संभव है तुम्हें ये निरर्थक लगे

>> 20 November 2009

संभव है तुम्हें यह निरर्थक लगे
कि
शाम होते ही लौट आते हैं
अँधेरे काले खौफनाक साये

और तुम होते हो
अपने घरों में बेपरवाह
ये सोचते हुए
कि हम सुरक्षित हैं


जब सोचे जाते हैं
दुनिया को मनमाने ढंग से
चलाये जाने के लिए
प्रजातंत्र की चाशनी में लिपटे हुए
राजनीतिक हथकंडे

और तुम थिरकते हो मदहोश होकर
अपने महबूब की बाँहों में
किसी डिस्को या बार की रंगीनियों में
लगाते हुए कहकहे

जब फैंके जाते हैं
सुबह की रोशनी में
संसद के अन्दर
गांधीनुमा नोटों के बण्डल
और दिखाए जाते हैं तीखे तेवर
कि संसद पर हमला
हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे

तुम रिमोट का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए
बढ़ जाते हो अपने गंतत्व पर
जहाँ आधुनिक गालियों से भरा समाज
करता है तुम्हारा इंतजार

संभव है तुम्हें ये निरर्थक लगे
कि
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु
कभी इस देश का हिस्सा थे

12 comments:

Udan Tashtari 24 November 2009 at 19:01  

कितनी गहरी बात कह गये...


वाकई एक पूरी जमात तैयार है जिन्हें यह सब निरर्थक लगे....


भावपूर्ण रचना!!

समयचक्र -महेन्द्र मिश्र- 24 November 2009 at 19:34  

गहरी और सटीक रचना . अनिल जी बधाई .....

Priya 24 November 2009 at 21:07  

aapke shabd ander tak asar kar gaye......sansad kam wo to drame ka manch jyada hai....Gandhi,bhagat, sukhdev, chandrashekar ki baatein sir kisse kahaniya hi lagte hai

मनोज कुमार 24 November 2009 at 21:39  

आपकी कविता का अलग महत्व है, यह हमारे सोंदर्यबोध को धक्का गेती है, उसे तोड़ती है। इसीलिए ऐसी कविताओं का अपना एक अलग महत्व है।

shikha varshney 24 November 2009 at 22:12  

तुम रिमोट का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए
बढ़ जाते हो अपने गंतत्व पर
जहाँ आधुनिक गालियों से भरा समाज
करता है तुम्हारा इंतजार
bahut kuch kah gaye aap apni is rachna main.

Anil Pusadkar 25 November 2009 at 10:33  

समाज के एक बड़े हिस्से को नंगा कर दिया अनिल भाई,बहुत ही करारा तमाचा है ये लेकिन अफ़सोस इसे वो लोग महसूस नही कर पा रहे हैं जिनके लिये ये है।

Babli 25 November 2009 at 16:39  

अत्यन्त सुंदर रचना! बहुत बहुत बधाई इस उम्दा रचना के लिए!

अर्शिया 25 November 2009 at 17:19  

सही कहा आपने, कुछ लोगों के लिए ये वाकई निर्रथक हो सकता है।


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क्या है कोई पहेली को बूझने वाला?
पढ़े-लिखे भी होते हैं अंधविश्वास का शिकार।

Devendra 27 November 2009 at 16:43  

अच्छी कविता

anilpandey 27 November 2009 at 17:01  

kitna sundar kahaa aapne . ghar ke bahar bhi duniya hai pr usaki kisaki prwah yadi san se ye sb kuchh milta rhe . tabhi tow hm dino din bipdaaon men ghire jaa rhe hain .

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