पेज 3 असली नारी शक्तिकरण है क्या ?

>> 21 May 2009

सबने देखा है उस औरत को जिसके सर पर छत है ? उसके नाम पर नारी शक्तिकरण की खूब चर्चा भी की है. जो पेज 3 की पार्टियों की तस्वीरों में छपी होती है. ये जताने के लिए कि देखो संसार कहाँ पहुँच गया है. स्त्री कितनी आगे पहुँच गयी है. चाहे उन्होंने बुटीक भर खोल रखी हो ...जो शौकिया फैशन डिजाइनिंग के कोर्से करके अपने बाप के पैसों से झूठा राग अलाप रही हों.

जिन्हें नारी शक्तिकरण की A, B, C भी न आती हो. अरे वो क्या जाने जिन्होंने अपने अमीर बाप के घर में पहला कदम रखा हो. अंग्रेजी स्कूल में पढाई लिखाई की हो ...विदेश जाकर डिग्री हासिल की हो और फिर वापस भारत आकर...बाप के पैसों से खुली दुकान या कोई कंपनी उनका इंतज़ार करती हो...जिनकी रात डिस्को में कटती हो ..पेज 3 की पार्टियों से जिन्हें फुर्सत न हो ...जो चूमा चाटी करते हुए फोटो खिचवा कर खुश हो रही हों .....उन्हें क्या पता होगा नारी शक्तिकरण का ...लेकिन जब भी नारी शक्तिकरण की बात की जाती है ...तो जी वो आ जाती हैं एक साडी पहन कर....जो रटे रटाये डायलोग बोलकर वाह वाह बटोरती हैं ...मैं उनके खिलाफ नहीं ...तरक्की उन्होंने भी की है ...क्या मगर नारी शक्तिकरण की जमीनी सच्चाई वही है...(और क्या उच्च वर्गीय उस समाज में भी स्त्री की दशा वाकई अच्छी होगी ?)...या सिर्फ उन्हें शो पीस बनाकर दिखाया जाता है

क्या नारी शक्तिकरण की बात करने वालों को वो नारी नहीं दिखाई देती जो ईट की भट्टी में झुलसती है, कारखानों में काम कर कर के अपने बच्चों को पालती है ...अपने बच्चों को उनके पैरों खडा करती है ...उनकी शादी करती है ...जो अपने जमीर के लिए लड़ती है ...जो समाज में रह रहे भूखे भेडियों से लड़ते हुए आगे बढती है ...

या जो अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा कपडों पर प्रेस कर कर के अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाती है ...जो सुबह के 6 बजे से रात के 12 बजे तक काम करती रहती है ...जो बच्चों की खातिर जगती है ...उनकी फिकर करती है ....जो अपनी पूरी जिंदगी इस आस में निकाल देती है कि इन्हें पढ़ा लिखा कर आगे बढ़ाना है ...

हाँ मैं सलाम करता हूँ ऐसी नारी को जो ईट की भट्टी में तपती है...ईट उठा उठा कर आगे बढती है, कपडे प्रेस करती है, सिलाई, कडाई, बुनाई कर कर के अपने बच्चों को पालती है ...दर्द सहती है ...फिर भी उफ़ नहीं करती इस आस में कि बच्चों को पालना है आगे बढ़ाना है

ऐसी ही दो स्त्रियों को मैं सलाम करता हूँ जिन्हें मैं जानता हूँ ..एक मेरे गृहनगर फिरोजाबाद में ...जिसके पति की मौत कारखाने में काम करते हुए हो गयी ...जिसके चार बच्चे थे और उसके पास कोई विकल्प नहीं था...उसने ईट के भट्टे में खुद को झुलसाया, मेहनत की ...दिन रात एक कर दिया ...और अपने 4 बच्चों को काबिल बनाया, उनकी शादी की, पढाया-लिखाया, उन्हें इस काबिल बनाया कि वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें ...हाँ उस अशिक्षित नारी को मैं सलाम करता हूँ ...जिसने अपनी जिंदगी में इतना संघर्ष किया

एक जहाँ में रहता अर्थात फरीदाबाद मैं अक्सर देखता हूँ कि एक महिला सुबह 8 बजे से रात को 8 बजे तक प्रेस करती है ...मेहनत करती है ..अपने बच्चों को पालती है...आस पास वाले बोलते हैं कि पिछले 10 साल से वो यूँ ही प्रेस करती आ रही है ....उस महिला का पति 15 साल पहले उसे छोड़ कर चला गया.. लेकिन वो टूटी नहीं ...उसने अपने बच्चों को पाला...खुद से लड़ी ..ज़माने से लड़ी ...मेहनत की...बच्चों को पढाया लिखाया ...और आज भी मेहनत कर रही है ...हाँ मैं इस महिला को सलाम करता हूँ ...इस महिला के जज्बे को ...अगर नारी शक्तिकरण की बात करें...अगर जमीनी शक्तिकरण की बात करें तो ये नारी शक्तिकरण है ....वो लड़ती हैं, आगे बढती हैं...वो आज जहाँ भी हैं खुद के दम पर हैं ...और इस नारी शक्तिकरण को मैं सलाम करता हूँ
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21 comments:

