दहलीज के उस पार

>> 28 October 2009

हम जानते हैं कि उस दहलीज पर हम फिर कभी नहीं पहुँच सकते जिसको पार करते ही हमारे वो सपने बिखरे पड़े हैं. जिसके उस पार एक एक करके चुने जाने लायक हजारों बिखरी पड़ी यादें हैं. हाँ वो यादें जिन्हें गले से लगाने को मन करता है. मन करता है कि उनसे हाले दिल पुँछ बैठूं. उनसे ढेर सारी गपशप करूँ. उनके साथ दिन भर खेलूं और रात को तारों के नीचे लेट उन्हें एक एक करके गिनने की होड़ करूँ. फलां तारा कितना अच्छा है या उसकी पता है वो कहानी थी जो कि नानी ने हमे उस रोज़ सुनाई थी.

हाँ उस दहलीज को बचपन की दहलीज कहते हैं. वो जो हमसे बहुत पीछे छूट चुका है और जब तब वो हमें दूर से मुस्कुराते हुए देखता है. कभी कभी तो लगता है कि वो कह रहा हो क्यों बच्चू हो गए बड़े, अब भुगतो, पहले तो जब हमारे साथ थे तब हमेशा बड़े होने की सोचा करते थे. अब हो गए न बड़े, बोलो क्या पा लिया और हम सोचते हैं कि उसकी इस बात का क्या जवाब दें, क्या कहें उससे.

बचपन की दहलीज के उस पार बहुत सारे सपने आज भी मौजूद हैं जो बचपन के साथ ही जाते रहे. बचपन था तो वो सपने थे जो हर दिन हमारे साथ रहते और हम उन्हें बड़ी संजीदगी से अपने पास रखते. उन्हीं सपनों के बीच एक नन्हा मुन्हा सा सपना हुआ करता था "ढेर सारे कंचे जीतने का सपना". हाँ जिन्हें अंग्रेजी में शायद मार्बल्स कहते हैं.

हम हर रोज़ सोचते कि काश कि ऐसा हो कि हमारा निशाना सबसे ज्यादा अच्छा हो जाए और हम सभी के सभी बच्चों के कंचे जीत लें. काश कि ऐसा हो कि हमारे पास ढेर सारे कंचे हो और हम उन पर फक्र करें कि देखा हमारे पास इतने कंचे हैं. बोलो हैं क्या तुम्हारे पास...कैसे होंगे तुम्हारा निशाना हम जैसा थोड़े है जो इतने जीत लोगे. लेकिन हमारा निशाना इतना अच्छा कभी हुआ ही नहीं कि हम अपनी कॉलोनी के सभी लड़कों से जीत पाते.

उधर बचपन में हमारा छोटा भाई जो हमसे तीन बरस छोटा हुआ करता था...हुआ करता था क्या...अभी भी है पूरे तीन बरस छोटा. इतना बड़ा निशानची था कि उसकी वजह से पूरी कॉलोनी में हाहाकार हुआ करता था. मजाल है कि उससे कोई जीत भी पाए. यूँ कह सकते हैं कि कंचों का बहुत बड़ा खिलाडी. माशाल्लाह उसका निशाना ऐसा था कि कितना भी दूर कंचा रखा हो वो उसको अपना निशाना बना लेता था.

और देखते ही देखते वो कब 2 किलो से लेकर 5 किलो के डिब्बे जीते हुए कंचों से भर लेता पता ही नहीं चलता और हम उसके उलट अक्सर उसी से लिए हुए कंचे बाहर जाकर हार जाते. तब वो माँ से कहता कि भैया हमारे सारे कंचे हार जायेंगे. देखो न माँ भैया को खेलने से मना करो. हम अब और कंचे नहीं देंगे. कई बार ऐसा हुआ कि उसके ठीक से पढाई में ध्यान न देने पर हमारे पिताजी उसके कंचों से भरा हुआ डब्बा दूर जाकर गुस्से में गटर में फेंक आते. लेकिन वो तीन रोज़ बाद ही फिर से तमाम कंचे इकट्ठे कर लेता.

बचपन धीरे धीरे अपनी पीठ पर बस्ता लाधे गुजर गया. हम और हमारा सपना भी शायद उस बस्ते में कहीं हो. किताबों के दरमियान उस मोरपंख के साथ रखा हुआ चला गया. जिसे बचपन में हम म्बदे चाव से रखते थे कि इसके एक से दो हो जाते हैं. भाई के जीतने पर अच्छा लगता था कि देखो तो कितना बड़ा निशानेबाज है. उधर जब कंचों का शौक उतरा तो क्रिकेट ने अपनी बाहें फैला दीं. उस में भी हमारे छोटे भाई ने ही कमाल दिखाया और हम अक्सर बहुत जल्दी आउट हो जाते. हाँ जब कभी अपनी टीम के विनिंग प्लेयर भले रहे हों लेकिन अपने भाई की तरह आलराउंडर नहीं. वो क्रिकेट में भी सबका चहेता था.

