वक़्त की हथेली पर फैलीं

>> 27 September 2009

वक़्त की हथेली पर फैलीं
तेरी मेरी खामोशियाँ

साँसों में घुलती सी जातीं
तेरी मेरी नजदीकियाँ

चुपके से दबे पाँव आकर
बाहों में लेती ये तन्हाइयां

बंद पलकों में समेटती
ख्वाबों में तेरी परछाइयां

सोचता हूँ कहीं ये वही
प्यारा सा इश्क तो नहीं

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कुछ एहसास जुदा से

>> 19 September 2009

वो करीब चौदह साल का रहा होगा...पढना उसे अच्छा लगता था...शायद हालातों ने उसे वक़्त से पहले कुछ ज्यादा ही समझदार बना दिया था...और उसे इस बात का भी एहसास था कि वक़्त से पहले समझदार होना कोई ज्यादा समझदारी का काम नहीं है...क्योंकि इंसान वक़्त से पहले समझदार तो हो जाता है लेकिन वक़्त से पहले उसके हाथ में वक़्त की बागडोर नहीं होती...उसके हाथ में ऐसा कुछ भी नहीं होता कि वो हालातों से लड़ सके...बस वो सब कुछ अपने सामने होते देख सकता है...और एक कोने में आँसू बहा के रह जाता है...शायद कोई उसका अपना उसके आंसू बहते हुए ना देख ले इसलिए वो खुद ही आँसू पौंछना सीख जाता है

जब रात को दिये की रौशनी में वह किताबों में आँखें गढाए पढ़ लिख कर कुछ बनने के ख्वाब देखता था...उसी समय रात को उसका बाप ड्यूटी से लौट कर उसकी माँ को मारता...कुछ समय रहते ही उसे पता चल चुका था कि उसका बाप उसकी माँ को क्यों मारता है...बाप के बहके क़दमों को रोकना उसके बस का नहीं था...माँ की तमाम कोशिशों का हश्र यही होता कि जब जब वो कुछ समझाने या अपने पति के बहके क़दमों को सही रास्ता दिखाने की कोशिश करती तब तब उसकी पिटाई होती...उसने बचपन में ही जान लिया था कि महिला सशक्तिकरण सिर्फ किताबों की बातें हैं अभी...टीवी में दिखने वाले कार्यक्रम सिर्फ एक दिखावा भर है...

वो बस अपने कमरे के एक कोने में सुबक सुबक कर रो लेता और फिर से अपनी किताबों में आँखें गढा लेता...जहां उसे ऐसा माहौल मिलना चाहिए था कि उसके व्यक्तित्व में निखार आता...उसके बौद्धिक विकास पर पूरा ध्यान दिया जाता...वही उसका उल्टा होता...बाप को कोई मतलब नहीं था कि उसका बच्चा क्या पढ़ रहा है और उसकी फीस कब भरनी है...किताबों की कहने पर वो अक्सर टाल जाता...एक उसकी माँ ही थी जिसने एक एक पैसा बचाकर उसकी किताबों का बंदोबस्त किया...ये भी एक अजब संयोग था कि जिसका बाप एक सरकारी नौकर हो उसे अक्सर किताबों के लिए माँ पर निर्भर रहना पड़ता...

ऐसे हालात जबकि घर में हमेशा कलह, मार पीट और बाप की मनमानी का दौर चलता...ऐसे में भी वह क्लास में प्रथम आने जैसा घोर अपराध करता था...उसके साथ ना जाने क्यों एक अजीब सी शक्ति रहती...कि चाहे जो भी हो जाए रो पीटकर, मार खाकर, बुरे से बुरे माहौल में भी उसे बस पढना है...उन दिनों जब वो दसवीं की कक्षा में था...बाप को अपने फिसले हुए पैरों के और ज्यादा फिसलने के बाद दूसरी शादी करने का शौक चर्रा गया...वो एक बहुत बुरा दौर था...एक तरफ जहां बाप घर में ठीक से तनख्वाह भी ना देता...माँ के साथ होने वाली मार पीट...किताबों की कमी को माँ के सहारे पूरा करना...और बाप का गन्दा रवैया...इन सबके साथ उसे दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं देनी थी.

