किसकी भाभी है.

ऐसे ही तमाम रोज़ों के बाद एक अंतिम निर्णय लिया गया कि इजहारे मोहब्बत होना ही चाहिए. कब तलक दर्दे दिल की तकलीफ़ सहेंगे. कब तलक होठों को सिले रखेंगे.

उन्हीं बाद के किसी दिन की खिलती धूप में किसी मोहल्ले के पास के बगीचे के खिले गुलाब को हाथ में लिए शाहजहाँये मोहब्बत सब कुछ लुटा देने को तैयार मैदान में कूद पड़े.

जिन वाक्यों के अंत में ता है, ती हैं, ते हैं आते हैं वे प्रेजेंट इन्डेफीनिट टेन्स के वाक्य होते हैं पढ़ाने वाले मास्साब से सीखी अंग्रेजी के बूते वे साइकिल के सामने आ तो गए लेकिन उसकी रगों में दौड़ती अंग्रेजी के सामने टिक ना सके और अपना क़त्ल खुद क़ातिल अपने हाथों से कर रन आउट हो गए.

बाद में दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है की तर्ज़ पर दोस्तों ने उनको उनके दुखयारे संसार से ये कह बाहर निकाला कि जोड़ी जमी नहीं, कहाँ तो ये और कहाँ वो, यार ये कॉन्वेंट वालियाँ, वगैरह वगैरह करते करते पायथागोरस प्रमेय के अंत जैसा इति सिद्धम लिख दिया.

दोस्ती कुछ हासिल कराये न कराये खुश रहने और रखने के हज़ार बहाने ढूँढ लेती है और बना लेती है.

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ज़िन्दगी बड़ी कलरफुल होती है बर्खुरदार

हम ऐसे स्कूल में थे जहाँ लड़कियों का नामो निशां नहीं था. और जब स्कूल के गेट पर हम अपने ठेले और खोमचे वालों के पास खड़े रह समय को धकेल रहे होते कि भाई अब बहुत हुआ ज़रा आगे बढ़ो. वह बीतता रहता और हम बेमतलब, बिना कुछ खाए दूर से ही ठेलों पर की चीज़ों को ऐसे महसूसते जैसे ये तो खायी हुई चीज़ है. हमें उनसे कोई आसक्ति न होती. असल में बात दूसरी ही होती जोकि हमारे घरों से शुरू हो हम तक ही ख़त्म हो जाती. उन दिनों सभी घरों में 3-3, 4-4 भाई बहन हुआ करते और तब न तो जेब खर्च जैसा चलन था और नाहीं उसके प्रारंभ होने की कोई सम्भावना दिखती. तब जेबें पहले से ही छोटी सिलाई जाया करतीं. और कई दफा तो गुप्त जेबें भी हुआ करतीं जिनमें हथेली भर पैसे किसी गुप्त ज्ञान से बसा करते. कभी कोई भूला भटका रिश्तेदार जाते वक़्त कोई चवन्नी या अठन्नी दे जाया करता तो लगता कि सपनों का एक पूरा संसार दे गया हो. और जब वो एक रूपया होता तो लगता इससे दुनिया का हर सुख हासिल किया जा सकता है. हम उस एक रुपये से मन ही मन ना जाने क्या क्या खरीद लिया करते.

उसी गेट के सामने से जब हमारे स्कूल की आखिरी घंटी टनटनाने को हुआ करती तब किसी कान्वेंट स्कूल की लड़कियों का ग्रुप निकला करता. वे अपनी अपनी साइकिलों पर हुआ करतीं और उन दिनों जबकि हम लड़की और उनके हर किस्म के स्वभाव से अनभिज्ञ थे, उन्हें स्कर्ट पहने साइकिल चलाते हुए जाते देखा करते. और तब लगता कि यह एक सुख है जो उन्हीं लड़कों को हासिल है जो उनके साथ पढ़ा करते हैं. वे अपने अपने ब्लेज़रों और टाईयों में सीलबंद से रिक्शों पर या अपनी अपनी साइकिलों पर आते जाते दिखा करते. उनसे बड़ी जलन हुआ करती. और जब तक वो आगे बढ़ पीक पर पहुँचने को हुआ करती तो हमारे स्कूल के मास्टर अपने हाथों में डंडा लिए हमें गुस्से से पुकारा करते. एक मिनट लेट होना हमें दो तीन चोटें तो खिला ही दिया करता. परन्तु यह हर रोज़ का सा एक बना बनाया खेल सा हो गया.