अक्सर ऐसा होता कि सोते से उठने से पहले ही कभी मैं उसका चेहरा बिगाड़ देता तो कभी वो मेरा. हमारा चेहरा देखकर पूरे घर में हंसी गूंजती रहती. कभी कभी तो हम भूत वाला चेहरा बनाकर ठीक एक दूसरे के सामने खड़े हो जाते और फिर जगाते कि उठो. उठते ही इतना डरावना चेहरा देखकर तो कोई भी डर जाता. फिर एक दूसरे को मारने को दौड़ते और जिसने शरारत की वो माँ के पीछे छुप कर चिढाता. जिसके साथ शरारत हुई वो माँ से शिकायत करता. माँ देखो इसने ऐसा किया, हम इसको नहीं छोडेंगे.

अब देखो तो आज इस दहलीज के पार कोसों दूर निकल आने पर वो सब बहुत याद आता है. वो भाई के गले में हाथ डालकर घूमना. साथ स्कूल जाना. एक ही झूले पर एक साथ झूलना. मेरा उसको तेज और ऊंचे झूले पर ना बैठने देना. अपना बड़ा होना जताना. स्कूल के बस्ते को टाँगे घर तक एक दूसरे का हाथ थामे चले आना. अब बहुत याद आता है. लगता है कि एक सुख जो हमसे दहलीज के उस पार रह गया.

अक्सर बचपन की दहलीज के उस पार हो आने का मन करता है. मन करता है कि एक दौड़ लगाऊं और पहुँच जाऊँ उस पार या ऐसी कोई कूद जिससे पार कर सकूं उस दहलीज को.

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बच्चन सिंह और बहू की विदा

>> 26 October 2009

एक बार की बात है कि गाँव में रहने वाले बच्चन सिंह की नयी नयी शादी हुई. शादी के कुछ दिनों बाद जो है अपनी बहू को लिवाने के लिए उनकी ससुराल से खबर आई. अब जो है बच्चन सिंह जो कि बहुत खाते थे, उनको उनकी अम्मा ने सख्त हिदायत दी कि देख बच्चू तू यहाँ तो बहुत खाता है. यहाँ की कोई बात नहीं लेकिन वहाँ अपनी ससुराल में जाकर खाने पर मत टूट पड़ना. चाहे जितना भी कहें खाने के लिए, लेकिन तू जो है बस दो टाइम ही खाना खाना. एक रात में और फिर सुबह.

बच्चन की अम्मा ने जो कि जानती थीं कि बच्चू खाली पेट तो रह नहीं पायेगा तो जो है उन्होंने रास्ते के लिए पूडी सब्जी बाँध कर रख दी और साथ ही गुड भी ढेर सारा बाँध कर रख दिया, कि अगर भूख लगे तो इसे खा लेना लेकिन वहाँ ससुराल में सभ्यता से पेश आना.

अब भाई बच्चन सिंह चल दिए उठाय पोटली, जो अम्मा ने बातें समझायीं वो उन्होंने बड़े ध्यान से कस कर दिमाग में बैठा लीं. सुबह के निकले बच्चन सिंह पैदल पैदल जो है अपनी ससुराल जा रहे हैं. कुछ घंटे चलने के बाद बच्चन ने सोचा कि चलो अब कुछ सुस्ताय लिया जाए. बच्चन सिंह को कुछ देर सुस्ताने के बाद भूख लगी तो उन्होंने कुछ पूडियां खा लीं और फिर उठाकर पोटली चल दिए. अब इस तरह चलते चलते बच्चन सिंह जो है दो-चार बार बीच में ठहरे होंगे तो उनकी जो है पूडियां रास्ते में ही ख़त्म हो लीं.

शाम तक चलते चलते उनकी ससुराल आ गयी. दूर से ही उनके छोटे साले ने देखकर दौड़ लगायी "जीजा आई गए"..."जीजा आई गए" और उनके हाथ में पकडे हुए थैले को लेने की कोशिश की, लाओ जीजा हम लये चलें. साले ने लाख कोशिशें की मगर बच्चन ने थैला नहीं दिया और खुद ही थैला पकड़ कर चलते रहे.

दरवाजे पर साली मिली वो भी थैला छीनने की कोशिश करने लगी कि लाओ जीजा अन्दर रख दें. अब बच्चन उस थैले को कैसे दे देते. उसमें तो बचा हुआ गुड था. अब यहाँ ससुराल आये हैं तो यहाँ ये थोड़े नहीं पता चलना चाहिए कि दामाद गुड साथ लेकर चला है खाने के लिए.

बच्चन जी की आते ही बड़ी आव भगत होने लगी. अन्दर सास को पता चल गया कि उनका दामाद आया है तो उन्होंने फट से अन्दर से नया चादर और दरी निकलवाई और खाट के ऊपर बिछावाया. साली ने हाथ पकड़ कर उन्हें खाट पर बैठाला और फिर अन्दर दौड़ती हुई गयी बताने के लिए, कि बड़ी बहन को बता दें कि उनके वो आ गए.

थोडी देर में साली शरबत लेकर आ गयी और जीजा को शरबत देते हुए बोली कि जीजा "हमाय काजे का लाये" और थैले को उठाने की कोशिश करने लगी. जीजा जी उछले और बोले देखो हमारी चीज़ को हाथ ना लगाओ कहे देते हैं...तुम्हारी बड़ी मजाक करने की आदत है हाँ.