एक माँ, एक बीवी क्या नहीं करती अपने घर को बचाने के लिए...पहले घर की इज्जत बचाने के लिए घर के अन्दर मार खाती रहती है...उफ्फ तक नहीं करती...वहीँ जब उसका पति उसके बच्चों और उसके खुद के पेट का ख्याल तक छोड़ देता है तब भी वो जैसे तैसे रूखे सूखे में गुजारा करती है...

वो इतना सब होने के बाद भगवान का सहारा लेती है...रात-दिन, सुबह-शाम कुछ नहीं छोड़ती जब वो भगवान को याद ना करती हो, पूजा पाठ नहीं करती हो, दुआ नहीं करती हो...तब ना वो हिन्दू रहती, न मुस्लिम, ना सिख और ना ईसाई...बस वो चाहती है कि उसका पति सही रास्ते पर आ जाये...उसकी आँखों से पर्दा उठ जाए...पूजा पाठ, ताबीज, लाल धागा और ना जाने क्या क्या...क्या नहीं करती वो इन सबके लिए...लेकिन पति पर तो शरीर की भूख सवार होती है...वो ना कुछ सोचता और ना समझता

इन सब हालातों में वो चौदह साल का लड़का जो वक़्त से पहले समझदार हो चला था...अकेला रोता है...अकेला रहना पसंद करने लगता है...कोई एक कोना ढूढता है...खुद रोता है और खुद ही आँसू पौंछ लेता है...कभी खुद से सवाल पूंछता है तो खुद ही जवाब देता है...किताबों की दुनिया में रहने लगता है और वो अकेला खुद का ही दोस्त होता है

इन सब में उस 14 साल के बच्चे का बचपन कहीं खो जाता है...क्योंकि वो वक़्त से पहले समझदार जो हो गया था...उसने खुद को ही अपना दोस्त जो बना लिया था...ना उसने कभी अपने बाप से चोकलेट के लिए कहा, ना फीस के लिए, ना किताबों के लिए...ना ही वो उम्मीद करता था कि उसका बाप कभी उसके स्कूल के फंक्शन में आएगा...वो कब अपने बाप को नापसंद करने लगा उसे याद ही नहीं...शायद जब उसका बचपन खो गया हो तब...या जब माँ की रात को सिसकियाँ सुनता हो तब...या हर पल माँ को डरा हुआ, सहमा हुआ पाता हो तब

उस दिन वो बहुत खुश था...क्योंकि माँ बहुत खुश थी...जब उसे पडोसी के अख़बार से पता चला कि उसका बेटा दसवीं में प्रथम आया है...माँ के होठों की मुस्कराहट देखकर उसे पहली बार एक सुखद एहसास हुआ...और इस बात का एहसास भी कि एक वही है जो हमेशा के लिए उसके होठों पर हंसी ला सकता है...

पता नहीं क्यों जब तब आज भी वो 14 साल का लड़का मेरे ख्वाबों में खडा हुआ दिखाई देता है...कुछ मुस्कुराता सा...एक रास्ते पर आगे चलता सा...एक जुदा एहसास लिए हुए उस लड़के को देखना मेरे लिए आज भी जुदा एहसास दे जाता है

कुछ एहसास हमेशा साथ क्यों रहते हैं...बिल्कुल दिल के करीब...उस 14 साल के लड़के जैसे

