सफर - ऐ रोमांटिक जर्नी (अन्तिम भाग)

>> 17 August 2009

इसे पढने से पहले पहला भाग और दूसरा भाग अवश्य पढ़ लें

कुछ सफ़र दिल में पूरे होने की आस लिए हुए बीच में ही अधूरे छूट जाते हैं...मानव और पल्लवी का ये सफ़र भी कुछ ऐसा ही था...मानव वहाँ से फ्लाईट पकड़ कर दूसरे शहर को रवाना हो जाता है और पल्लवी वहाँ से कहाँ गयी मानव को कुछ नहीं पता था...लेकिन उसने ऐसा तो बिलकुल नहीं सोचा था...कि इस सफ़र का ऐसा भी एक मोड़ आएगा...वो बस एक अजीब उधेड़बुन में था...क्या उसे पल्लवी अच्छी लगती है...क्या पल्लवी उसे दोबारा मिलेगी...

पल्लवी अपने घर पहुँचती है उसकी माँ उसका बैग पकड़कर कहती है ये पैर में क्या हो गया...अरे वो कुछ नहीं हल्का सा पैर मुड गया था...अब ठीक हूँ...अच्छा ठीक है हाथ मुंह धो ले और फिर कुछ खा पीकर आराम कर, सो जा थक गयी होगी...पल्लवी अपने कमरे में जाती है और कुछ ही देर में सो जाती है...उसकी माँ उसके कमरे में खाना खाने के लिए कहने आई लेकिन उसे सोता देखकर चली जाती हैं...पल्लवी को अचानक से मानव का चेहरा सामने दिखाई देता है...बिलकुल ऐसे जैसे कि वो उसके एकदम करीब हो...बिलकुल पास...एकदम पास...और वो जाग जाती है...रात के 3बज रहे हैं...मानव मेरे सपने में...पल्लवी सोचती है ये मुझे क्या हो गया है...उठकर रसोई में जाकर कुछ खाकर फिर सो जाती है

सुबह पल्लवी की सहेली उसके घर आती है...हैलो आंटी जी...कहाँ है पल्लवी...अपने कमरे में...वो पल्लवी के कमरे में जाती है...तो आ गयी मैडम...बड़े लम्बे टूर पर गयी थी आप तो...तो क्या क्या किया वहाँ...पल्लवी उसे मानव के बारे में बताती है...आये हाय क्या बात है...कैसा था हैंडसम...कैसी बातें करता था...क्या कहा उसने...क्या क्या बातें हुई...कुछ हुआ...पूजा तू भी न...अरे बता ना यार...ऐसा कुछ नहीं हुआ...हाँ शुरू में थोडा फ्लर्टी लगा...बाद में ठीक था...आय हाय फ्लर्टी...तो बात कहाँ तक पहुंची...कैसी बात...अरे लव शव...और क्या...उसने आई लव यू बोला कि नहीं...तूने कुछ कहा कि नहीं...वगैरह वगैरह...पूजा तू भी ना...ऐसा कुछ नहीं था...ला उसका नंबर दे में भी बात करूँ...आखिर हम भी तो देखें कौन है और कैसा है...और जब पल्लवी आखिरी की बात बताती है तो पूजा दंग रह जाती है...व्हाट...मतलब तूने ऐसा बोला...पूजा पल्लवी को तमाम बातें बोलती है...तेरा कुछ नहीं हो सकता...वगैरह वगैरह

पल्लवी कहती है जो होना है सो होगा...खामखाँ की फिक्र न कर...पूजा कहती है कि अगर तुझे उससे प्यार हो गया तो...फिर तू क्या करेगी...व्हाट...'प्यार'...कुछ भी बोलती रहती है तू...पल्लवी पूजा को बोलती है...ये अपनी लव थियोरी बंद कर और कुछ काम की बात कर...पूजा कहती है चल बाहर घूमने चलते हैं...फिर दोनों स्कूटी पर बाहर चल देती हैं...रास्ते में पल्लवी पूजा को बताती है कि उसे बस अपनी एक बात अच्छी नहीं लगी कि उसने उसे पूरा सच नहीं बताया कि वो लेक्चरार भी है...पूजा खामोश रह जाती है कुछ कहती नहीं...बस इतना कहती है कि अच्छे लड़के किस्मत से मिलते हैं और तूने अपनी किस्मत पर ठोकर मार ली