हममें से कुछ एक्स्ट्रा स्मार्ट एक बिलकुल देशी स्कूल के होने वाले प्रोडक्ट, उन लड़कियों को ताड़ते हुए हदें पार कर सीटियाँ मारते या कोई मोहब्बत भरी बात कह दिल जीतने की कोशिशें किया करता. मोहब्बत से तो हर कोई देखा करता लेकिन सबकी मोहब्बतों में फर्क हुआ करता.

फ्यूचर तब दूर से हम वैदिक विद्यावती इंटर कॉलेज के लड़कों को देख मुस्कुराता हुआ हमारे बचपने पे कभी लाड़ तो कभी तंज कसता होगा. और कहता जरुर होगा मन ही मन खुद से कि अमाँ छोडो यार कर लेने दो दिल्लगी. ज़िन्दगी खुद ही दे देगी तज़ुर्बे. तुम क्यों कॉलर ताने खड़े हो मियां. तुम्हारा क्या छीन रहे हैं.

और क्या पता कल को पाला बदल जाये और कोई शोख हसीना मोहब्बत कर बैठे और बन जाये कोई फ़साना.

जिंदगी बड़ी कलरफुल होती है बर्खुरदार.

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उनींदी रातें

>> 13 July 2015

तुम नहीं हो फिर भी हो. दिन भर महकता है ये घर. इसमें बसी है खुशब तुम्हारीू. मैं नहीं खोलता खिड़कियाँ सारीं और आहिस्ता से खोलता हूँ दरवाज़े इसके. कि तुम अब भी हो, यहाँ हर कोने में.
सुबहें दोपहरों तक खींच ले जाती हैं खुद को जैसे तैसे. शामें बहुत याद दिलाती हैं तुम्हारीं.
तुम जब थीं तो बरसता था गुस्सा , कि वक़्त ही नहीं है तुम्हारी जेबों में खर्च करने के लिए. अब जेबें फटी फटी सी हैं मेरी. कि वक़्त पुराने लम्हों में जीता है.
तकिये के नीचे रख छोड़ी थीं जो तुमने अनगिनत कहानी, वे पूरेपन में मेरी रातों में शामिल हो उठती हैं.
तुम दिन में, सुबह में, शामों में और उनींदी रातों में, हर लम्हे में बेइंतहा याद आती हो.

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ज़िंदगी के साइड इफेक्ट्स

कहीं किसी रोज़ में मिलूँगा तुमसे किसी अजनबी की तरह. हम जानते हुए भी नहीं बोलेंगे एक लफ्ज़ भी. तुम मुझे भुला दिए हुए किसी ख्वाब सा सोचोगी फिर भी. मैं जानकार भी अनजान बना रहूँगा तुम्हारी उपस्थिति से. क्या इतने पर भी भुला दी जाएँगी चाँदनी रात में तेरी गोद में सर रखकर जागी रातें. क्या भुला दोगी तब तक, तेरे गालों की हँसी पे लुटाया था हर दिन थोडा थोडा, क्या मेरे सीने में तब भी धड़केगा दिल वैसे ही.
क्या चाहकर भी नहीं जानोगी उस कही कविता के हश्र के बारे में. जिसे किसी एक रोज़ सिरहाने पर रखी किताब में पढ़ना चाहा था तुमने. क्या याद होगा तुम्हें वो नाम अब तक जो पुकारा करती थीं मोहब्बत भरे दिनों में. क्या साँसे वैसी ही चलती होंगी या सीख लिया होगा तुमने कोई नया कैलकुलेशन.
जब हम मिलेंगे फिर से कभी कहीं. क्या तुम उधार दे सकोगी अपनी मुस्कराहट उस पल के लिए. या सिमट जाओगी खुद में ही और कहोगी कि तुम बेहतर हो. और पूँछ कर तुम मिटा देना चाहोगी कि तुम कैसे हो, पुरानी सभी संभावनाओं को.
मैं फिर भी उस दिन को भर लूँगा अपनी आँखों में और सोचूँगा कि तुम अब भी नहीं उबरी हो जिंदगी के साइड इफेक्ट्स से.

