दो किनारे !

>> 30 January 2010

वक़्त ने दस्तक दी । उसकी उंगली पकड़ उसे ले चल दिया और ले जाकर खड़ा कर दिया नदी के एक ओर । इससे पहले कि वो कुछ पूँछता उसने अपने ओठों पर उंगली रखी और उसे खामोश रहने के लिये इशारा किया । उसने इशारों ही इशारों में, उसे अपनी पलकें मूँद लेने के लिये कहा । उसने अपनी पलकें मूँद लीं । कुछ पल ख़ामोशी के बाद एक गहरा सन्नाटा छा गया और एक ठंडी पवन सामने से आकर गुजरी । नदी लहराई और उसके चेहरे को छूती हुई चल दी । उसे वक़्त ने आँखें खोल लेने के लिये कहा । पलकें खोलते ही उसकी आँखें उसे देख रही थीं । वो ठीक उसके सामने नदी के उस ओर थी । उसका दुपट्टा हवा से खेल रहा था । वो हाथों से पानी की लहरों के साथ खेल रही थी । उसे लगा ये कोई सुनहरा ख्वाब है । उसकी इस सोच पर वक़्त मुस्कुराया । उसने उसकी ओर देखा तो उसने हाँ में अपना सर हिलाकर रजामंदी दी, कि ये वही है ।

वक़्त मुस्कुराता हुआ वहाँ से चल दिया । शायद उन्हें एकांत देना चाहता था । वो उसे देखकर मुस्कुरायी । उसने भी उसके जवाब मैं मुस्कान दी । उस ओर से आँचल लहराती हुई वो बोली :

-नाराज हो ?
-नहीं तो (ऐसा उसने सिर हिलाकर कहा)
-"खामोश क्यों हो ?" उसने जानना चाहा
-वक़्त ने खामोश कर दिया है शायद या शायद यहाँ सब कुछ खामोश है इसी लिये मैं खामोश जान पड़ता हूँ ।
-"लेकिन ये नदी तो खामोश नहीं" उसने कहा ।
-"शायद नदी को बहते रहने की आदत है इसी लिये उसे खामोश रहना पसंद नहीं" उसने उसकी ओर देखते हुए कहा
-"वक़्त भी तो कभी खामोश नहीं होता" उसने फिर कहा
-हाँ, शायद
-शायद नहीं, सच है ये कि वक़्त कभी खामोश नहीं होता । वो अपनी उसी रफ़्तार से आगे बहता रहता है ।
-हम्म्म्म ! उसने ठंडी साँस भरी ।

तब वो कुछ खामोश सी हो गयी । लगा कि वो आज भी फिक्रमंद है । नदी की धारा को छूते हुए उसने कहा:
-जानते हो ये नदी, वक़्त ने यहाँ क्यों रख छोड़ी है ?
-क्यों ?
-क्योंकि वो जताना चाहता है कि तुम और मैं नदी के अब दो किनारे हैं । हम किनारे ख़त्म होने के बाद ही मिल सकते हैं और तुम जानते हो, ये मुमकिन नहीं ।
-"मैं जानता हूँ कि इस नदी के किनारों की परंपरा कैसे ख़त्म होगी ।" वो बोला
-कैसे ?
-या तो मैं इस नदी रुपी सारे आँसू पीकर तुम्हें भुला दूँ या मैं भी तुम्हारे अस्तित्व को धारण कर तुमसे हमेशा के लिये आ मिलूँ ।

उसने उसके अस्तित्व में आने के लिये खुद को आँसुओं रुपी नदी में डुबो दिया । यहाँ तक कि उसने खुद को भुला दिया और अपने अस्तित्व को मिटा वो उस नदी में डूबता हुआ उस पार जा लगा । इस तरह उसने प्यार करने के सलीके में से एक को चुना ।

तब वक़्त ने दस्तक दी और उन्हें एक ओर देखकर, एक पल के लिये मुस्कुराया, फिर चल दिया । अब वे दोनों वक़्त के दायरों में ना थे ।

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ई छोकरा-छुकरिया कैसे नैन मटक्का करत रहत