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बेहिसाब सी जिंदगी

>> 15 September 2009

कभी कभी इंसान इतना रोना क्यों चाहता है...कभी बेवजह तो कभी इतनी वजहें होती हैं कि उन्हें गिना भी नहीं जा सकता...या फिर हम उन्हें गिनना पसंद ही नहीं करते...बस रो भर लेना चाहते हैं...पर रोना तब और ज्यादा आता है...जब हम रोना चाहते हैं तो कमबख्त ये आंसू भी साथ नहीं देते...निकलने का नाम ही नहीं लेते

जिसे 6 साल से आप दोस्त कहते हैं वो आपको उधार मांगने पर ये बोल दे कि उसे शोपिंग करनी है इसलिए पैसे नहीं दे सकता...तब कमबख्त ये दिल बहुत रोता है...बस ये आंसू ही नहीं निकलते...तब उस 6 साल पुराने दोस्त से बस यही कहते बनता है कि चल कोई नहीं...और मन करता है कि वहाँ से भागते हुए कहीं जाओ और जितना जी चाहे उतना रो दो

कहीं सुना था कि दोस्त की खातिर कई अपनी एफ.डी. भी तुड़वा देते थे...अच्छा लगता है उस दोस्त के लिए जिसके लिए किसी ने आज के हिसाब से ये कुर्बानी दी होगी...कुछ ऐसे भी दोस्त होते हैं जो बातों ही बातों में अपनी तनख्वाह 40 हज़ार बताते हैं...लेकिन ये सोच कर भी दिल डर जाता है कि इनसे चन्द पैसे मांग लेने पर इनका जवाब क्या होगा...शायद बहाना कहना बेहतर हो...

शायद रिश्तों और दोस्ती के हिसाब किताब में मैं पिछड़ गया सा लगता हूँ...वरना इस तेज़ दौड़ती भागती जिंदगी के इन पहलुओं पर गौर करके भी आँखें बंद कर लेने का मन ना करता

क्या इस बेहिसाब सी जिंदगी का फिर से एक बार हिसाब करना लाजमी होगा...फिर सोचते ही डर जाता हूँ...कहीं हिसाब करने पर हारा हुआ महसूस ना करूँ...कहीं ये अनगिनत रिश्ते बहुत पीछे ना छूट जाएँ...और फिर खाली हाथ से ये जिंदगी कैसी लगेगी...

फिर ये सोच कर तसल्ली कर लेता हूँ कि एक समय कुछ जुबानों से रात के 11 बजे ये भी सुना था कि "योर टाइम इज ओवर, अब तुम अपना ठिकाना कहीं और देख लो, अब बस और नहीं"...कमबख्त वो रात भुलाये नहीं भूलती...जब रात भर आसरे के लिए किसी और जगह पैर पसारने पड़े हों...फिर ये तो जिंदगी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा भर है

तब यही जान पड़ता है कि दोस्त तुम्हें अपनी शोपिंग मुबारक हो और तुम्हें अपनी बनियागीरी...क्योंकि और कुछ कहने लायक है भी तो नहीं...जिसे कहा जा सके...एहसास को तो बस महसूस ही किया जा सकता है...कहा नहीं

काश मेरे लिए इस बेहिसाब सी जिंदगी का हिसाब करना थोडा आसान होता...तब रिश्तों और दोस्तों की पकड़ यूँ इस कदर ढीली ना पड़ती जाती...

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वो गहरे तक इंसान था

>> 10 September 2009

हालाँकि वो सिविल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा धारी था लेकिन फिर भी उसे कई नौकरियों से निकाला जा चुका था और कईयों को वो छोड़ चुका था...और इन सब के पीछे वजह थी तो उसका गहरे तक इंसान होना. इस ज़माने में जहाँ लोग इंसानियत को बेचते खाते हैं और अगर किसी में इंसानियत होती भी है तो सतही तौर पर. ऐसे में उसका गहरे तक इंसान होना ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन था.