Manorma 21 May 2009 21:10  

ji haan main bhi ek aisi hi mahila ko janti hoon jinheone sari zindgi khoob mehnat ki...

aapne sach hi kaha hai TV par to mostly oonche gharane aur high figh ladies ko lakar baitha diya jata hai

pratibha 21 May 2009 21:16  

सचमुच यही है असली सशक्तीकरण. बाकी तो सब कोरी लफ्फाजी है. अच्छा लिखा है आपने.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" 21 May 2009 21:41  

अधिकतर तो नारी सशक्तिकरण के नाम पर बिना यथार्थ को जाने बेफालतू की लफ्फाजी ही देखने को मिलती है.

hem pandey 21 May 2009 22:42  

नारी सदा से ही सशक्त है. आपने जो उदाहरण दिए हैं उस तरह के एक- दो नहीं अनेकों उदाहरण हैं. लगभग सभी पाठकों ने अपने आस पास कुछ एक ऐसे उदाहरण जरूर देखे होंगे. विगत समय की अपेक्षा आज परिस्थितियाँ नारी के लिए कुछ अनुकूल अवश्य हुई हैं.ईंट के भट्टे में काम करने वाली और कपडों में प्रेस करनेवाली महिला जहां नारी सशक्तीकरण का उदाहरण है वहीं किसी कंपनी की सी ई ओ भी ऐसा ही उदाहरण है. अमीर बाप की बेटी होने या रात को पार्टियों में जाने के कारण उसे इस गौरव से वंचित नहीं किया जा सकता.

अनिल कान्त : 21 May 2009 22:59  

Hem PAndey Ji maine pehle hi Clear kar diya tha ki main unke khilaf nahi hoon ...

kintu jab shaktikaran ki baat aati hai tab sirf aur sirf Page 3 standard wali mahilayein hi kyun yaad aati hain

Nari shaktikaran to jameeni star par bhi hai.

Udan Tashtari 22 May 2009 08:18  

अभी भी इसे विचारणीय आलेख ही कहूँगा..

Jayant Chaudhary 22 May 2009 10:08  

अनिल भाई...


मेरे मन के विचार आपने लिख दिए..
मुहं की बात छीन ली...
:))

बहुत सुन्दर.

!जयंत

Nirmla Kapila 22 May 2009 11:46  

anil bahut badiya vichar hain magar ameer aur greeb hona nari sashkti karan me jaroori nahin ek ameer nari bhi abla ho sakti hai magar nari sashaktikaran me jo ek disha hai use moolyon par rakha jana chahiye na ki adhunikta par bahut badiya hai is lekh par dasha aur disha ko samne rakh kar ek aur lekh likho kyon ki tum bahut badia likhte ho

मीनाक्षी 22 May 2009 13:48  

अनिल, आपका लिखा हमेशा प्रभावित करता है...नारी चाहे जो भी अमीर हो या गरीब हो...जो भी अपने बच्चे को इंसान बना कर अच्छे समाज के निर्माण में योगदान करे...वही सशक्तिकरण का उत्तम उदाहरण है.. शुभकामनाएँ

दिगम्बर नासवा 22 May 2009 14:27  

ऐसी नारी शक्ति ही है जो शक्ति की सत्ता...नारी शक्ति की सत्ता को अपने कन्धों पर उठाये हुवे है..........सलाम है मेरा

बी एस पाबला 22 May 2009 19:53  

ज़मीनी स्तर पर किया गया इस तरह का सशक्तिकरण अक्सर बिना किसी का सहारा मिले होता है। जबकि पेज 3 का …

Priya 22 May 2009 23:21  

bahut badiya.....sahi mayne mein sashaktikaran ki shuruwaat yahi se honi chaiye..... par afsoos ...pahel kaun kare

sujata 22 May 2009 23:45  

Great post..Even though there is not much link but reading your post I kept on thinking of an ad on TV that I like very much, its Havel cables I think, where they show how a small boy makes a 'chimta'for his mother who is making chapatis... True what women in rural India go through to bring up children goes totally unseen.

sujata 22 May 2009 23:45  
This comment has been removed by the author.
Anil Pusadkar 23 May 2009 10:29  

अनिल,छत्तीसगढ मे नारी सशक्तिकरण साफ़ नज़र आता है।पंचायतो से लेकर हर स्तर पर वे अपनी उपस्थिती का एहसास करा रही है।सड़क पर ठेला धकेल कर जी-तोड़ मेहनत करने से लेकर सब्जियां बेचने के मामले एकाधिकार बना चुकी है।मेहनत मजूरी के साथ-साथ शराब बंदी आंदोलन जैसी जागरूकता भी सिर्फ़ नारी ही दिखा रही है।यंहा तो सब्जी बेच कर जमा किये हुये रूपये दान मे देकर बिन्नी बाई सोनकर ने नगर माता का खिताब भी पाया है। और तो और यंहा छत्तीस्गढ को छत्तीसगढ महतारी यानी माता कहते हैं।

रंजन 23 May 2009 21:30  

नारी शस्शक्तिकरण के बहुतेरे आयाम है.. कुछ छ्द्म है कुछ छुपे है.. तय करना होगा कि आखिर हम हासिल क्या करना चाहते है.. असल नकल की सही पहचान कर आगे कदम बढाना होगा.. चर्चा होनी चाहिये.. सार्थक चिंतन..