पूजा और पल्लवी वापस घर आ जाती हैं...पूजा उसे छोड़कर चली जाती है...पल्लवी अपने कमरे में सोच में डूबी हुई बैठी है...बार बार उसके दिमाग में मानव से बात करते रहने का फ्लैश बैक चलता है...कभी उसकी कोई बात तो कभी उसकी कोई बात...उसकी माँ आती है और कहती है खाना खा ले बेटा...

अब पल्लवी को हर छोटी बड़ी बात में मानव के जुड़े होने का एहसास होने लगता है...कभी टेबल पर रखे आलू के परांठों से तो कभी चाय से...कभी किसी बात से तो कभी किसी बात से...वक़्त धीरे धीरे बीतने लगता है...पर उसका सोचना कि वक़्त के साथ मानव से जुडी यादें भी जाती रहेंगी...ऐसा कुछ भी नहीं हुआ...हर दूसरे दिन उसे मानव सपनों में दिखाई देने लगा...

कई महीने बीत चुके पर वो बातें...वो चेहरा अभी भी जेहन में था...वो यादें कमबख्त पीछा ही नहीं छोड़ती...सोच में डूबी हुई पल्लवी अपने कमरे में बैठी है...खिड़की के सहारे...वो डूबते हुए सूरज की ओर देख रही है...कमरे में पन्ने बिखरे पड़ें हैं...पंखें की हवा से अस्त व्यस्त...पल्लवी की माँ कमरे में आती है...पल्लवी...अरे ये सब क्या है...कहाँ ध्यान है तेरा...वहाँ क्या देख रही है...पल्लवी का ध्यान टूटता है...अरे कुछ नहीं...वो डूबता हुआ सूरज...क्या बात है पल्लवी...कुछ बात है क्या...नहीं तो...कुछ नहीं...तो फिर तू आजकल इतनी उखड़ी उखड़ी क्यों रहती है...अरे कुछ भी तो नहीं हैं...आप भी ना खामखाँ परेशान हो रही हैं...कुछ होगा तो आपको नहीं बताऊंगी

पूजा पल्लवी के घर आती है...उसके कमरे में जाती है...पल्लवी उसे सारी बात बताती है...पूजा सारी बातें ध्यान से सुनती है...पल्लवी की आँखों में देखती है और फिर जोर से हंसती है...बेटा तू तो गयी काम से...तुझे प्यार हुआ है...और तुझे पता ही नहीं...व्हाट...प्यार...क्या बात कर रही है...पल्लवी पूजा को बोलती है....क्यों ये उसका सपनों में आना...उसकी बातें सोचती रहना...उसकी बातें अच्छी लगना...ये प्यार नहीं है तो और क्या है...पल्लवी सोच में पड़ जाती है...इसे प्यार कहते हैं...हाँ बेटा इसे ही प्यार कहते हैं...पूजा बोली...तो अब...पल्लवी पूजा की ओर देखती है

दोनों सोच में पड़ जाते हैं कि अब क्या हो...पूजा बोलती है तूने सारे रस्ते तो पहले ही बंद कर दिए और अब मुझसे उम्मीद लगा रही है कि कुछ हो जाये...तब तो उस दिन बड़ी कह आई थी कि मैं खुद को समझना चाहती हूँ...मैं देखना चाहती हूँ...वगैरह वगैरह...अब तो बस ऊपर वाले पर छोड़ दे...जो होना है अब वही करेगा...हम लोग तो वैसे भी अब कुछ नहीं कर सकते...पल्लवी पूजा के चेहरे की ओर देखती है...और पल्लवी की आँखों से आंसू निकल आते हैं...वो पूजा के गले से लग जाती है

