ख्वाब कभी नहीं मरते

>> 31 July 2009

'ख्वाब कभी नहीं मरते' और जो मर जाए तो वो ख्वाब ही कैसे...जानती हो तुमने ये एक बार कहा था...याद है ना तुम्हें...हाँ याद ही होगा...हाँ शायद...सोचता हूँ 'मरे हुए ख्वाब कैसे होते होंगे'...जिनका जीते जी कोई वजूद ना रहा...उन मरे हुए ख्वाबों का क्या होता होगा...क्योंकि किसी भी ख्वाब को 'शहीद' तो घोषित नहीं किया जा सकता...हाँ उसे थपथपी देकर सुलाया जरूर जा सकता है....हाँ शायद...जब मैंने ये कहा था तब तुम कैसे देखती रह गयी थीं मुझे...और मैं अनजान सा खोया सा उस रेत पर आडी तिरछी लकीरें खींचे जा रहा था...बिलकुल जिंदगी की तरह...जो कमबख्त सीधी चलने का नाम नहीं लेती...काश इसमें भी ट्रेन के स्टेशन की तरह कोई बंदोबस्त होता....तो हम भी एक स्टेशन से चढ़ अपने मनपसंद स्टेशन तक जाकर उतर जाते...और कुछ पल सुस्ताने के बाद...आगे की सोचते...मगर शायद खुदा को ये कहाँ मंजूर...

पर अगर ख्वाब मर जाते हैं तो वो यहीं कहीं भटकते होंगे हमारे आस पास...है ना...ऐसा मैं जब कहता था तो तुम कैसे प्यार से मुझे निहारने लगती थीं....ये भी अजीब इत्तेफाक है...नहीं इत्तेफाक नहीं हो सकता...कल रात को जब उनींदा सा अपनी हसरतों को खूँटी पर टांग जब बाहर चहल कदमी कर रहा था तो जानती हो क्या हुआ...एक मरा हुआ ख्वाब अचानक से मेरे पास आया...उसने देखा मुझे...मुस्कुराया...ठीक वैसे ही जैसे तुम मुस्कुराती थीं...सिगरेट के धुंए की लड़ी को हटाते हुए मैंने उसे गौर से देखा...एक पल वो मुझे तुमसा जान पड़ा...वही आँखें...वही शक्ल...वही अंदाज...

कहने लगा कैसे हो जनाब...मैं मुस्कुराया...ठीक तो हूँ मैं...ठीक हूँ...वो आगे बढा...मुस्कुराते हुए मेरे गालों को थपथपाया...बोला मैं ख्वाब हूँ...तुम्हारा सबसे हसीन ख्वाब...और चलने को हुआ...फिर मुडा,और 'हाँ उसका भी'...मैंने उसे गौर से देखा...वो वही चाहता था कि मैं मुस्कुराऊं...ठीक वैसे ही जैसे तुम हमेशा चाहती थीं...वो हाथ हिलाते हुए बोला मैं यहीं हूँ तुम्हारे आस पास...और आँखों से ओझल हो गया...ये तुम्हारा ही ख्वाब था....हाँ तुम्हारा ही होगा...तुमने ही इसे छोडा है मेरा साथ देने के लिए...है ना...हाँ तुम ठीक ही कहती थीं ख्वाब कभी नहीं मरते...वो हमारे आस पास ही तो रहते हैं...बिल्कुल पास...इतने कि हाथ से छुओ तो एक नरमी सी दे जाएँ

अबकी जो दोबारा मिला तो उससे पूछूँगा क्या तुम आज भी आइसक्रीम खाती हो...क्या तुम्हें आज भी पानी पूडी खाने पर आंसू बहाना अच्छा लगता है....क्या तुम्हें आज भी ठण्ड में पंखा चलाना भाता है...क्या तुम आज भी हवाओं में अपना दुपट्टा ख़ुशी से झूम कर लहराती हो...क्या तुम आज भी तरह तरह की शक्लें बनाती हो...क्या तुम आज भी हंसते हंसते रो जाती हो...
क्या तुम आज भी...ख्वाब बुनती हो

Read more...

एक हसीन ख्वाब

>> 30 July 2009

बादल का एक टुकडा आकर के बोला
देख चाँद लेकर आया हूँ तेरे लिए

मैंने देखा उसे करीब से
और आँखों में सजा लिया

एक हसीन ख्वाब सजा कर के आँखों में
वो मतवाला हो गया उड़न छू

अभी रहने दो मुझे नीद में
देखने दो मुझे ख्वाब

फिर क्या पता
नींद आये ना आये

Read more...

धुंधलाती सी यादें

>> 26 July 2009

कभी कभी लगता है कि हम यादों के महखाने में बैठे हैं और ठीक उसी तरह खुद को भूल चुके हैं जैसे कोई पैग लगा खुद को भुला देता है या भूल जाना चाहता है...हाँ उसी तरह बीती हुई जिंदगी के तमाम पहलू...वो तमाम बातें...वो तमाम प्यार भरी, उलटी-सीधी हरकतें यादें बनकर आ जाती हैं और हम खुद को मदहोश कर लेते हैं उन यादों में...हाँ शायद फर्क यादों का होता है

एक बार यादों की नगरी में प्रवेश कर जाओ...बस फिर क्या...हर एक याद आपसे आपका हाल चाल पूंछ बैठेगी...कहिये जनाब क्या हाल हैं आपके...आपका आना आजकल इधर कम हो गया है...और आप हैं कि बस मुस्कुरा भर रह जाते हैं...हाँ वो हंसी बनावटी नहीं होती...क्या फर्क पड़ता है वो क्लोज-अप इस्माइल हो या कोई और...आपको वहाँ पोज नहीं देना...वहाँ तो बस आप हैं और वो यादें...

ऊपर वाली तस्वीर देख रहे हैं...जनाब जो बैठे हुए हैं वो हमारे प्यारे भाई जान हैं...'छोटे'...हाँ बचपन में उसे इसी नाम से तो बुलाता था...जब बेहद प्यार आता था तो...कमबख्त क्या दिन थे...हाथ से फिसले तो फिसलते ही गए...और हमारी चोटी को छूने की चाहत शुरू हुई तो बदस्तूर जारी है...हाँ आज तक छुई नहीं...

बचपन में हमारे बापू हम दोनों के एक से ही कपडे बनवाते थे...ताकि कोई ये ना कह सके कि मेरा वाला अच्छा है या तेरा वाला...या उस समय की तंग हालत..और बंद मुट्ठी ऐसा करवाती हो...खैर...अच्छा लगता था...लेकिन वक़्त बीतते बीतते दिल में तमन्नाएं घर बना लेती हैं...पापा हम नहीं पहनेंगे ये एक से कपडे...क्या आप एक से ही कपडे बनवाते हैं...

अब फोटो से तो सब जान ही गए हैं कि ताजमहल है...हम लोगों ने ताजमहल कितनी बार देखा कह नहीं सकते...अब तो याद भी नहीं...अरे जी गणित में तो हम शुरू से होशियार थे पर क्या है कि हमारे बापू की पोस्टिंग आगरा में ही थी...बस जब तब ताजमहल जाना हो ही जाता...कभी किसी रिश्तेदार के साथ तो कभी किसी...

उन दिनों तो ताजमहल के नीचे जहां कब्र भी हैं वहाँ भी जाने के लिए सीढियां खुली हुई थीं...ये ऊंची ऊंची दीवारें...और उन दीवारों पर क्या चित्रकारी थी...जी कमाल...और बहुत अच्छा अच्छा लिखा हुआ था...तब हमारे अंकल जी की पोस्टिंग वहीँ थी ताजमहल पर ही...बस ये ना पूंछो क्या मौज आती थी...नीचे कब्र वाले इलाके में जाकर बड़ा मजा आता था...जब मैं पुकारता 'छोटे'...और वो आवाज चारों और गूँज जाती...ऊपर से नीचे तक...दाएं से बायें तक...और वो छोटे की हंसी की गूँज...'भैया'...'भैया'...जब वो जोर जोर से आवाजें लगाता....और वो हंसी की गूँज...हां...हां...हां...ही...ही...वाह क्या दिन थे ...कमबख्त बड़ी जल्दी बीत गए...और बन गए याद

माँ कहती है एक बार जब हम गाँव गए तो गाँव की सभी औरतें अपने घर के बाहर चबूतरे पर निकल आई...और हम दोनों भाइयों को एक से कपडे पहन देख कहने लगी देखो कैसी राम-लक्ष्मण की जोड़ी जा रही है...बस वो दिन आखिरी दिन था...हमारी दादी ने कभी एक से कपडे ना बनवाने की हिदायत बापू को दे दी...कभी सोचता हूँ तो बहुत प्यार आता है उन एक से कपडे पहनने पर...उफ़ कमबख्त ये यादें भी अजीब होती हैं...कभी हँसाती हैं तो कभी रुलाती हैं...और जब ये जिंदगी ले जाती है हमें दूर अपनों से...तब रह रहकर याद आता है वो बचपन...वो शरारतें...वो यादें...वो बातें...माँ का प्यार...भाई का झगड़ना...बहन की फरमाइशें...और ना जाने क्या क्या....यादें...हाँ यादें...

Read more...

एक प्रेम कहानी ऐसी भी (अन्तिम भाग)

>> 23 July 2009



कहानी आगे पढने से पहले कृपया एक प्रेम कहानी ऐसी भी (पहला भाग) पढ़ लें

ये खामोशी भी बहुत अजीब होती है...कमबख्त खामोशी में ऐसा जान पड़ता है कि बस साँसों के चलने की ही आवाज़ आ रही हो...आज की खामोशी अभिमन्यु को उस मुलाकात की खमोशी पर पहुंचा देती है...तब भी उसके पास कहने को कुछ नहीं बचा था और आज भी वो क्या कहे उसे समझ नहीं आ रहा था...लेकिन वो प्रेरणा को इस तरह रोते हुए, दुखी नहीं देख सकता था...वो बात बदलने के उद्देश्य से बोलता है...यहाँ क्या पढ़ाती हो...'वही अंग्रेजी' प्रेरणा जवाब देती है...तो मोहतरमा बच्चों को अंग्रेज बना रही हैं...आप आज तक नहीं कहती हुई प्रेरणा चुप हो जाती है...नहीं सुधरे यही कहना चाहती हो ना...मैं कैसे सुधर सकता हूँ...प्रेरणा थोडी सी मुस्कुरा जाती है...अभिमन्यु भी यही चाहता था...