>> 27 January 2010

स्वागत है आप सब लोगन का प्रेम नगर मां । अब ई का नाम प्रेम नगर काहे है ? बड़ा जाना पहचाना सा सवाल और हम कहत हैं कि ई सवाल का जवाब दे दे थक गये हैं कि भैया ऊ का कहत हैं कि हियाँ प्रेम बहुत होत है । जब देखो तब हियाँ के लड़के लडकियाँ नैन मटक्का करत रहत । अब ऊ कल की ही बात लै लेओ । ऊ किशनवा की छुकरिया कैसे दीदें फाड़ फाड़ के ऊ रमेशवा के छोकरा को देख रही । जब ई सब करत हैं तो सब कछु भुलाए देत । सब जग बैरी हुई जात । नाही देखत कि कोनों बड़ा बुजर्ग भी हुआं खड़ा है । जैसे क ज़वानी इनमा ही आई है अकेली ।

आजकल तो ऊ का खिटिर-पिटिर करत रहत हैं । अरे का कहत हैं ऊ का मुई बाइल । जब देखो तब ऊ पर उंगलियाँ चलात रहत नाही तो कान में लगाईं खी-खी करि-करि हसत जात । ना जाने ई बिलायती लोगन ने का खिलौना बनाई दियो है । सब ऊ पर ही सवार रहत हैं और अब का बताएं पहिले चलो चिट्ठी पत्री पकड़ में आयि जात थी तो समझाई बुझाई देत थे । पर अब नाही दद्दा । अब तो कछु हाथ नहीं आवत ।

पड़ोस की लल्ली ऊ जोगनवा के लल्ला से का कहि रही थी । हाँ, आई लब ऊ । फिर बाद मा खी-खी करि-करि हसत जात । अरे हम कहत हैं कि ई प्यार-व्यार करन का बखत है का । चुपी-चाप पढ़ाई लिखाई नाही करी जात । जब बखत आबे तब ही सब काम अच्छे लागत हैं । अबही उम्र ही का भई । अबही तो आठये में ही पढ़त है । ना जाने ई छोकरा और छुकरीयाँ कहाँ भटकत जात हैं ।

छोकरन का, का है, ऊ तो मुंह पौंछ पाँछ के चलि दियें और टक-टकी लगाई देखिये कोई और शिकार । पर इन छुकरियन को का समझायें कि चुपी चाप पढ़ाई लिखाई में मन लगावे और सही बखत पर सही काम करें । नाही तो सारी जिंदगी का रोना रही जात है बस । अब रमा काकी की तो बात लगत है बुरी । अब लगत है बुरी तो लागे बुरी । रमा काकी तो कहत है बात सच्ची और खरी ।

अब समय नाही है कि यूँ ही समय ख़राब किया जावे । ऊ तो वैसे ही हम जनानी लोग इत्ते बरस से पीछे चली रही हैंगी । समय पर जो पढाई-लिखाई भी ना की तो कैसन निबाह हुई । अब ऊ ज़माना नाही जब राधा और मीरा बनि सिर्फ प्रेम करि स्त्री धरम का निबाह किया जात था । अब जमाना आगे बढ़ी कदम से कदम मिलाये चलि बे का है । नाही तो पीछे मुंडी घुमाई देख लीजो जादा बखत अबही नाही गुजरा है, कि का का गुजरी है हम जनानी लोगन पै ।

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आधा सच !

>> 24 January 2010

यह बात उसे बचपन में ही पता चल गयी थी कि अगर इस दुनियाँ में सबसे ज्यादा कुछ कडवा होता है तो वह है "सच" । हाँ सच सबसे ज्यादा कडवा होता है । उसके साथ हमेशा ऐसा होता था कि सच उसे टुकड़ों में पता चलता था ।