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मन का पोस्टमार्टम-1

हम सब एक दिन चले जाने के लिए ही आये हैं लेकिन क्या हम वो कुछ कभी कर पाए जो करने के लिए हमारा दिल आ आकर गवाहियाँ देता है. मन काउंसलर बना हमें बार बार समझाता है कि तुम ये नहीं, ये करने के लिए बड़े भले लगते हो.
कितनी दफा सुनते हैं हम अपने काउंसलर मन की आवाजों को. क्या अन्य तमाम तरह की आवाजों की तरह ये आवाजें भी गम हो जाने के लिए लगायी जाती हैं.
असल में हम हर रोज़ ही अपने आप से कितना दूर होते चले जाते हैं. अपनी पीतल पर सोने का झूठा रंग चढ़ाये जाते हैं और भूल जाते हैं कि ये कच्चे रंग एक दिन उतर जाने हैं.
जब हमारा मन पहली बारिश में नाचने का करता है तो क्या हम नाच पाते हैं. क्या हम दिल में अटकी किसी बात को होठों तक ला पाते हैं. क्या हम खुले रास्तों पर गाने का दिल होने पर गा पाते हैं.
फिर वे कौन से क्षण होंगे जब हम जी सकेंगे जिसे हम दुनियादारी में भुला आये हैं. क्या पानी का वो सोता हम दुनिया के सामने खोल सकेंगे.

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कस्बाई मोहब्बत

अभी दौड़ती भागती ज़िन्दगी ने वहां दस्तक नहीं दी थी. किसी को भी कहीं पहुँचने की बेताबी नहीं थी. इक छोटा सा क़स्बा था. अभी भी अपने होने की पहचान लिए खड़ा था.
ना तो उसे रफ़्तार का शऊर आया था और नाहीं उसे अपने सुस्ताने का कोई ग़म. चन्द दुकाने थीं कहने को, जिससे जीवन अपनी इच्छाएं पूरी करने में समर्थ था. नई इच्छाएं उग आने का फिलहाल कोई ख़ाद पानी डाला नहीं गया था.तो बंद मुट्ठी से जीवन में भी ख़ुशी कम नहीं आंकी जाती थी.
इन्हीं क़स्बाई दिनों में उसकी धड़कने संगीत सी बजने लगती थीं. जब जब वो बस की उस खाली सीट पर आ बैठती. जिसे कितने ही जतन से वो एक लम्बी दूरी से बचाए हुए आता. उस एक रूट की एक ही बस तो थी वो. जिसे वापसी में भी सवारियां भर उन्हें उनके गांवों और कस्बों में छोड़ना होता.
बाद के दिनों में धीरे धीरे बाकी की सवारियों ने उसके पास की सीट पर बैठना ही छोड़ दिया था. और जब उसके क़स्बे के जबरन बनाये गए बस स्टैंड नुमा जगह पर बस रूकती तो वह आती और उस सीट पर बैठ जाती.
कितना कुछ अनकहा था जो उमड़ता रहता मन के भीतर और हर रोज़ ही मोहब्बत का पौधा कुछ और बढ़ जाता.
अभी तक स्मार्ट फ़ोनों ने ठीक से दस्तक नहीं दी थी. कुछ शौक़ीन जबरन ले भलें आते थे लेकिन बिना इन्टरनेट उस पर खेले गेम ही जाते थे या जब मन ऊब जाये तो तसवीरें खीच लो और गाने सुन लो.
लड़के के पास एक पुराना मोबाइल तो था लेकिन वो उसके इश्क़ में कोई मददगार नहीं हो सकता था. लड़की कस्बों में मोबाइल नहीं रखा करती थीं. और नंबर की अदला बदली की नहीं जा सकती थी.
तब ऐसे ही किसी रोज़ बस के शहर में रुकते और लड़की के उतरते हुए. लड़का दौड़ा था फिर पास आकर लड़के ने लड़की का छूट गया बैग थमाया था. घबराहट और शर्माने की मिली जुली प्रतिक्रिया में लड़की धन्यवाद कहना भी भूल गयी थी. हाँ कुछ दूरी तक चलते हुए एक बार उसने मुड़कर देखा था. तब लड़का उसे वहीँ खड़ा हुआ दिखा था. उसे जाते हुए देखते हुए.
तब असल में उनकी उस प्रेम कहानी का पहला दिन था. शायद पहला क्षण. उस एक रोज़ के उस वाक्ये ने बीच की खायी को पाट दिया था. जिस पर चल वे दोनों मिल सकते थे. एक दूसरे की भावनाओं को महसूस सकते थे.
उसी इक दिन में कितना कुछ बदल गया था. अब लड़के की एक पहचान थी. उसका कोई एक नाम था जो जाना जा सकता था. और शायद मोहब्बत में पड़ वो नाम अपनी स्मृतियों में लिखा जा सकता था.