फिर कुछ देर के लिए सन्नाटा पसर जाता है...दोनों ही कुछ सोचने लगते हैं...शादी क्यों नहीं कर लेते...कब तक यूँ ही भटकते रहोगे...प्रेरणा, अभिमन्यु से कहती है...और फिर माँ को भी तो अपनी बहू पर लाड, प्यार लुटाना है ...उनसे उनका हक़ क्यों छीनते हो...अभिमन्यु प्रेरणा की आँखों में देखता है फिर सिगरेट की डिब्बी निकाल लेता है...सिगरेट जलाकर एक कश लेता है...धुंआ फैलाता है...फिर कहता है...जानती हो प्रेरणा बचपन में माँ ने एक कहानी सुनाई थी...एक पंक्षी की कहानी...माँ कहती थी कि एक ऐसा पंक्षी होता है जो बारिश कि उस पहली बूँद का इंतज़ार करता है जो बहुत दिनों बाद होती है(एक ख़ास बारिश)...और अगर वो उसे ना पी पाए तो फिर वो बाकी की बूंदों के बारे में सोचता ही नहीं...और उसके साथ ही अगला कश लेकर धुंआ उड़ा देता है...प्रेरणा अभिमन्यु के चेहरे को देखती रह जाती है....और फिर वैसे भी कोई लड़की मुझे पसंद ही नहीं करती...कोई शादी ही नहीं करना चाहती...कहता हुआ मुस्कुराता है...और उठकर टहलने लगता है...

वैसे भी किसी ने कहा है 'हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता'...वैसे चाँद मियाँ अपनी ड्यूटी पर हैं देखो अभी भी चमक रहे हैं...शायद आज चाँदनी रात है...हाँ शायद (प्रेरणा बोलती है)...तभी अभिमन्यु शौल हटाकर ठंडी चल रही हवा को शरीर से छूता है...हू-हू-हू-हू...अरे बहुत ठण्ड है...वैसे तुम्हें चाँदनी रात बहुत पसंद थी ना...तब जानती नहीं थी ठीक से कि अमावस्या भी होती है और शायद किसी किसी की जिंदगी पूरी अमावस्या की तरह ही होती है...प्रेरणा कहती है...इधर आ जाइये और शौल ओढ़ लीजिये ठण्ड लग जायेगी...

अभिमन्यु को ये बात अन्दर तक लगती है...कहीं ना कहीं दिल बुरी तरह चकनाचूर हुआ पड़ा है...जीने की तमन्ना ही जाती रहती है इंसान के पास से तब ऐसा ही होता है...शायद ऐसा ही कुछ...फिर अभिमन्यु घडी देखता है अभी करीब 1 घंटे में सुबह हो जायेगी...कितना दूर है तुम्हारा हॉस्टल...यही कोई 4-5 किलोमीटर दूर होगा...ह्म्म्म्म कहते हुए आकर बैंच पर बैठ जाता है

कितनी ही बातें थीं प्रेरणा के पास कहने के लिए मगर सिर्फ सोच ही रही थी वो...और अभिमन्यु अपनी सोच में डूबा हुआ था..आलम यह था कि दोनों बैंच पर बैठे थे और बिल्कुल खामोश...सोचते सोचते कब वक़्त बीत जाता है पता ही नहीं चलता...अचानक से अभिमन्यु ऐसे उठता है जैसे नींद से जागा हो...फिर घडी की तरफ देखता है...अरे सुबह हो गयी...प्रेरणा कहती है हाँ...चलो चलते हैं अब...

दोनों स्टेशन से बाहर निकल आते हैं...बाहर बस खड़ी थी और पास ही एक तांगा...अभिमन्यु तांगा देखकर बोलता है...अरे चलो तांगे में चलते हैं...प्रेरणा कहती है तांगे में क्यों...अरे चलो ना तांगे में अच्छा लगेगा...वो तांगे वाले के पास जाते हैं...वो बताता है कि पहले स्कूल पड़ेगा फिर वो कंपनी...अभिमन्यु कहता है ठीक है चलो बैठ जाते हैं इसमें...

छोटा सा और बहुत हरा भरा सा पहाड़ी क़स्बा था...तांगे में बैठकर सफ़र करने में अलग ही आनंद आ रहा था...अभिमन्यु तांगे वाले से मजाक के लहजे में कहता है...अरे भाई इसमें एफ.एम रेडियो है क्या...वो कहता है क्या साहब आप मजाक बहुत करते हैं...अच्छा तो तुम फिल्मों की तरह कोई गाना ही सुना दो...साहब गाना तो नहीं आता...अच्छा ये तो बहुत गलत बात है...उधर प्रेरणा थोडा मुस्कुराती सी है...अच्छा तो कितने बाल बच्चे हैं आपके...एक है...बस एक ही, हम तो सोच रहे थे 4-5 तो होंगे ही...अरे साहब ऐसी भूल तो हम कतई नहीं कर सकते...क्यों भला...अरे हमारे बापू जो थे उन्होंने 11 बच्चे पैदा किये थे...पूरी 10 लड़कियों के बाद हमे पैदा करने के वास्ते...और फिर सारी जिंदगी शादियाँ ही करते रह गए...प्रेरणा अपने मुंह पर हाथ रख लेती है और फिर दूसरी तरफ देखने लगती है...अभिमन्यु मन में ही कुछ बोलता सा है...'बहुत मेहनती थे जैसा कुछ'...

तांगे वाला पूंछता है आप लोगन के बच्चे नज़र नहीं आते...लगता है अभी नयी नयी शादी हुई है...प्रेरणा और अभिमन्यु एक दूसरे की आँखों में देखते हैं...फिर नज़रें हटा लेते हैं...कहीं और देखने लगते हैं...धीरे धीरे बातों ही बातों में सफ़र कट जाता है...प्रेरणा का हॉस्टल आ जाता है...प्रेरणा अपना बैग उठा कर उस पर से उतरती है...अभिमन्यु उसके चेहरे की तरफ़ देखता है...शायद कुछ बोलना चाहता है...पर खामोश है...उधर प्रेरणा भी कुछ कहना चाहती है...पर वो भी सोच कर रह जाती है...वो चल देती है...अभिमन्यु कहता है...कभी कोई जरूरत हो, कोई परेशानी हो मुझे याद करना...और अपना कार्ड उसे दे देता है...प्रेरणा कार्ड ले लेती है...फिर उसके बाद अभिमन्यु तांगे में बैठ अपने ऑफिस की तरफ चल देता है


"लेकर सर पे अपने आई रात पोटली
बैठ सिरहाने मेरे वो तमाम छोड़ गयी उलझनें

डरता हूँ कहीं दिन यूँ ही ना बीत जाए"


अभिमन्यु जानता था कि प्रेरणा कभी फ़ोन नहीं करेगी...कुछ दिन अभिमन्यु अपनी ऑफिस में व्यस्त रहा...और कंपनी के ही दिए हुए घर में रहने लगा...ऐसा नहीं था कि वो प्रेरणा को याद नहीं करता बल्कि वो ये सोचता कि कहीं उसकी वजह से वो और ज्यादा परेशां ना हो...

एक शाम मार्केट में एक रेस्टोरेंट में वो बैठा हुआ था...तभी वहाँ प्रेरणा का आना हुआ...प्रेरणा ने उसे देख लिया...वो उसके पास ही आकर बैठ गयी...क्या लोगी...कुछ खाना है या पीना है...नहीं कुछ नहीं...अरे...ठीक है एक कॉफी...अरे भाई जान दो कॉफी ले आना...अभिमन्यु आवाज़ देता है...तो यहाँ कैसे...कुछ नहीं वो कुछ सामान लेने आई थी...अच्छा...अभिमन्यु प्रेरणा की आँखों में झाँकता है...फिर कहता है काफी बदल गयी हो...क्यूँ क्या हुआ प्रेरणा बोली...चाल ढाल, कपडे पहनने का अंदाज...लगता है स्मिता पाटिल की कोई फिल्म देख रहा हूँ...प्रेरणा हल्का सा मुस्कुरा जाती है...

तभी कॉफी आ जाती है...अरे एक मिनट में आता हूँ...अभिमन्यु प्रेरणा को बाथरूम जाने का इशारा करता है...उसके जाने के बाद अचानक से प्रेरणा की नज़र अभिमन्यु की डायरी पर पड़ती है...वो जानती थी की अभिमन्यु लिखता भी है...वो यूँ ही उसकी डायरी उठाकर पन्ना खोल लेती है...उस पर एक कविता लिखी हुई थी....कविता क्या थी दर्द की खान थी...उससे रहा नहीं गया और उसने वो बंद कर दी...थोडी देर में ही अभिमन्यु आ जाता है...प्रेरणा कॉफी पीते हुए बार बार अभिमन्यु को देख रही थी और अभिमन्यु प्रेरणा को...तो अभी भी लिखते हो डायरी...अभिमन्यु थोडा सा मुस्कुरा जाता है...हाँ कभी कभी लिख लेता हूँ

प्रेरणा कहना चाहती थी की क्यों अपनी जिंदगी ख़राब कर रहे हो...पर वो कह नहीं पाती...कुछ भी कहने से पहले उसे हमेशा ख्याल आ जाता था कि वो ये हक़ तो कब का खो चुकी है...कॉफी ख़त्म हो जाती है...वो कहती है अच्छा अब चलती हूँ मुझे जल्दी जाना है...ह्म्म्म ठीक है चलो मैं भी चलता हूँ तुम्हें वहाँ छोड़ दूंगा...प्रेरणा नहीं चाहती थी कि अब और ज्यादा अभिमन्यु उससे मिले और दिल ही दिल में परेशां रहे...वो बहाना करती है नहीं उसे एक और काम है...वो चली जायेगी...अभिमन्यु ज्यादा जिद नहीं करता और उसे जाने देता है

वो कहते हैं ना कि कुछ रिश्ते एहसास से जुड़े होते हैं...जिनमें बंदिशें नहीं होती...पवित्रता और एक दूसरे से जुडाव ही एक दूसरे की तरफ खींच लेते हैं...वहाँ रिश्ता बनाना नहीं पड़ता...खुद ब खुद कायम हो जाता है...ऐसा ही रिश्ता था अभिमन्यु और प्रेरणा का रिश्ता...यूँ ही जब तब प्रेरणा और अभिमन्यु टकराने लगे...ना चाहते हुए भी मिल जाते...और बातें होती...वही एक दूसरे को देखना...महसूस करना और कुछ ना कहना...प्रेरणा के लिए तो अजीब दुविधा थी...उसने बहुत कुछ सहा था इन पिछले 5 सालों में...पहले अपना प्यारा खोया और फिर अपना सुहाग...और फिर पिछले अजीबो गरीब 4 साल...जो कैसे बीते वो तो बस प्रेरणा ही जानती थी

उस दिन अभिमन्यु प्रेरणा से मिला और उससे शाम को पास की ही पहाड़ी पर घुमाने के लिए कहा...प्रेरणा पहले तो मना करना चाहती थी लेकिन फिर उसके मन ने मना नहीं किया...शायद अब वो एक रिश्ते से जुड़ने लगी थी...उसने आने के लिए बोल दिया

शाम को दोनों उस पहाड़ी पर बैठे हैं...चारों और बादल घिर आते हैं...ठंडी ठंडी रूमानी हवा बह रही है...अभिमन्यु प्रेरणा से कहता है...याद है तुम्हें वो एक दिन जब हम यूँ ही इसी तरह पानी से भरे हुए बादलों के नीचे बैठे हुए थे...उस जगह जहां हम अक्सर मिलते थे...प्रेरणा अपने अतीत में चली जाती है जहाँ प्रेरणा अभिमन्यु के सीने पर सर रख कर बैठी हुई थी...और प्यारी प्यारी बातें करती थी...कितना सुखद और रूमानी था वो दौर...अचानक से प्रेरणा वापस लौट आती है...सच में...आज में...वो बस अभिमन्यु की तरफ देखती है...आप शादी क्यों नहीं कर लेते...कब तक यूँ ही घुटते रहोगे...कब तक माँ यूँ ही इंतजार करती रहेंगी...कब तक ये सब यूँ ही चलता रहेगा...कब तक अतीत में जीते रहोगे...मैं चाहती हूँ कि तुम खुश रहो...