हालाँकि उसके घर में पैसों का ज्यादा अभाव नहीं था. पिताजी बैंक में अधिकारी थे और माँ अध्यापिका. फिर भी कहीं ना कहीं उसके माता पिता भी कभी कभी उसके लिए परेशान होते कि ना जाने इस लड़के का क्या होगा. अभी अभी उसकी नई नई नौकरी लगी है और उसके माता पिता अब ये सोच रहे हैं कि ना जाने कब तक करेगा. कहीं इसे भी ना छोड़ दे. जानते थे कि इसे झूट, धांधली, रिश्वतखोरी से सख्त नफरत है.

लड़के के लिए शादी का रिश्ता आया तो माँ बाप का खुश होना लाजमी था. उनको लड़की पसंद थी तो उन्होंने अपने बेटे सिद्धांत से शाम को इसका जिक्र किया. सिद्धांत को भी शादी करने में कोई आपत्ति नहीं थी और अपने माँ बाप की ख़ुशी में ही वो अपनी ख़ुशी समझता था. सिद्धांत ने लड़की वालों के घर जाकर लड़की देखने के लिए हामी भर दी.

सिद्धांत अपने माता-पिता के साथ अगले रोज़ लड़की देखने के लिए गया. लड़की वालों के यहाँ पहुंचे तो वहाँ बड़ी आव भगत हुई. आपस में जमाने भर की बातें हुईं. लड़की के पिताजी और मामा जी बार बार सिद्धांत से उसके डिपार्टमेन्ट के काम काज के बारे में पूँछ रहे थे.

उनका मकसद काम काज के बारे में जानने से नहीं था...उनका मतलब इस बात से था कि आखिर वहाँ ऊपरी कमाई का जरिया क्या है और वहाँ कितनी कमाई होती है. सिद्धांत ने सब कुछ भाँपते हुए पहले से ही सब कुछ साफ़ कर लेना जरूरी समझा. उसने कहा कि वह लड़की से अकेले में बात करना चाहता है. लड़की वालों ने भी हामी भर दी.

अब सिद्धांत और लड़की दोनों कमरे में अकेले थे. सिद्धांत ने कुछ अपने बारे में बताया और कुछ उसके बारे में जाना और उसके बाद कहा देखिए आप मुझे पसंद हैं लेकिन मैं पहले से ही सब कुछ साफ़ कर देना चाहता हूँ कि पहली बात तो यह कि मुझे दहेज़ नहीं चाहिए और मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि क्या आप 12 हज़ार रुपये में घर का खर्च चला लेंगी. क्योंकि अगर आपने और आपके घर वालों ने यह सपने बुन रखे हों कि मैं जिस जगह काम करता हूँ वहाँ ऊपरी कमाई के बहुत विकल्प हैं तो मैं आपको बता दूं कि आप गलत इंसान के बारे में सोच रहे हैं.

मेरे लिए मेरी नौकरी का मतलब वो 12 हज़ार रुपये ही हैं और इससे ज्यादा के बारे में सोचकर अगर आप शादी करती हैं तो ये आपकी भूल होगी. अगर आप यह सब जानते हुए मुझसे शादी करती हैं तो मैं आपसे वादा करता हूँ कि मैं आपको कभी दुखी नहीं रखूँगा और आप मेरे साथ खुश रहेंगी. इन सब बातों के हो जाने के बाद सिद्धांत अपने माता पिता के साथ कुछ समय बाद अपने घर को लौट आया.

उधर लड़की ने अपने घर वालों से सारी कहानी बता दी. लड़की वालों का फोन सिद्धांत के पिताजी को आया और उन्होंने काफी देर बात करने के बाद कहा कि हमारी लड़की और आपके लड़के की नहीं निभ पाएगी. अतः इस शादी का ना होना ही बेहतर है.