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आरजुओं के फूल मन के आँगन में खिलते हैं

>> 10 July 2015

आरजुओं के फूल हर रोज़ ही मन के आँगन में खिल उठते. और मन बावरा हो झूमता.

उन दिनों भावनाओं का समुद्र जो उमड़ता तो फिर ठहरने का उसमें सब्र ही न होता.दिल कहता कि ये जो मन की कोमल सतह पर हर रोज़ ही उग आती हैं और दिन ब दिन बढती है चली जाती हैं. इन्हें किस तरह से थामूं या कि उगने दूं और फिर किसी एक रोज़ उससे कह दूं कि "तुम जो पास होती हो तो फिर कुछ भी और पा लेने की इच्छा बची नहीं रह जाती".

मैं हर आने वाले नए दिन में अपने दिल को टोकता लेकिन वह तो जैसे पतंग बन हवाओं में उड़ता ही रहता. उन क्षणों में फिर उस अनुभूति को महसूसने के सिवा और कुछ नहीं होता. हरदम ही उसकी मुस्कराहट, उसका चलना, उसका बोलना सामने आ आ खड़ा होता. और फिर दिल चारों खाने चित्त हो जाता.

दिल पतंग सा, रखकर काँधे पे आरजुएं, उसके दुपट्टे सा फिजाओं में उड़ता फिरता. उड़ता ही फिरता.

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मैं लिखता हूँ क्यों

न लिखना जब गुनाह सा लगने लगे, तब तब लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ काले अँधेरे उजियारों में, मैं लिखता हूँ अधूरे दिनों की पूरी रातों में.

जब भरम पिघल जाये और कानों को गलाने लगे, तब तब लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ उगे हुए सूरज में जी सकने के लिए, मैं लिखता हूँ आत्मा से नज़र भर मिलाने के लिए.

जब रोना सुकूँ लगने लगे और हँसना एक बहुत बड़ा गम, तब तब लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ कि लिखा जा सके प्रेम में डूबे महबूब का गम, कि टूटे पंख लिए परिंदा कोई जब भरता है अपने दिल में उड़ने की अभिलाषाएं. मैं लिखता हूँ कि लिखना रचता है मेरी अभिलाषाओं का संसार.

जब तलब उठती हो और बुझायी न जा सके उसकी जलती लौ. मैं लिखता हूँ.

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बारिशों का शहर

ये शहर बारिशों का सा शहर जान पड़ता है. जागती रातों में जब बाहर खिड़की के मुहाने पर खड़े केले के पत्तों पर बारिशों का संगीत बजता है तो लगता है तुम्हें यहीं होना चाहिए था. जो तुम होतीं तो मैं बाँट सकता अपने भीतर भर आये सुख के कुँए को पूरा पूरा.

जब सबका सवेरा सो जाता है तब उगने लगता है मेरे भीतर रचे संसार का सूरज. जो तुम होतीं तो मैं बाँटता अपने धूप का आँगन.

बारिशें थमतीं नहीं अक्सर. यहाँ पेड़ों की शाखों पर बजती है कोई धुन रह रहकर. कि जो तुम होतीं तो गीत कोई गुनगुनाता मैं.

मैं हूँ शामिल इन सब में लेकिन फिर भी मुस्कुराती नहीं आँखें, कि तुम बिन सब कितना अधूरा है.
यहाँ हर रोज़ ही बरसता है बादल, कि ये शहर बारिशों का सा शहर जान पड़ता है.

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इच्छाओं का भंवर

>> 09 July 2015

इच्छा कहाँ से उपजती होगी. अधूरेपन से या पूरेपन से. पूरापन कभी किसी को कहाँ हासिल हुआ है और जब कभी जो हासिल ही नहीं हो सका उसे फिर पूरापन किन अर्थों में कहा जाये.

असल में अधूरापन इच्छाओं का दमन करके पूरा किया नहीं जा सकता तो फिर हम कहाँ से कहाँ को भाग रहे होते हैं.