उसके यहाँ काम करने वाली के मुँह से आधा सच उसे दोपहर को पता चला कि उसका पति उसे बहुत मारता-पीटता है और उसके कमाए हुए पैसों को छीन कर शराब पी जाता है । आधा सच उसे रात को पता चला, जब उसके पिताजी उसकी माँ को शराब के नशे में लात-घूसों से पीट रहे थे और गाली-गलौच कर रहे थे । तब उन दोनों आधे सचों को मिलाकर एक पूरा सच उसने ये जाना कि स्त्री चाहे अमीर घर में हो या गरीब घर में, मर्द उसे पैरों तले कुचलते रहना चाहता है । फर्क सिर्फ इतना है कि उसके यहाँ सफाई करने वाली वापसी में गाली-गलौच करती हुई लोगों से चीख चीख कर कह सकती है कि उसका पति उसे मारता है । जबकि उसकी माँ नहीं । ये एक मर्यादित समाज का बनाया हुआ ढाँचा था जिसके अन्दर उसे सब सहना पड़ता था ।

जब एक तथाकथित वर्ग विशेष द्वारा बनाया गया नियम उसने जाना कि उनके लिये एक अन्य वर्ग ऐसा है जिसे छू लेने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाता है । जब उसी वर्ग द्वारा उस अछूत वर्ग की स्त्री की इज्जत तार-तार करने की खबरें उसने पढ़ी और सुनी तो उसे दोनों आधे सच को मिलाकर पूरा सच यही पता चला कि यह सब खुद की सहूलियत के लिये बनाये गये नियम हैं । असल में उनके लिये स्त्री केवल भोग्या है, चाहे वह किसी भी वर्ग की हो ।

आधा सच उसके लिये किसी छोटे शहर की लड़की का प्यार में पड़कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाना और फिर पकडे जाने पर दोनों को जान से मार दिया जाना था । बाकी के आधे सच को दुनियाँ की नज़र में सच बनाकर परोसा जाता, वह यश चोपड़ा की फिल्मों में सरसों के खेत में खड़े हीरो की फैली हुई बाहों में हीरोइन का भागते हुए गले लग जाना और अंत में लड़की के बाप का ये कहना कि जा जी ले अपनी जिंदगी ।

इस अधूरे सच का बनाया हुआ एक हिस्सा सुभाष घई की फिल्मों का था । जिसमें हीरो कहता है कि अगर असली भारत देखना है तो रेलगाड़ी के सामान्य डिब्बे में सफ़र करते हुए बाहर झाँक कर देखो । शायद ए.सी. के डिब्बे में बैठकर यह डायलॉग लिखना बहुत सुखद होता होगा । पर्दे के परे का सच, एक के ऊपर एक पैर रखकर उस डिब्बे में सफ़र करते हुए साँस लेने के लिये बामुश्किल गर्दन का इधर से उधर घुमा लेना भर था । जब वह थोडा बड़ा हुआ तो उस पर्दे के सच को और बड़ा करने के लिये सुभाष घई को अपना चचा बनाते हुए करण जौहर का सिर पर अमीरी लादे दौड़ लगाना था । सुनहरा, सुहावना और मनोरंजक सच ।

आधा सच उसका ये जानना कि मेहनती और होशियार इंसान जिंदगी में बहुत आगे निकलते हैं । बाकी का आधा सच पैसों की कमी की वजह से उसका इंजीनियरिंग न कर पाना और पड़ोस के फिसड्डी लड़के का डोनेशन पर प्रवेश लेकर इंजीनियर बन जाना था ।

उसने सच हमेशा टुकड़ों में ही जाना । आधा सच जिसे दुनियाँ छुपाये घूमती और बाकी का आधा सच जिसमें दुनियाँ छुपी घूमती ।

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अंत का प्रारंभ !