समय बीत गया. बात आई गयी हो गयी. दोनों एक ही शहर में रहने वाले लोग थे तो दोनों का एक दूसरे से सामना होना लाजमी है. एक रोज़ जब सिद्धांत बस से सफ़र कर रहा था तभी उसकी नज़र रोड के दूसरी तरफ गयी जहाँ कुछ लड़के एक लड़की को छेड़ रहे थे और लड़की के विद्रोह करने पर उन्होंने लड़की को चाकू मार दिया था. लड़की रोड पर पड़ी थी और चारों तरफ लोग खड़े तमाशा देख रहे थे. चन्द लोग कह रहे थे कि भाई इसको अस्पताल ले जाओ कोई. कुछ देख कर अफ़सोस जता रहे थे और आगे बढ़ते जा रहे थे.

सिद्धांत बस से जल्दी से उतर कर उस पार पहुंचा और करीब जाकर देखा तो उसे लड़की का चेहरा याद आ गया. उसने जल्दी से उसे उठाया और अस्पताल लेकर गया. लड़की रास्ते भर बेहोश रही. अस्पताल पहुँच कर उसका इलाज हुआ और आराम करने के बाद जब उसे होश आया तो सिद्धांत उसके सामने था. अब वो नींद से जाग चुकी थी. वो नींद जिसमें वो बचपन से थी और उसकी आँखों से आंसू छलक आये. तब तक उसके माता पिता भी वहाँ आ पहुंचे जिनको सिद्धांत ने खबर कर दी थी. अब उसे समझ आ चुका था कि किसी में इंसानियत का होने का मतलब ये नहीं कि वो इस दुनिया में आठवाँ अजूबा है. फर्क सिर्फ इतना है कि कोई सतही तौर पर इंसान होता है और कोई गहरे तक इंसान होता है. माँ बाप के आ जाने पर सिद्धांत वहाँ से चला आया. उसके माँ बाप ने सिद्धांत को धन्यवाद दिया और उनके भी आंसू निकल आये.

करीब 15 दिन बाद लड़की के माँ बाप सिद्धांत के घर आये और उन्होंने सिद्धांत से अपनी लड़की की शादी की इच्छा जताई. सिद्धांत वहीँ मौजूद था. सिद्धांत ने कहा कि मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन पहले आप अपनी लड़की से तो पूँछ लें. उन्होंने कहाँ कि बेटा अब हमें पता चल चुका है कि तुम सबसे अलग क्यों हो और उसने ही हमें यहाँ भेजा है. वो खुद ही तुमसे शादी करना चाहती है.

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रात जब ठहर जाए

>> 06 September 2009

रात जब ठहर जाए
और भोर का उजाला ना हो
सिसकियाँ ही सिसकियाँ हो
और ख़ुशी का सहारा ना हो
कुछ देर संभल जाना
कुछ देर ठहर जाना

मैंदान से भाग खड़े होना
जब तुम्हें सबसे लगे आसां
जब कुछ भी ना बचा हो
खाली तुम रह जाओ
एक आशा की किरण होगी
तुम उसको जला लेना

जब तुम चाहो मुस्कुराना
और दर्द भरी हो आहें
जब सफर हो बहुत लम्बा
और कदम भी लड़खड़ायें
मंजिल बस पास ही होगी
तुम एक कदम बढ़ा लेना

जब जीना हो मुश्किल
और कुछ भी न समझ आये
जब दर्द ही दर्द हो
और वो हद से बढ़ जाए
दिल में रखना एक आस
और उससे तुम लड़ जाना

रात जब ठहर जाए....

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जिंदगी के प्रति सकारात्मक सोच

>> 03 September 2009

वो एक मुश्किल दौर था...बिलकुल हरा देने वाला, थका देने वाला...उस रात मैं सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन पर खडा आने वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था...घर से खबर आई थी कि पिताजी हमें छोड़ कर जा चुके हैं...उस स्टेशन पर खडा मैं तमाम सवालों में उलझा था...कई विचारों को उधेड़ता बुनता रहा...अब ऐसा कुछ भी मेरे पास नहीं था कि जिससे मैं आगे की पढाई कर सकता...मेरे पास 100 रुपये भी पूरे नहीं थे...ट्रेन का किराया एक दोस्त से ले मैं घर के लिए चल दिया था...वो काली रात थी...बेहद काली...डराने वाली...नींद ना आने वाली...बिना पलकें झपकाए ट्रेन में बैठे वक़्त को गुजारने वाली...