अभिमन्यु हाथ की लकीरों को देखता है फिर हँसता सा है...ये सब किस्मत की बातें है...क्या तुम खुश रह सकीं...वो प्रेरणा की आँखों में देखता है...उसकी आँख भर आती है...इसीलिए शायद मेरी किस्मत में भी ये सब नहीं...बादल आज कुछ मेहरबान हो चले...ठीक उसी पल बारिश भी होने लगती है जब प्रेरणा की आँखों से आँसू बहने लगते हैं...प्रेरणा उठकर जाने लगती है...अभिमन्यु उसका हाथ पकड़ लेता है...मैं भी तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ...यूँ घुट घुट कर मरते हुए नहीं...और पास खींच लेता है...इतना पास कि दोनों के बीच बस मामूली सा फासला है...मुझसे शादी करोगी...प्रेरणा उसकी आँखों में देखती रह जाती है...काफी देर तक देखती रहती है...फिर अचानक से...नहीं मैं शादी नहीं करना चाहती...और खुद को छुडा लेती है...मुझे पता था कि आप मुझसे मिलते रहोगे और एक दिन ऐसा कुछ होगा...और मुझ पर एहसान करने की सोचोगे...मैं जा रही हूँ...प्रेरणा चली जाती है...अभिमन्यु वहीँ बारिश में खड़ा खड़ा भीगता रहता है...उसकी आँखों से भी पानी बरस रहा था...

दिन बीत जाते हैं...लगभग 1 महीना हो जाता है प्रेरणा उसे नहीं मिली...अभिमन्यु थोडा चिंता में आ जाता है...एक रोज़ वो मार्केट गया हुआ था तभी वो तांगे वाला मिलता है...अरे साहब आप यहाँ...अभिमन्यु उसे पहचान जाता है....क्यों क्या हुआ...अरे वो मेमसाहब तो हॉस्पिटल में भर्ती हैं...अभी अभी उन्हें छोड़ कर आ रहा हूँ...अभिमन्यु अपने हाथ से सिगरेट फेंकता है....कहाँ, किस हॉस्पिटल में ?...वो कहता है चलो मैं आपको छोड़ देता हूँ...

हॉस्पिटल में पहुँच अभिमन्यु प्रेरणा के कमरे में पहुँचता है...वो बिस्तर पर थी...उसे इस हालत में देखकर उसकी आँखें गीली हो गयी...उसके पास एक टीचर थी...वो खामोशी से वहीँ पास ही बैठ जाता है...वो टीचर से पूँछता है क्या हुआ...अरे मैडम की तबियत काफी दिनों से ख़राब थी...शायद पीलिया है और ऊपर से नीद नहीं आती तो नीद की गोली खाती हैं...सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया...बस जैसे तैसे यहाँ लेकर आ रहे हैं...अभिमन्यु इतना दुखी कभी नहीं था...वो सोचता है प्रेरणा ने कभी बताया भी नहीं...

2-3 घंटे बाद वो मैडम से बोलता है आप जाइए...मैं यहाँ सब संभाल लूँगा....मैडम बताती हैं कि उन्होंने इनके पिताजी के पास फ़ोन कर दिया है वो कल तक आ जायेंगे...अभिमन्यु लगातार यूँ ही प्रेरणा के पास बैठा रहता है...अगले 2-3 घंटे में प्रेरणा को होश आता है...अभिमन्यु को सामने देखकर वो उसे देखती रह जाती है...अरे आप...बस कुछ बोलो मत तुम मुझसे....तुमने इस काबिल भी नहीं समझा कि मैं तुम्हारी इस हालत में तुम्हरे साथ रह सकूं...प्रेरणा खामोशी से सब सुनती रहती है...अभिमन्यु की आँखों से आँसू बह रहे थे और वो अपने दिल की सारी बातें कहे जा रहा था...वो मैंने सोचा...प्रेरणा कुछ कहना चाहती है...हाँ बस अब कुछ कहने की जरूरत नहीं...कहते हुए अभिमन्यु उसे रोक देता है

अभिमन्यु सारी रात जाग जाग कर उसकी देखभाल करता है...अगले रोज़ शाम तक ठाकुर साहब आ जाते हैं...वो अभिमन्यु को देखकर चौकं जाते हैं...पर आज उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था...वो एक हारे हुए खिलाडी थे...उनके सारे पासे उल्टे जो पड़े थे...उन्होंने प्रेरणा को देखा उस से बात की...अब उस कमरे में तीन वो इंसान थे जो एक दूसरे की जिंदगी से जुड़े हुए थे....एक इंसान की वजह से तीनो की जिंदगी आज इस मुकाम पर थी...कई बार प्रेरणा के पिताजी अभिमन्यु को धन्यवाद कहना चाहते और अपने किये की माफ़ी माँगना चाहते...पर रुक जाते...7-8 दिन तक अभिमन्यु यूँ ही प्रेरणा की देखभाल करता रहा...इतनी देखभाल और उसकी फिक्र तो उसके पिताजी भी नहीं कर पाते...उसके पिताजी को बार बार यही ख्याल आता...हर रोज़ प्रेरणा अभिमन्यु को अपनी आँखों के सामने देखती...अपनी देखभाल करते देखती...आज उसके दिल में कोई ऐसी बात नहीं थी कि कुछ भी गलत सोच सके...आज उसे उस दिन पहाड़ी पर अपने किये हुए बर्ताव पर मलाल हो राह था...कि वो कितना गलत सोचती थी...अभिमन्यु से ज्यादा उसे कभी किसी ने चाह ही नहीं और ना कोई चाह सकता...आज उसकी समझ में आ गया था

अभिमन्यु दिन के समय कहीं बाहर कुछ दवाइयाँ लेने गया हुआ था...उसकी ऑफिस से चपरासी आता है जो उसकी माँ की चिट्ठी लाता है...माँ की लिखी हुई चिट्ठी थी...प्रेरणा से रहा नहीं गया...प्रेरणा चिट्ठी खोल कर पढने लगती है...चिट्ठी पढ़कर पता चलता है कि माँ उसे घर आने को बोल रही हैं और अभिमन्यु के किये हुए वादे को पूरा करने के लिए कह रही हैं....कि अबके बार अगर आपको कोई लड़की पसंद आती है तो वो उसे माँ के साथ देखने जाएगा...प्रेरणा चिट्ठी पढ़कर रख देती है और उसके मन में ख्याल आता है कि वो क्यों अभिमन्यु के रास्ते में आये...क्यों वो पहले से ही शादी कर चुकी लड़की से शादी करे...क्यों वो एक विधवा से शादी करे...इसी पशोपेश में वो तमाम बातें बुन लेती है...अभिमन्यु के लौटने पर वो बताती है कि माँ कि चिट्ठी आई है...पर यह नहीं बताती कि उसने पढ़ी है...1-2 रोज़ में प्रेरणा की हॉस्पिटल से छुट्टी हो जाती है...प्रेरणा के पिताजी भी जाने के लिए होते हैं

प्रेरणा के पिताजी प्रेरणा के हॉस्टल से जाने के बाद अभिमन्यु के पास जाते हैं और अभिमन्यु से अपने किये हुए की माफ़ी मांगते हैं...और बहुत शर्मिंदा होते हैं...वो जान चुके थे कि उन्होंने अपनी बेटी और अभिमन्यु का दिल दुखाया है...दोनों की जिंदगी तबाह की है...आज वो जान चुके थे कि ये जात, ये धर्म सब दुनिया की बनायीं हुई बातें हैं...रखा इनमें कुछ नहीं...कुछ भी नहीं...और अंत में वो अभिमन्यु से विदा लेते हुए जाने लगते हैं...अभिमन्यु उन्हें स्टेशन तक छोड़ कर आता है...

अगले 2 रोज़ बाद अभिमन्यु प्रेरणा की खबर लेने जाता है कि अब वो कैसी है...जब वो वहाँ पहुँचता है तो उसे पता चलता है कि वो तो वहाँ से चली गयी...अभिमन्यु सोच में पड़ जाता है कि वो बिना बताये कैसे चली गयी...साथ ही साथ बहुत गुस्सा भी आता है...कोई ठीक ठीक पता भी नहीं था किसी को कि कहाँ गयी है...कई रोज़ बीत जाते हैं हर रोज़ अभिमन्यु वहाँ जाये और कोई खबर ना मिले...जब करीब एक हफ्ता बीत जाता है और फिर भी कोई खबर नहीं मिलती तो वो निर्णय लेता है प्रेरणा के घर जाने का...

अभिमन्यु प्रेरणा के घर जाता है वहाँ उसका भाई और उसके पिताजी मिलते हैं...उसके पिताजी बड़े प्यार से उसे अन्दर बैठा हाल चाल पूंछते हैं...और जब अभिमन्यु उनसे प्रेरणा के बारे में पूँछता है तो वो खामोश हो जाते हैं...उसके जिद करने पर वो हकीकत बताते हैं कि किस तरह उसकी चिट्ठी प्रेरणा ने पढ़ी और अब वो तुम्हारे और तुम्हारी शादी के बीच नहीं आना चाहती...वो जानती है कि जब तक वो वहाँ रहती तुम कहीं शादी नहीं करोगे...इसी लिए वो अपनी किसी सहेली के यहाँ चली गयी है...किस सहेली के यहाँ ये उसने हमे नहीं बताया...बस कह गयी है कि मैं ठीक रहूंगी...अभिमन्यु की आँखों से आँसू बह आते हैं और वो अपने दिल का हाल बताता है कि वो हमेशा से प्रेरणा से ही प्यार करता था और तब भी उससे शादी करना चाहता था और आज भी उससे शादी करना चाहता है...प्रेरणा के पिताजी का दिल भर आता है...पागल लड़की पता नहीं क्या क्या सोचती रहती है...