दिन बड़े मासूमियत से गुजरा करते थे । अपने होने का भरपूर एहसास कराकर ही शाम को ढलते थे और फिर चाँद को सौंप कर चल देते थे । दिल और दबी जुबाँ जिस बात को दिन में खुद से न कह पाते वो बड़ी फुर्सत से चाँद से कहा करते ।

उन कस्बाई दिलों की मोहब्बत किताबें बदलते हुए जवान होती और कई दिल ऐसे होते जो दिल की बात दिल ही में रखे रह जाते । उन दिनों कई ऐसे रिवाज़ हुआ करते जिन्हें लोग तोड़ने में झिझकते थे । ऐसा नहीं था कि उनमें साहस न था बल्कि रिवाजों और उनके दरमियाँ एक गहरा रिश्ता बन जाया करता । लड़की अगर किसी को दिली मोहब्बत करती भी है तो कभी उसका इज़हार न करती । उन कस्बाई लड़कियों के दिलों के एहसास दिल में ही जमा रहते और एक दिन आता जब कोई और उनको डोली में बिठा के ले जाता ।

उन्हीं दिनों शालिनी भी इन्हीं रिवाजों के बंधनों में बंधी हुई थी । अगर उसका बस चलता तो सुधांशु से कह देती कि "सुधांशु तुम कुछ कहते क्यों नहीं ? माना मैं तो लड़की हूँ और मेरी सीमाएँ तय हैं, लेकिन तुम तो कह सकते हो कि तुम्हें मुझसे मोहब्बत है ।" लेकिन न तो कभी सुधांशु ने चुप्पी तोड़ी और न शालिनी उस रिवाज़ को ख़त्म कर सकी ।

सुधांशु लड़कियों में झेंपू के नाम से मशहूर था । शरीफ इतना कि पूँछो मत और आँखें ऐसी कि रूह तक उतर जाएँ । अक्सर जब कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कविता या गीत सुनाता तो ख़ामोशी छा जाती और सब डूब कर सुनते । सभी जानते थे कि सुधांशु शालिनी को चाहता है । जब कभी सुधांशु लड़कियों के झुण्ड से होकर गुजरता तो लडकियां उसे शालिनी के नाम पर छेड़ती हुई खिलखिला देतीं । पर सुधांशु ने कभी चुप्पी न तोड़ी । कॉलेज ख़त्म हो गया और शालिनी दिल की बात दिल में ही जमा किये हुए चली गयी । उसके पिताजी का तबादला नये शहर हो गया था ।

फिर एक रोज़ पूरे आठ बरस बाद शालिनी और सुधांशु जिंदगी के एक मोड़ पर टकरा गये । हुआ यूँ कि एक सम्मलेन के सिलसिले में जिस शहर में शालिनी का आना हुआ । उसी सम्मलेन के सिलसिले में सुधांशु भी आया था ।

अचानक से इतने बरस बाद सुधांशु और शालिनी एक दूजे के आमने सामने थे और कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहा जाए । दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था । तब शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा -
-बिलकुल नहीं बदले
-अच्छा, क्या नहीं बदला ?
- यही कि आज भी शर्माते हो । पता है कॉलेज के जमाने में लडकियां तुम्हें किस नाम से बुलाती थीं ?
- "किस नाम से ?" मुस्कुराते हुए सुधांशु ने कहा
-झेंपू
- "जानता हूँ ।" कहते हुए सुधांशु ने अपना सर झुका लिया और फिर मुस्कुराते हुए शालिनी की ओर देखा
-"सचमुच बिलकुल वैसे ही हो ।" कहती हुई शालिनी मुस्कुरा दी ।

उस दिन सम्मलेन ख़त्म होने के बाद जाते हुए पता चला कि दोनों के ठहरने का बंदोबस्त एक ही होटल में है । तब शाम की चाय होटल में साथ पीने का वादा हुआ । जब चाय पर दोनों मिले तो सुधांशु बोला -
-क्या अजीब इत्तेफाक है ! मैं यही सोच रहा था कि तुम इसी रंग की साडी पहन कर आओगी और देखो वही हुआ ।
-अच्छा ।
-हाँ, सच में ।
-"तुम भी तो नहीं बदले । तुम्हें आज भी कुर्ता-पायजामा पहनना अच्छा लगता है ।" शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा

बातों ही बातों में पता चला कि दोनों जिंदगी में इतने दूर निकल आने पर भी शादी से जुड़ नहीं पाये । अब तक शादी न करके वह इस दुनिया के दस्तूर को पीछे धकेले हुए थे ।