पूजा पल्लवी को समझा बुझा कर चली जाती है...आज पल्लवी जी भर के रोई...खूब...जितना दिल चाहा...उसकी नज़र खिड़की के बाहर जाती है...बारिश होने लगी...इस बारिश के साथ ही मानव की यादें जुडी हुई थी...वो भागती हुई छत पर जाती है...और बाहें फैलाकर बारिश में भीगती है..."कभी खुद की मर्ज़ी से बारिश में भीगी हो...नहीं भीगी हो तो भीग कर देखना...तब पता चलेगा"...एकदम फ्लैश बैक में चली जाती है पल्लवी...ये बात मानव ने उसे बोली थी...आज मानव की बात सच साबित हुई...उसे आज बारिश में अच्छा लग रहा था...साथ ही साथ ये बारिश एक तड़प लिए हुए थी...सब कुछ था लेकिन मानव कहीं नहीं था

अब पल्लवी को हवा में दुपट्टा उडाना अच्छा लगता था...अब वो आलू का परांठा खाना पसंद करने लगी थी...पूजा के साथ तेज रफ्तार से चलती स्कूटी पर खड़ी होकर वो अपना दुपट्टा उडाती...अब उसे उन सब बातों से प्यार हो चला था जो मानव ने कहीं थीं

वक़्त अब करवट ले रहा था...अब ये प्यार एक दर्द भी साथ लिए हुए रहता...ना मिल पाने का दर्द...इस दर्द के साथ अब पल्लवी ने जीना सीख लिया...लेकिन उसका प्यार और भी गहरा होता जा रहा था...इस बात को पूरे 2 साल बीत चुके थे...आज पूजा और पल्लवी मंदिर गए...पल्लवी अब आये दिन मंदिर जाती और भगवान से विनती करती कि बस एक बार वो मानव से मिला दे...कम से कम वो अपने दिल की बात तो कह सके...वो जान तो सके कि मानव क्या सोचता है...उस दिन मानव क्या कहना चाहता था...मानव का क्या हाल है

2 साल और मानव...बहुत कुछ बदल दिया इन 2 सालों ने...उसका हाल पल्लवी से बुरा था...प्यार का एहसास और एक दर्द कि पल्लवी ने आखिरी बार जाते हुए उसकी बात ना सुनी...आखिर पल्लवी ने एक बार भी नहीं सोचा...प्यार के साथ अब वो एक घुटन लिए हुए भी जी रहा था...और इस बात को सोचता रहता कि बस एक बार मिल जाए पल्लवी तो वो अपने दिल का पूरा हाल बयान कर दें...हर वो बात कह दे जो उसके दिल में है....जो उसने इन बीते 2 सालों में महसूस की है...और जोर से डांटे...अपने प्यार को बयाँ कर दे

आज वो सब कुछ छोड़ छाड़कर दूसरे शहर जा रहा है...उसका दोस्त उसे छोड़ने आया है...क्यों कर रहा है यार तू मानव ऐसा...इतनी अच्छी नौकरी को छोड़कर जा रहा है...जगह बदलने से क्या होगा...क्या तू उसे भूल पायेगा...तू जहां भी जाएगा उसे याद करेगा...तू उससे प्यार करता है...खुद को कब तक यूँ ही सजा देता रहेगा...छोड़ यार सब ठीक है...तू अपना ख्याल रखना...वहाँ पढाऊँगा तो थोडा ध्यान बटेगा...और नौकरी का क्या है, दोबारा दिल करेगा तो फिर आ जाऊंगा....जब चाहे बदल लो...मानव का दोस्त मानव से गले मिलता है...चल अपना ख़याल रखना...और देख ज्यादा खामखाँ की बातें मत सोचना...हाँ ठीक है