वो अभिमन्यु को वादा करते हैं कि जैसे ही उसकी खबर आएगी वो उसे बता देंगे...अभिमन्यु उनसे कह कर जाता है कि वो वहीँ वापस जा रहा है वो वहीँ पर प्रेरणा का इंतजार करेगा...क्या पता प्रेरणा वहाँ आ जाये...और जो मैं ना मिला तो फिर...दिन बीत गए...हर रोज़ के साथ एक नयी उम्मीद बनती और फिर रात के साथ वो उम्मीद टूट जाती...दिन महीने में बदल गए...करीब 6 महीने बीत चुके थे....

कौन सोचता है कि ऊपर वाले ने क्या सोच रखा हो आपके लिए...अभिमन्यु तो कभी नहीं सोच सकता था...कभी भी नहीं...आज वो माँ से मिलकर लौटा था...वही स्टेशन था...वही बैंच...वो बैठ जाता है...बस वो था और वो खाली पड़ी बैंच...वो सिगरेट निकालता है, जलाता है और धुंआ उड़ाता है...चारों और फैला हुआ धुंआ...वो धुंआ अजीबो गरीब शक्लें बना रहा था...कभी रोने की तो कभी हंसने की...अभिमन्यु गर्दन झुका कर बैठ जाता है...एक अंतहीन सोच में डूबा हुआ...बिल्कुल खामोश...वक़्त कितना बीत गया उसे पता ही नहीं...तभी ट्रेन की आवाज़ होती है...कोई उतरा है उसमें से...पर अभिमन्यु वैसे ही गर्दन झुकाए बैठा हुआ है...हाथ में सिगरेट जल रही है...उसके पास कोई आता है...उस हाड कपाने वाली ठण्ड में जिसका अभिमन्यु को एहसास नहीं हो रहा था...एक शौल कोई उसके कन्धों पर डालता है....वो गर्दन उठाता है...वो कोई और नहीं प्रेरणा थी...वही चेहरा...वही खामोशी...पर आज उस पर सवाल नहीं थे...आज वो चेहरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा वो पहले कभी देखा करता था...जब प्रेरणा सिर्फ उसकी हुआ करती थी...तुम...बस इतना निकला अभिमन्यु के मुंह से...मुझे माफ़ कर दो 'अभी' मैंने आपको हमेशा गलत समझा...और वो उस दिन जब...अभिमन्यु उठता है और प्रेरणा के गाल पर एक चांटा खींच कर मारता है...तुमने सोच भी कैसे लिया...प्रेरणा अभिमन्यु के सीने से लिपट जाती है...मुझे माफ़ कर दो...अब जिंदगी भर फिर कभी ऐसा नहीं सोचूंगी...अभिमन्यु कहता है पक्का...हाँ बिल्कुल पक्का...फिर दोनों एक दूजे से लिपट कर काफी देर तक रोते रहते हैं

अब वही बैंच है और दोनों बैठे हुए हैं...अभिमन्यु प्रेरणा के गले में हाथ डाल कर बैठा हुआ है...फिर वो सिगरेट निकालता है...जलाता है...धुंआ छोड़ता है...आज चाँद अपने शबाब पर है...आज चाँदनी रात है शायद...प्रेरणा बोलती है...अच्छा 'अभी' एक बात कहूँ...ह्म्म्म्म...आप सिगरेट पीते हुए बिल्कुल अच्छे नहीं लगते...सच्ची...हाँ सच्ची...पक्की-पक्की...हाँ बाबा पक्की-पक्की...और प्रेरणा, अभिमन्यु के हाथ से सिगरेट लेकर फेंक देती है...आज से सिगरेट बिल्कुल बंद...अरे...अरे...ये अच्छी दादागीरी है...अभिमन्यु बोलते हुए हँसता है...और प्रेरणा भी हँस देती है...अभिमन्यु प्रेरणा को एक बार फिर से गले लगा लेता है...

"कितने ही चाँद-सितारे देखे थे मैंने इन बीती लम्बी रातों में
हर रात काली और उदास ही नज़र आई मुझे

आज चाँद भी मेरा है और चाँदनी भी मेरी"

Read more...

एक प्रेम कहानी ऐसी भी

>> 21 July 2009




रात लौट आई लेकर फिर से वही ख्वाब
कई बरस पहले सुला आया था जिसे देकर थपथपी

कमबख्त रात को भी अब हम से बैर हो चला है


अक्सर कहानी शुरू होती है प्रारंभ से...बिलकुल शुरुआत से...लेकिन इसमें ऐसा नहीं...बिलकुल भी नहीं...ये शुरू होती है अंत से...जी हाँ दी एंड से...कहानी का नहीं...उनके प्यार का...हाँ वहाँ से जहाँ से उनका प्यार ख़त्म होता है...उनकी आखिरी मुलाकात के साथ...जब प्रेरणा और अभिमन्यु आखिरी बार मिलते हैं...प्रेरणा की शादी के साथ..


और फिर 5 साल बाद.....


एक छोटा सा स्टेशन है...गाडी रूकती है...स्टेशन सुनसान है...अभिमन्यु ट्रेन से उतरता है...एक परिवार और उतरा है...उन्हें लेने कोई आया है...वो उन्हें लेकर चले जाते हैं...अभिमन्यु काले कोट वाले साहब से कुछ पूंछता है...उसके बाद वो आगे बढ़ जाता है...वहाँ बैंच दिखाई दे रही हैं...वो वहाँ बैठ जाता है...पीछे की बैंच पर कोई शौल ओढे बैठा है...हाड कपाने वाली ठण्ड में वो कुछ ज्यादा गर्म कपडे नहीं पहने हुए...अपनी फिक्र करना छोड़ दिया है उसने...वो सिगरेट जला लेता है...धुंआ उड़कर बादलों सा आस पास पसरने लगता है पीछे से खांसने की आवाज़ आने लगती है...एक्सक्यूज मी, प्लीज....अभिमन्यु आवाज़ सुनकर अचानक से मुड़ता है...क्योंकि ये आवाज़ तो जानी पहचानी थी...हाँ ये प्रेरणा की आवाज़ थी...उधर प्रेरणा भी अभिमन्यु को देखकर अजीब सी रह जाती है....कुछ पल के लिए सन्नाटे में भी एक ऐसा सन्नाटा पसर जाता है...ठीक वैसा ही सन्नाटा जैसा दोनों के बीच उस आखिरी मुलाक़ात पर पसरा था....जो आज तक खामोशी कायम किये हुए था....

प्रेरणा तुम...अभिमन्यु बोलता है...हाँ अभिमन्यु के लिए तो ये एक ख्वाब जैसा ही था उसे दोबारा देखना...और फिर दोनों बैंच की एक ही तरफ बैठ जाते हैं....कुछ सवाल प्रेरणा की आँखों में थे तो कुछ अभिमन्यु की में...पर दोनों खामोश...सिगरेट का धुंआ अभी भी उड़ रहा था...छोड़ी नहीं ये आदत...प्रेरणा के सवाल के साथ सन्नाटा ख़त्म होता है....ह्म्म्म...अभिमन्यु प्रेरणा की तरफ देखता है....फिर सिगरेट की तरफ...आदतें....आदतें....ये आदतें भी अजीब होती हैं....कुछ अपने आप छूट जाती हैं....और कुछ चाहने पर भी नहीं छूटती....फिर से पीना कब शुरू कर दी...प्रेरणा कहती है...पता नहीं कब शुरू हुई...ठीक से अब तो याद भी नहीं...खैर...तुम यहाँ...कैसे...वो यहाँ के नवोदय विद्यालय में नौकरी मिल गयी है...अच्छा कब से...1 साल हो गया...और आप...ह्म्म्म...सरकारी नौकरी जब जहाँ भेज दें चला जाता हूँ....वैसे यहाँ एक कंपनी है उसका सोफ्टवेयर बनाने का प्रोजेक्ट मिला हुआ है...उसी के सिलसिले में....ओह अच्छा...पहली बार आना हुआ है आपका....हाँ...यहाँ से जाने के लिए बस तो सुबह ही मिलेगी...हाँ वो काले कोट वाले भाई साहब बता रहे थे...

एक बहुत ही ठंडी हवा का झोंका अभिमन्यु के कानों से गुजरता है...अभिमन्यु कपकपाने लगता है...ये क्या दो कपडों में इतनी ठण्ड में चले आये...मालूम है कि इतनी ठण्ड है फिर भी....प्रेरणा अपना बैग खोलकर गरम शौल देखने लगती है....अरे नहीं मेरे पास है वो...माँ ने चलते वक़्त रख दिया था...प्रेरणा शौल निकालकर देती है...ओढ़ लीजिये इसे जल्दी से...अभिमन्यु के मुंह से माँ के बारे में सुनकर...माँ कैसी हैं...अभिमन्यु शौल ओढ़ते हुए...अच्छी हैं...चलते वक़्त तमाम हिदायतें दे रही थीं...

तभी प्रेरणा को याद आता है वो बीता हुआ पल...जब प्रेरणा अभिमन्यु से कहती है "क्या माँ बहुत प्यार करती हैं...हाँ बहुत...बहुत प्यार करती हैं...बहुत प्यारी हैं...वो तुम्हें मुझसे भी ज्यादा चाहेंगी देखना तुम...अच्छा...सच...हाँ वो अपनी बहू के बहुत ख्वाब बुनती हैं"...फिर एक ही पल में प्रेरणा अतीत से उस बैंच पर लौटती है...और मन ही मन सोचती है...उनकी बहू के बारे में....अभिमन्यु की बीवी के बारे में....पर सोचती है कि वो क्या हक़दार है ये पूँछने की....वो बस सोचकर रह जाती है....पूंछती नहीं...

ठाकुर साहब कैसे हैं ? अभिमन्यु सवाल की तरह पूँछता है प्रेरणा से...वो जानती है कि वो उसके पापा के बारे में पुँछ रहा है....हाँ यही तो कहता था...अभिमन्यु उन्हें...ठाकुर साहब....वो अच्छे हैं...पहले की ही तरह...प्रेरणा अभिमन्यु की तरफ देखती है पर कुछ कहती नहीं...अभिमन्यु सिगरेट जला लेता है...एक वो समय भी था जब प्रेरणा के एक बार कहने पर अभिमन्यु ने सिगरेट छोड़ दी थी....कभी नहीं पीता था फिर....धुएं के साथ एक वो सच भी धुंधला सा पड़ गया...