किसी तरह साली थैले को छोड़कर अन्दर गयी और अन्दर जाते ही सास ने कहा कि जा दौड़कर बगल वाली काकी को बुला ला वो कम तेल में अच्छी पूडियाँ तल देती हैं. साली दौड़ती हुई बाहर चली गयी. अब जो है बच्चन जी को बड़े जोरों से भूख लग रही थी, तो उन्होंने अगल बगल देखा और पाया कि कोई नहीं तो थैले से गुड निकालकर खाने लगे. जल्दी से थोडा बहुत खाकर मुंह पौंछ पांछ कर बैठ गए कि कहीं कोई देख ना ले. इस तरह वो खाने बनते बनते कई बार गुड खा चुके.

थोडी देर बाद साला कहने को आया कि जीजा जी खाना खा लो. बच्चन जी ने मना कर दिया कि भूख नहीं है...थोडी देर बाद साली आई तो उसको भी मना कर दिया कि भूख नहीं है. भाई बड़ी परेशानी वाली बात...उसके बाद सास आई कि बेटा खाना खा लो तो उनसे बोले कि अभी भूख नहीं है. थक हार कर उनकी बहू को उनकी सास ने भेजा कि देख तो खाना काहे नहीं खा रहे. उनकी बहू आयीं और उनसे बोली काहे नखरा कर रहे हो...काहे नहीं खानों खाई लेत. भाई अब बच्चन को जाना पड़ गया.

अब अन्दर जाकर वो खाने के लिए बैठ गए...रसोई में काकी पूडियाँ तल रहीं और खिड़की पर खड़ी खड़ी उनकी बहू देख रही कि खा रहे हैं कि नहीं. इधर बच्चन एक पूडी का एक कौर कर रहे और जल्दी जल्दी खाना खाए जा रहे. उनकी ये हालत देख उनकी बहू को बहुत गुस्सा आया..उन्होंने इशारे से बच्चन को उँगलियों से बताया कि एक पूडी के दो कौर करके खाओ. पर बच्चन तो कुछ और ही समझ बैठे. वो दो पूडियों को एक साथ खाने लगे. उनकी बहू ने माथा ठोंका...और इशारे से समझाया कि जैसे मर रहे थे वैसे ही मरो.

जैसे तैसे रात कटी और सुबह फिर वही हाल बच्चन को फिर भूख लगने लगी. अन्दर वालों को 2 बार मना कर चुके नाश्ते के लिए. यहाँ चुपके चुपके गुड खाए जा रहे. तभी उनका साला आ गया. इनके मुंह में गुड था, इन्होने मुंह बंद कर लिया. इनका एक गाल फूला हुआ देख साला बोला का खाई रहे जीजा जी. ह्म्म्म...ह्म्म्म....करके गर्दन ना में हिलाने लगे. वो अन्दर भाग कर गया और साली को बुला लाया...साली से भी कुछ नहीं बोल पा रहे बच्चन जी...बोले कैसे मुंह में तो गुड ठूंस रखा था और सबके सामने खोल भी नहीं सकते कि चोरी जो पकड़ी जाती.

इस तरह बात का बतंगड़ बन गया, उनकी सास आ गयीं और फिर रोना धोना शुरू कि पहले बखत दामाद आये और यहाँ बीमार पड़ गए. ना जाने क्या हो गया है दामाद को. उनकी बहू रोये सो अलग. बच्चन उनके सामने मुंह भी नहीं चला पा रहे. उनकी सास ने गाँव के डॉक्टर को बुला लिया. डॉक्टर आया उसने उनके मुंह का मुआयना किया. जब वो एक गाल पर उंगली करें तो बच्चन गुड को दूसरे गाल की तरफ कर लें और जब दूसरी तरफ करें तो इस गाल को कर लें. डॉक्टर ने कहा भाई चलता फिरता फोड़ा हो गया है आपके दामाद को.

सास बोली डॉक्टर साहब "हमाई दामाद को ठीक करि देओ"..चाहे जितना दाम लगे..डॉक्टर बोला कि इनका तो ऑपरेशन करना पड़ेगा और डॉक्टर ने वहीँ कहा कि फोड़ा फोड़ना पड़ेगा. उन्होंने बच्चन के मुंह को दोनों हाथों से पकडा और जोर से दबा दिया. बाहर गुड की धार निकली जो सीधे डॉक्टर के मुंह पर गयी. थोडी देर बाद डॉक्टर उछालते हुए बोला. वाह मैंने नयी खोज कर ली. अब मैं अपनी रिसर्च में लिखूंगा कि फोड़ा पक जाने पर मीठा होता है. अब गाँव में जितने भी लोग वहाँ एकत्रित हुए थे थे, सब डॉक्टर की जय जयकार करने लगे. उधर बच्चन की जान में जान आई कि चलो बच गए. वरना अगर पकडे जाते तो न जाने क्या होता. डॉक्टर को सौ रुपये देकर सास ने विदा किया.