# 2 साल...हाँ पूरे 2 साल बीत जाने के बाद

पानी की बड़ी सी नाव है मानव उसमें चढ़ता है...आखिर उसे पार करके उसे दूसरी ओर से शहर की गाडी लेने आएगी...नाव में करीव 15-20 लोग और भी बैठे हुए हैं...आमने सामने...वो जाकर अपना बैग उसमें रख देता है और नीचे गर्दन झुकाए बैठ जाता है...अभी अभी उसने एक चेहरा देखा...हाँ वही चेहरा जो वो हर रोज़ सपने में देखता है...वही चेहरा जिसके बारे में वो सोचता रहता है...वही चेहरा जिसकी वजह से वो सब कुछ छोड़ छाड़ कर आया है...वो सोचता है कि ये उसका बस वहम होगा...वो गर्दन उठाता है...उस नाव में उसके ठीक सामने पल्लवी बैठी थी...पल्लवी उसे देखे जा रही थी...दोनों की आँखें बस एक दूसरे को देखे जा रही थीं...ऐसे जैसे कि कितने जन्मों के बिछडे हुए मिले हैं...दोनों की हालत बेसुध सी हो गयी...दोनों कहीं खो से गए...दोनों ने बड़े ध्यान से एक दूसरे को देखा...उन्हें पक्का यकीन हो गया कि उन्होंने वाकई एक दूसरे को देखा है...और वो सच में एक दूसरे के सामने हैं

पल्लवी वहाँ से उठकर मानव के पास आ जाती है..उसके पड़ोस में बैठे हुए भाई साहब को अपनी जगह जाने के लिए कहती है...दोनों को इतनी ख़ुशी कभी नहीं मिली...कभी भी नहीं...कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या कहें...कहाँ से बात शुरू करें...पल्लवी हौले से कहती है..."दुनिया गोल है"...और मुस्कुराती है...मानव बोलता है कुछ कहा...ह्म्म्म...नहीं फिर मानव की ओर देखकर मुस्कुरा जाती है...

दोनों के मुंह से निकलता है...यहाँ कैसे...कहाँ जा रहे हो...फिर दोनों चुप हो जाते हैं...ओके ठीक है पहले आप कहो...पल्लवी नहीं आप कहो...मानव मुस्कुरा जाता है...क्यों आज आप पहले नहीं कहोगी...पल्लवी ना में सर हिलाती है...उसकी आँखें ऐसे लग रही थीं जैसे सब कुछ आज इसी पल कह देना चाहती हैं...सामने इतने सारे लोग बैठे हुए थे...इसलिए दोनों ने खुद को रोक रखा था...

कहाँ जा रहे हैं आप...पल्लवी मानव से पूंछती है...ह्म्म्म यहीं...और उसके सवाल को नज़र अंदाज़ कर देता है...मानव के दिल में एक अजीब सी घुटन थी...वो प्यार भी करता था और इस बात से भी खफा था कि वो जब चाहे तब कुछ जाने और उसे कुछ जानने का हक़ नहीं...

कुछ ही देर में नाव दूसरी तरफ पहुँच जाती है...दोनों उतरते हैं...मानव उतर कर चलने लगता है...पल्लवी उसके पीछे पीछे जाने लगती है...कहाँ जा रहे हैं...मेरी बात तो सुनिए...और उसका हाथ पकड़ लेती है...नारज हो क्या...मानव उसकी ओर देखता है और कहता है...नहीं...मैं क्यों नाराज़ होने लगा...आखिर तुम मेरी हो कौन...क्या रिश्ता है...जो मैं नारज होने लगा...तुम कुछ भी तो नहीं...सॉरी आप...पल्लवी कहती हैं नहीं मुझे आप तुम ही कहो...कम से कम हक़ तो जताते हो...

हक़ किस हक़ की बात कर रही हो...ह्म्म्म....यूँ ही बीच रास्ते में छोड़ कर जाने की...तुम सब कुछ जान लेना चाहती हो लेकिन कुछ बताना नहीं चाहती...मुझे तुम्हारे नाम के सिवाय क्या पता है...कुछ भी तो नहीं...फिर क्यों...आखिर क्यों मैं बेवजह ये सब बातें करूँ...मानव जोर से चिल्लाकर पल्लवी को बोलता है

पल्लवी बोलती है पर मैं कुछ कहना चाहती हूँ...क्या कहना चाहती हो...आई ऍम सॉरी...मेरी वजह से आपको जो तकलीफ हुई उसके लिए...और मुझे लगता है कि...मानव कहता है...बस खुश हो आज जानकार कि ये दुनिया गोल है...आज दो साल बाद पता चल गया...अब तो खुश हो...मैं कहना चाहती हूँ कि...क्या कहना चाहती हो....पल्लवी मानव के ख़राब मूड को देखकर शांत हो जाती है...मानव कहता है आज 2 साल बाद यही कहना चाहती हो कि हम दोस्त बन सकते हैं...तुम मुझसे बात मत करना...समझी तुम...