अगली सुबह मैं अपने घर के उस कमरे में था...जहाँ 6 आँखें मेरी तरफ देख रही थी...कुछ तलाशती सी...कुछ चाहती सी...हाँ वो आँखें मेरी माँ, भाई और बहन की थीं...उस वक़्त मैं अपना पहला वाक्य क्या बोलूं ये भी समझ नहीं आ रहा था...और मेरे रो देने का मतलब था कि वहाँ आंसुओं का सैलाब लाना..."सब ठीक हो जायेगा, मैं हूँ ना " जाने ये शब्द कैसे मेरे मुंह से निकले थे...शायद जो जरूरी भी थे...एक राहत देते से ये शब्द...मुझे खुद भी नहीं पता था कि सब कैसे ठीक हो जाएगा लेकिन उस वक़्त मैं कहना चाहता था...उनके लिए आशा की एक किरण रखना चाहता था...और वो मैंने किया

घर पर 100 रुपये तक ना थे...जाने वाला वो शख्स हजारों का क़र्ज़ छोड़ गया था...कोई सगा सम्बन्धी ऐसा ना था जो आगे आकर कहे कि आज का खाना हमारे यहाँ खा लेना...या हम हैं ना कोई फिक्र करने की जरूरत नहीं...सब के सब बस हमें खा भर लेना चाहते थे...या सिर्फ परेशानियों को सुन पीठ पीछे हँस भर लेना चाहते...समस्याएं मुंह फाड़े खड़ी थीं

हर नया दिन तकलीफ और समस्या के साथ खडा होता था...लेकिन फिर भी मेरे दिल के किसी कोने में एक विश्वास जगा हुआ था कि सब ठीक हो जाएगा...मुझे भरोसा है कि मैं धीरे धीरे सब ठीक कर लूँगा...कैसे ये मुझे नहीं पता...पूर्णतः कब तक ये भी नहीं पता...लेकिन कर जरूर लूँगा...हाँ यही एक आत्मविश्वास था जिसने मेरा साथ दिया...उसी आत्मविश्वास ने मेरा हाथ थामा और मुझे आगे ले गया...सबसे पहले मैं अपनी अगली बची MCA की आखिरी साल को पूरी करने की सोचने लगा...उसके लिए मैं एक बैंक गया...कि शायद यहाँ से एजुकेशनल लोन मिल जाए...लेकिन स्थिति तब और ख़राब हो गयी जब बैंक मैनेजर ने लोन देने से मना कर दिया

वो एक मुश्किल दिन था और बुरा दौर...मुझे हर हाल में आने वाले एक महीने में अपनी फीस का बंदोबस्त करना था...नहीं तो बिना कोर्स किये आगे बढ़ना मुश्किल था...अब सोचना ये था कि फीस का बंदोबस्त आखिर किया कहाँ से जाए...रिश्तेदार और सगे सम्बन्धी सब के सब नाक भोहं सिकोड़ने लगे थे...हमसे दूर भागने लगे थे...मैंने निश्चय किया कि अपने पुराने मित्रों और अपने खुद के जानकारों से कुछ बात करता हूँ...उस बुरे वक़्त में मेरे कुछ अच्छे दोस्तों और जानकारों ने मेरी मदद की...मेरे कुछ MCA के सीनियर्स ने साथ दिया