बच्चन को उनकी बहू समेत बड़े लाड प्यार से कुछ घंटों में उनकी सास ने विदा किया. इस तरह बच्चन उर्फ़ बच्चू अपनी माँ की हिदायतों सहित अपनी बहू को ससुराल से लिवा लाये.

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मेरे कमरे की दीवार

>> 24 October 2009

संभव है तुम्हें ये बहुत अजीब लगे...कि आजकल मैंने अपने कमरे की दीवार से दोस्ती कर ली है...जब थक जाता हूँ तो यूँ ही मुझे निहारा करती है और मुझसे ढेर सारी बातें करती है...हाँ वो सभी बातें जो मैं करना चाहता हूँ...वो ध्यानमग्न होकर मेरी बातों में खो जाती है...पता है अब तक की गयी उससे सभी बातें उसे याद हैं...और जब तब वो मुझे उसी दुनिया में ले जाती है जहां वो सभी सपने और वो सभी बातें बिखरी पड़ी होती हैं...वो हर बात से मेरी मुलाकात कराती है

अभी कल ही तो देखा था मैंने अपने कमरे की दीवार को...बिलकुल एकटक मुझे प्यार से देखे जा रही थी...निगोडी को जरा सी भी शर्म नहीं आती...आये दिन ऐसे ही मुझे देखती रहती है...शायद मेरी आदत उसे भी लग गयी है...मैं भी तो उसे यूँ ही एकटक देखता रहता हूँ...उसमें कुछ खोजता सा...शायद वो बातें...वो पुरानी यादें...

शायद तुम्हारा चेहरा...या शायद वो गुलाब जो मैंने पहली रोज़ तुम्हें दिया था...वो हवा में उड़ते हुए बाल जिनमें उस गुलाब को मैंने लगाया था...वो सब मुझे दिखाती है...शायद ऐसा लगता है कि वो कोई सिनेमा का पर्दा है और उसके पीछे हसीं ख्वाबों से सजी हुई दुनिया है जो रील बाई रील चल रही है...कहीं आगे बढ़ने या पीछे करने की जरूरत नहीं पड़ती...वो मुझे वही सब दिखाती है जो मुझे देखना है...पता नहीं उसे कैसे मालूम कि मैं यही देखना चाहता था

उसने भी तो वो सब कुछ याद कर रखा है...और उसके पास हर वो तमाम यादों को याद कर कर मेरे सामने लाने का तजुर्बा होता गया है...उसे सब कुछ याद है...तुम्हारी और मेरी उससे चिपकी हुई ढेर सारी बातें मुझे कल ही उसने मेरा हाथ पकड़ कर स्पर्श करायीं...जो हमने देर रात तक उससे अपने अपने सर को टिकाकर आपस में की थीं.

वो तुम्हारी उँगलियों के स्पर्श से बनी तमाम कलाकृतियाँ मुझे मुस्कुराती सी नज़र आती हैं. तुम्हारे नयनों से उधार लिए गए रंगों को वो आज भी बदस्तूर संभाले हुए है...हर रोज़ एक नया रंग नज़र आता है मुझे उसमें...हाँ तुम्हारा रंग...प्यार का रंग...ख़ुशी का रंग...तकरार का रंग...तुम्हारे होठों का रंग...तुम्हारे ख्यालों का रंग...उस एहसास का रंग जो साथ होने से बनता है.

कल ही वो इन तमाम रंगों में रंगी मुझे इन्द्रधनुष सी जान पड़ी...और बाहें फैलाए मुझे अपने आप में खोयी हुई दुनिया मेरे सामने ले आई...हाँ वही सब कुछ तो था...खुला हुआ दूर तक आसमान...महकते हुए गुलाब...बिखरे पड़े फुर्सत के लम्हे...तितलियों की तरह आपस में बातें करती हवा में उड़ती तेरी मेरी बातें...और तुम्हारे दामन से लिपटा हुआ में...वो तुम्हारे उँगलियों का मेरे सीने पर बेतरतीब सी शक्लें बनाना...और बिलकुल पास महसूस होती हुई तेरी मेरी साँसे...और घुलती हुई खुशबू.

हाँ मेरे कमरे की दीवार आज भी सब कुछ संभाले हुए है...आज भी वो उस एहसास को साथ लेकर रहती है...जो तेरे और मेरे होने से बनता है...जो स्पर्श से बनता है...जो साँसों के घुलने से बनता है...जो आपस में बात करती हुई तेरी-मेरी बातों से बनता है

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दायरों से जुदा !! होने के एहसास के करीब

>> 15 October 2009

जब रिश्तों को निभाने वाले बड़े हो जाए और रिश्तों के दायरे छोटे । तब काश ऐसा हो पाता कि माँ जिस तरह छोटे पड़ गए स्वेटर को उधेड़ कर फिर से नए सिरे से बुनती और हम उसे बड़े चाव से पहनते । ठीक उसी तरह अगर रिश्तों को भी सहेज कर रखा जा सकता तो कितना अच्छा होता या सही कहूँ तो उस एहसास को जिन्हें लोग रिश्तों का नाम देते हैं ।