अभिमन्यु इधर उधर देखता है...कुछ तलाशता सा...चाय वाला कहीं...प्रेरणा अपने बैग से थर्मस निकाल कर अभिमन्यु की तरफ चाय बढाती है...ये चाय...वो मैंने चाय की दुकान बंद होने से पहले ही थर्मस में भरवा ली थी...आज भी उस्ताद हो...थैंक यू कहते हुए अभिमन्यु चाय ले लेता है...और मन ही मन सोचता है कि प्रेरणा तो शुरू से ही उस्ताद थी...हर काम में...ख्याल रखने में हर बात का...

अभिमन्यु अपने बैग की जेब तलाशने लगता है...क्या हुआ...देख रहा हूँ शायद कुछ खाने को पड़ा हो....अरे मेरे पास है ना...प्रेरणा अपने बैग से नमकीन निकालती है...तब तक अभिमन्यु अपने बैग से कुछ निकालता है....अरे गुजिया...प्रेरणा कहती है....माँ ने बनायीं है....हाँ....लो जानता हूँ तुम्हें बहुत पसंद है....प्रेरणा गुजिया लेती है...खाती हुई कहती है...आपकी बीवी तो बड़ी किस्मत वाली होगी जो इतनी प्यारी माँ मिली उन्हें...नहीं किस्मत ने माँ का साथ नहीं दिया...क्या मतलब...प्रेरणा बोली....प्यार लुटाने के लिए बहू का होना भी बहुत जरूरी है....कहते हुए अभिमन्यु चाय का घूँट गले से नीचे उतारता है...अभी...प्रेरणा के मुंह से निकला...और वो अभिमन्यु के चेहरे की तरफ देख रही थी...ढेर सारे सवाल...और ढेर सारी पुरानी बातें साफ साफ प्रेरणा के चेहरे पर पढने को मिल जाती इस समय...

खैर मेरा छोडो....तुम बताओ...तुम इतना दूर कैसे नौकरी करने आ गयी...तुम्हारे पति कहाँ हैं आजकल...ऐसा सवाल जिससे बचने के लिए वो यहाँ सबसे दूर पड़ी थी...आखिरकार बरसों बाद पूंछा गया....और वो भी उस इंसान ने जिसके एक तरफ जिंदगी कुछ और थी...और उसके परे जिंदगी कुछ और...

प्रेरणा के चेहरे पर खामोशी छा गयी...वो कुछ नहीं बोली...सिगरेट का एक कश लेकर धुंआ छोड़ते हुए उसने कहा...तुमने जवाब नहीं दिया...प्रेरणा नमकीन का पैकेट बैग में रखने लगी...और थर्मस को भी उसने बैग में रखना चाहा...एक अजीब सी खामोशी लिए हुए...अभिमन्यु के लिए ये खामोशी एक लम्बा सवाल बन चुकी थी...अभिमन्यु ने बोला....बोलती क्यों नहीं क्या हुआ...प्रेरणा के खामोश चेहरे की आँखें भर आई...अभिमन्यु उसकी आँखों की नमी को अपने दिल की गहराइयों तक महसूस करता है....क्या...प्रेरणा के मुंह से बस इतना निकला वो अब नहीं हैं....सिगरेट सुलग कर अभिमन्यु का हाथ जला देती है...उसके हाथ से सिगरेट छूट जाता है....प्रेरणा की आँख से आंसू की बूँद टपक जाती है....मतलब क्या, कैसे....अभिमन्यु पूँछता है....एक रोड एक्सीडेंट और फिर सब ख़त्म....आज बरसों बाद अभिमन्यु की आँख भर आई...एक दर्द फिर से हरा हो गया....क्योंकि वो दुखी थी....कब...कब हुआ....शादी के एक साल बाद...प्रेरणा बोली....और आँसू थे जो रुक ही नहीं रहे थे....और तुम पिछले 4 साल से....बोलते हुए अभिमन्यु उसके रोते हुए चेहरे को देखता रह गया....दोनों के बीच एक लम्बी खामोशी छा गयी... (कहानी आगे जारी है)
आगे की कहानी का लिंक ये हैं :
दूसरा एवं अंतिम भाग

Read more...

ऐ काश कि अब होश में हम आने ना पायें

>> 17 July 2009

ये बचपन के दोस्त भी क्या ख़ास फुर्सत से बने होते हैं...एक तरफ जहाँ लगता हैं कि वो इतने अच्छे हैं कि खुदा ने उन्हें बड़े दिल से बनाया होगा और उस पर वो हमारा प्यारा बचपन...मासूमियत से भरा...ना कोई बंदिश और ना कोई चिंता...बस ऐश ही ऐश...खुशनसीबी भी क्या चीज़ होती है...ये एक ऊपर वाले की तरफ से एक तौह्फे के तौर पर मिलती है...हाँ मैं भी कम से कम एक मामले में खुद को खुशनसीब मानता हूँ...दोस्तों के मामले में...और उस पर से बचपन के दोस्त जब अंत तक साथ बने रहे तो क्या कहने...

इस भाग दौड़ की जिंदगी से जब कभी फुर्सत के पल चुरा लेता हूँ तो बचपन के दोस्त की तरफ दौड़ लगा ही लेता हूँ...एक लम्बा अरसा हो चला जब मैं और वो नहीं मिल सके...और उस रोज़ आखिरकार खुदा ने कुछ रहमत दिखाई...दिल्ली जाना हुआ और बारिश मैं भीगने के बाद बस एक ही ख्याल आया कि बस अब और नहीं...मेरे कदम खुद ब खुद उसकी ओर दौड़ पड़े...

होश में तो हम पहले से ही नहीं थी...एक दूजे से कई महीने बाद मिलने की ख़ुशी और जब बीयर के घूँट गले से नीचे गए तो होश बाकी कहाँ रहना था...बस छिड़ गयी वही बचपन की धुन...वो बचपन के बस्तों, साइकलों, कक्षाओं में मस्ती की कहानी...एक दूजे को चिढाने की कहानी...वो मौज मस्ती, वो क्रिकेट की जबानी...वो पहले प्यार की भीनी भीनी खुशबू...ना जाने कहाँ से कमबख्त ने जिक्र छेड़ दिया...एक पल तो लगा कि हम उन्हीं दिनों मैं जी रहे हैं

और हमारे बचपन के दिन भी कम मजेदार नहीं थे...आखिर भूलें भी तो कैसे भूलें...याद है यार वो जब एक बार तीरथराम सर ने तेरे बाल कैंची लेकर बुरी तरह काट दिए थे...उसके बाद तुझे सर से बालों का सफाया ही कराना पड़ गया था...इस बात पर तो जी सिगरेट जला ली बन्दे ने...हा हा हा हा...हाँ यार कैसे भूल सकता हूँ...

हम आर्य समाज की संस्था द्वारा चलाये जा रहे स्कूल में पढ़ते थे...उसके नियम, कायदे, कानून...और उस पर से उसके अध्यापक गण...एक से बढ़कर एक...और हम लोगों ने भी सबके नाम एक से बढ़कर एक रखे हुए थे....

एक थे हमारे तीरथराम सर उन का बस एक ही काम था सप्ताह में दो दिन हर कक्षा में एक चक्कर लगाते और अगर किसी के बाल आवश्यकता से अधिक बड़े हैं तो उसके बालों पर उल्टी सीधी कैंची मार जाते...बस फिर क्या है कोई मरता क्या ना करता...बालों का जड़ से ही सफाया करवाना पड़ता था ऐसी हालत में...एक बार हमारे ये दोस्त उनके चंगुल में फंस गए थे...उनकी पैनी नज़र से इनका हीरो बनना छुप ना सका....

दूजे वो जो पी.टी. के सर थे...शायद ही उन्होंने कभी पी.टी. करवाई हो...उनका बस एक ही काम था कि कक्षा में आये चौक उठाई और ब्लेक बोर्ड पर लिख दिया "सभी छात्र अपना अपना अपूर्ण कार्य पूरा करें"...और उनकी चौक शायद ही किसी काम के लिए चली हो...थे पी.टी. के सर...और दुबले पतले इतनी कि पूंछो मत....4-5 साल बाद रिटायर होने वाले थे...आखिरी पीरियड ख़त्म होने पर शांति पाठ होता था...अगर किसी लड़के ने शांति पाठ ख़त्म होने से पहले बस्ता बंद कर लिया तो समझो खैर नहीं...उसके बस्ते की सारी किताब-कांपियां कक्षा के हर कोने में नज़र आती थीं और वो बच्चा अपनी कांपियां ही बीनता रह जाता था...

उधर वो हमारे महेश्वरी सर वो रोज़ याद करने को देते और याद ना करके लाने पर हर अगले दिन पूँछते कि कौन कौन याद करके लाया है...और सबको खडा कर देते....फिर कहते कि जो बच्चा चुप से बैठ के याद करे वो बैठ सकता है...अब लो भला बैंच पर कौन खडा होना चाहेगा...और उनकी ख़ास आदत वो आये दिन कोई कहानी सुनाते थे...वहाँ स्कूल में हर रोज़ पैर छूने का रिवाज था...हर बच्चा माहेश्वरी सर के पैर जरूर छूता....उनकी ज्यादा इज्जत करने के लिए नहीं...बल्कि उनके जूतों की पोलिश ख़राब करने के लिए...और वो अपने पैर इसी कारण छूने ना देते

एक सर ऐसे कि कब हंसते थे और कब सामान्य रहते थे हम अंत तक ना जान सके...और अपनी ही धुन में कब हाथ इधर का उधर कर देते...बच्चे समझते कि इन्होने बाहर जाकर पानी पीने की इजाजत दे दी है...जब बच्चा बाहर से वापस आता तो उसकी मार पड़ती कि बिना पूँछे क्यों गया

और वो हमारे कला विषय के सर उन्हें कितना और क्या आता था इसका तो पता नहीं...पर उन्होंने छटवीं कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक बस आम, गिलास और सीनरी बनाना सिखाया था...हर दूसरे दिन वही बनवाते थे....अंग्रेजी के सर ऐसे थे कि उनसे जो बच्चा ट्यूशन नहीं पढता था वो उसको दुश्मन समझते थे...और कक्षा के 80% बच्चे उनके दुश्मन हुआ करते थे....