ज़िन्दगी के एक छोर से उस दूसरे छोर तक जहाँ इन सबके न जाने क्या अर्थ बचे रह जाते होंगे.
या दोनों छोरों के मध्य पसरी दूरी को नापने की ज़िद. उस ज़िद को कोई दौड़कर करता है तो कोई सुस्ताता हुआ.

क्रिएटिविटी जिन किन्हीं खानों में रखी जाती हो. होती बड़ी भली भली है. वो इन छोरों को नापने का हौसला भरती है. नई ऊर्जा का संचार करती है और जो राहतों का समन्दर दिखता है कहीं मध्य में वो शायद इसी भली चीज़ की भलमनसाहत है.

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वक़्त और इंसान

एक वक़्त में इंसान कुछ हो जाना चाहता है. वो उस होने के लिए जूझता है, संघर्ष करता है. दूसरों से सुलझता है और खुद में उलझता है.

वो हो जाना असल में उस वक़्त में होता नहीं जिसमें उसके लिए तत्परता होती है.
और फिर जब वही सब एक-एक कर सामने होती हुई दिखती हैं. तब तक उनके लिए सोचा और महसूसने के लिए रखा सुख उड़नछू हो चुका होता है.

जिन पहले की सोची गयी बातों को आप गुजरे वक़्त से वर्तमान में ला स्वंय से भी बोलते हैं तो उनसे जुड़ा सुख बहुत पहले ही वाष्पित हो चुका होता है. और आप फिर फिर नया कुछ हो जाने के लिए स्वंय को उन्हीं संघर्षों में घसीट लाते हैं.

मन का होना मनमाफिक समय से तालमेल बिठाने में पिसड्डी खरगोश होता चला जाता है.

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इकरारे मोहब्बत

ठीक ठीक तो नहीं बता सकता कि कब उसे देख मेरे दिल की हार्ट बीट अपने नार्मल बेहवियर की शक्लो सूरत बदलना सीखी थी लेकिन इतना तय था कि वो फरवरी की धूप सी लगने लगी थी.
मैं जिस इंस्टिट्यूट में चन्द रोज़ पहले पढ़ाने के लिए दाखिल हुआ था. वो बाद के दिनों में उन्हीं क़तारों में शामिल हो गयी जिनका में हिस्सा था. बच्चों की वे कतारें हमें हमारा स्पेस देतीं. और तब उन्हीं क्षणों में एक छोर को छोड़ दूजे को पकड़ने के मध्य में हीं उसकी आँखें मेरी चोर निगाहों को पकड़ लेतीं. मैं जान कर ये जतलाता कि अभी के बीत गए क्षणों में जो भी और जितना भी भर हुआ था उसमें मेरा कोई कसूर नहीं है.
जब वो कॉरिडोर से गुजरती तो दिल अपनी नार्मल स्पीड छोड़ देता. वो सीधे सपाट हाईवे को छोड़ प्यार की पगडण्डियों पर चलने लगता. जिसके दोनों और दूर तक फैले बसंती सरसों के फूल खिल उठे हैं. और वो पगडंडियों से होता उनमें उसकी शक़्लें तलाशने लगता.
ये इतना भर होता तो भी दिल अपने आप को संभाल लेता लेकिन जब वो अपनी मुस्कुराहटों के फूल बिखेर देती तो लगता जीवन बस यही है. कितना सुखद और कितना मासूम.
जब घड़ी आखिरी के क्षणों के लिए टनटनाने लगती तो दिल उदासियों से भर उठता. फिर उसके बाद की दोपहरें कहीं किसी किताब के किसी पन्ने पर अटक जातीं और शामें बेवजह के ख्यालों से गुजरती हुई उसकी यादों को समेट लातीं. रातें बेचैनियों में शामिल ख़ुशी में करवटें बदलतीं. और जब सुबहें सिरहाने आ मेरे दिल को टटोलतीं तब वो उस कॉरिडोर में टहलने को चला जाता जहाँ किसी बीते दिन में वो मुझे देख कर भी न देखना जता रही थी.
दिन तब धीमे धीमे महीनों में तब्दील होते चल दिए थे और मेरा कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म होने की कगार पर था. वो वहां स्थायी थी और मैं अस्थायी. तब मेरे दिल ने मुझसे सवालात करने प्रारम्भ कर दिए थे. जिनके उत्तर मुझे उलझा दिया करते. और जब उलझने बहुत बहुत बढ़ गयीं तब मैंने स्वंय से ही जवाब जानना चाहा था. क्या इक़रार करना इतना दुरूह है.
और इन्हीं सवालों और जवाबों की कशमकश से जूझता में उसके सामने था. वे बिल्कुल आखिरी के दिन थे और तब उन्हीं क्षणों में मैंने दिल की राह पर चलते चलते उससे कहा था "तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो".
वो मुस्कुरायी थी और उन फ्रीज़ हो जाने वाले क्षणों में उसने कहा था "मैं जानती हूँ".
अबकी दफा मुस्कुराने की बारी मेरी थी.
वे क्षण स्मृतियों के धरातल पर बीज़ बनकर गिरे और बाद के दिनों में उनमें हर रोज़ ही नई नई किस्मों के तमाम फूल खिलते ही गए. खिलते ही गए.