पर तुम्हारा और मेरा रिश्ता क्या था । ये मैं तब भी सोचता था और आज भी सोचता हूँ । क्या हमने अपने रिश्ते का कोई दायरा भी बनाया था । मुझे ठीक से याद नहीं कि इस पर भी हमारी कभी बात हुई हो या शायद हम इन सभी रिश्तों से अलग कहीं जुड़े हुए थे । कहीं किसी कोर पर गहरे से गाँठ बंधी हुई थी । जिसको देख पाना और समझ पाना कभी बहुत आसान जान पड़ता तो कभी मालूम ही न चलता कि भला रिश्तों का भी ऐसा कोई बंधन होता है ।

एहसास को नाम देना मैंने तुमसे ही सीखा । तुम्हारे पास हर एहसास के लिए एक नाम जो हुआ करता था । हर एहसास का नाम कितना जुदा था । जो इस दुनिया के दिए हुए नामो से बिल्कुल नए । मुझे ठीक से याद है कि दर्द, ख़ुशी, दुःख, पीड़ा, हर्ष, इन सभी नामों से कितने अलग थे तुम्हारे दिए हुए नाम । उन एहसासों के नाम ।

इन दायरों के बाहर भी एक दुनिया है । ये तुमने ही मुझे बताया । वो दायरे जो हम खुद बना लेते हैं या हमें बने हुए मिलते हैं । तुम कैसे उन सभी दायरों के बाहर, हमेशा मुझे मुस्कुराती हुई खड़ी मिलती । हाँ तुम जब हाथ थाम कर मुझे उन दायरों से बाहर ले गयीं तो वो दुनिया अलग थी । जिसका एहसास करना तो बहुत आसान हुआ करता लेकिन तुम्हारी आँखों में झांकते हुए उन एहसासों को नाम देना उतना ही मुश्किल । हाँ बहुत मुश्किल ।

पर जब भी तुम साथ चलते हुए यूँ ही मेरा हाथ थाम लेती तो यूँ लगता कि मुझे उस एहसास का नाम मिल गया हो । तुम्हारे साथ उन भूले हुए दायरों और बहुत कहीं पीछे छूट गए रिश्तों के नाम को मैं याद ना तो किया करता और ना ही मुझे याद रहते ।

ऐसे कई अनगिनत तुम्हारे पूँछे गए सवालों को में अपने कुर्ते की जेब में संभाल कर रखता और तुम्हारे इंतज़ार में उन्हें बार-बार, एक-एक करके निकालता । शायद किसी सवाल का जवाब मुझे मिल जाए । हाँ उन सवालों में छुपी हुई, घुली हुई तुम्हारी यादों को में एक एक करके हाथ पर रखता और अपने चेहरे पर मल लेता । देखना चाहता कि तुम्हारी यादों के साथ मेरा चेहरा कैसा दिखता है । सच कहूँ तो मैं ठीक से आज भी अपने चेहरे को उन यादों के साथ महसूस करने की कितनी भी कोशिश करूँ वो चेहरा कहीं दिखाई नहीं पड़ता । शायद वो चेहरा तुम अपने साथ जो ले गई हो । हाँ साथ ही ले गई होगी । नहीं तो मुझे मेरा चेहरा यूँ अजनबी सा ना लगता ।

हाँ अगर कुछ याद रहता है तो वो पल जब तुमने उस रोज़ हमारे आस पास उन सभी एहसासों को बुला लिया था और हम रिश्तों के दायरों से बहुत दूर कहीं एहसासों की बसाई हुई दुनिया में खुद को पाया हुआ महसूस कर रहे थे । हाँ वो पल सबसे जुदा था । मैंने खुद को तो पाया ही, तुम्हें भी पा लिया था ।

रिश्तों के दायरों से दूर और तुम्हारे-मेरे एहसासों के नज़दीक, मैं तुम्हें आज भी खुद के साथ पाता हूँ । हाँ यही तो एक एहसास है जो सबसे जुदा, सबसे सुखद है और जो हमेशा मेरे साथ रहता है ।

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नोटपेड को डायरी बनाने का तरीका (बहुत आसान)

>> 12 October 2009

सोच रहा हूँ कि आज आपको कुछ तकनीकी बात बता दूं.
आप सदैव नोटपेड को किस तरह उपयोग करते हैं. उसमें कुछ भी लिख कर और उसका कुछ भी फाइल नेम देकर सेव कर देते हैं.

लेकिन अगर आप चाहते हैं कि जब भी आप उस नोटपेड को खोलें तो खुलने पर उसमें उस वक़्त का समय और तारीख लिखी हुई आये. फिर इस बार कुछ लिख देने और सेव कर देने के बाद अगली बार खोलें तो अगली बार का समय और तारीख व समय आये. तो दोस्तों ये बहुत आसान है.

आइए जाने कैसे ?

Step-1:

नोटपेड को खोलें और उस में .LOG लिख कर फिर अपनी मर्ज़ी से फाइल नेम डालकर सेव कर दें और नोटपेड को बंद कर दें.

Step-2:

अब उस नोटपेड की फाइल को खोलें, आपको उस वक़्त जो समय है वो लिखा हुआ दिखाई देगा और उस दिन की तारीख भी.

बस अब कुछ भी अपने मन का उसके नीचे लिखें और फिर इस फाइल को सेव कर दें और इस नोटपेड फाइल को बंद कर दें.