तब उन दो रोज़ की बातों और साथ-साथ चहलकदमी कर लेने के बाद एक शाम दोनों एक ही कमरे में थे । तब शालिनी ने सुधांशु से कहा -
-कितना अच्छा हो कि हम इस दुनियाँ के बनाये हुए दस्तूरों और रिवाजों के बंधनों से मुक्त होकर जिंदगी बसर कर सकें । न उसके आगे कोई सोच हो और न पीछे ।
-"मतलब !" शालिनी की इस बात पर सुधांशु ने बोला ।
- मतलब, जैसे कि तुम मुझे कॉलेज के जमाने में चाहते थे और ये मैं ही नहीं हर कोई जानता था । तुम खुद कभी कह न सके और मैं रिवाजों में कैद रही ।

सुधांशु ने शालिनी की आँखों में झांकते हुए देखा और पाया कि दिल की बात कह देने की ख़ुशी शालिनी की आँखों में आँसू बनकर उतर आयी है । तब सुधांशु ने उसके आँसुओं के कतरों को ओठों से चूम लिया ।

शालिनी के लिये यह एक अंत का प्रारंभ था जिसके लिये वह इतने बरस पहले सोचा करती थी । एक बार फिर उसका मन वहीँ उसी कस्बाई दौर में पहुँच गया । जहाँ वह तमाम जतन कर लेने के बाद भी कुछ भी तो न कह सकी थी । आज उसने अपने दिल की जमा बातों को आसुओं में बहा दिया और वो आँसू के कतरे सुधांशु के लिये एक-एक मोती की तरह थे जिन्हें वह इत्मीनान से चुन रहा था ।

* चित्र गूगल से

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तपती दोपहर का बूढा नीम

>> 20 January 2010

जून की एक दोपहर थी या दोपहर भरी एक जून .....नहीं शायद गर्मी की एक दोपहर । निमोरियों से नीम भरा हुआ उस तपती दोपहर को खड़ा खड़ा देख रहा था । पकी-अधपकी निमोरियाँ, कुछ जमीन पर और कुछ नीम पर झूल रही थीं ।

इस सुस्त छुट्टी भरी दोपहर को काटना उतना मुश्किल न था जितना कि ख्यालों के बिखरे समूंचे गुच्छे को एकत्रित करके उन्हें जमा करना । उस पर बेतकल्लुफी इतनी कि कप के गर्म ओठों को इन ओठों से लगाने का बरसों से रिवाज सा हो चला । दोनों के ओंठ एक दूजे को हर रोज़ छूने के आदी हो गये ।

भरी दोपहर में गर्म भापनुमा कप कुर्सी के सामने रखा हुआ मेरे ओठों की तलब में है । मैं ठीक उसके सामने कुर्सी पर लेटने की मुद्रा में ख्यालों को चुन रहा हूँ । शायद सबको जमा कर सकूँ । सीने पर किताब औंधी पड़ी हुई है । न जाने कितनी किताबों ने इन पिछले उनसठ बरसों में सीने की धड़कन को सुना होगा । न जाने आपस में इन धडकनों और किताबों ने आपस में क्या बातें की हों । हो सकता है बहुतों ने उसको संगीत समझने की भूल भी की हो या फलां किसी किताब को मेरे सीने की धडकनों से कोई खासा लगाव हो गया हो या कुछ खास नापसन्दी जो वो कभी कह न सकीं हों ।

मन हुआ कि औंधी पड़ी किताब को सीने से अलग कर कप के गर्म ओठों की प्यास बुझा दूँ । फिर एक ख़याल जो न जाने कैसे माथे पर पसीने की बूँद बन जमा हो चला है कि अबकी बसंत से पहले सेवा से मुक्त हो जाउँगा और फिर बसंत तो नयापन लाता ही है । सामने लदे पड़े पत्ते एक एक कर झड जायेंगे और उनकी जगह नई पत्तियाँ अस्तित्व में आ जायेंगीं । शायद अब मैं भी शाख का एक पुराना पत्ता ही हूँ । उफ्फ यह ख़याल ...