लेकिन फिर भी इतने रुपए इकट्ठे न हो सके कि मैं वहाँ अपना पूरा साल गुजार सकूँ...लेकिन दिल में ना जाने क्यों एक आस थी...एक सकारात्मक विचार था...कि सब ठीक हो जाएगा...बस में अपने कॉलेज में उन कुछ रुपयों के साथ पहुँच गया...उन दिनों मुख्यमंत्री मायावती जी ने स्कोलरशिप के नाते फीस ना लेने का आदेश दिया था...वो मेरे लिए जीने का एक सहारा बना...पास के अपने पैसों से मैंने जैसे तैसे वह साल गुजारा...यह एक सकारात्मक सोच का ही नतीजा था कि सब धीरे धीरे ठीक होने लगा था

मैंने धीरे धीरे सीख लिया था कि समस्याओं को देख भाग खड़े होने से समस्याएं ख़त्म नहीं होती...सकारात्मक सोच हिम्मत देती है...सकारात्मक सोच जीतने के लिए साहस देती है...मैंने अपनी MCA पूरी करते हुए ये सीख लिया था कि भले ही जिंदगी में मेरा यह संघर्ष जारी रहे लेकिन सकारात्मक सोच हमें जीत के करीब ले जाती है...हिम्मत के साथ डटे रहने और संघर्ष करते रहने से जीत हासिल होती है

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ये कैसी ख्वाहिशें हैं जो पूरी नहीं होतीं

>> 01 September 2009

चन्द रोज़ पहले ही एक साथ का दोस्त यू.एस. की फ्लाईट पकड़ कर उड़ गया...एक दूजे वतन को जहाँ उसके सपनों का संसार उसे बुला रहा है या शायद अपनी चादर लम्बी करने गया हो...वो कहते हैं ना कि उतने ही पैर फैलाओ जितनी लम्बी चादर हो...शायद वो अपने पैरों से ज्यादा अपनी चादर लम्बी करना चाहता है...वरना रोटी की तो उसके लिए अपने वतन में भी कमी नहीं

सोचता हूँ कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बंदूकों के साये में अपनी छोटी सी चादर छोड़ कर सर्दी में-गर्मी में सीना तान कर खड़े हैं...कमाल है...फर्क सिर्फ पैरों का है...एक हैं जो अपने वतन की खातिर खड़े हैं...और एक अपने पैरों को यहाँ से उखाड़ दूजे वतन में खड़े होना चाहते हैं

शायद चमकती हुई सड़कें...साफ़ सुथरे चेहरे...भागती हुई गाडियाँ...और डॉलर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हों...तब वो एक पल के लिए भी नहीं सोचते कि मेरा मुल्क, मेरा देश, मेरा ये वतन...शांति का उन्नति का प्यार का चमन...हाँ टीवी में दिखाए जा रहे अपने वतन के बम विस्फोट पर इतना तो जरूर कहते होंगे...इंडिया इज नोट सेफ...वहाँ का तो आये दिन का यही लफड़ा है...वही मार पीट...वही नेतागीरी...वही टूटी रोड...वही बिजली की किल्लत...वही भीख मांगते लोग...पता नहीं इस देश का क्या होगा

अभी कुछ रोज़ पहले सुना था अमेरिका अपने खुद के देशवासियों को नौकरी देना चाहता है...उन्हें लगता है बाहर के लोग उनकी रोज़ी रोटी छीन रहे हैं...सुना है वीजा ख़तम होने पर वहाँ बसे भारतीयों को अब अपने वतन की याद आ रही है...वही देश जो उनकी नज़र में टूटा फूटा है...जहाँ गन्दी पॉलिटिक्स है...जहाँ टूटी सड़कें हैं...और ना जाने क्या क्या...जो कभी वो बोला करते थे...सभी कुछ तो उनकी नज़र में वही है...फिर भला अचानक से याद कैसे आ गयी