मानव पल्लवी से कहता है कि पिछली बार तुमने कहा था...कि तुम देखना चाहती हो कि ये दुनिया गोल है कि नहीं...आज मैं कहता हूँ कि अब मैं जानना चाहता हूँ कि मुझमें कहाँ कमी है...आखिर रिश्ते बनाने से मैं डरता क्यों हूँ...और अब मैं जानना चाहता हूँ कि जिस रिश्ते के बारे में मैं सोच रहा हूँ...क्या मैं निभा सकता हूँ...मुझे पता है कि तुम्हें ज्यादा कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ता..पर मुझे पड़ता है...

इस तरह वो पल्लवी की बात बिना सुने चला जाता है...आज पल्लवी मानव की तरह मायूस खड़ी थी...आज वो बहुत कुछ कहना चाहती थी...लेकिन मानव ने उसे मौका नहीं दिया...ठीक वैसे ही जैसे कभी उसने नहीं दिया था...वो आज उसे छोड़ कर ठीक उसके सामने चला गया...और वो उसे बस जाते हुए देख रही है...वो कहाँ जा रहा है....उसे नहीं पता...पर आज वो इतना जान गयी थी कि मानव के मन में क्या है...और वो उसे चाहता है...वरना इतना गुस्सा वो कभी नहीं दिखाता...

2 महीने बीत चुके हैं पूजा, पल्लवी के घर आती है और उसे किसी तरह समझा कर चली जाती है...आज उसके कमरे में एक अजीब सी खामोशी है...किताब सब उलट पुलट हैं...बिस्तर भी ठीक नहीं है...पल्लवी की माँ उसके कमरे में आती है...पल्लवी के पास बैठ कर उसकी माँ उसके सर पर हाथ फिराती हैं..क्या हुआ बेटा...और पल्लवी अपने माँ के सीने से लग कर बुरी तरह से रोने लगती है

क्या हुआ बेटा कुछ बोल तो सही...और फिर पल्लवी रो रोकर सारी बात अपनी माँ को बताती है...उसकी माँ उसे दिलासा देती हैं कि सब ठीक हो जाएगा...लेकिन उन्हें भी नहीं पता था कैसे...उस भगवान पर भरोसा रख सब ठीक हो जायेगा...और पल्लवी को अपनी गोद में लिटाकर उसे सुलाती हैं

वक़्त बीतता रहा और पल्लवी का हाल तो प्यार में बुरा हो रखा था...वो जानती थी कि जब एक बार वो मिला है तो उसे जिंदगी में कभी न कभी फिर मानव जरूर मिलेगा...तब वो उसके सीने से लग कर खूब रोएगी और उसे बताएगी कि वो उसे कितना प्यार करती है

छः महीने गुजर चुके थे...पल्लवी दूसरी जगह नौकरी के लिए चली जाती है...अब उसका दिल यहाँ नहीं लगता था...अपना मन बदलने के लिए कुछ महीने का कहकर वो दूसरे शहर में नौकरी करने चली जाती है...जहां मानव का बहुत कुछ जुडा हुआ है...एक तो बारिश जो आये दिन होती रहती है...जहां वो हवा में अपना आँचल उड़ा सकती है...जी खोलकर दौड़ सकती है...लेकिन वो करती नहीं...वो एक अजीब सी खामोशी लिए रहती है...उसकी आँखें बहुत कुछ कहना चाहती हैं लेकिन फिर भी खामोश हैं

उधर मानव पल्लवी के शहर में नौकरी करने पहुँच जाता है...लेकिन उसे नहीं पता कि वो पल्लवी का शहर है...वो पल्लवी के पिताजी की ही यूनिवर्सिटी में पढाने लगता है...पल्लवी के पिताजी का लगाव मानव से कुछ ज्यादा ही हो जाता है...वो उसे बेटे की तरह चाहने लगते हैं...पल्लवी के पिताजी शाम को डिनर पर मानव को बुलाते हैं