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प्रेम में होना

सबसे मुश्किल है प्रेम में होकर प्रेम गीत लिखना या लिखना कोई एक प्रेम कहानी. प्रेम में होना बना देता है साधारण सी प्रतीत होने वाली भावनाओं को दुरूह. प्रेम फिर केवल प्रेम भर नहीं रह जाता.
वो हो जाता है हिमालय की चोटी पर पहुंचे उस नई नई उम्मीदों से भरे पर्वतारोही सा. वो दिखता है, सुनाई पड़ता है लेकिन फिर भी अंत में आकर महसूसना भर रह जाता है.
बावजूद इसके कि करते हैं आप लाख प्रयत्न प्रेम नहीं सिमट कर आता किसी प्रेम कविता में.
प्रेम जतलाया जाना भी हो जाता है धीरे धीरे स्वंय जैसा. और आप रीते खड़े असहाय से बोल देते हैं पहले से बोलते आ रहे शब्दों को.
प्रेम बेजुबान एक स्वाद है. प्रेम बिना आवाज़ों का कोई संगीत जो बजता है भीतर ही भीतर और आप महसूसते हो उसे हर इक नए क्षण.
प्रेम केवल होना ही भर नहीं है.

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प्रतीक्षा मन के धरातल पर रेंगती रहती

लड़का बेरोज़गारी से जूझते दिनों में घंटों उसकी प्रतीक्षा करता. घंटे पहले सेकंड से प्रारम्भ होते और फिर ऐसे कई कई सेकंड प्रतीक्षाओं के जुड़ मिनटों में तब्दील हो जाते और ये पहाड़ी रास्तों से दुर्गम मिनट ऐसे आगे बढ़ते जैसे घंटों की खोज़ की जानी हो. और ये काम इन्हीं को सौंपा गया हो.
सुबहें पहले दोपहरों में तब्दील होने में आनाकानी करतीं और फिर शाम तक पहुँचने में उन पर सुस्ती छा जाती. लड़का हर आने जाने वाली विभिन्न किस्मों की गाड़ियों को देखता और ये जानते हुए भी की शाम होने में अभी इतना समय है जितने में वो उस सामने के पार्क में उतनी ही बार बेवजह एक जगह से उठ चहलकदमी करता हुआ दूसरी जगहों पर बैठ सकता है जितनी दफा वो पहले ये सब कर चुका है. उन गाड़ियों में रह रहकर उसके होने का आभास होता.
वो दीवारों पर लगे फिल्मों के पोस्टर देखता और उनसे जोड़ मन ही मन नई नई कहानियां बुनता, उन्हें उधेड़ता और फिर से बुनने में लग जाता. हालाँकि उसने उनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं देखी थी फिर भी सोचता कि कभी किसी रोज़ अगर लड़की ने कहा कि चलो ये फ़िल्म देखते हैं तो फिर वो क्या करेगा. उसे किस तरह मना करेगा की वह यह फ़िल्म नहीं देख सकता क्योंकि वह अपने मन में इसे कई कई दफा पहले देख चुका है. यह एक तरह की पीड़ा है कि आप जैसा सोचते रहे हों वो वैसा न निकले. और वो इस नई पीड़ा से नहीं जुड़ना चाहता था.
कभी कभी लड़की जल्दी आ जाती तो लड़का वहीँ अपनी उसी बनायीं हुई दुनियां में अटक रहता. जब लड़की उसे बाहर हाथ पकड़ वापस अपनी दुनिया से ला जोड़ती तब उसे एहसास होते कि पीछे वो प्रतीक्षाओं की अंतहीन लड़ियाँ तोड़ कर बाहर लाया गया है.
वो होता इस संसार में किन्तु पीछे रह गए रचाये हुए संसार की स्मृतियाँ उसका पीछा करती ही रहतीं.
कहते हैं प्रतीक्षा मन के धरातल पर रेंगती हुई दूरियां नापती है.