अभी कुछ महीने पहले ही तो पड़ोस में रहने वाले नेगी साहब के छोटे भाई...यू.एस. से बीवी बच्चों समेत वापस आ गए...सुना है कि उन्हें वहाँ रहते हुए पूरे 10 साल गुजर चुके थे...और उनके अनुसार वो वहाँ बैंक लोन पर घर और गाडी भी खरीद चुके थे...कमाल है...बड़ों से सुना था कि मुसीबत में अपने घर के ही काम आते हैं...चाहे भूखे ही सही...रोटी फिर भी देते हैं

चन्द रोज़ पहले ही तो टीवी पर ऑस्ट्रेलिया में हुए अच्छे नजारे देखने को मिले...वही चमचमाते लोग...वही चमचमाती सड़कें और भागती दौड़ती जिंदगी...पर भागते दौड़ते तो अपने ही नज़र आये...कमाल है दौड़ने के लिए यहाँ जमीन तो अपनी है...किसी से लड़कर भागते हुए अपने घर में तो घुस सकते हैं

अभी जुलाई में ही सुना कि मेरी ही दोस्त ने ऑस्ट्रेलिया जाने का अपना प्लान बदल दिया...वो कहते हैं ना कि हालात ठीक नहीं हैं...वरना डेट,वीजा और पासपोर्ट सभी तो तैयार थे...

ये कौन सी चमक है जो सब कुछ बदल देती है...जिंदगी...सभी रिश्ते-नाते, माँ-बाप सभी तो यहाँ छूट जाते हैं...फिर ऐसा क्या है जो वहाँ सुकून देता है...जो मुझे महसूस नहीं होता...और मेरे कई साथियों, कई देशवासियों को वो सुकून अपनी ओर खींचता है

बड़ी बड़ी इमारतें, लम्बी चौड़ी चमचमाती सड़कें...फास्ट लाइफ...डॉलर...नाईट लाइफ...हो सकता है यही सब हो जो वहाँ से इन्हें खींचता हो...वरना और ऐसा क्या है जो आकर्षित करता है...ऐसा कौन सा सुकून है जो माँ बाप से अलग रह कर मिलता है...जो अपने भाई-बहन और दोस्तों से जुदा रहने पर मिलता है...वरना मार पीट तो वहाँ भी है...जिसका सबूत हमें टीवी वाले दिखा ही चुके हैं...पता नहीं टीवी के पीछे और कितना सच है

पता नहीं पर मुझे ये सब सुकून नहीं देते...अरे जब मैं अपने माँ-बाप के पास ही न रह पाया...अपने भाई-बहन को उछलते-कूदते...लड़ते-झगड़ते ही ना देख पाया...अरे जिन डॉलर को मैं कमाने वहाँ गया...उन डॉलर से खरीदी माँ को शौल, बहन का सूट और भाई को बाइक चलाते ही ना देख पाया...बाप को सीना चौडा करके चलते ही ना देख पाया तो फिर उन डॉलर को कमाने का फायदा क्या...क्या फायदा जो इतनी दूरी पर अकेला रह...अपने किसी जिगरी दोस्त के पास रात गुजार पुरानी यादें ताजा करने का मन होने पर भी वैसा ना कर सकूँ...ये ना कह सकूँ यार तेरी बहुत याद आती है...आज तो दो जाम हो जाएँ बहुत दिन हो गए...

क्या फायदा जब माँ को याद आये तो उनका हाथ तरस जाए मुझे छूने को, मेरे माथे को चूमने को...जब बहन राखी पर दूसरी बहनों को राखी बांधती देखे और उदास मन से भेजे उन डॉलर के गिफ्ट को देख रो पड़े...क्या फायदा जब भाई को उदासी में मेरे सीने से लग रोने का मन करे तब वो सीना उसके पास ना हो...क्या फायदा फक्र से बाप का चौडा होता सीना मेरे ना होने पर दिन ब दिन टूटता हौसला बनता जाए...क्या फायदा जब मैं दुखी और परेशान हो जाऊँ तो अपनी माँ के गले लग रो न सकूँ...उनके हाथ का निवाला ना खा सकूँ....

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