मानव डिनर टेबल पर बैठा होता है...पल्लवी की माँ और पिताजी भी डिनर टेबल पर बैठे होते हैं...तभी मानव की नज़र पल्लवी की तस्वीर पर जाती है...वो अचानक से उठकर वहाँ पहुँचता है...ये इशारा करते हुए बोलता है...पल्लवी की माँ कहती है ये हमारी बेटी है...कहाँ हैं ये...पल्लवी की माँ कहती है कि उसकी खुद से ही लड़ाई चल रही है आजकल...पता नहीं ऐसा क्या किया है उसने कि...जिससे वो प्यार करती है वो उसकी बात बिना सुने उसे छोड़ कर चला गया...और ये कहते हुए वो रोने लगती हैं...मानव कहता है प्यार...मानव पल्लवी की माँ के पास जाकर कहता है कहाँ है पल्लवी...मुझे अभी उससे मिलना है...पल्लवी की माँ एक पल में ही उसकी बातों से समझ जाती हैं कि यही वो लड़का है....और वो पूरी कहानी बताती हैं...और अंततः वो उसका पता बताती हैं...वो कहता है मुझे निकलना है...मैं उससे जल्द से जल्द मिलना चाहता हूँ...उनके पैर छू कर कहता है मुझे बहुत जल्दी है अब...और वो उसी रात पल्लवी के शहर को निकल लेता है

पहाडियों में बसा हुआ शहर...हल्की हल्की बारिश हो रही है...पल्लवी छतरी लेकर पैदल चल रही है...मानव पीछे से बोलता है...पता है ये दुनिया गोल है...और यहाँ चाहने वाले इसी दुनिया में कहीं ना कहीं टकरा ही जाते हैं...चाहने वाले मिल ही जाते हैं...पल्लवी एकदम पलटती है...पीछे बारिश में भीगता हुआ मानव खडा हुआ है...

पल्लवी मानव को देखकर खुश हो जाती है...मानव तेज आवाज में दूर से बोलता है...मुझे तुमसे कुछ कहना है...पल्लवी चिल्लाती है क्या...आई लव यू...मैं तुमसे प्यार करता हूँ...बहुत बहुत बहुत...पल्लवी बोलती है...जानती हूँ...मैं भी आपसे कुछ कहना चाहती हूँ...मानव कहता है जानता हूँ...पल्लवी कहती है फिर भी मुझे कहना है...आई लव यू...आई लव यू...आई लव यू...और दोनों एक दूसरे के करीब आकर एक दूसरे के गले से लग जाते हैं

जानती हो बारिश में भीगने में मजा आता है...पल्लवी हाँ में सर हिलाती है...मानव कहता है पर ये नहीं जानती ना कि साथ साथ भीगने में ज्यादा मजा आता है...पल्लवी हंसने लगती है...अच्छा...और वो छतरी फेंक देती है...फिर वो दोनों धीरे धीरे आगे बढ़ने लगते हैं...आपस में कुछ नोक झोक सी आवाजें आ रही हैं...अच्छा जानती हो बारिश में 'किस' करने में...

23 comments:

Neha 17 August 2009 at 12:11  

kaafi dinon baad padhe aai....so kai dino ki kasar aaj hi nikal gayi....kya baat hai aajkal romantic lekh jyada likhte hain.....?..khair...main bhi kaafi dinon se soch rahi thi ki yahaan aakar kuch padhu....vaise bhi aapko return gift dena hi jyada pasand hai...vaise bahut hi behtarin lekh hai....badhai swikaren...aur haan is baar comment gift ke roop me dene ke liye dhanyawaad...vaise mujhe return gift bhi pasand hai....