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उलझा उलझा बचपन

>> 07 July 2015

मन पर बने घावों के निशाँ कभी नहीं मिटते. बचपन की स्मृतियों में उलझा वो बच्चा रह रहकर याद हो आता है जिसे कभी ये समझ नहीं आता था कि वो कौनसी बातें रहती होंगीं जिनको लेकर उसकी माँ आये दिन पिटा करती है. वो बच्चा भरे हुए स्कूल में बेहद अकेला डरा डरा घूमा करता. न जाने कौनसी उधेड़बुन में लगा रहता. उसे घर जाने से डर लगा करता. वो असल में स्कूल की चाहरदीवारी में खुद को कैद कर लेना चाहता.
जहाँ बच्चे स्कूल की टनटन से ख़ुशी में झूम झूम उठते वो सहम जाया करता. वो पतंगों को देख पतंग बन कहीं दूर उड़ जाना चाहा करता. लेकिन ये उसकी चाहना भर ही रह जाया करती जो कभी पूरी न हुआ करती.
वो सोचा करता कि तीसरी मंज़िल से अपने हाथ फैलाये चिड़ियों की तरह कूदे और यहाँ से कहीं दूर निकल जाये और जब वापस आये तो माँ के पास कोई दुःख न हो और नाहीं घावों के निशाँ.
वो मन भर रो लेना चाहा करता किन्तु उसका मन कभी न भरता. हर जगह थी तो केवल रिक्तता. और मन पर बने उसके घावों के निशाँ दिन ब दिन गहरे होते ही चले जाते. होते ही चले जाते.
बचपन कभी धुन्धलाता नहीं वो केवल बड़प्पन में पीछे से रह रह झाँकता रहता है.

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दिल आज भी तुम्हारी मोहब्बत की बारिश में भीगा हुआ है मेरी जाना.

वो यही कोई रूमानियत से लबालब बारिशों भरी दोपहर थी. यहाँ वहाँ अपने अपने बस्तों को अपने नाज़ुक कन्धों पर लादे बच्चे यहाँ वहां भर आये पानी पर छपा छप खेलने में उत्साहित से दिख जाते. पेड़ धुले धुले गर्मी से राहत की साँस भरते मुस्कुराते हुए किनारों पर खड़े हर आने जाने वालों पर चिढातेे से पानी की बौछारें फैंक दिया करते.
कहीं कोई जल्दी नज़र नहीं आती थी. यूँ लगता कि अभी अभी जो सुबह बीती है वो भी कह रही हो कि मुझे भी अपनी इस ठंडक में शामिल कर लो.
सवारियां ऑटो में लदी हुईं न जाने कहाँ से कहाँ को जाने में बेचैनी दिखा रहीं थीं. उसी किसी खूबसूरत क्षणों में वो भीगता रिक्शा न जाने कहाँ से कहीं को न जाने के लिए चलते चला जा रहा था. तब मैंने ही हाथ दिया था शायद उसको. हाँ मैंने ही दिया होगा. तब तुमने ही कहा था कि थोडा रुकते हैं. लेकिन तुम्हें बारिशें कितनी तो भाती हैं ये खबर थी मुझको.
बारिशों ने तब उस मौसम की पहली आमद दी थी. बिना छतरी वाला रिक्शा था और हम भीग जाना चाहते थे. तब तुमने कहा था कि कोई क्या कहेगा कि देखो तो भीग जाने के लिए रिक्शे पर बैठे हैं. और मैं मुस्कुराया भर था.
बारिश की नन्हीं नन्हीं बूँदें हमारे चेहरों को आ हमें शायद ये बता रही थीं कि अभी हम जीना भूले नहीं हैं. उन्हीं किन्हीं क्षणों में तुम्हारे गाल को चूमा था मैंने. और तुम शरमा कर रह गयीं थीं. तब तुमने कहा था कि किसी की भी फ़िक्र नहीं करते. और मैंने कहा था की सामने फिक्र करने वाला मुझे कोई आता दिखाई नहीं पड़ता. तब तुम मुस्कुराई थीं और हँसते हुए कहा था कि और पीछे. मैं पीछे आती स्कूल के बच्चों की साइकिल की कतार को देख कितना हँसा था.
उस भीगते दिन में मैंने कहा था कि मैं इस शहर में यूँ ही बेपरवाह अपनी सारी ज़िन्दगी तुम्हारे साथ इसी तरह रिक्शे पर बैठ घूमना चाहता हूँ. उस रोज़ उस बारिश ने भी उस खुदा से हमारे लिए दुआ माँगी होगी. और शायद उन रिक्शे वाली भैया ने कहा हो आमीन.
दिल आज भी तुम्हारी मोहब्बत की बारिश में भीगा हुआ है मेरी जाना.

