कि ये लोकतंत्र है

>> 02 November 2009

हम अंधे हैं
और बहरे भी

या हम देखना चाहते हैं
चंद कपडों में परोसी गयी
परदे पर नग्न स्त्री

और सुनना चाहते हैं
रेडियो पर पॉप संगीत
और अपनी सलामती की खबरें

हम इंतजार करते हैं
हमें मारने वालों के लिए
इन्साफ का

देखते हैं, सुनते हैं
और फिर भूल जाते हैं
लाल किले पर खड़े होकर
दिया जाने वाला भाषण

हमें बताया जाता है
बार बार
कि ये लोकतंत्र है

33 comments:

रश्मि प्रभा... 2 November 2009 at 14:58  

लोकतंत्र ! जितनी नागवार बातें हैं,उनको प्रस्तुत करना और खुलेआम डट के खड़े हो जाना
लोकतंत्र है ..........

महेन्द्र मिश्र 2 November 2009 at 15:18  

बहुत बढ़िया पर भाई लोकतंत्र में नेता अंधे और गूंगे होते है अपुन नहीं ?

अम्बरीश अम्बुज 2 November 2009 at 15:26  

हम इंतजार करते हैं
हमें मारने वालों के लिए
इन्साफ का

bahut sahi....
jai hind...

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) 2 November 2009 at 15:37  

लोकतंत्र की सच्चाई कड़वी लेकिन यह अभिव्यक्ति मधुर

हैपी ब्लॉगिंग

सुशील कुमार छौक्कर 2 November 2009 at 16:04  

आज भी अच्छा लगा आपका लिखा कुछ अलग सा पढकर।
देखते हैं, सुनते हैं
और फिर भूल जाते हैं
लाल किले पर खड़े होकर
दिया जाने वाला भाषण

सच तो अब वो भाषण नही रहे और ना ही उन्हें सीरियस लेने वाले।

बहुत खूब।

ओम आर्य 2 November 2009 at 16:32  

yah jantantra sirf naam ke liye rah gayi hai .............yaha janata ke pratinidhi sirf chunkar jaate wakt tak sab yad rakhate hai sata our kursi pane ke bad kuchh yad nahi rakhate hai ...............andhe neta hai hamare desh ke ..........sundar

shikha varshney 2 November 2009 at 16:45  

wowwww SPLENDID!बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है.

महफूज़ अली 2 November 2009 at 16:54  

Bahut...........badhia.........

DEMOCRACY IS THE GOVERNMENT OF FOOLS AND LEADS BY AN IDIOT...

अर्कजेश 2 November 2009 at 16:56  

कोई भी तंत्र होगा उसकी हालत खराब कर दी जायेगी । संविधान निर्माताओं ने तो सबसे कम बुराइयों वाला तन्त्र चुना था ।
समस्या चरित्र की है, तंत्र चलाने वालों के । उसमें सुधार कैसे हो ।

Udan Tashtari 2 November 2009 at 17:54  

न बतायें तो हम भूल ही जायें कि यह लोकतंत्र है.


बहुत गहरी चोट कर रही यह रचना.

Ashish (Ashu) 2 November 2009 at 18:29  

सत्य वचन भाई छोटी सी कविता मे बहुत कुछ कह गये आप धन्यवाद

Priya 2 November 2009 at 21:29  

Anil agar aapki rachna ki baat sirf karoon to yahi kahoongi ki shabdo ke sanyojan se aaj ke loktantra ko bakhoobi utara hai aapne blog ke canvas par.......Lekin jab baat desh ki sirf itna kahna hai...ki akele kuch nahi hota .....agar ladna hai in buraiyon ke khilaaf to ekjut hona hi padega....warna sirf kalam chalegi.....karm jas ke tas

Shobhna Choudhary 2 November 2009 at 21:59  

ek satya likh diya aapne...aaj kal hum pata nahi kis disha main chale ja rahe hai....

Pankaj Upadhyay 3 November 2009 at 02:00  

ji ye loktantra hai apni kuch achhhaiyon aur bahut saari buraiyon ke saath :)

achha likha..