खैर थी कि विज्ञान, गणित और एक अन्य अंग्रेजी वाले सर अच्छे थे...मेरा दोस्त बीयर का घूँट गले से नीचे उतारकर बोलता है...अबे अच्छा उसका क्या हुआ...उसकी शादी हो गयी क्या..वो बोला...उसने फिर से नयी सिगरेट जला ली...वही तेरा पहला प्यार...जिसको तू छत से छुप छुप के देखा करता था...जो तुझे देखकर मुस्कुरा जाया करती थी....शादी हो गयी होगी उसकी तो...है ना....हुई कि नहीं....मैं उसके हाथ से सिगरेट ले लेता हूँ...कश लेता हूँ, धुंआ उड़ाता हूँ...यूँ दबी हुई आग को हवा नहीं देते मेरे दोस्त...क्यों भड़का रहे हो उस दबी हुई चिंगारी को....

अब ये हम लोगों की तीसरी बीयर है...वो खोलते हुए बोलता है...अच्छा सही है...तू तो बड़ा आदमी हो गया...प्रोग्रेस...वाह...अबे उसका बताया नहीं क्या हुआ था...अरे यार वो पहला और आखिरी ख़त था जो पकडा गया था...और उसके बाद वो मोहब्बत वहीँ दफ़न हो गयी थी...उसकी बहन के हाथ प्रेम पत्र पकडे जाने तक का तो तुझे सब पता ही है...वो बोला फिर क्या हुआ...बस फिर कुछ नहीं हुआ...वो उसी तरह देखती और मुस्कुराती...लेकिन हमें वही मंजर याद आ जाता...मेरा पहला प्यार अधूरा रह गया दोस्त...वो हँसता है...हा हा हा...अधूरा प्यार...बाद में पिताजी का ट्रांसफर होने के बाद की कहानी पता नहीं...

वो बोलता है "नो मोर लव स्टोरी प्लीज"....मैं उसकी आँखों की तरफ देखता हूँ...लडखडाती जबान भी दर्द महसूस करा जाती है...शायद कहना चाह रहा हो कि मेरा प्यार तो पूरा था फिर क्यों ऐसा हुआ...आखिरी बीयर के साथ यह एहसास करा रहा है वो....चन्द महीने पहले ही तो उसकी महबूबा की शादी कहीं और हुई थी...ये कमबख्त इश्क भी ना...उन बचपन के गलियारों में फिर से पहुँच कब नीद आ गयी हमें खबर ही नहीं लगी...शायद हम चाहते भी ना थे उस रोज़ होश में रहना

Read more...

चेहरे कहीं गुम हैं मुखौटों के पीछे

>> 15 July 2009

हमारे पड़ोस में रहने वाले वर्मा जी बड़े ही नेक और शरीफ इंसान हैं.उस रोज़ वो पास के ही आश्रम के पास खड़े थे जिसको वो काफी चंदा देते हैं. वहाँ कुछ मोक्ष, ज्ञान, मोह-माया त्यागने, परम आत्मा और ईश्वर को पाने के बारे में बताया जा रहा था. कुछ बड़े बड़े पोस्टर लगा रखे थे और बाकायदा सफ़ेद वस्त्र धारण वर्मा जी और उनकी कुछ साथी महिलाएं और पुरुष बाकायदा लोगों को सब समझा रहे थे.

वर्मा जी ने मुझे उधर से निकलते देख मुझे पुकारा और समझाना चाहा कि सब मोह माया है, अपना ध्यान ईश्वर में लगाओ. जब मैं उधर खडा होकर एक नज़र देखता हूँ. वो कह रहे हैं कि सब माया है, सब यहीं छोड़ कर जाना है. मेरे दिमाग में टन्न से कुछ बजा...आएं वर्मा जी को क्या हो गया? कैसी बातें कर रहे हैं? अगर ऐसा है तो हमसे किराया लेते हैं और उसकी असल पर्ची भी नहीं देते ताकि उनका टैक्स न लगे और पर्ची मांगो तो घर खाली कर दो की प्यारी सी धमकी दे देते हैं.

फिर वो कह रहे हैं कि इस शरीर की ज्यादा सेवा नहीं करनी चाहिए. मैं सर खुजलाने लगा ये क्या हुआ वर्मा जी को, वर्मा जी तो हमेशा एसी कार में घुमते हैं, उसके बिना कहीं कदम भी नहीं रखते और कल ही तो उन्होंने अपने नीचे रहने वाले किरायेदार की बिजली काट दी थी ताकि उनका एसी चल सके. अमां वर्मा जी काहे मजाक कर रहे हो (ऐसा हमने मन में सोचा)...अरे बाप रे ई कैसा मुखौटा लगा रखा है चेहरे पर वर्मा जी ने. फिर हमारी नज़र कार में एसी चला कर बैठे कुछ सभ्य पुरुष और महिलाओं पर गयी जो इस आश्रम रुपी संस्था को चलाते हैं. हमने सोचा चलो अच्छा है बाहर नहीं निकल रहे वरना खामखाँ पसीना बहेगा...वर्मा जी का क्या है ? कुछ भी कहते रहते हैं. ये भी भला कोई बात हुई.

उधर सफ़ेद वस्त्र धारण किये हुए महिलाएं जो कि उस आश्रम में रहती हैं वहाँ एकत्रित गरीब महिलाओं को समझा रही हैं कि ईश्वर क्या है, परमात्मा क्या है, मोह क्या है, माया क्या है, असीम सुख क्या है, भगवान की भक्ति क्या है? और उधर हम खामखाँ आज तक सोचते रहे कि जैसा कि आश्रम में 24 घंटे लाइट का बंदोबस्त है, उचित साफ़ सफाई, एसी, पंखा, इनवर्टर, दोनों पहर भर पेट अच्छा खाना और कहीं बाहर जाना हो तो वर्मा जी की और अन्य भद्र पुरुषों की गाडियां हैं और हाँ एक स्कूटी भी तो है. जीवन जीने का आनंद ही आनंद है.

कमाल है फिर ये इन गरीबन को काहे ऐसे बोल रहे हैं...कि ई सब कछु नाही है...ई सब में कछु नाही धरो...और ऊ देखो सबके सब बड़े ध्यान से सब समझी रहे हेंगे. हमारा दिमाग इस धर पटक में बहुत घूमा कि ये गरीब लोग भी अजीब हैं...परेशान हैं, दुखी हैं, शरीर को कष्ट है...तभी ईश्वर की बात और मोक्ष की बात पर ध्यान दे रहे हैं. अरे हमारा मन तो किया कि वहीँ खड़े के खड़े कही दें कि ऐ गरीब लोग काहे टाइम खोटी करते हो खुद का. इसी आश्रम में काहे नाही भरती हुई जात. दोनों बखत भर पेट भोजन तो मिलिए. भजन तो तुम सब कर ही लियो दोनों बखत. अरे हम तो कहत हैं चारो बखत.

हम वर्मा जी के चेहरे को देखकर मुस्कुराये और उस सफ़ेद वस्त्र धारण की हुई महिला को जो कल ही कूलर सही करने वाली दुकान पर वर्मा जी के साथ खड़ी थीं और ये कह रही थी कि कूलर आज ही सही हो जाना चाहिए.

...............................................

उधर मेरे भाई के ऑफिस में शिखा मैडम का मूड आज बहुत अच्छा है. एक सहकर्मी ने उनकी तारीफ की है और वो खिलखिला के हँस रही हैं...मोबाइल की घंटी बजती है और वो किसी को डांट सी लगा रही हैं , उस पर तेज तेज चीख रही हैं. मेरा मूड ख़राब मत किया करो अच्छा अभी मैं बिजी हूँ बाद में बात करुँगी...बाद में पता चला कि वो महोदय उनके पति हैं....और बाद में ये भी पता लगा कि ये ज्यादातर अपने पति पर इसी तरह झल्लाती हैं और ये अपने उन से ज्यादातर ऐसे ही बातें करती हैं

आएं ई कैसे हुआ...अभी अभी तो ये मैडम खिलखिला रही थीं और अचानक से इनका टोन बदल कैसे गया...जानकार ताज्जुब हुआ कि इन्होने अपने पति से लव मैरिज की थी(हम सर खुजलाने लगे)...पूरा छह महीने का लव था हाँ...अभी हम सोच ही रहे थे और वो मैडम उधर किसी दूसरी लड़की से खिलखिला के बातें करती दिखीं.

.........................................

शर्मा जी गरीबों के बड़े हितेसी हैं और यहाँ के हाऊसिंग बोर्ड के मुखिया भी. अभी शर्मा जी कह रहे थे कि गरीब बच्चों के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है. सरकार को और हम लोगों को कुछ करना चाहिए. तभी छोटू चाय वाला चाय लेकर आता है और उससे धोखे से चाय टेबल पर फ़ैल जाती है. शर्मा जी उसे गरियाते हुए खीज रहे हैं और जो मन में आ रहा है वो बके जा रहे हैं. बस उन्होंने हाथ उठाते उठाते रोका है. कम्बखत से एक काम भी ठीक से नहीं होता...चाय भी ठीक से नहीं लायी जाती...और मैं सोच रहा हूँ कि इसकी उम्र कितनी होगी 7-8 साल...अभी अभी तो शर्मा जी गरीबों की बातें कर रहे थे.


और मैं असमंजस में कि कौन सा चेहरा है और कौनसा मुखौटा...या एक चेहरा और कई मुखौटे...क्या चेहरा कभी दिख पाता है

Read more...