बरामदे की खिड़कियाँ भरी दोपहर की लू से लड़ती हुई हिल रही हैं । मन करता है भागता हुआ नीम पर चढ़ जाऊँ, ठीक बचपन की तरह, जब माँ छड़ी लेकर पीछे दौड़ती थी और यह घनी पत्तियाँ मुझे अपने आगोश में ले लेती थीं । सोचता हूँ पकी हुई निमोरी खाकर देखूँ ठीक बचपन की तरह ही अब भी स्वाद होगा शायद...नहीं बीवी क्या सोचेगी ! बुढापे में सठिया गये हैं । हाँ शायद सठिया ही तो गया हूँ, साठ पूरा होने को है । बचपन में माँ डाँटा करती थी और अब ये बीवी पीछा नहीं छोडती ।

अब ये दूसरा ख़याल भी न जाने कहाँ से आ जमा हुआ । ये खुद को जिंदा बनाए रखने का ख़याल भी क्या अजीब ख़याल है । वो क्यों कहती रहती है कि भगवान उसे मुझसे पहले उठा ले । अगर मैं पहले चला जाऊँ तो पेंशन तो मिलती ही रहेगी । लेकिन शायद उन दोनों की बीवियां कहाँ इसे चैन से रहने देंगीं । तभी शायद कहती रहती है मुझसे पहले जाने की । उफ़ ये ख़याल...

इन ख्यालों के बिखरे पड़े गुच्छे को सँभालने को वक़्त कहाँ है ! लेकिन इस बसंत से पहले ही ढेर सारा वक़्त आ धमकेगा और जमा हो जाएगा जिंदगी भर के लिये । ये ख़याल भी कमबख्त चुपके से आकर जमा हो जाते हैं...

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मुक़र्रर समाज

>> 15 January 2010

सूरज धीमे धीमे बुझता सा लगने लगा । शायद हौले हौले पीला पड़ने लगा था, ठीक किसी गरीब के चेहरे की तरह । विद्यालय की घंटी, नहीं शायद घंटा, हर रोज़ की तरह जाकर महँगू ने बजा दिया था । महँगू जो पाँचवी कक्षा में पढता था, उसे यह कार्यभार मास्टर जी ने शुरू से सौंप रखा था । महँगू इस कार्यभार से दो ही सूरतों में मुक्त हो सकता था, या तो वह विद्यालय छोड़ दे या फिर आठवीं पास कर के विद्यालय पास कर ले । स्वतंत्र देश के एक स्वतंत्र गाँव के एक स्वतंत्र स्कूल में पढ़ते रहने के लिये महँगू घंटा बजाने के लिये गुलाम था ।

सरकार ने विद्यालय के लिये एक बिरजू यादव नाम का चपरासी रख छोड़ा था । जिसका विद्यालय से सिर्फ वेतन पाते रहने का सम्बन्ध था । उसे घंटा बजाते रहने से ज्यादा अपने खेत पर पूरे दिन रहना ज्यादा अच्छा लगता था । बिरजू ने मास्टर जी से पूरी बात पक्की कर ली थी और शुक्ला मास्टर जी ने आँख झपकाते हुए उसकी बात इस एवज में मान ली थी कि वह हर महीने कुछ अनाज और सब्जी मास्टर जी को देता रहेगा । इस तयशुदा कार्यक्रम में दोनों खुश थे ।

शुक्ला मास्टर जी कद में 5 फुट के थे और साइकिल अपने कद से ऊँची रखते थे । साइकिल पर चढ़ने के लिये उन्हें पहले किसी ऊँचे चबूतरे जैसी ऊँची जगह पर चढ़ना होता था । विद्यालय से बाहर निकलते ही उन्होंने कुछ मिट्टी डलवाकर साइकिल पर चढ़ने के लिये चबूतरा बनवा लिया था ।

सभी बच्चों के एक एक करके विद्यालय से बाहर निकल जाने पर वे चबूतरे पर चढ़ते तब उसके बाद साइकिल पर चढ़ते और फिर महँगू पीछे से साइकिल में धक्का मारता । मास्टर जी साइकिल के पैडल मारते हुए आगे बढ़ जाते थे । महँगू तब उस कच्चे रास्ते से अपने गाँव की तरफ जाता और हर रोज़ की तरह कक्षा के कुछ लड़कों से गाली खाता । हर दूसरे-तीसरे दिन वह महँगू पर हाथ उठा देना अपना हक़ समझते थे ।

