वक़्त की हथेली पर फैलीं

>> 27 September 2009

वक़्त की हथेली पर फैलीं
तेरी मेरी खामोशियाँ

साँसों में घुलती सी जातीं
तेरी मेरी नजदीकियाँ

चुपके से दबे पाँव आकर
बाहों में लेती ये तन्हाइयां

बंद पलकों में समेटती
ख्वाबों में तेरी परछाइयां

सोचता हूँ कहीं ये वही
प्यारा सा इश्क तो नहीं

38 comments:

Manorma 27 September 2009 at 12:32  

हाँ लगता तो ऐसा ही है कि कहीं इश्क ने अपना रंग दिखाया है :)
आजकल आप कम लिखते हैं

sudhir 27 September 2009 at 12:34  

क्या बात है भाई जान आज इश्क की बात कैसे हो चली
चन्द पंक्तियों में हाले दिल कह रहे हैं क्या ?

अनिल कान्त : 27 September 2009 at 12:35  

साहब दिल ने जो कहा वो लिख दिया
कसूर माफ़ :) :)

M VERMA 27 September 2009 at 12:42  

जी हाँ वही प्यारा सा इश्क है.
बहुत खूब

रंजना [रंजू भाटिया] 27 September 2009 at 12:43  

हाले दिल सुनना ,सुनाना भी कई बार कसूर माफ़ कहला देता है :) जो भी है इश्क या प्यार आपका लिखा बहुत अच्छा लगा ...शुक्रिया

विनोद कुमार पांडेय 27 September 2009 at 13:40  

अरे सोचने की बात नही ये सब तो इश्क़ के ही लक्षण है..
बढ़िया रचना..बधाई..दशहरा की हार्दिक शुभकामना..

अल्पना वर्मा 27 September 2009 at 16:19  

sundar saral shabdon mein saji abhivyakti! Sundar kavita.

विवेक 27 September 2009 at 16:43  

वक्त की हथेली पर फैली...तेरी मेरी खामोशियां...वाह...बहुत ही कोमल सा अहसास है...सुंदर

वन्दना 27 September 2009 at 17:46  

waah waah.........ishq ko bakhubi bayan kar diya

ओम आर्य 27 September 2009 at 18:49  

अनिल भाई आजतक जितनी भी आपकी रचनाये पढी
है उनमे सबसे खुबसूरत रचना /जो दिल के धमनियो से होकर गुजर गया/बस इतना कहुंगा कि वाह वाह वाह वाह वाह जियो हजारो साल!

अजय कुमार झा 27 September 2009 at 19:54  

अनिल भाई...अब हो गया न...अब लिखे जाओ..
शादी होने के बाद ..देखना..कितनी शैली बदल जायेगी,......हा......हा....हा....

'अदा' 27 September 2009 at 20:10  

Anil ji,
ye sab kya kah rahe hain ??
CHAKKAR kya hai ??
kuch bhi ho kavita behad khoobsurat likhi hai aapne.
waah waah karne ko dil kar raha hai.
isliye WAAH !!! WAAH !!!

समयचक्र - महेंद्र मिश्र 27 September 2009 at 20:13  

बहुत सुंदर कविता
दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामना

Priya 27 September 2009 at 20:29  

sunder rachna ....vijay parv mubarak ho

Mithilesh dubey 27 September 2009 at 20:34  

क्या बात हैं। बहुत ही सुन्दर , भावनाओं को समेटे लाजवाब रचना। बहुत-बहुत बधाई

Anu...:) 27 September 2009 at 22:23  

Nice poem :)
Soft words,but strong emotions!:)

Anil Pusadkar 27 September 2009 at 23:46  

लगता नही बल्कि कन्फ़र्म है कि वो इश्क़ ही है।

ravikumarswarnkar 28 September 2009 at 00:41  

बेहद खूबसूरत अभिव्यक्तियां....

ताऊ रामपुरिया 28 September 2009 at 11:41  

इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

सुशील कुमार छौक्कर 28 September 2009 at 12:28  

अजी ये इश्क हो या ना हो पर दिल को छू गया। अगर ये इश्क हो जाए तो क्या कहने। सच कहूँ तो आपका लिखा बताशे सा मीठा लगा। शब्दों में जो सुंदरता है ना बस क्या कहूँ.............. आपकी लेखनी से जलन सी होने लगी :)

Nirmla Kapila 28 September 2009 at 14:34  

वक्त की हथेली पर फैली तेरी म्रेरी खामोशियाँ बहुत ही सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति है दशहरा की हार्दिक शुभकामना!!

Kishore Choudhary 29 September 2009 at 09:15  

अच्छा कविता भी ? और वह भी इतनी सुंदर, लोग सच कहते होंगे !

वन्दना अवस्थी दुबे 29 September 2009 at 16:46  

हां अनिल जी लगता तो ऐसा ही है....

naveentyagi 29 September 2009 at 16:47  

सोचता हूँ कहीं ये वही
प्यारा सा इश्क तो नहीं
sundar

Udan Tashtari 30 September 2009 at 00:55  

सोचो मत...वही है. :)

उम्दा रचना!!

Sudhir (सुधीर) 30 September 2009 at 19:06  

बड़ी प्यारी अभिव्यक्ति....सुन्दर

Neha 1 October 2009 at 13:43  

to aap kavita bhi likh lete hain...multi telented ho bhai....

MUFLIS 2 October 2009 at 19:04  

sochtaa hooN kaheeN ye
pyara-sa ishq to naheeN

waah ,, huzoor
kis saadgi se aapne chnd alfaaz ko
pyara-sa izhaar de daala
mubarakbaad
---MUFLIS---

रंजना 3 October 2009 at 16:32  

Waah !!! Bahut sundar !!!

Roomayiyat se bhari sundar rachna...

Rajey Sha 3 October 2009 at 19:22  

पहली बार आपके ब्‍लॉग्‍ पर आये, प्रसन्‍नता हुई।

Rajey Sha 3 October 2009 at 19:22  

पहली बार आपके ब्‍लॉग्‍ पर आये, प्रसन्‍नता हुई।

चंदन कुमार झा 5 October 2009 at 00:20  

बहुत ही सुन्दर प्रेम की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

Harkirat Haqeer 5 October 2009 at 12:56  

सोचता हूँ कहीं ये वही
प्यारा सा इश्क तो नहीं ....

ओये होये ....?????

Vijay Kumar Sappatti 5 October 2009 at 15:22  

Anil ji ,

sabse pahle , bahut dino ke baad , deri se aane ke liye maafi chahta hoon ,

bhai , aapki ye nazm padhkar to man roomani ho gaya .. kya kahun ..aakhri pankhtiya to lajawab hai ...waaah


meri dil se badhai sweekar karen.

vijay
100th post - www.poemsofvijay.blogspot.com

Rakesh 5 October 2009 at 17:14  

वक़्त की हथेली पर फैलीं
तेरी मेरी खामोशियाँ

साँसों में घुलती सी जातीं
तेरी मेरी नजदीकियाँ
anilji
wakai umdapanktiyan hai ye...wah...

दिगम्बर नासवा 9 October 2009 at 15:08  

अनिल जी ........... सच में इश्क का जादू ही है जो ऐसा लिक्वा देता है .......... आज ही दुबई वापस आया हूँ और आपकी कमाल की रचना पढ़ रहा हूँ ......... आनंद आ गया .........

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