Step-3:

अब जब जब भी आप इस नोटपेड फाइल को खोलेंगे तो उस वक़्त का समय और तारीख उसमें लिखी हुई आएगी.

तो देखा किस तरह से आपने नोटपेड का एक डायरी की तरह उपयोग कर लिया.

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गुजरे हुए दिनों से सिफारिश !!

>> 09 October 2009

बचपन की सुबह बहुत प्यारी होती थी...सुखद एहसासों वाली सुबह जब तब याद आ ही जाती है. उन बचपन के दिनों में एक ख़ास दिन भी हुआ करता था जब माँ सुबह उठते ही मुझे बाहों में भर कर गोद में ले लेती और ढेर सारा दुलार करती. नहीं माँ मुझे और सोना है...थोडा और सोने दो न माँ...और माँ गोद में लेकर यूँ ही मुझे उठा लेती...आँगन में ले जाकर मुझे नहलाती और फिर अपने हाथों से कंघी करती और कुछ देर बाद उनके हाथ में एक थाली होती...माँ मेरा तिलक करती और मुझे खाने को मिठाई देती...स्कूल जाते हुए माँ मेरी जेब में 10 रुपये रखते हुए कहती कि चोकलेट खा लेना...तुझे पसंद है ना.

शुरू के दिनों में पता नहीं था कि इस ख़ास दिन क्या होता है और ना ही याद रहता कि ये ख़ास दिन कब आता है. लेकिन हमेशा एक सुखद एहसास लेकर आता वो दिन. उन दिनों स्कूल में अपनी क्लास में बच्चे अपने जन्म दिन पर टोफियाँ बाँटते या फिर मिठाई. उस दिन पता चलता कि फलां बच्चे का जन्म दिन है आज इस लिए वो टॉफी या मिठाई बाँट रहा है.

एक रोज़ स्कूल से लौटते ही मैंने माँ से पूंछा...माँ मेरा जन्म दिन कब आता है...माँ मुस्कुरा दी. बोली क्यों क्या हुआ...नहीं बताओ ना कि मेरा जन्म दिन कब आता है...माँ मुस्कुराते हुए और सुई का धागा मुंह से काटते हुए बोली तुझे नहीं पता...मैंने कहा नहीं तो...माँ ने मुझे गोदी में बिठाते हुए सर पर हाथ फेरते हुए बोला...जिस दिन मैं तुम्हारा तिलक करूँ समझ जाना कि उस दिन तुम्हारा जन्म दिन है. मैंने कहा पर माँ सभी बच्चे तो उस दिन स्कूल में टॉफी बांटते हैं अपने जन्म दिन पर, लेकिन मैं क्यों नहीं...माँ ने कहा तुम्हारे जन्म दिन की टोफियाँ कहीं और बांटी जाती हैं...मैं बोला कहाँ...वो बोली अबकी बार तुम खुद अपने हाथों से बाँट देना...मैं खुश होते हुए बोला अच्छा ठीक है.

कुछ रोज़ बाद एक खूबसूरत सी सुबह माँ ने मुझे दुलार करते हुए गोद में उठा लिया और नहलाने के बाद तिलक किया. मैं खुश हो गया...क्या माँ आज मेरा जन्म दिन है...हाँ, माँ बोली...माँ मुझे उस सुबह मंदिर ले गयीं और जब हम मंदिर के बाहर लौटे तो माँ ने जो फल खरीद रखे थे वो मेरे हाथों में देते हुए बोली कि सामने जो लोग बैठे हुए हैं ये उन्हें बाँट दो...मैंने उन्हें देखा वो बहुत असहाय और भूखे थे...उस रोज़ मुझे वो फल बाँटते हुए बहुत ख़ुशी मिल रही थी.

स्कूल जाते हुए माँ ने मेरी जेब में 10 रुपये रखे और बोला कि आज शाम को तुम अपने दोस्तों को बुला लेना खाने पर. मैंने माँ को मुस्कुराते हुए देखा...और माँ के गले लगते हुए उनके गाल पर चूमते हुए स्कूल को चल दिया. उस रोज़ मैंने अपनी क्लास में अपने दोस्तों को बताया कि मेरा आज जन्म दिन है और सभी को शाम को माँ ने घर पर खाने के लिए बुलाया है. इंटरवल में मेरी गर्ल फ्रेंड 'निगार' मेरे पास आई और बोली कि मैं तो नहीं आ पाऊँगी अनिल...सॉरी...मैंने पहले मायूस होकर जमीन की ओर देखा फिर मैंने अपनी जेब से 10 रुपये निकाल कर चोकलेट खरीद कर उसे खाने को दी...उसने आधी तोड़ते हुए मुझे दी...और मेरे गाल पर किस करते हुए कहा 'हैप्पी बर्थ डे'...मैं मुस्कुरा गया.