महँगू को अपने घर पहुँचने के लिये पूरा गाँव पार करके बाहरी सिरे पर जाना होता । गाँव की रुपरेखा इसी तरह की होती थी । मंदिर और कुएँ के पास ठाकुर और ब्राह्मणों के घर होते उसके बाद अन्य जातियों के फिर गाँव के बाहरी सिरे पर एक कोने में चमारों और मेहतरों के घर होते थे । मेहतर तो कम ही होते थे, चमार ज्यादा होते थे । यही बसावट ज्यादातर हर गाँव की होती थी । जिसमें चमारों और मेहतरों के घर गाँव के बाहर होना तय था ।

महँगू आँखों में आँसू लिये घर जाता और घर पहुँचते पहुँचते सुबकना बंद कर देता । गाँव के आखिरी छोर पर पहुँचते पहुँचते बहुत समय लग जाता था । उन लड़कों का कुछ हो नहीं सकता था क्योंकि वे गाँव के बीच में ही रह जाते थे । महँगू ने आँसुओं के साथ समझौता कर लिया था और आँसुओं ने महँगू के साथ ।

अगली सुबह जाकर उसे फिर से वही काम करना होता था । मास्टर जी की कुर्सी तथा मेज साफ़ करता और घंटा बजाता । कक्षा में उसके बैठने कि जगह तय थी । इन सभी तय जगहों, तय कार्यभार, तय समय पर मास्टर जी की साइकिल में पीछे से धक्का, तय समय पर गाली व पिटाई खाते हुए उसने विद्यालय पास कर लिया ।

जब उसने दसवीं के विद्यालय में प्रवेश पा लिया तो वहाँ भी उसके कुछ काम तय हो गये थे । उन तय कामों और साथ के लड़कों की गर्मजोशी को सहते हुए उसने दसवीं पास कर ली ।

गाँव की रुपरेखा में एक बात और जुडी गयी थी । अगर उसकी नौकरी से सम्बंधित कोई कागज़ आता और यदि वह गाँव के ऐसे सदस्य के हाथ पड़ता जो महँगू की नौकरी लग जाने को सह ना सके तो वह कागज़ कभी महँगू को नहीं मिलता था । गाँव के चन्द लोगों को छोड़कर कोई सहनशील नहीं था ।

गाँव के असहनशील लोगों का साथ और तयशुदा चीज़ों के साथ अंततः महँगू की नौकरी लग गयी । महँगू उस रोज़ बहुत खुश था । मन ही मन महँगू ने कई सारे ख्वाब बुन लिये थे । जिसमें गाँव से बाहर निकल शहर में क्लर्क की नौकरी और तयशुदा भावना से मुक्ति ।

जब महँगू गाँव से शहर जाने के लिये रेलगाड़ी में बैठा तो शहर पहुँचते हुए उसे वहाँ भी कुछ तयशुदा चीज़ें दिखीं । शहरों की बसावट में भी ध्यान रखा जाता था । जिसमें शहर में गरीब और भूखे का होना तय था । रेल की पटरी के सहारे रहने वाले गरीब हर शहर में होने चाहिए थे । गरीबों और भूखों का शहर में होना बहुत जरूरी था ताकि वे फ्लेटों और कोठियों वालों का काम कर सकें । फ्लेटों और कोठियों वालों के लिये गरीबों और भूखों का होना इसलिए भी जरूर था कि वह आत्मसंतुष्टि कर सकें कि वे अभी तक अमीर हैं और उनका हुक्म मानने वाला कोई है । यह भी एक तयशुदा कार्यक्रम का एक तरह का जात-पात था ।