दिगम्बर नासवा 17 August 2009 at 12:17  

vaav ................ anil जी............ mazaa aa गया आपकी kahaani पढ़ कर............. दिल में seedhe utar गयी.......... pallavi और maanav की premaanubhooti सच में bheeni bheeni khushboo की तरह jehan में utar गयी........... aapse milne aana padhega Faridabad................ jaldi ही

raj 17 August 2009 at 13:42  

hmm..happy end...boht kuch tha khani me...miln judayee dard....sabhi kuchh...

vandana 17 August 2009 at 14:14  

anil ji
kahaani nhi thi ye to jaise chalchitra ho aankhon ke samne sab ghatit ho raha ho........aisa laga jaise ............ab kya kahun.

संजीव गौतम 17 August 2009 at 19:23  

अंत भला तो सब भला. सुखांत कहानियां अज़ीब सी संतुष्टि देती हैं. बधाई अनिल भाई. हां क्या फ़िरोज़ाबाद जाना होता है?

अनिल कान्त : 17 August 2009 at 20:00  

जी संजीव जी मेरा फिरोजाबाद आना जाना लगा रहता है...मेरे परिवार के बाकी सदस्य फिरोजाबाद में ही हैं

Harkirat Haqeer 17 August 2009 at 20:54  

जैसे -जैसे कहानी पढ़ती गयी आपकी प्रतिभा की कायल होती गयी .....कहानी लिखने के लिए एक मानसिक द्वंद से होकर गुजरना पड़ता है ...इतना आसन नहीं होता ये कार्य .....बहुत - बहुत बधाई इस सफलता के लिए .....!!

Shefali Pande 17 August 2009 at 22:35  

बढ़िया कहानी है .....

Shefali Pande 17 August 2009 at 22:35  

बढ़िया कहानी है .....

Prem Farrukhabadi 17 August 2009 at 23:01  

bahut hi behtar manmohak dil se badhai!!

Nirmla Kapila 18 August 2009 at 08:17  

पीछे से फिर कहानी पढी और उसकी रवानगी मे बहती चली गयी ।अपकी शैली की तो पहले ही कायल हूँ। बहुत भावमय कथा है और अंत सकारात्मक होने से कहानी सुखमय अनुभूती देती है बहुत सुन्दर बधाई

sanjay vyas 18 August 2009 at 08:31  

सहज प्रवाह लिए प्रेम की तीव्रता अभिव्यक्त करती कहानी.

sujata 18 August 2009 at 11:46  

beautiful ending. Liked the entire story, very vivid and lifelike characters.

Vidhu 18 August 2009 at 13:23  

phursat men pdhungi ...kahaani vaise sar sari tour par padhi hai ..thodaa philmi touch liye hue hai ..phir bhi bhaashaa kaa istemaal khoob kiyaa hai aapne badhai

गौतम राजरिशी 19 August 2009 at 09:25  

अंत ने थोड़ा सा निराश किया....मुझे लग रहा था कि कोई ट्विस्ट होगा, कोई उदास कर देने वाला ट्विस्ट...क्योंकि ये अंत प्रेडिक्टिव था...

लेकिन अच्छे शिल्प के लिये बधाई अनिल!

अनिल कान्त : 19 August 2009 at 10:23  

गौतम जी मैं आगे से ख़याल रखूँगा...कि आप निराश ना हों

Manorma 19 August 2009 at 12:18  

Superb Love Story....I like it...Impressed

Manorma 19 August 2009 at 12:18  

aap agli kahani kab likh rahe hain

sudhir 19 August 2009 at 12:19  

Chha gaye bhai....shabdon ka istemaal aap bahut achchhi tarah karte hain...

behtreen kahani

sudhir 19 August 2009 at 12:20  

aur haan aap love stories kaafi achchhi kah lete hain :)

PD 19 August 2009 at 19:27  

bhai mere, Gautam ji wala haal mera bhi hai.. mujhe aisa laga ki is kahani ko jaldi khatm karne ke chakkar me last me gadbad kar diye.. iska ek part aur likh kar kahani aur achchha ban sakta tha..

But 1st and 2nd part was superb.. :)

Sunil Bhaskar 21 August 2009 at 19:52  

भैया हमें तो कहानी बहुत पसंद आई...अगली कब ला रहे हैं

MD. SHAMIM 21 May 2012 at 11:25  

aankhon se hoye huwe dil gahrayiyo me uter gyi ye kahani.

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