उस शाम वो मेरा पहला जन्मदिन था जो सामूहिक रूप से मनाया गया...और मेरे ढेर सारे दोस्त...अंकल-आंटी लोग आये...उस दिन बहुत कुछ 10 से जुडा हुआ था...मैं उस दिन 10 साल का था...उस दिन महीने का 10 वां दिन था...और महीना भी 10 वां था...और वो चोकलेट भी 10 रुपये की थी जिस के बाद मुझे 'बर्थ डे किस' मिली थी :)

कमबख्त ये 10 अक्टूबर जब भी आता है...अपने से जुडी ढेर सारी यादें मेरे आस पास छोड़ जाता है...माँ की गोद, माँ का ढेर सारा प्यार...बचपन के दोस्त...किशोरावस्था के किस्से...कॉलेज के यार और उनके साथ बिताई महफिलें...वो हुडदंग...सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कि मेरे आस पास ही आकर बैठ गए हों...और मुस्कुरा रहे हों !!

चित्र: गूगल से

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तुम, मैं...और हमारी असल सूरतें

>> 05 October 2009


सुनो आँखें बंद करो...क्यों...अरे बंद करो ना...पहले बताओ फिर...आँखें बंद करने पर मैं तुम्हें कहीं ले चलूँगा...कहाँ...ओह हो...कहता हुआ मैं उसकी आँखों पर अपनी नर्म हथेलियाँ रख देता हूँ...मैं तुम्हें अपनी फेवरेट जगह ले जा रहा हूँ


अपने घर के पीछे का दरवाजा खोलते ही तुम दौड़ रही हो अपने पैरों तले बिछी हरी घास पर...उन पर बिखरी हल्की हल्की ओंस की बूँदें ऐसे चमक रही हैं जैसे मोती...दूर दूर तक फैला हुआ आसमान है...और उस पर अपनी खूबसूरती बिखेरता इन्द्रधनुष ऐसा लग रहा है मानों उसने अभी अभी होली खेली हो...उसे देखते ही तुम दौडी दौडी आकर मेरा हाथ पकड़ लेती हो और कहती हो वो देखो इन्द्रधनुष...कितना प्यारा है ना...तुम खिलखिला कर हंस रही हो...बिलकुल नेक दिल हँसी...जिसमें तुम शामिल हो और मैं...और तुमने उसमें इन्द्रधनुष के रंग कब शामिल कर लिए मुझे पता ही नहीं चला

हरी घास के एकतरफ बनी हुई पगडंडियों पर तुम नंगे पैर दौडे जा रही हो और मैं तुम्हारे पीछे पीछे चल रहा हूँ...कहीं तुम गिर ना जाओ इस बात से भी डर रहा हूँ...पर तुम यूँ लग रही हो जैसे हवा ने तुम्हारा साथ देना शुरू कर दिया है...रास्ते में खड़े वो मुस्कुराते हुए बाबा तमाम रंग बिरंगे गुब्बारे लेकर खड़े हुए हैं...हरे, लाल, पीले, गुलाबी, नीले...हर रंग में रंगे हुए गुब्बारे...तुम उन्हें देखकर ऐसे खुश हो रही हो जैसे एक मासूम बच्ची...उन गुब्बारों में एक रंग मुझे तुम्हारा भी जान पड़ता है...मासूमियत का रंग...या शायद प्यार का रंग...या फिर ख़ुशी का रंग

जानता हूँ तुम्हें वो गुब्बारे चाहिए इसी लिए तुम मेरे पास आकर मेरा हाथ पकड़ कर चल दी हो...तुम्हें गुब्बारे मिल जाने पर तुम कैसे दौडी दौडी जा रही हो उन गुब्बारों के साथ...और एक ही पल में तुमने उन गुब्बारों को छोड़ दिया है...बिलकुल आजाद...किसी पंक्षी की तरह वो उडे जा रहे हैं या शायद तुम्हारी तरह...ना जाने किस देश...और पास आकर तुम जब ये पूंछती हो कि ये उड़ कर कहाँ जाते हैं...मैं बस मुस्कुरा भर रह जाता हूँ...तुम कहती हो बोलो ना...मेरी मुस्कराहट देखकर तुम फिर बाहें फैलाये दौड़ने लगती हो

आगे तुम्हें सेब का बाग़ दिख जाता है और तुम दौड़ती हुई उसमें चली जाती हो...और कहीं छुप जाती हो...मेरे वहाँ पहुँचने पर तुम आवाज़ देती हो...कहाँ हूँ मैं...और फिर तुम्हारी खिलखिलाती हँसी गूँज जाती है...बिलकुल पंक्षियों के चहचहाने की आवाज़ में घुली सी लगती है तुम्हारी हँसी...और तुम पेडों की ओट में छुपी हुई बार बार मुझे आवाज़ देती हो...कभी इस पेड़ के पीछे तो कभी उस पेड़ के पीछे...जानता हूँ तुम्हें लुका छुपी का खेल बहुत पसंद है...शुरू से अब तक...और मेरे थक जाने पर कैसे अचानक से पीछे से आकर तुम मुझे अपनी बाहों में थाम लेती हो...और फिर मेरे सीने से लग जाती हो...मैं तुम्हें बाहों से पकड़ कर हवा में झुलाता हूँ...और फिर तुम सेब तोड़ कर पहले खुद चखती हो और मुझे देती हो कि खाओ बहुत मीठा है...