कार्यालय में पहुँच महँगू के लिये धीरे धीरे कुछ काम कार्यालय के काम के अलावा तय हो गये थे । जिनमें साहब के घर की सब्जी लाना और उनके बच्चों को स्कूल छोड़कर आना शामिल था । हर सप्ताह के अंत में छुट्टी के दिन महँगू को साहब के घर जाकर हाजिरी देनी होती थी कि हाँ हम आपकी जी हजूरी के लिये हाजिर हैं । ताकि साहब की नज़रें उस पर टेडी न हों ।

अब इस शहर की व्यवस्था में भी तमाम बातें तय हो गयीं थीं । शहर की बसावट की तरह उसकी जिंदगी भी तय हो चली थी । जो अब रेल की पटरी के सहारे रहने वालों से ऊपर तथा अपने साथ काम करने वाले ऊपर के बाबुओं तथा साहब से नीचे थी । यह स्वतंत्र देश के एक गाँव में रहने वाले महँगू की एक स्वतंत्र शहर में एक तयशुदा व्यवस्था के अंतर्गत व्यवस्थित जिंदगी हो गयी थी ...

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उस जानिब रूहानी तक़द्दुस चेहरे

>> 04 January 2010

उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....

-यह नीम की ही पत्तियाँ झड रही हैं न...
-हाँ, शायद पतझड़ का मौसम है ।
-नहीं ये अँधेरे का मौसम है...लगता है अँधेरा हौले हौले झड़ता हुआ गहरा रहा है ।

तब वो एकपल के लिये मद्धम से मुस्कुरा दी थी...फिर उसने कहा

-कितना अच्छा हो कि हम न कुछ पूँछे और न जाने...अपनी अपनी जिंदगी के जवाब एक दूजे से न माँगें । दिमाग को इसमें शामिल न करें और उसे जी लें जिसे ये दिल जीना चाहता है ।

तब वो ढेर सारे उसके बाद के खामोश पल कब और कैसे गुजर गये....कहाँ पता चला था
वक़्त जब पहलू बदलता है तो खामोश सा चुपचाप गुजर जाता है ।

तब रात चाँदनी थी । हवा गुनगुनाती सी कानों को छूकर जा रही थी । दिल की आहटें दूजे के दिल तक अपना सन्देश गुपचुप पहुंचा रही थीं ।

तब मैंने उससे कहा था
-लगता है आज पूरे चाँद की रात है !
-नहीं, आज चाँद कुछ अधूरा सा जान पड़ता है...कल पूरे चाँद की रात होगी !
उसकी इस बात पर चाँद उतरकर उसके गुलाबी गाल को थपथपा कर चल दिया था । मैंने मुस्कुराते हुए उस चाँद को जाते देखा...

उसने यूँ ही आहिस्ता से चाँद को जाते देखकर पूँछा
-आपको सपने देखना पसंद है...
-हाँ, बहुत...शायद मुझे उससे ज्यादा पसंद है, सपनों को जमा करना...रंग बिरंगे सपने, खूबसूरत सपने, अपनों के सपने, अपने सपने
-सच !
-हम्म्म्म....मैंने ठंडी साँस भरकर कहा
-क्योंकि जमा किये सपने याद बन जाते हैं और उन सुनहरी जमा यादों को मैं अक्सर थपथपा कर उनका हाल पूँछता हूँ । उन यादों में वो सपने बिलकुल अपने लगते हैं ।

यह कहते हुए मैं खामोश सा हो चला था । वो उस पल बोली थी...
-यादें पवित्र होती हैं...शायद इसी लिये जमा रह जाती हैं

-तब उन गहरी हो सकने वाली यादों को, जिनकी आहटें भी रूहानी संगीत छेड़ती हैं, संवारने के लिये हम एक सफ़र पर चल दिये थे...

उस खामोश फैली हुई चाँदनी में उसके ओंठ तितली के पंखों की तरह खुले और काँपे थे और उसकी पलकें सीपियों की तरह मुंद गयीं थीं...जिस पल दोनों के ओठों के स्पर्श ने उस यादगार गहराए हुए पल को एक खुशनुमा न भूलने वाली याद बना लिया था । खुलती और बंद होती सीपियों का वह संसार एक अध्याय बन जिंदगी से जुड़ गया...

* तक़द्दुस = पवित्र, उस जानिब = उस ओर

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