शोभना चौरे 23 May 2009 23:47  

aapne bhut shi mayne nari ke sshktikaran ko rekankit kiya hai .mai bhi un sbhi mhilao ko nmn krti hu jinke dam par aj kamkaji mhilaye apne ghar ke bahr kshetra me safal ho rhi hai .kintu apki yh bat se mai shmat nhi hu ki(ak ashikshit mhila )ki jgh aap use aisa likh skte hai jo mhila kbhi school nhi gai.blki us mhila neto apni asli shiksha se smaj ke samne ak udahrn pesh kiya .
asi mhilaye hmare smaj ki ridh hai .
apke bebak aalekh ke liye sadhuwad .

●๋•guℓѕнαn●๋•™ 24 May 2009 12:33  

Women are the source of life. Its sad though very true, in today's era that they are regarded as the weaker sex.

And the so called women empowerment has reduced to the freedom of fashion, vulgarity and openness, when actual women empowerment is related to bring into light their capabilities, honoring their intelligence and giving them a chance to contribute in society in a constructive manner. It's all about recognizing them as human par at men.

You have beautifully sketched out how important a role women's play and how strongly they carry out their responsibility. If given a chance they can do wonders. But Alas! they are reduced to act as what men want to see them.

I may be sounding a bit too much Page3 hater, but for some reason i can never figure out how oodles of makeup and small dresses make them symbols of women empowerment hen we have so many women keeping a balance in their work and home, contributing in society both materially and morally.

I salute such women.

Keep writing :)

abhivyakti 24 May 2009 17:24  

अनिल जी,
बहुत अच्छा लिखा आपने...नारी सशक्तिकरण के आन्दोलनों को लेकर पहली आपत्ति तो यह होती है कि इसका नेतृत्व वे लोग करते है जिन्होंने यह कभी महसूस ही नहीं किया कि जिनके उत्थान के लिए झंडा उठाए है उनका जीवन जीना क्या है...वातानुकूलित ड्राइंग रूम में प्रोजेक्ट्स बनाकर पञ्च सितारा होटलों में महंगी विदेशी शराब की चुस्कियों के साथ बड़ी बड़ी योजनाएं और कमीशन डिस्कस किये जाते है...क्या उन लोगों को यह भी पता है कि फैशन बदलने और जीवन स्तर बदलने में बहुत बड़ा फर्क है...जो गाँव की बाला आजसे २० बरस पहले घागरा चोली में मजदूरी करती थी..आज वही बड़े घरों की उतरन के पुराने कपडों में जींस पहन कर भी मजदूरी ही कर रही है...आज भी पचास प्रतिशत आबादी के मात्र दस प्रतिशत सांसद महिला है...आज भी बहुत पैसे वाले लोग अपनी बेटियों और बीवीओं पर नजर रखने के लिए निजी जासूसों को पैसे देते है..और वे लोग ही आधी रात में बार बालाओं के नृत्य देखते है और पैसे फेकते है...आज भी हमारे घर की बहु बेटियाँ घर का सारा काम निपटा कर नौकरी करने जाती है और वापस आने पर फिर काम में जुट जाती है..क्या इन वंचनाओं को अपने आन्दोलन के नेतृत्व में शामिल करने का साहस कथित नारी सशक्तिकरण के पुरोधाओं में है???

एक अच्छे विषय पर सशक्त लेखन की बधाई...!

Pyaasa Sajal 25 May 2009 00:52  

dekhiye bura mat maaniyega,par main aapki kuch baato se asahmat hoon yahaan...

ye kehna ki sampann mahilaaye naari-shakti aur naari-adhikaar jaisi batein nahi kar sakti,ya unke mooh se shobha nahi deta,ye to bilkul galat hai..agar aaj wo safal hai,kisi mukaam pe hai to bhi ho sakta hai ahaan tak pahunchne ke liye sangharsh ke ek aise maarg se unko guzarna padaa ho jahaan unko is baat ka andaaza hua ho ki ek naari ke liye ye samaaj rozmaara ki bhi kaisi mushkile paida karta rehtaa hai...agar wo lagaatar ek bade gharaane me bhi badee hoti hai,fir bhi jo bhedbhaav ka ek chalan samaaj me vyaapt hai,usse roobaroo to wo hoti hi hongee!!

samaaj ki koi kami shayad samaaj ke ek varg tak seemit nahi,isliye e jo soch hai wo mujhe munaasib nahi lagti...aise shayd hum apni hi kamee ko dabaane ki koshish kar rahe hai

www.pyasasajal.blogspot.com

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