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साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

उन ऊँघती शामों को जो धीमे धीमे अँधेरे की गिरफ़्त में चले जाने को हुआ करतीं किन्तु कहीं से भी उनकी उन क्षणों की आभा से लगता बिल्कुल नहीं था. सूरज गुलाबी हुआ करता और रात की देहरी पर टंगा हुआ सा जान पड़ता था. हाँ तमाम किस्म के पंक्षी अवश्य ही अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर दिखते. जैसे एक मजदूर सुबह से शाम तक की दिहाड़ी कर घर को लौट जाना चाहता हो.
वो किन्हीं दो बड़े शहरों के मध्य नाम के लिए बना दिया गया स्टेशन था. ऐसे जैसे कि सुस्ताने के लिए कहीं तपती दोपहरों में बीच राह में कोई झोंपड़ी या कोई पेड़ों का कोई छोटा बागीचा. जहाँ ठहरने वालों को कहीं से कहीं को नहीं जाना होता. हाँ राहगीर को वे सुस्ताने के लिए, ज़रा दम भरने के लिए सुकून भरी छाँव अवश्य देते हैं. उसी तरह का दूर से दिख जाने वाला वह स्टेशन मुस्कुराता सा खड़ा रहता. बड़ी गाड़ियाँ वहां जब तब सिग्नल पास होने के लिए सुस्ताती दिख जाती थीं. और छोटी गाड़ियों के लिए वहां बैठे बेफिक्र लोग बतलाते बतलाते अपने घरों की, अपने परिवारों की बातों में मशग़ूल हो कब अतीत में चले जाते मालूम ही न पड़ता.
उन्हीं दिनों में तुम मुझे बहुत बहुत याद आया करतीं. मैं उस स्टेशन के नाम के लिए कहे जाने वाले प्लेटफार्म नंबर दो पर बैठा तुम्हारे बारे में सोचा करता. सुबहें कट जाया करतीं लेकिन दोपहरें अक्सर शामों का इंतज़ार किया करतीं और मैं और मेरा भरा पूरा अकेलापन देर तलक उस प्लेटफार्म पर अटके रहते. कहीं से कहीं भी न जाने के लिए.
उदासियाँ अक्सर स्मृतियों में आ आकर झाँका करतीं. और मैं उन्हें परे धकेलने के अंतहीन प्रयत्नों में लगा रहता. यहाँ तक किन्हीं कमजोर क्षणों में मैं मरने के ख्यालों से घिर जाता.
कहीं कोई तो ऐसी डोर होगी जो हमें जोड़ती होगी. इन्हीं और ऐसी तमाम बातों और हो सकने वाली भविष्य की कामयाबियों के बारे में सोचा करता.
वो तुम्हारी मोहब्बत ही थी जिसने इतना कसकर मुझे मुझ तक पहुँचने वाली विश्वास भरी डोर से बांधेे रखा.
वो मेरी उदासियों का और कभी कभी मिल जाने वाली खुशियों का साथी प्लेटफार्म नंबर दो आज भी ज़ेहन में मुस्कुराता सा खड़ा है. जिस पर सुस्ताने के लिए या अपने ग़म साझा करने के लिए लोग और रेलें ठहर जाया करती थीं.
साथियों की कोई क़ुअलिफिकेशन्स या डेफिनेशन्स नहीं हुआ करतीं.

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