पास ही बह रही नदी जो ना जाने कहाँ दूर से चली आ रही है...और ना जाने कहाँ जा रही है...शायद कुछ गाती सी...हाँ कुछ गाती सी ही लग रही है...उसका संगीत सबसे मीठा है...पास ही की उस बैंच पर तुम मेरा हाथ पकड़ कर ले जाती हो...और उस पर बैठते ही तुम मेरे सीने पर अपने सर को रख लेती हो...हम बहुत देर तक खामोश यूँ ही नदी के बहने को देखते रहे...उस पानी में उसके अन्दर के छोटे छोटे पत्थर साफ़ दखाई दे रहे हैं...और वो रंग बिरंगी मछलियाँ जिन्हें देख कर तुम्हारे लवों पर मुस्कराहट सज गयी...जिनसे तुम्हारे लवों की मिठास बढ़ गयी सी लगती है

हम यूँ ही घंटो चुप चाप से खामोशी में एक दूसरे से बातें करते रहे...फिर तुम कहती हो कि तुम्हें नदी में नहाना है...मैं तुम्हें मना नहीं कर सकता ये तुम जानती हो...जानता हूँ भीगने पर तुम्हें सर्दी भी लग सकती है...तुम नदी के पानी में चली जाती हो...तुम और तुम्हारे कपडे भीग चुके हैं...हाथ देकर तुम मुझे बुलाने लगती हो...आओ ना...और हम दोनों बहुत देर तक उसमें नहाते रहते हैं...आस पास के पेडों पर से पंक्षी हमारा नहाना देख रहे हैं...और उन पर नज़र जाते ही तुम शरमा जाती हो और मेरे सीने से लग जाती हो...उन पलों में तुम्हारे लवों की मिठास का एहसास मुझे होता है...हमारी साँसे एक दूसरे में घुल सी जाती हैं...

पास के ही पत्थरों से बने टीले पर सूरज गुनगुनी धूप देकर जा रहा है...शायद कहीं से इकट्ठी कर कर लाता हो...हम अपने अपने कपडों को उस गुनगुनी धूप में पत्थरों पर बिछाकर सूखने के लिए छोड़ देते हैं...उतनी प्यारी गुनगुनी धूप में लेटने का हम लुत्फ़ ले रहे हैं...पास ही में रखे हुए रंगों से तुम रंगोली बनाने लग जाती हो और बार बार मुझे मुस्कुरा कर देखती हो...और मेरे कहने पर कि क्या देख रही हो...तुम कहती हो कि तुम्हारी आँखों से ख्वाब चुरा चुरा कर उनमें रंग भर रही हूँ...मैं भी मुस्कुरा जाता हूँ.

हमारे कपडे सूख जाने पर हम वहाँ से चल देते हैं...सूरज डूबने लगता है...दूर नदी में डूबता सा लगता है...तुम मुझसे पूंछने लगती हो...क्या सूरज नदी में रहता है...मैं डूबते सूरज को एक बार फिर देखता हूँ...और तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में थाम कर वापस चल देता हूँ...रास्ते में खड़े फिर वही बाबा अबकी बार आइस क्रीम बेच रहे हैं...तुम पगडंडियों पर दौड़ती हुई उनके पास पहुँचती हो...मेरे कहने पर कि तुम्हें सर्दी लग जायेगी...तुम आइस क्रीम लेने के लिए जिद करती हो.

कुछ दूर हम दोनों आइस क्रीम खाते हुए चले जा रहे हैं...वापसी में हमें गुलाबों से भरा बगीचा मिलता है...मैं जब गुलाब को तोड़ने लगता हूँ तो तुम पूंछती हो कि गुलाब को दर्द तो नहीं होगा...मैं ना में सर हिलाता हूँ...साथ चलते चलते मैं तुम्हारे बालों में गुलाब लगा देता हूँ...तुम मुस्कुराते हुए मेरी आँखों में झांकती हो...चलते चलते फिर से तुम खिलखिला जाती हो...ढेर सारी रंग बिरंगी तितलियाँ वहाँ से गुजरती हुई जा रही हैं...तुम्हारे चारों और आ आकर कुछ कह रही हैं...शायद सूरज के डूबने पर अपने घरों को जा रही हैं और तुमसे ख़ास तौर पर अलविदा कहने चली आई हैं...तुम एक तितली को अपनी हथेली पर बैठा कर कुछ बोलती हो...शायद अलविदा ही कहा होगा

खुशियाँ बिखेरती हुई तितलियाँ अपने अपने घरों को चली जाती हैं..तुमने मेरा हाथ फिर से पकड़ लिया है...और हम चहलकदमी करते हुए अपने दरवाजे तक पहुँच गए हैं...फिर तुम अचानक से मेरे गाल को चूम कर दरवाजा खोलकर अन्दर चली जाती हो...मैं भी मुस्कुराता हुआ तुम्हारे साथ आ जाता हूँ.

सुबह उठ कर तुम मेरे सीने पर अपने सर को रख कर बोल रही हो...कहाँ ले गए थे मुझे...और मैं तुम्हारे बालों को चूमकर कहता हूँ...हमारी फेवरेट जगह...तुम मुस्कुरा जाती हो

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