Sudhir (सुधीर) 3 November 2009 at 08:24  

अनिल जी,

राष्ट्र के लिए कुछ करने के कामना तो हर कोई करता हैं किन्तु सोचे हमे इसे मूर्त रूप देने के लिए क्या किया....आज के लोक्तान्रा की सही परिभाषा दी आपने पर आज के युवा को भी ललकारा जाना कहिये - वो जवानी ही क्या जो वक्त की बाजू न मरोड़ सके लोकतंत्र पर रोने के स्थान पर हम आप कुछ करे तो क्या अच्छा होगा...

Anil Pusadkar 3 November 2009 at 10:26  

बताया जाता है बारबार कि ये लोकतंत्र है,सटीक।

richa 3 November 2009 at 12:02  

"कि ये लोकतंत्र है"... सब जानते हैं फिर भी बार बार याद दिलाना पड़ता है की ये लोकतंत्र "जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है"... और उससे भी बड़ा प्रश्न ये कि असल में हमारा, यानी जनता का योगदान है कितना और क्या वाकई हम कुछ करना चाहते हैं इसके लिये ?

अनिल कान्त : 3 November 2009 at 12:26  

कम से कम मुट्ठी भर लोग तो निकल ही आयेंगे इसे बचाने के लिए और जो करना चाहते हैं देश के लिए. जिनके पास कुछ कर सकने के लिए, कम से कम वो तो कर ही सकते हैं.

वन्दना 3 November 2009 at 13:10  

aaj ke kadve sach ko bakhubi bayan kiya hai........shayad kuch asar ho..........aap prayas karte rahein jage huyon ko jagaane ka.

Prem 3 November 2009 at 18:51  

kash loktantr ke prati yuva peedhi jagruk ho sake goodwishes.

दिगम्बर नासवा 3 November 2009 at 18:54  

हम इंतजार करते हैं
हमें मारने वालों के लिए
इन्साफ का ........

SACH KAHA ..... AUR ISI INTEZAAR MEIN HUM KHUD BHI IK DIN MAR JATE HAIN .... LOKTANTR JO HAI ... ACHHEE RACHNA HAI ...

M.A.Sharma "सेहर" 3 November 2009 at 20:12  

Aaj ayai to thee ....aapki kahani padhne .....U know !!

Ab yahee hai loktantr ji ...!!sigh !!
sach likha !!

Nirmla Kapila 4 November 2009 at 14:12  

ाज के लोक तन्त्र की यही सच्चाइ है बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है। कहानी हो या कविता आपकी रचना बहुत सुन्दर होती है धन्यवाद और शुभकामनायें

Anu...:) 4 November 2009 at 20:03  

Very nice...and hard-hitting! :)

Karan Kashyap 5 November 2009 at 11:25  

sahbdo aur bahvo ka sahi sahi mishran hai jo sidhi chot karta hai

Karan Kashyap 5 November 2009 at 11:27  

Bahot hi paini bhasha ke vajah se aapke shabd sidhe dil me utar jate hai,

गुर्रमकोंडा नीरजा 5 November 2009 at 18:32  

यही है आज का लोकतंत्र

Aarjav 6 November 2009 at 19:05  

jo kuchh bhii ho ....antim jimmedarii hamaarii aapkii hi hai ......achchhii kavitaa !

Harkirat Haqeer 6 November 2009 at 19:38  

देखते हैं, सुनते हैं
और फिर भूल जाते हैं
लाल किले पर खड़े होकर
दिया जाने वाला भाषण

हमें बताया जाता है
बार बार
कि ये लोकतंत्र है

समय पर चोट करती सशक्त कविता .....!!

पी.सी.गोदियाल 9 November 2009 at 13:16  

बहुत सटीक अनिल जी , चूँकि लेख लंबा था, इसलिए मैंने फुरसत में पढने का निश्चय किया था ! आज पढा तो सच में, मजेदार लगा, और अपने लोकतंत्र के तो क्या कहने मासाल्लाह !!

Apoorv 16 November 2009 at 22:07  

जितनी तेज और तल्ख इस कविता की तासीर है अनिल साहब....उतना ही हकीकत के करीब है इसका मैसेज..हमारे वक्त को निरपेक्ष आइना दिखाता हुआ...

हम इंतजार करते हैं
हमें मारने वालों के लिए
इन्साफ का

Post a Comment

आपकी टिप्पणी यदि स्पैम/वायरस नहीं है तो जल्द ही प्रकाशित कर दी जाएगी.

Related Posts with Thumbnails

  © Blogger template Simple n' Sweet by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP