तुम बिन मेरी भाषा की पवित्रता बची नहीं रह जाती

>> 15 May 2011

सुबह से शाम तक तुम्हारी आवाज़ के लिए तरसता रहा. हमारी स्मृतियों के आईने में तुम्हारा होना खोजता रहा. उलट-पलट के उन बीत गए बेतरतीब पलों की श्रंखलित कड़ियाँ बनाने का प्रयत्न करता रहा किन्तु हर नए क्षण यह ख़याल हो आता की किस पल को कहाँ जोडूँ. हर लम्हा जो तुम्हारे साथ बिताया है वो बेशकीमती है. तुम्हारी उजली हंसी की खनक कानों में रह-रह कर गूंजती रही. मन की रिक्तता को भरने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु तुम नहीं तो कुछ भी नहीं. तुम जब पास होती हो तो कुछ भी और पा लेने की तमन्ना बची नहीं रह जाती. जीवन में तुम्हारे सिवा मुझे और कुछ नहीं चाहिए. तुम हो तो सब कुछ है, नहीं तो कुछ भी नहीं.

भावनाओं के समुद्र से तैरकर बाहर आने का मैं लाख प्रयत्न करूँ किन्तु हर बार ही डूब-डूब जाता हूँ. कई दफा मैंने इसके परे भी जाने का प्रयत्न किया है और जानना चाहा है कि क्या यह केवल प्रेम की कोमल भावना ही है ? इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं ?

मन का पोस्टमार्टम कर देने से केवल उसकी चीर-फाड़ ही संभव है. उसमें बसी आत्मा फिर भी कहीं रह जाती है. सच कहूँ तो तुम मेरे मन की वह आत्मा हो.

देर रात तक करवटें बदलता रहा. मन उदासियों से भरा हुआ था. कई दफा मन को बहलाने का प्रयत्न करता रहा. किन्तु यह संभव ना हो सका. तुम्हारे बिना कुछ भी तो अच्छा नहीं लगता. ना गीत गुनगुनाना, ना कविता बुनना और ना ही किसी कहानी की तिकड़मबाज़ी करना. तुम बिन मेरी भाषा की पवित्रता बची नहीं रह जाती.

दो बजे हैं और चार को तुम्हें जगाना भी है. जहाँ दूर कहीं तुम न जाने सो रही होगी या जाग रही होगी. जानता हूँ यही कहोगी कि देखना तबियत ख़राब कर ली तो तुम से बात नहीं करुँगी.

अभी-अभी मर जाने का ख़याल आया और मैंने उसे चले जाने दिया. याद हो आया तुम्हें मेरे साथ एक लम्बी जिंदगी जीनी हैं.

8 comments:

akhtar khan akela 15 May 2011 20:30  

bhtrin bhtrin .akhtar khan akela kota rajsthan

प्रवीण पाण्डेय 15 May 2011 20:47  

क्या कहूँ, बस प्रभावित हूँ।

kshama 15 May 2011 21:28  

Diary numa aapka lekhan,bahut,bahut achha lagta hai....!

संगीता पुरी 15 May 2011 22:23  

अच्‍छा लिखा .. शुभकामनाएं !!

अवनीश सिंह 16 May 2011 10:08  

सुन्दर लेख |
अंतिम पंक्ति ने लेख को सार्थक बना दिया |

वन्दना 16 May 2011 13:37  

हमेशा की तरह भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति।

दिगम्बर नासवा 16 May 2011 14:39  

अनिल जी .. बहुत समय बाद आज फिर वही मज़ा आ गया ... मान करता है बस पढ़ते जाओ ... पढ़ते जाओ ... कैसे हैं आप ... अभी फरीदाबाद में ही हैं या कहीं और ...

Er. सत्यम शिवम 16 May 2011 14:53  

बहुत सुंदर ..क्या कहूँ...आपकी हर रचना लाजवाब है।

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