दो नैना और इक कहानी

>> 14 July 2009

याद है तुम्हें जब तुमने एक बार कहा था कि कहीं ऐसा न हो कि एक दिन हमें एक दूसरे को देखने के लिए आँखें तरस जाएँगी...पता नहीं क्या सोचकर तुमने ये कहा था...शायद तुम्हें एहसास हो चला था कि ये जिंदगी हमारी झोली में क्या डालने वाली है...शायद ये एक एहसास ही तो था जो हमे जोड़े रहा...जब तुम कुछ पूँछा करती थीं...तो मैं खामोशी से मुस्कुरा दिया करता था...और आज देखो मेरे पास कहने को इतना कुछ है...पर वो मुस्कुराती हुई आँखें नहीं जो मेरी तरफ देखा करती थीं...कुछ भी बड़े प्यार से सुनने के लिए

मैं कहना चाहता हूँ कि मैं तुम्हें बहुत याद करता हूँ...कि जब तुम हवा में अपना दुपट्टा उड़ाया करती थीं...तो तुम बहुत अच्छी लगती थीं...कहना चाहता हूँ कि जब तुम खिलखिला के हँसती थीं तो तुम्हारी हँसी मेरे दिल में असर करती थी...और हर बार मैं यही ख्वाहिश पैदा करता था कि तुम यूँ ही जिंदगी भर मेरे साथ खिलखिला कर हंसती रहो...कहना चाहता हूँ कि जब तुम बच्चों सी हरकतें करती थीं तो तुम पर बहुत प्यार आता था

कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी आइसक्रीम खाने की जिद मुझे बहुत पसंद थी...कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा चुपके से मेरे गाल पर किस करना बहुत अच्छा लगता था...कहना चाहता हूँ कि तुम मुझे बहुत याद आती हो...कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी याद मुझे हँसा जाती है और फिर ना जाने क्यों रोने को मन करने लगता है...और ना जाने क्यों, ना चाहते हुए भी आँखों से आँसू छलक जाते हैं

ये जिंदगी बहुत खूबसूरत है...इसे ख़ुशी से जीना...चाहे मैं रहूँ या ना रहूँ...याद है तुमने ये बात जिस पहाडी के पत्थर पर बैठ मुझसे कही थी...उस पर ना जाने क्यों मैं दोबारा गया...वो मुझे वीरान सी जान पड़ी...बिल्कुल मेरी जिंदगी की तरह...बेरंग, बेजान, बेमतलब सी...और जब इस सोच से उबर कर खुद को देखा तो पाया कि मैं भीग चुका हूँ...उस बारिश में जो काफी देर से हो रही थी...कमाल है आज पहली बार ऐसा हुआ कि बारिश हुई और मुझे उसके बंद होने पर पता चला...याद है मुझे तुम्हें बारिश बहुत पसंद थी...है ना...क्या आज भी तुम्हें बारिश में भीगना पसंद है

किताबों के दरमियान रखे हुए उन सूखे गुलाबों की पंखुडियों को जब हाथ से स्पर्श करता हूँ...तो ये मुझे पुरानी यादों में लेकर चले जाते हैं...वो तुम्हारे नर्म हाथ और मखमली बाहें...जिनसे तुम मेरे सीने से लिपट जाया करती थीं...वो किताबें जो तुमने दी थीं वो उसमें लिखी हुई कहानी ना बोल कर हमारी अपनी कहानी कहने लग जाती हैं...कमबख्त ये भी नहीं समझती...कैसे समझेंगी तुम्हारे हाथों का स्पर्श जो है उस पर और जिसे तुमने चूम कर दिया था...हर वो किताब उतनी ही महफूज़ है मेरे पास ठीक तुम्हारी यादों की तरह...

ये जो आँखें हैं जिन्हें तुम अक्सर दो नैना कहा करती थीं...आज भी इक कहानी बसी हुई है इनमें...पता है किसकी और कौन सी कहानी...तेरे मेरे ख्वाबों की कहानी...तेरी मेरी ख्वाहिशों की कहानी...

हाँ जब तब इन दो नैनों में कभी बादल तो कभी पानी नज़र आ जाता है...और उसके साथ ही वो ख्वाहिशें और वो ख्वाब दोनों ही गीले हो जाते हैं

Read more...

तूने जो ना कहा वो मैं सुनता रहा

>> 09 July 2009

फैज़ मियाँ एक शेर कहते हैं...उनकी वाली लड़की अपनी सहेलियों के साथ उधर से गुजर रही है...उस झुंड में से एक लड़की 'स्टूपिड' सा कुछ कह कर जा रही है...मैं वहीँ खान साहब की चाय की दुकान पर चाय की आखिरी चुस्की ले रहा हूँ...लड़की के 'स्टूपिड' कहने से फैज़ मियाँ बुरी तरह आहत हैं...

इन लड़कियों में 'नजाकत और नफ़ासत' तो रही ही नहीं कहते हुए वो मेरे ही बैंच पर बैठ जाते हैं...खान साहब कहते हैं...अरे दौर तो हमारा था जब 'नजाकत और नफ़ासत' तो लड़कियों की पहचान हुआ करती थी...पर तब हम लोग भी ऐसे ना थे...हम उनकी तारीफ भी बड़े प्यार से किया करते थे...आज के लोंडों की तरह नहीं जी फब्तियां कसते हैं...छेड़छाड़ करते हैं...और बलात्कार जैसी घटनाएं होती हैं...तब ये सब ऐसा नहीं था...मोहब्बत अगर होती थी तो उसका भी एक लम्बा दौर चलता था और शराफत कायम थी...

अरे खान साहब आप तो बस अपना दौर सुनाने लगते हैं...हम कौन सा उसे छेड़ रहे थे...मैं कहता हूँ खान साहब फैज़ मियाँ इश्क में हैं...खान साहब मुस्कुरा जाते हैं...अरे कब से...यही कोई पिछले एक बरस से और आपने गौर नहीं किया...इनकी वाली ने इन्हें कुछ नहीं कहा...वो तो कोई सरफिरी थी जो इन्हें 'स्टूपिड' कह कर चली गयी...

तभी वो छोटा सा बच्चा आ जाता है दुकान पर जिसे खान साहब हर रोज़ मुफ्त में नाश्ता कराते हैं और चाय पिलाते हैं...और यही क्रम पिछले 2-3 बरस से चल रहा है...तभी एक ग्राहक उस लड़के के बारे में खान साहब से पूँछता है...किस धर्म का है लड़का...खान साहब उस आदमी की तरफ मुस्कुरा कर देखते हैं और कहते हैं..."गरीब और भूखे का कोई धर्म नहीं होता"...ये तो धर्म और मजहब के ठेकेदारों के बनाये हुए चोंचले हैं...धर्म और मजहब के नाम पर तो बस उन ठेकदारों और नेताओं के घर ही आबाद हुए हैं...

मैं अपनी ही बैंच पर बैठे फैज़ से कहता हूँ...क्यों फैज़ मियाँ तो बात कहाँ तक पहुँची...अमां यार तुम तो रहने ही दो...ये नहीं कि दोस्त की कोई मदद करो...यहाँ हमारी जान पर बनी है तुम्हें दिल्लगी की सूझ रही है...सिगरेट को जलाते हुए मैं कहता हूँ...यार तुम कहो तो जान दे दूँ पर उससे कुछ हासिल तो हो...पर आज फैज़ मियाँ कुछ संजीदा से जान पड़ते हैं...पास ही खड़े अपने अब्बा जान के दिए हुए स्कूटर को उठाते हैं...स्टार्ट करते हैं...और उस पर मेरे पीछे बैठने का इंतजार करते हैं...मैं उठता हूँ और उनके साथ स्कूटर पर बैठ जाता हूँ....

शाम का समय है खाना खाने के बाद मैं कमरे में बैठा सिगरेट सुलगा लेता हूँ...फैज़ मियाँ बड़े अपसेट से दिखाई जान पड़ते हैं जो कमरे में ही हैं पर इस बात का इल्म उन्हें जरा भी नहीं कि उस कमरे में मैं भी हूँ...अचानक वो होश में आते हैं और मेरे हाथ से सिगरेट ले खुद धुएं छोड़ने लगते हैं...कहते हैं यार चल रात का शो देखने चलते हैं...मैंने कहा कौन सी...वो बोले 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे'...अबे 20 दफा तो दिखा चुका है वो फिल्म...तो 21 वीं दफा और सही..वो बाहर जाकर स्कूटर स्टार्ट कर लेता है...और बार बार स्कूटर की तेज़ आवाज़ देता है...मैं जाकर उसके पीछे बैठ जाता हूँ...अबे कपडे तो पहन लेने दिया कर...अबे वहां कौन सा मेरा निकाह पढ़ा जा रहा है...जो तैयार होगा...

सिनेमा हॉल के अन्दर बैठा मैं आधा सोते और आधा जागते हुए फिल्म देखता हूँ...फिल्म खत्म हो गयी...बाहर निकल कर अब मैं स्कूटर स्टार्ट करता हूँ...फैज़ मियाँ पीछे बैठे हैं...कुछ दूरी चलने पर फैज़ मियाँ कहने लगते हैं...रोक यार...क्यों क्या हुआ...हर बार की तरह आज इनका मन गंभीर है...रास्ते की उस बैंच पर बैठ वो सिगरेट सुलगा लेते हैं...

उनकी गंभीरता देखते हुए मैं कहता हूँ क्या हुआ फैज़ मियाँ...क्यों उखड़े हुए हो...कुछ नहीं यार...बस जी भर गया...रिहाना है जो कि प्यार तो करती है लेकिन कबूल नहीं करती...उसके पीछे 1 बरस बीत गया...अब दिल नहीं लगता...जिंदगी बोझ सी जान पड़ती है...मैं जानते हुए भी मुस्कुराते हुए कहता हूँ अच्छा तो उसका नाम रिहाना है...पर आज फैज़ मियाँ कुछ ज्यादा ही गंभीर जान पड़ते है...अच्छा ठीक है...तुझे पूरा यकीन है कि वो तुझ से प्यार करती है...हाँ उसकी आँखों में साफ़ झलकता है...कभी सामने पड़ जाती है तो ऐसे कतराती है जैसे महबूबा हो...मैं कहता हूँ...अच्छा मियाँ तो बात यहाँ तक पहुँच चुकी है...आँखें भी पढ़ी जाने लगी...यार खामखाँ की बातें ना करो, कुछ उपाय बताओ क्या करूँ...मैं उसके हाथ से सिगरेट लेकर धुंआ छोड़ता हूँ...और सोचने की मुद्रा में...ह्म्म्म्म सोचना पड़ेगा...तो तुझे पूरा यकीन है कि वो तुझ से प्यार करती है...हाँ भाई जान हाँ....

यार 'आदि' कुछ आईडिया सोच...कुछ कर यार...अच्छा ठीक है फिल्मों वाले आईडिया का उल्टा करते हैं...क्या मतलब...कुछ लड़कों को गुंडा बनने के लिए तैयार कर ले...क्या मतलब है बे तेरा...अरे उनसे ये कहना कि वो रिहाना के सामने आकर तेरी मार लगायें...अबे क्या बक रहा है...देख सीधा सा मतलब है अगर वो तुझे पिटता देखेगी तो उसका दिल जरूर पसीजेगा...और तेरे पास जरूर आएगी...चाहे तेरे घायल होने के बाद ही क्यों ना आये...

अबे आईडिया पूरा फ़िल्मी है...अरे फैज़ मियाँ आजमा कर तो देखो...कभी कभी फ़िल्मी आईडिया भी काम कर जाते हैं...यार कहीं बेइज्जती ना हो जाये 'आदि'...अबे प्यार पाने के लिए ये सब ना सोचो...और वैसे भी कौन सी तुझे इज्जत कंधे पर टांग कर घूमना है जो कोई ले लेगा...चल ठीक है देखते हैं इस आईडिया को भी...

पैसे की कोई कमी ना थी फैज़ मियाँ के पास...उनके अब्बा हजूर पुराने रईश थे...तो अपने ही जान पहचान के लड़के से 8-10 लोंडों का इंतजाम उन्हें खिला पिला कर कर लिया...अब बारी थी उस सुबह की जब इस कहानी को अंजाम देना था...मैं और फैज़ मियाँ, खान साहब की दुकान पर चाय की चुस्कियां ले रहे थे...तभी 7-8 लड़को का झुंड आया और दूसरी तरफ से रिहाना और उसकी सहेलियों आ रही थीं...उन लड़कों ने आव देखा ना ताव और आकर फैज़ मियाँ का कोलर पकड़ कर उठा लिया...यही है और फैज़ मियाँ को पीटने लगे...पहले दो चार थप्पड़ पड़ने तक तो मैं खामोश रहा...और उसे अपने किये गए प्लान का हिस्सा समझ रहा था...लेकिन वो लड़की जो फैज़ मियाँ को 'स्टूपिड' कहती थी वो मुस्कुरा रही थी और उन लड़कों में से 1 लड़का उस लड़की से बात कर रहा था...हालांकि रिहाना का हाल बहुत बुरा था...उस से ये सब देखा नहीं जा रहा था...मैं समझ गया कि पासा उल्टा पड़ गया है...मैं भागते हुए फैज़ मियाँ को बचाने को दौड़ा...वो अपने साथ हॉकी लेकर आये थे...उन्होंने हॉकी से फैज़ मियाँ की पिटाई शुरू कर दी...मेरे बीच बचाव करते हुए उन्होंने मुझे भी धुनना शुरू कर दिया

काफी पिटाई करने के बाद वो फैज़ मियाँ को डराने के लिए अपने साथ लाये चाकू को हाथ में लेकर धमकाने के उद्देश्य से कहने लगे साले फिर कभी छेड़ेगा लड़कियों को...मैं उसकी तरफ दौड़ा...ये सब क्या है...उसने डराने के लिए चाकू चलाया...और इस आपाधापी में चाकू मेरी जांघ पर लग गया...वो लड़के सब डर कर भागने लगे...फैज़ मेरी तरफ लपका...मेरी टांग से खून बहने लगा...रिहाना भी दौड़ती हुई आई...फैज़ चीख चीख कर कहने लगा भागते कहाँ हो...छोडूंगा नहीं तुम सबको...उसने मुझे उठाकर कंधे पर डाला...ऑटो वाले को जल्दी से बुलाकर उसमें बिठा अस्पाल ले जाने लगा...रिहाना, फैज़ और मेरी तरफ देख रही थी...उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे...फैज़ के मुंह से रिहाना के लिए निकला मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा

अस्पताल ले जाकर मुझे टाँके लगाये गए...शायद में बेहोश हो गया था...जब होश आया तो खुद को अस्पताल के कमरे के बैड पर पाया...फैज़ कुर्सी पर बैठा हुआ था...फैज़ ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा यार मुझे माफ़ कर दे ये सब मेरे चक्कर में हो गया...मैं मुस्कुरा दिया...तभी वो लड़के वहां पहुँच गए जो असल में फैज़ ने ये सब नाटक करने के लिए बुलाये थे लेकिन उनके पहुँचने से पहले वो उस लड़की के बुलाये हुए भाई बंधू वहाँ पहुँच गए...लड़कों ने कहा कि यार फैज़ जब हम आधा घंटे बाद वहां पहुंचे तो हमे पता चला कि ये सब हुआ है...फैज़ चुप रहा...फैज़ की आँखें गीली थी...मैंने कहा कि कोई नहीं अब जो हो गया सो हो गया...कुछ देर बाद वो लड़के चले गए...तभी रिहाना उस कमरे में आई...डरती हुई..सहमी सी...फैज़ उस पर चीख पड़ा...क्यों आई हो यहाँ...यही देखने कि जिंदा है या मर गया...वो रोने लगी...मुझे कुछ नहीं पता इस सबके बारे में...ओह तुम्हें नहीं पता...तो ये गुंडे कहाँ से आ गए...अरे वो उस बेवकूफ की कारिस्तानी है...मुझे तो कुछ पता भी नहीं था...चली जाओ यहाँ से...मुझे अपनी शक्ल भी नहीं दिखाना...

वो मेरे पलंग पर बैठ गयी...मैंने मुस्कुराते हुए रिहाना को देखा...अपने साथ लाये फल रिहाना ने मेज पर रख दिए...आई ऍम सॉरी...ये सब मेरी वजह से हो गया...फैज़ कमरे से बाहर चला गया...रिहाना ने पास ही रखा दूध का गिलास और दवा मुझे दी...रिहाना काफी देर तक बैठी रही और फिर कल आउंगी का कह कर चली गयी...1 रोज़ में फैज़ का मूड भी थोडा ठीक हो गया...

अगले रोज़ रिहाना आई और पिछले रोज़ की तरह ही दूध का गिलास उठा कर दवा खाने के लिए बोली...मैं बोला मैं नहीं खाऊंगा जब तक मुझे एक बात नहीं बताओगी आप...क्या...सच सच बताना आपको मेरी कसम है...हाँ ठीक है सच सच बताउंगी लेकिन पहले दवा तो खा लीजिये...मैंने कहाँ नहीं पहले बताओ...क्या आप हमारे फैज़ मियाँ से प्यार करती हैं...वो बस हल्का सा मुस्कुरा दी...कुछ बोली नहीं...मैंने मुस्कुराते हुए बोला क्या आप हमारी भाभी बनेंगी...फैज़ बोला क्या यार...मैंने हंसते हुए कहा...अरे यार जब गाडी यहाँ तक पहुँच ही गयी है तो बात पूरी कर ली जाए ना...और हम सब हंसने लगे...ठहाकों से पूरा कमरा गूंजने लगा...और मैं बोला भाई हमारे फैज़ मियाँ तो आप पर दिलो जान से मरते हैं....क्यों फैज़ मियाँ...अरे बोलो ना...हाँ...हाँ बोलो ना...और फिर पहली आवाज़ आई रिहाना की हाँ और उसके बाद फैज़ मियाँ की हाँ भाई हाँ....और इस तरह फैज़ मियाँ के इश्क की दास्ताँ शुरू हुई

Read more...

वो बसंत के दिन

>> 05 July 2009

वे बसंत से पूर्व के दिन थे । उन्हीं में से एक निखरा, उजला, गुनगुनी धूप का दिन याद हो आया । कई वृक्षों के मध्य खड़ा नीम लजा रहा था जैसे बड़ों के मध्य वस्त्रहीन बच्चे को कह दिया गया हो 'छी नंगे बच्चे'। एक गिलहरी अशोक की पत्तियों में लुका-छुपी में मग्न थी । आसमान में पतंगे लहराती, बलखाती नृत्य कर रही थीं । दूर छतों पर से डोर नाज़ुक हाथों में दिखाई पड़ जाती थी । बच्चे बारी-बारी से पतंग को मन-माफिक सैर करा रहे थे । उन छतों के परे अन्य छतों पर औरतें अभी भी स्वेटर के फंदों में उलझी हुई हँसी-ठिठोली कर रही थीं ।

मैं छत पर लेटा हूँ, नीले आकाश को ताकते हुए बार-बार मेरी आँखें मुंद जाती हैं । निद्रा जैसा कुछ महसूस नहीं होता, सुस्ता लेने के बाद उठ बैठता हूँ । किताब औंधे पड़ी है, उठा लेता हूँ । मन में ख्याल हो आया 'चलो अगला अध्याय पढ़ा जाये' । कुछ पढ़ा और फिर कोई अनचाहा ख्याल आ पहुँचा । दाँतों को कुरेदने लगता हूँ । मन नहीं भरा, नाखून चबा रहा हूँ । गिलहरी मुंडेर पर आकर कुछ चुंग रही है । मुझ से नज़र मिलने पर दौड़ गयी । पुनः अशोक की पत्तियों में लुप्त हो गयी ।

सहसा एक पत्ता झर कर किताब पर आ गिरा । निगाहें वृक्षों की ओर जा पहुँचीं । वापस किताब पर लौटते हुए निगाहें दस फलाँग दूर की छत पर उलझ जाती हैं । वो दाँतों को कुरेद रही है, फिर नाखून चबाने लगी । मैं प्रतिउत्तर में अपने नाखूनों को दाँतों के मध्य से स्वतंत्र करता हूँ । वो यह देख खिलखिला कर हँस देती है । मैं झेंप जाता हूँ । निगाहों को किताबों में छुपा लेता हूँ । मन चंचल हो उठता है । पुनः छत को निहारता हूँ । वो पुनः खिलखिला दी । बच्चों सी उज्जवल, मासूम हँसी । प्रथम और अंतिम निर्णय में यही निष्कर्ष निकलता है ।

मैं किताब उठाकर टहलने लगता हूँ । वो भी टहलने लगती है । उसे देखता हूँ, ओह हो अजीब आफत है । जो चाहे करे, मेरी बला से । फिर से उसे देखता हूँ, वो मुस्कुरा देती है । हवा चल दी है और उसमें उसके लम्बे बाल लहराने लगते हैं । उसने उन्हें खुला छोड़ रखा है । स्वतंत्र, बेफिक्र हो वे इधर से उधर उड़ सकते हैं । उसके गालों को छू सकते हैं । वो उन्हें हटा कर कानों के पीछे धकेल देती है । अबकी मैं मुस्कुरा देता हूँ । प्रतिउत्तर में वह लजा जाती है ।

आज आसमान में रंग ज्यादा खिल रहे हैं । हरे, लाल, पीले, नीले, गुलाबी रंगों की पतंगे ज्यादा हो गयी हैं । उत्साहित बच्चे दूर-दूर तक पेंच लड़ाने के लिये जाते हैं । जीत जाने पर, खिलखिला कर कह उठते हैं 'वो काटा' । नीम पर भी हरा रंग चढ़ने लगा है । किताबों में जी कम लग रहा है । निगाहें उसे खोज रही हैं । वो दिख गयी है । इशारे से उसे स्वंय का नाराज़ होना जताता हूँ । वो मुस्कुरा कर माफ़ी नामा भेज रही है । मैं निगाहें हटा कर किताब पर जमा लेता हूँ । केवल दो मिनट ही हुए हैं, दिल करता है उसे निहारूं, किन्तु ऐसा नहीं करता ।

छत पर कुछ गिरने की आवाज़ आयी है । निगाहें इधर-उधर कुछ तलाश करने लगती हैं । कोरे कागज़ के मध्य कुछ है । पत्थर निकाल कर बाहर करता हूँ । उसने लिख भेजा है 'अच्छा अब माफ़ भी कर दो ना' । साथ में एक स्माइल भी । मैं उसको देखता हूँ । वो मुस्कुरा रही है । मैं भी मुस्कुरा उठता हूँ ।

ये उसका पहला प्रेम पत्र था.....

Read more...
Related Posts with Thumbnails

  © Blogger template Simple n' Sweet by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP