मेरा चाँद मुझे आया है नज़र

>> 30 June 2009

अगर मैं तुम्हें चाँद कहूँ तो तुम क्या कहोगी...तो मैं कहूँगी सब्जी ख़त्म हो गयी है...आज शाम को बाज़ार से ले आना...और अगर मैं कहूँ कि तुम चाँदनी हो तो...तो मैं कहूँगी ऑफिस जाना है देर हो रही है...अरे सुनो न...जाने दो लंच भी बनाना है...क्या बीवीयों की तरह काम करने चल देती हो....मैं उसका हाथ पकड़ कर खीचता हूँ...क्या सुबह सुबह रोमांटिक हो जाते हो आप...चलो नहा लो...मुझे कन्धों पर हाँथ रख कर बाथरूम तक धकेल कर आती है....आपको भी ऑफिस जाना है और मुझे भी....

चन्द मिनटों बाद मैं आवाज़ देता हूँ अरे सुनती हो रामखिलावन की अम्मा ज़रा तौलिया तो देना...वो तौलिया लाती है...और मुस्कुराती हुई बोलती है...ये क्या रामखिलावन की अम्मा...कौन है रामखिलावन...अरे अपना बच्चा अगर लड़का हुआ तो तुम रामखिलावन की अम्मा हो जाओगी ना...छी...रामखिलावन...क्यूँ क्या बुराई है रामखिलावन में...मैं हँसते हुए बोलता हूँ...रामखिलावन की अम्मा...और हँसते हुए तौलिया उसके सर पर फेंक देता हूँ...वो मेरा गला पकड़ लेती है...एक बार और बोला तो...मैं हँसता हूँ....वो भी मुस्कुराने लगती है...और ये रोजाना तौलिया मुझसे क्यूँ मांगते हो...लेकर जाया करो...ह्म्म्म्म्म...हर रोज़ की तरह करता हूँ...और वो हर रोज़ की तरह मुस्कुरा जाती है...और इस तरह सर हिलाती है कि ...जिसका मतलब है कि आप कभी नहीं सुधर सकते

वो ऑफिस के लिए तैयार होने के लिए बोल नहाने चली जाती है...उसके तैयार होने तक मैं अख़बार पढता रहता हूँ...वो बाहर निकलती है...अरे क्या आप अभी तक अखबार पढ़ रहे हैं....तैयार नहीं होना...ऑफिस नहीं जाना...ह्म्म्म्म्म...हाँ हो रहा हूँ ना....और शर्ट पहनता हूँ...फिर एक आवाज़ अरे जान देखो इसका बटन....क्या हुआ बटन को...टूट गया...वो जल्दी से सुई धागा लेकर आती है...बटन लगाने लगती है...ये क्या करते हो आप बटन का...हर दूसरे रोज़ टूट जाता है...मैं मुस्कुराता हूँ...अच्छी लग रही हो...और गहरी सांस लेता हूँ...वो दांत से धागा काटती है...ये हर दूसरे रोज़ की कहानी है...उसे भी पता है...कि मैं जानबूझकर बटन तोड़ देता हूँ...और उसके धागा काटने के बाद उसे किस करूँगा...उसके बाद वो मेरी बंद मुट्ठी से टूटा हुआ बटन लेकर वापस डिब्बे में रख देती है...कुछ आदतें जो बन जाती हैं...दिल में घर कर जाती हैं...उनमें से ही है ये एक आदत

हर रोज़ की तरह ही वो अब मुझे नाश्ता करा रही है...मेरा मनपसंद परांठा....हर रोज़ की तरह वो अब बोलेगी...आपका परांठा खाना बंद करना पड़ेगा...देखो टीवी में क्या दिखाते हैं...और हर रोज़ की तरह ही मैं मुस्कुरा जाता हूँ...तभी मोबाइल की घंटी बजती है....दोस्त से बातें...बातें करते करते...ऑफिस निकलने के लिए अब मैं कुछ खोजने लगता हूँ...कपडे पलटता हूँ...कभी सोफा...कभी बिस्तर....कभी कुछ तो कभी कुछ...क्या हुआ क्या खोज रहे हैं आप...अरे...और फिर खोजने लग जाता हूँ...अरे बताओ ना...काफी देर खोजता हूँ...अरे मोबाइल नहीं मिल रहा...वो मुस्कुरा जाती है...आप भी न इतने बड़े भुलक्कड़ है कि...कान से क्या लगा रखा है...अब मुस्कुराने की बारी मेरी है...अपनी इस बेवकूफी और भूलने की आदत पर मुझे हंसी आती है...

दिन गुजर गया है...शाम हो चली...ऑफिस से वापस लौटना है...उसकी कॉल आ रही है...कहाँ हैं आप...निकले कि नहीं...ह्म्म्म...बस निकल रहा हूँ...अच्छा आज याद है ना...क्या...उफ्फ फिर भूल गए...कल बोला था ना आज हम बाहर खाना खायेंगे...अरे हाँ...हाँ ठीक है...ठीक है आप वहाँ पहुँच जाना...ह्म्म्म्म...कुछ देर बाद हम आमने सामने होते हैं...अच्छा ये केंडल लाइट डिनर भी अच्छा तरीका है...वो मुस्कुराती है...वो कैसे...वो ऐसे की चाँद भी तो अँधेरे में ही दिखता है...और मेरा चाँद बहुत खूबसूरत हो जाता है अँधेरे में...वो खिलखिला उठती है...आप भी ना हमेशा

वापस घर आ मैं अपने लॉन में खडा हूँ...वो पीछे से आकर मुझे कहती है...अच्छा आँखें बंद करके पहचानो कि मेरे हाथ में क्या है...मैं गहरी सांस लेता हूँ...गाजर का हलवा...इसकी खुशबू में तुम्हारे हाथों का जादू बस जाता है...फिर हर बार की तरह वो मुझे अपने हाथों से हलवा खिलाती है...अरे रुको मैं कुछ भूल गया...अरे हाँ...एक मिनट रुको...मैं कमरे से वापस आकर उसे गुलाब देता हूँ...हर रोज़ की तरह मैं इसे लाना नहीं भूला...वो मेरे सीने से लग जाती है...आई लव यू की मीठी मीठी आवाज़ मेरे कानों में...मेरी साँसों में घुल रही है

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रूठ ना जाना तुमसे कहूँ तो

>> 28 June 2009

मेरी जिंदगी,

आज जब शाम हो चली है...बादलों ने अपना रुख मोड़ लिया है...चारों ओर काली घटाएं छा गयी हैं...और इस वीराने में तुम्हारी याद ने दस्तक दे दी है....हाँ एक यही तो है जो हरदम मेरे साथ रहती हैं...तुम्हारी यादें...तुम्हारी बातें...जो हँसाती भी है और आँखों में आंसू भी दे जाती हैं...तुम्हारा मुझसे रूठ कर चले जाना ठीक साँसों के बिना जी ना पाने जैसा है....जब तुम इतने दिनों बाद मुझसे रूठ कर गयी तो हर पल ही ये एहसास होता है कि तुम्हारे बिना जीना मुमकिन ही नहीं...

इस घर में कुछ भी ऐसा नहीं जिससे तुम्हारी याद ना जुडी हो...वो बाहर का लॉन, वो कॉफी का कप, वो सोफा, वो बिस्तर, रसोई...हर जगह, हर चीज़ पर तुम्हारा जैसे स्पर्श है...जो हर घडी तुम्हारी याद दिलाता है...बिस्तर की सिलवटें ठीक वैसे की वैसी ही हैं...मैंने उन्हें वैसा ही रख छोडा है...उनसे ढेर सारी यादें जो जुडी हैं...वो तुम्हारा मेरे सीने पर सिर रखकर ढेर सारी बातें करना...अपने अरमानों, अपने सपनो की बातें करना...मेरा तुम्हारे बालों को सहलाना...सब कुछ याद आता है...कहने को तो अभी चन्द रोज़ हुए हैं लेकिन ये एक युग बीतने जैसा है

जब रसोई में तुम मेरे लिए पूरे मन से कुछ पकाया करती थी और फिर पीछे से जाकर जब मैं तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता और तुम्हारा कहना कि देखो वो जल जायेगा....मैं तुम्हें आटा लगा दूँगी....वो लिए हुए ढेर सारे चुम्बन....वो तुम्हारा कोमल स्पर्श....तुम्हारे चले जाने पर सब रह रहकर याद आते हैं

बाहरी लॉन में बैठ तुम्हारे साथ कॉफी के घूट के साथ की वो ढेर सारी गपशप...वो तुम्हारा मुस्कुराना...बरसती हुई बूंदों तले तुम्हारा भीगना...मुझे अपने पास खींच लेना...दूर के सुहाने नजारों को दिखाना...सब जैसे मेरे ख्यालों में, यादों में बस गया है...और एक तुम हो जो दूर जाकर बैठी हो....हाँ गलती तो मेरी ही है.....जो तुम्हें जाने दिया ...

तुम रूठ कर गयी हो तब से एक पल के लिए भी मुझे राहत नहीं...न कॉफी के घूट हैं...न कोमल स्पर्श...ना वो ढेर सारी बातें...ना गपशप...ना वो अब नजारे अच्छे लगते....बिस्तर पर नीद नहीं आती...चहलकदमी करता हुआ रात गुजार देता हूँ....कमरे में सिगरेट की तमाम खाली डिब्बियां इकट्ठी हो चली हैं....तुम्हारी एक जगह ठीक से लगायी हुई किताबों को अब इधर उधर पटकने में मज़ा नहीं आता...इतने रोज़ से हर किताब पलट कर देख चूका हूँ किसी में जी नहीं लगता...

तुम हो कि बस चली गयी रूठकर मुझसे...जानती हो कि मुझे ठीक से मनाना भी नहीं आता...आज जब तुम मेरे पास नहीं हो तो लगता है कि कहीं ये साँसे भी साथ ना छोड़ जाएँ...बस एक ही बात जानी और समझी है कि तुम नहीं तो कुछ भी नहीं....तुम्हारे बिना जीना मुमकिन नहीं...

हाँ अब इस अधूरेपन के साथ जीना मुमकिन नहीं...इस एहसास के साथ कि तुम अपने इस चाहने वाले नादान, नासमझ, बुद्धू को माफ़ करोगी और जल्द से जल्द वापस आकर तुम्हारे अपने सब कुछ को संभालोगी...इस वीराने को ख़त्म करोगी और मुझे एक और मौका दोगी...ताकि मैं तुम्हें जता सकूं कि इस दिल में तुम्हारे लिए कितना प्यार है...मेरी जिंदगी में तुम क्या हो....मेरे लिए तुम क्या हो...मैं बाहर देख रहा हूँ बारिश की बूंदे अपने बाहरी लॉन की दीवार को भिगो रही हैं...और मेरे आँसुओं की बारिश इस ख़त को....

"तुम्हारा अपना...तुम बिन अधूरा"

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'इत्तेफाक' एक प्रेम कहानी (अन्तिम भाग)

>> 19 June 2009

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हमारी मुलाकातों और ढेर सारी बातों का ही ये असर था कि स्वेता मुझे आदित्य से 'आदि' कहने लगी थी....जो उसके मुंह से सुनने में उतना ही अच्छा लगता...जितना कि मुझे स्वेता अच्छी लगती....मुझे पता ही ना चला कि मुझे कब उससे प्यार हो गया...शायद पता भी ना चलता...लेकिन कहते हैं ना कि कभी कभी किस्मत हम पर मेहरबान होती है....

जैसा कि मैंने उससे कहा था कि हम लोग आने वाले रविवार को झील के पास घूमने चलेंगे....रविवार के दिन स्वेता को साथ ले मैं उस झील के किनारे पहुँच गया....झील की सुन्दरता और वहां का आकर्षण और पंक्षियों के चहचहाने और इधर से उधर होने की गूँज हमारे कानों में पड़ती तो दिल खुश हो जाता....काफी लोग वहां घूमने के लिए आये थे....कुछ पल के लिए वो खामोश रही....अपनी अँगुलियों से मिट्टी में आडी- तिरछी लकीरें खीचती रही....मैंने पूंछा क्या हुआ स्वेता....आज बहुत चुप चुप हो....क्या हुआ.....ह्म्म्म...कुछ नहीं....नहीं कोई बात तो है....अरे नहीं कुछ भी तो नहीं....अच्छा...या बताना नहीं चाहती....नहीं न कोई बात नहीं है....अच्छा चलो ठीक है....अच्छा बोलो आइसक्रीम खानी है....वो देखो वहाँ आइसक्रीम वाला है....उसने हाँ में गर्दन हिलाई....मैं आइसक्रीम लेकर आया....

जब आइसक्रीम ख़त्म कर ली तो उसकी खामोशी को तोड़ने के लिए मैंने पूँछा....अच्छा बताओ कि 'रसीदी टिकट' फिर पढ़ी....हाँ दोबारा पढ़ी थी....तो कैसी लगी.....सच कहूँ तो उसमें....इंसान के जज्बात हैं...जिसे इंसान महसूस करता है....हर किसी के बस का नहीं कि उस हद तक इंसान शब्दों में अपने एहसास को बयां कर सके....फिर इतना बोलने के बाद उसने चुप्पी साध ली....मैं झील की तरफ देख रहा था....वो काफी देर तक सिर्फ और सिर्फ मेरी ओर देखती रही...फिर कुछ देर सोचते हुए उसने मुझसे सवाल किया...अच्छा आदि आपको कभी किसी से इश्क हुआ है....ह्म्म्म्म....क्या कहा....मैंने उसकी ओर देखते हुए पूँछा....कुछ देर मेरी ओर देखने के बाद बोली ...कुछ नहीं....और धीमे से बोली बुद्धू....नहीं तुम कुछ पूंछ रही थी....कुछ नहीं....अरे नहीं बोलो...आपको कभी इश्क हुआ है.....मैं मुस्कुराया....पता नहीं...वैसे डर लगता है....वो बोली किससे....मैंने कहा इश्क से.....क्यों डर क्यों लगता है....क्योंकि इश्क करके ज्यादातर लोग मिल नहीं पाते...प्रेम कहानियाँ ज्यादातर अधूरी रह जाती हैं....वो मुस्कुरायी...बस इस लिए डरते हो....ह्म्म्म्म्म शायद....वैसे आज तक मुझे पता नहीं चला कि मुझे कभी इश्क जैसा कुछ हुआ हो....तुम्हें हुआ है क्या...मैंने पूँछा...मेरी आँखों में देखकर फिर दूसरी ओर देखने लगी वो....उसने कुछ जवाब नहीं दिया

फिर उसने पूँछा अच्छा वो वहाँ लोग कहाँ जा रहे हैं...बड़ी भीड़ है....मैंने कहा....इश्क के मारे हैं....क्या मतलब....अरे मतलब ये कि वहाँ पास में ही एक मंदिर है....और यहाँ के लोग कहते हैं कि अगर कोई सच्चे दिल से किसी को चाहता है और यहाँ आकर उसे मांगता है....तो उसकी मन्नत पूरी होती है....उसके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी चमक उठी...अच्छा वाकई....चलो हम भी घूमने चलते हैं वहाँ....मैंने कहा क्या करोगी जाकर....छोडो बैठो...सब फालतू की बातें हैं....अरे चलो ना मुझे मंदिर देखना है....मैंने कहा मैं तो नहीं जा रहा....वो बोली प्लीज प्लीज प्लीज....चलो ना....मैंने कहा ठीक है...चलते हैं...पर मैं सिर्फ तुम्हारी वजह से जा रहा हूँ....

वहाँ पहुँच वो मंदिर में पूरी श्रद्धा के साथ ध्यान मग्न हो गयी....पता नहीं मन ही मन क्या माँगा उसने....मैं तो बस खड़े खड़े उसे ही देखता रहा....वहाँ ना जाने कितने चाहने वाले आये थे...अपनी अपनी मन्नते लेकर....वहाँ पास ही बैठे कुछ भिक्षुओं को कुछ देने के लिए मुझसे बोली पर्स निकालो अपना...मैंने कहा क्यों...अरे निकालो ना....उसमें से उसने २०० रुपये निकाल कर और उनके फल खरीद कर सबमें बाँट दिए....मैंने कहा अब खुश...अब चलें...वो मुस्कुरायी...बोली नाराज़ हो क्या...मैं भी मुस्कुरा गया....फिर हम झील के किनारे पहुँचे....तो ना जाने कैसे मेरा पैर मुड गया...और मेरे पैर में मोच आ गयी.....उफ्फ दर्द के कारण बुरा हाल हो गया मेरा.....स्वेता ने मुझे संभाला...और मुझे रिक्शे में बिठा कर डॉक्टर के पास ले गयी...डॉक्टर ने कुछ दवा दी और फिर उसके बाद मैं स्वेता के कंधे का सहारा लेकर ही रिक्शे मैं उसके साथ बैठा...मुझे मेरे कमरे तक वो लेकर गयी....

कमरे की हालत देखकर वो दंग रह गयी....कपडे जो थे वो इधर के उधर....कमरे में सिगरेट के टुकड़े पड़े हुए थे....उसे ज़रा भी देर ना लगी ये जानने में कि मैं निहायत ही आलसी किस्म का इंसान हूँ...और जो अपना ख्याल नहीं रखता....मुझे बिस्तर पर लिटा वो बोली ये क्या हालत बना रखी है कमरे की...इसी तरह रहा जाता है क्या....क्या इसी तरह जिंदगी बिताओगे....मैं हँसा तो मेरा पैर हिल गया....और अचानक से दर्द हुआ....रहने दो हँसने की कोई जरूरत नहीं है.....और फिर उसने सारे कपडे एक एक करके मेरे देखते देखते धो डाले...मेरे मना करने पर भी वो ना मानी....कुछ ही देर में कमरे की हालत बदल गयी....वो कॉफी बनाकर मेरे लिए लायी...क्यों करते हो ये सब....जिंदगी से ज़रा भी लगाव नहीं....शादी क्यों नहीं कर लेते.....मैंने कहा क्या करूँगा शादी करके...ऐसा ही भला हूँ....और शादी करने के लिए भी लड़की की जरूरत होती है....कहाँ से लाऊं लड़की....क्यों कमी है क्या लड़कियों की...किसी को पसंद करते हो तो उससे कर लो....मैंने कहा....ये इश्क भी अजीब है....वो बोली या हो सकता है कोई तुम्हें पसंद करती हो....मैंने कहा इस सरफिरे को कौन पसंद करेगी....और मैंने फिर एक गलत सवाल पूंछ लिया....वैसे तुम कब शादी कर रही हो...बुलाओगी ना....बस शायद वही गलत हुआ....उसने कुछ ना बोला....उस रोज़ वो मेरे लिए खाना बना कर चली गयी....और अगले दो रोज़ तक भी स्वेता आती और ज्यादा बात ना करके खाना बनाकर और मुझे खिलाकर चली जाती...मेरी किसी बात का जवाब हाँ या ना में देती....

लेकिन उस रोज़ वो कुछ उदास थी....वो आई उसकी आँखों में कई सारे सवाल थे....मैं भी कुछ परेशान हो चला था....वो खाना बनाकर और मुझे वो किताब 'रसीदी टिकट' देकर कहने लगी मैं कुछ दिनों के लिए घर जा रही हूँ....पर क्या हुआ....कुछ नहीं...और इतना कह कर वो चली गयी....उसका जाना मुझे बहुत अजीब लगा....बिस्तर पर करवटें बदल मुझसे रहा ना गया...मैंने वो किताब पलटी...उसमें एक ख़त रख छोडा था उसने....

जिसे पढ़ा और पढता ही चला गया...उसके बाद मैं अपने आप को कोस रहा था...क्या किया उस बेचारी के साथ....उसने लिखा कि आदि क्या आपको किसी की मोहब्बत की पहचान नहीं....या एक लड़की क्या चाहती है...ये भी उस लड़की को ही बोलना पड़ेगा....घर वाले पूंछते रहते हैं कि शादी कर लो...कोई पसंद हो तो बता दो...क्या बता दूं .....मुझे वो पसंद है जो...इश्क को एक फालतू काम समझता है...जा रही हूँ....मुझे नहीं पता आगे क्या होगा.....

मैं जानता था कि उसके शहर को जाने वाली ट्रेन अभी 1 घंटे बाद ही है....मैं जिंदगी भर अपने आप को कोसना नहीं चाहता था....मैं बाहर को जैसे का तैसा निकल लिया....रहा सहा दर्द तो मालूम ही नहीं पड़ा....शायद अब कोई दर्द मुझे ना रोक पाता....रिक्शे में बैठ मैं स्टेशन पहुँचा....वो दूर एक बैंच पर बैठी थी...गुमसुम...चुपचुप...खामोश सी....कुछ सोचती सी....मैं उसके पास पहुँचा....वो ख़त हाथ में पकड़ उसके चेहरे की तरफ देखा..उसने मुझे एक नज़र देख...अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया....जब मैं दूसरी तरफ से उसे देखा तो फिर उसने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया....स्वेता.....अच्छा बाबा सॉरी....माफ़ कर दो.....मैं कौन होती हूँ.....सॉरी...सॉरी ...सॉरी....

अच्छा कान पकड़ता हूँ...मैं घुटनों के बल उसके सामने ही बैठ गया....और कान पकड़ लिए...सॉरी ...सॉरी...माफ़ कर दो ना प्लीज....मुझे क्या पाता था कि....क्या कि....वो बोली....यही कि तुम भी मुझसे प्यार कर सकती हो.....वो फिर दूसरी तरफ देखने लगी ....अच्छा बाबा सॉरी...कोई सवाल नहीं...बाप रे इतना गुस्सा.....उसने मेरी आँखों में देखा....और देखती रही....मैं बोला वैसे तो मुझे भी ना जाने क्यों बहुत दिनों से ऐसा महसूस हो रहा था...लेकिन...मतलब...लेकिन....मुझे डर लगता था...और सच कहूं तो मुझे ठीक से पता ही नहीं था प्यार कैसे होता है...वो इस बात पर हँस पड़ी...बुद्धू...अच्छा बोलो माफ़ किया ना.....ओके ठीक है बाबा....आई लव यू.....मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ....बहुत ज्यादा...ह्म्म्म हाँ सबसे ज्यादा.....वो मुस्कुराने लगी...बुद्धू...पागल....और ये क्या उन्हीं कपडों में चले आये.....मैंने खुद को देखा...क्यों बुरा लग रहा हूँ क्या....उसने सर हिलाया....और कुछ बुद्धू सा कुछ बोला.....

वो बोली अच्छा ठीक है आप कल मेरे घर आना...मैं पापा से आपको मिलाऊँगी....क्यों...किसलिए...आपको शादी नहीं करनी तो क्या...मेरे पापा को मेरी शादी करनी है....मैं मुस्कुरा गया....ओह....अच्छा ठीक है...उसने अपना पता लिखकर दिया.....ट्रेन ने आवाज़ दी....मैंने उसे ट्रेन में बिठाया....ट्रेन चलने को हुई....तभी वहाँ से एक फूल वाला गुजरा...मैंने एक गुलाब दौड़ते हुए स्वेता को पकडाया....और तेज़ आवाज़ में कहा आई लव यू.....उसने भी कहा आई लव यू ......

अगले रोज़ में एक अच्छे बच्चे की तरह उनके पिताजी के दरबार में हाज़िर हो गया....बैठने के कमरे में जहाँ एक ओर किताबें रखी हुई थीं....और दूजी ओर कुछ जीते हुए इनाम....कुछ चित्रकारी.....जिनसे पता चला कि स्वेता को इसका भी शौक है.....मैं खडा होकर किताबे देखने लगा....कुछ ही देर में स्वेता के पिताजी जिन्हें मैंने अंकल कहकर संबोधित किया का उस कमरे में प्रवेश हुआ.....

आंटी जी मिठाई, नमकीन, बिस्कुट और कॉफी लेकर आई....अंकल जी, आंटी जी और मैं काफी देर तक खामोश से रहे...फिर आंटी जी ने कहा लो बेटा....कुछ लो....मैंने थोडा सा झिझकते हुए कॉफी उठाई....पास ही वो किताब रखी हुई थी जिसे मैं देख रहा था.....तो आप पढने का शौक रखते हैं या यूँ ही.....स्वेता के पिताजी बोले....जी पढ़ लेता हूँ ...अच्छा लगता है पढना.....फिर इस तरह से बात शुरू हुई और काफी लम्बे समय तक किताबों में ही उलझी रही....आंटी जी बोली चैन लेने दोगे बच्चे को या बस यही सब....बस हँसी का माहौल बन गया....मैं भी मुस्कुरा गया....और अंततः अंकल जी बोले कि बेटा बाकी सब तो स्वेता ने आपके बारे में बहुत कुछ बता दिया है....और हमे ख़ुशी है कि उसने तुम्हें पसंद किया है....आंटी जी बोली बेटा तुम हमें पसंद हो....हमारी एक ही बेटी है.....बस गुस्सा थोडा होती है लेकिन दिल की बहुत अच्छी है....मैं मुस्कुरा गया.....हाँ सो तो है...मैंने कहा....तभी अन्दर से स्वेता की आवाज़ आई क्या कहा.....मैंने कहा कुछ नहीं .....मैंने तो कुछ कहा ही नहीं....और सब हँसने लगे...स्वेता भी हँसने लगी.....

दो महीने बाद हमारी शादी हो गयी.....पहली रात को जब मैं कमरे में दाखिल हुआ...तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर कहा अच्छा ये फ्रेंच किस क्या होती है....नाम कुछ सुना सुना सा लगता है.....वो मुस्कुरा गयी....बोली क्यों सिर्फ सुना ही है....हाँ सिर्फ सुना है....अच्छा बच्चू....जानती हूँ कितने बुद्धू हो....जाओ जाओ.....मैंने कहा सच्ची मुच्ची नहीं जानता....सिखाओ न .....वो मुस्कुरा गयी.....बुद्धू ...ऐसा कुछ बोला शायद उसने ....

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'इत्तेफाक' एक प्रेम कहानी (भाग-2)

>> 18 June 2009

पहला भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें 'इत्तेफाक' एक प्रेम कहानी
हम दोनों उस शहर के खासम खास रेस्टोरेंट में थे....खास इस वजह से कि वहाँ कॉफी अच्छी मिलती थी और शांति का एहसास होता....उस रोज़ बजने वाला मधुर संगीत एक अलग ही धुन छेड़ रहा था....वो मेरे सामने बैठी थी....'रसीदी टिकट' उसके पास ही थी....हमारे बीच एक खामोशी की दीवार खड़ी हो चली थी...उसे तोड़ते हुए मैंने पूँछा तो कैसी लगी आपको किताब....उसकी ओर से खामोशी टूटी...वो बोली...सच कहूँ तो मुझे बेहद प्यारी लगी ये किताब...एक एक शब्द से जैसे लगाव हो चला था....जैसे जैसे पढ़ती गयी वैसे वैसे में इसमें डूबती गयी....एक बार ख़त्म होने के बाद भी मन कर रहा था कि फिर एक बार पढूं....मैं मुस्कुराते हुए बोला तो पढ़ लेतीं आप....

ये इश्क भी अजीब होता है ना....इंसान को क्या का क्या बना देता है...उसने मेरी ओर देख कर बोला....जैसे शायद मेरी आँखों में झाँक कर पूंछ रही हो....कि आपको क्या लगता है....मैंने कॉफी का घूँट भरा जिसे दुकान पर काम करने वाला वो लड़का अभी अभी रख कर गया था....घूँट गले से उतर जाने के बाद मैं हल्का सा मुस्कुराया....पर कुछ बोला नहीं....वो कहने लगी....आप कम बोलते हैं शायद....नहीं तो...ऐसा तो कुछ नहीं है....मैंने इशारा करते हुए कहा...आप कॉफी पीजिये ठंडी हो रही है....

तो आप क्या पढ़ाती हैं....मेरा मतलब किस विषय की लेक्चरर हैं आप...कॉफी का दूसरा घूँट भरने के बाद मैंने उससे पूँछा....जी समाजशास्त्र....ह्म्म्म्म....बहुत खूब....अच्छा विषय है आपका....हाँ कह सकते हैं....वो बोली....और आपने क्या किया हुआ है....एम.एस.सी मैथ से...अरे वाह....वो बोली....फिर आप बैंक में क्या कर रहे हैं...शक्ल से तो आप पढने लिखने वाले लगते हैं....हमारी तरह लेक्चरर क्यों नहीं बन गए....मैं मुस्कुराया....जी वो हमारे बस का रोग नहीं है....अच्छा जी...तो बैंक की नौकरी में खुश हैं आप....खुश होने की वजह अभी तक मिली नहीं....मैं बोला ...जो करना चाहा उसका मौका नहीं मिला....और जो हुआ वो होता गया...बस आगे देखते हैं क्या होता है....आगे के लिए ऐसा कुछ सोचा नहीं

हमारी बातें थी उनके विषय बदलते जाते और हम कॉफी के घूट भरते जाते...बातों ही बातों में मुझे उसका नाम स्वेता और उसे मेरा नाम आदित्य पता चला....कुछ था जो मुझे उस से जोड़ रहा था....वरना एक भी पल ऐसा नहीं आया कि मुझे लगा हो कि अब मुझे चलना चाहिए...उस रोज़ 5-6 कॉफी हम लोगो ने ख़त्म की...जिसमें पता चला कि उसके पिताजी एक प्रोफेसर हैं और वो अपने माँ बाप की इकलौती संतान है....वो यहाँ मेरी ही तरह इस शहर में अकेली है....किताबों से उसे मेरी तरह ही लगाव है....पर फर्क है कि मैं बस किसी खोज में लगा हूँ...और उसे पूरी तरह पता है कि उसे कब क्या करना है....हाँ शायद उसे ये भी पता था कि उसे लेक्चरर बनना था....उसके अन्दर कहीं भी छल, कपट, झूट और मक्कारी जैसी कोई चीज़ मुझे दिखाई नहीं दी...जिसे में अक्सर दूसरे लोगों में देखता था....शायद यही वजह थी कि मैं लोगों से दूर भागता था

और उसकी बातों में मैं उससे वो किताब 'रसीदी टिकट' लेना ही भूल गया...बातों ही बातों में पता चला कि उसे फूलों से लगाव है, साहिर साहब के लिखे गीत पसंद हैं....उसे मंदिर जाने से ज्यादा अच्छा चर्च जाना लगता है...हिन्दू होते हुए भी उसकी ये बात मुझे थोडी अलग लगी...हालांकि मेरी और भगवान की बिलकुल नहीं बनती थी....और एक लम्बा अरसा बीत चुका था जब मैं आखिरी बार मंदिर गया था

काफी लम्बा समय बीत जाने के बाद उसने कहा कि अब उसे चलना चाहिए...हालांकि वो मेरी बातों से समझ चुकी थी कि भगवान में मेरी ज़रा भी दिलचस्पी नहीं है...फिर भी ना जाने क्यों उसने मुझे रविवार के दिन चर्च चलने के लिए बोला....मैं क्या कहता....मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराया....साफ़ तौर पर ना बोलने वाला इंसान था मैं....लेकिन मैंने उससे ना चाहते हुए भी हाँ बोल दी....आखिर और करता भी क्या....उस शहर में ऐसा था भी कौन जिसके साथ मैं समय बिताने वाला था....

घर लौट कर मैं अपने बिस्तर पर करवट बदल रहा था...आज उससे की हुई बातें दिमाग में चल रही थीं....ऐसा क्यों हो रहा था....शायद मुझे भी नहीं पता था....ऐसा नहीं था कि पहले कभी किसी लड़की से मैंने बात नहीं कि थी....पर इसमें ऐसा कुछ खास था....जो मुझे अपनी ओर खींचे जा रहा था....शायद ऐसा कुछ जिससे मुझे राहत मिलती हो....खैर जैसे तैसे मैं सुबह होने से पहले सोया....

दो दिन बाद रविवार था....मुझे ठीक याद था कि मुझे जाना है...जबकि मैं उस दिन ना जाने की सोच कर आया था....मैं चर्च के कुछ ही दूरी पर खडा था....समय था कि बहुत बड़ा लम्बा फासला सा तय करने जैसा लग रहा था....अपनी ऐसी हालत में सिगरेट पीने की आदत पर में काबू ना कर सका...पास ही से एक सिगरेट खरीद मैंने सिगरेट सुलगा ली....और उसके आने का इंतज़ार करने लगा....वो एक बहुत ही प्यारे सूट में आई...शायद आज मैंने उसे जी भर कर देखा....वो बहुत ही प्यारी लग रही थी....दूर उसे आते देख मैंने अपनी सिगरेट फेंक दी....वो पास आई और मुस्कुराते हुए बोली...आप सिगरेट पीते हैं....

मैंने कहा हाँ...कभी कभी पीता हूँ....उसने कुछ नहीं बोला...जबकि मैं सोच रहा था कि शायद ये भी दूसरी लड़कियों की तरह ऐसा कुछ बोलेगी कि छोड़ दो या बुरी बात है...पर उसने ऐसा कुछ नहीं बोला....उसने अपने बैग से पानी की बोतल निकाली और मुझे दी....मैंने मुंह में पानी डालकर गला साफ़ किया....वो मुझे अपने साथ चर्च के अन्दर ले गयी....ये पहली बार था जब मैं किसी चर्च में आया था....एकदम शांति....गिने चुने लोग....वो एक जगह बैठ गयी....मैं भी उसके पड़ोस में बैठ गया....

फिर मैं कभी सामने देखता...और कभी उसके चेहरे को...उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थी....उस पल वो मुझे बहुत मासूम और नेक इंसान लगी....यूँ लगा कि बहुत ही प्यारी आत्मा है...शायद उसने कुछ माँगा भी हो....पता नहीं क्या....लेकिन माँगा ही होगा....ज्यादातर लोग माँगने ही तो जाते हैं....यही सोच रहा था मैं....उसने कुछ रुपये वहाँ दान में दिए....इससे ये तो पता चला कि कम से कम उसने अपनी प्रार्थना में पैसे तो नहीं माँगे होंगे...वो बोली पता है...ये पैसे गरीब बच्चों के काम में आते हैं...उनकी पढाई, खाना, कपड़े वगैरह....मुझे उसकी बातों ने प्रभावित किया

अभी बस हम चर्च के बाहर पैदल चल ही रहे थे कि पास ही एक बच्चा सड़क पार कर रहा था कि एक गाडी अनियंत्रित होकर उसे टक्कर मारकर चली गयी....उधर अफरा तफरी मच गयी....मैंने बच्चे को गोद में उठाया....और रिक्शे में बैठ पास ही अस्पताल ले जाने लगा...स्वेता भी मेरे पीछे दूसरे रिक्शे पर आई...डॉक्टर को दिखाने पर....डॉक्टर ने उसकी पट्टी की और कुछ दवा लेने को बोल दिया.....उसकी दवा खरीद कर उस बच्चे को उसके घर पहुंचा दिया....उसके माँ बाप हमे बहुत रोकते रहे लेकिन देर ज्यादा हो जाने के कारण हमने फिर कभी आने का वादा किया

उस बच्चे के घर से वापस लौटते समय वो काफी देर खामोश रही....फिर बोलने लगी कि इस दुनिया में ज्यादातर लोग ऐसे क्यों होते हैं....जब उस बच्चे को चोट लगी तो सब बस खड़े देख रहे थे.....समझ नहीं आता कि लोग ऐसे क्यों होते हैं....मैंने उसे रिलेक्स होने के लिए बोला....कहा कि ये सब तो चलता रहता है....वो बोली नहीं आखिर क्यों हम इतने स्वार्थी हो जाते हैं....समझ नहीं आता....मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराया और कहा चलो कोई नहीं अब वो ठीक है....चिंता मत करो....मैंने उसे घर वापस जाने के लिए बोला....रिक्शे पर उसे बैठा कर मैं पैदल चलने को हुआ....वो बोली आदित्य आप अपना मोबाइल नंबर दे दीजिये....मुझसे नंबर लेने के बाद वो चली गयी....मैं उसके ओझल हो जाने तक उसे देखता रहा....मेरे घर पर पहुँचने पर एक मैसेज आया..."मुझे फक्र है कि आप जैसा इंसान मेरा दोस्त है"...उसके नीचे नाम लिखा था स्वेता....मैंने उसे बदले में मैसेज किया कि चलो अब आराम कर लो कल शाम को हम लोग मिलते हैं....

हम दोनों की मुलाकातों का एक लम्बा दौर चल निकला....हम दोनों आपस में एक दूसरे से बहुत घुल मिल गए थे....हम दोनों घंटो एक दूसरे के साथ बैठे बातें करते रहते.....वो बातें करते करते थकती ना थी...और मुझे उसको सुनते रहना अच्छा लगता....शायद अब हम दोस्ती के रिश्ते से आगे बढ़ने लगे थे....वो जब तब मेरे लिए कुछ न कुछ बना के भी लाती....फिर एक दिन मैंने कहा कि चलो इस रविवार को पास में ही एक सुन्दर सी झील है वहां घूमने चलेंगे....उसने कहा ठीक है

आगे जारी है

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'इत्तेफाक' एक प्रेम कहानी

>> 16 June 2009

ऐसा नहीं था कि जो हो रहा था मैं इन सब से बेखबर था....लेकिन शायद मैं अपने वजूद की तलाश में था....मैं खुद की तलाश में था....और इसी तलाश में कब उससे टकरा गया पता ही नहीं चला....ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि उसका और मेरा मिलना भी एक इत्तेफाक से हुआ.....ये इत्तेफाक भी बड़े अजीब होते हैं....कभी कभी जिंदगी के मायने ही बदल देते हैं

किताबों में डूबे रहना मेरा शौक भी था और सच कहूं तो मेरी कमजोरी कह लें या एकमात्र सहारा....या तो किताबें मुझे तलाशती या मैं किताबों को....इसी तलाश में मेरा एक दिन उसी जगह जाना हुआ जहाँ मैं अक्सर जाया करता....उस किताब वाले के पास जहाँ एक सी शक्लों वाले लोग अक्सर दिखाई देते...हाँ शायद पढ़ते पढ़ते सबकी शक्लें एक सी ही लगती मुझे....या उन सब ने एक सी किताबे पढ़ पढ़ कर एक सी शक्लें कर ली थीं...

उस रोज़ मैं बस वहाँ खड़ा उस किताब वाले को बड़ी तसल्ली से देख रहा था...सच कहूं तो उसकी शक्ल को पहचानने की पूरी कोशिश कर रहा था....कि इसकी शक्ल में भी आखिर कोई बात होगी....आखिर इसने इतनी किताबे बैची हैं...हो सकता है कुछ पढ़ी भी हों....वैसे तो कई बार वो बता चुका था कि वो अपने समय का 8 वीं पास है....वो बोला बाबूजी कौनसी किताब दूँ....

कुछ सोचकर गया नहीं सो कुछ बोलता....अंततः कई लोगों से सुन रखा था 'रसीदी टिकट' के बारे में....पर कभी मौका नहीं मिला उसे पढने का....या सच कहूँ कभी मन नहीं किया....और कभी किया भी तो वो किताब दुकान पर मौजूद ना होने की वजह से पढ़ी नहीं....मैंने उसे बोला कि 'रसीदी टिकट' मिलेगी क्या....वो हल्का सा मुस्कुराया और बोला हा साहब...सिर्फ आखिरी पीस ही बचा है....आपकी किस्मत अच्छी है....मैंने किताब हाथ में ली...और पर्स से पैसे निकाल उसे दिए....तभी एक आवाज़ आई जिसकी फरमाइश भी रसीदी टिकट थी....लड़की की आवाज़ थी....जो मेरे नजदीक ही खड़ी थी....अरे नहीं मैडम आखिरी ही थी जो अभी अभी इन साहब ने खरीद ली...वो लड़की मुझे देखती है....

पर मुझ से कुछ बोलती नहीं...कब तक आ जायेगी दोबारा....जी यही कोई हफ्ते दस दिन में आ जायेगी....इतना लेट....जल्दी नहीं आ सकती....मैडम हफ्ते दस दिन में ही मेरा किताबे लेने जाना हो पायेगा....मैं उनकी बातें सुन रहा था.....और मेरा आज भी उस किताब को ऐसा पढने का कोई ख़ास मन ना था....मैंने कहा आप ले लीजिये इसे....आप पढ़ लीजिये...वैसे भी मेरा अभी मन नहीं....मैं बाद में पढ़ लूँगा....वो थोडी खुश सी हुई....वो अपने पर्स से पैसे निकालने लगी...अरे क्या कर रही हैं आप...पैसे रहने दीजिए...जब आप पढ़ लें तो इन बाबा को किताब दे जाना मैं इन से ले लूँगा...

पक्का आपको अभी नहीं पढ़नी....कहीं आप मेरी वजह से तो नहीं ऐसा कर रहे....मैं मुस्कुराया....मैंने कहा रख लीजिये...उसने किताब अपने हाथ में ले ली....मैं फुटपाथ पर पैदल चलने लगा....वो भी ना जाने क्यों पैदल ही चलने लगी...वो चाहती तो रिक्शा कर सकती थी....मैं तो ऐसा ही था...पैदल चलना मेरा शौक ही हुआ करता था....

वो साथ चलते हुए बोली थैंक यू.....मैं मुस्कुरा दिया....मैंने कहा पढ़ लीजिये अच्छी लगे तो बताना...मैं भी पढ़ लूँगा....वो भी हल्का सा मुस्कुरा दी....तो क्या आप इधर रोज़ आते हैं....हाँ आप कह सकती हैं....जब भी मन बेचैन सा होता है चला आता हूँ.....हाँ वो पहले भी मैंने एक बार आपको यहाँ देखा है....अच्छा.....वो बोली लगता है आप किताबों का बहुत शौक रखते हैं.....मैं बोला क्यों आप नहीं रखती...किसी और के लिए ले जा रही हैं.....वो हँस दी अरे नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है ....मैं उतना नहीं पढ़ती शायद जितना आप पढ़ते हों....

अच्छा क्या करते हैं आप....ऐसा कुछ ख़ास नहीं पर फिर भी....एक बैंक में मुलाजिम हूँ....वो हँस दी...मुलाजिम....मैंने हँसते हुए पूँछा और आप....जी मैं कॉलेज में लेक्चरर हूँ....तभी शायद रास्ता ख़त्म सा हुआ....और मेन रोड आ गया....वो दोबारा शुक्रिया अदा करती हुई बोली....अच्छा ठीक है अब मैं चलती हूँ.....मैंने कहा ठीक है....

कुछ था जो होना था....शायद उस खुदा ने कुछ सोच रखा था....अभी तक मैं ये नहीं जान पाया था कि आखिर आज जो हुआ वो सिर्फ एक घटना थी या ऐसा इत्तेफ़ाक जो मेरा हाथ पकड़ कर कहीं ले जाना चाहता है....खैर जो भी था....मैं उस रोज़ समझ नहीं सका....करीब दो रोज़ बाद मेरा फिर उधर जाना हुआ....मैं पैदल ही चला जा रहा था उस फुटपाथ पर...उस से आज में फिर टकरा गया.....वो पीछे से रिक्शे पर आ रही थी....शायद उसकी मुझ पर नज़र पड़ी....उसने कहा अरे सुनिए....मैंने पीछे मुड़कर देखा....वो रिक्शे से उतरी....और मुस्कुराती हुई मेरे पास आई...बोली अरे ये तो बहुत अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल गए....मैं आपकी ही किताब वापस करने जा रही थी.....मैंने कहा ख़त्म कर दी...वो बोली हाँ....मैं मुस्कुराया और बोला कि तुम तो हमारी भी उस्ताद निकली....वो हँस पड़ी....अरे मुझे किताब अच्छी लगी तो मैं खुद को रोक ना सकी.....मैंने कहा चलो अच्छी बात है

उसने कहा कि चलो कहीं बैठें....कॉफी पीते हैं....मैंने कहा हाँ यहीं पास में एक रेस्टोरेंट है....वो अच्छी कॉफी बनाता है....हम दोनों पैदल ही फुटपाथ को नापते हुए चल दिए....शायद उसके साथ चलना मुझे अच्छा लग रहा था....कुछ ही देर में रेस्टोरेंट आ गया.....

आगे जारी है
आगे की कहानी के लिंक यह हैं:
दूसरा भाग
अंतिम भाग

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इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते

>> 14 June 2009

"ये आदतें भी बड़ी अजीब होती हैं । ये भूलना भी तो एक आदत है और हाँ याद रखना भी । खासकर जब आप याद रखना चाहो तो भूल जाते हो" कॉफी के नन्हे नन्हे घूँट लेता हुआ मैं मुस्कुराते हुए बोला ।

वो मेरी आँखों में निहारते हुए बोली "अच्छा वो कैसे ?" कॉफी के कप को उस लॉन की दीवार पर रखते हुए मैं बोला "ह्म्म्म्म्...जैसे मैं याद रखने की कोशिश करता हूँ कि तुम्हारी आँखें मुझे कुछ याद दिलाना चाहती हैं लेकिन मैं भूल जाता हूँ ।"

-अच्छा उठो, यहाँ आओ देखो ।
-"क्यों?" वो लॉन में कुर्सी पर बैठी हुई बोली ।
-अरे आओ ना ।
-"अच्छा ठीक है, लो आ गयी" मेरे पास आते हुए उसने कहा ।

-मैं हाथ से इशारा करते हुए बोलता हूँ "वो देखो दूर पहाडी के मोड़ को देख रही हो" ।
-हाँ, देख रही हूँ ।
-कितनी खूबसूरत जगह है, है ना ।
-हाँ, लेकिन....
-लेकिन क्या ?
-अरे बुद्धू, उस मोड़ का इस बात से क्या मतलब ?
-मतलब तो है । देखो, मैं वहाँ बैठे हुए, हर आने जाने वाले जोड़े को देख रहा हूँ और याद करने की कोशिश कर रहा हूँ कि इनमें से पिछली साल भी हमें कौन कौन यहाँ मिला था ।

-अच्छा तो कुछ याद आया ?
-ह्म्म्म्म्म...हाँ, मैं क्या सोच रहा था कि....
-"क्या ? क्या सोच रहे थे आप" वो मुस्कुराती है । मेरी आँखों में शरारत देखती है । हाँ-हाँ बोलिए क्या सोच रहे थे आप ?
-ये मोड़ बड़ा प्यारा है ना । ये बारिश की हल्की फुहार । ये रोमांटिक मौसम । ये प्रेमी, ये प्यार करने वाले, ये चाहने वाले । उस मोड़ पर कितनी बार बैठते हैं ।
-ह्म्म्म्म्म....सो तो है ।

-मैं उसके गले में बाहें डाल कर बोलता हूँ "अच्छा तुम्हें नहीं लगता कि वहाँ अपना एक छोटा सा, नन्हा मुन्हा सा रेस्टोरेंट हो । जहाँ हॉट एंड कोल्ड कॉफी मिले । वे वहीँ, खुले में, नन्ही-नन्ही पड़ती हुई फुहारों के नीचे बैठे हुए, उस रूमानियत को महसूस करते हुए, कॉफी के घूँट भरे और हाँ फूलों की दूकान भी....
-वो क्यों ?
-अरे वो इस लिए कि गुलाब लेने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ेगा न ।


-तुम भी ना, पता नहीं क्या क्या सोचते रहते हो
-नहीं सच्ची-मुच्ची । काश कि ऐसा हो । यहाँ इन पहाडों के बीच इस पड़ती हुई बारिश, बहती हुई ठंडी-ठंडी हवा, उफ्फ...हूहूहू...कपकपाने वाली सर्दी और दो प्रेमी लोग बाँहों में बाहें डाले घूमते हुए, एक दूसरे से इजहारे मोहब्बत करते हुए । शादी के 2 साल बाद, 5 साल बाद, 50 साल बाद भी आयें....आते रहें
-वो हंसने लगती है "अच्छा मिस्टर रोमियो, खयाली बातें बनाना छोडो ।

-सच में ऐसा हो, तो कितना अच्छा हो
-अच्छा तो हमारे बच्चे क्या करेंगे ?
-क्या करेंगे....पढेंगे लिखेंगे और क्या ।
-रहने दो तुम्हारे होते हुए तो पढ़ लिए ।
-क्यों मेरे होते हुए क्यों नहीं पढेंगे ?
-और नहीं तो क्या, तुम बस ऐसी ही बातें करते रहोगे ।
-अरे नहीं में बिलकुल सख्त डैडी बनूँगा ।
-जाओ जाओ बन गए सख्त डैडी ।
-अच्छा कोई नहीं, तुम हो ना, तुम तो ठीक से पढाओगी उन्हें ।
-हाँ बस सब में ही करुँगी ना । तुम खुद कुछ मत करना ।
-अरे मैं करूँगा ना, तुम्हें और बच्चों को ढेर सारा प्यार करूँगा और हाँ कॉफी बनाकर भी पिलाऊंगा । और हम उस मोड़ पर भी जाया करेंगे....

उस मोड़ पर खुद भी उस बारिश, वो हल्की-हल्की रूमानियत भरी ठंडी-ठंडी हवा, उस खुले आसमान के तले रोजाना बैठा करेंगे, कॉफी पियेंगे ।
-जाओ जाओ, रहने दो मिस्टर रोमांटिक
-अच्छा सुनो
-ह्म्म्म्म....बोलो
-मुझे कुछ याद आया
-क्या ?

मैं उसके कानों में रूमानियत भरे अंदाज़ में कहता हूँ "आई लव यू" । वो खुश हो जाती है । फिर उसके गले में बाहें डाले हुए बोलता हूँ "अच्छा चलो, उस मोड़ पर कुछ देर बैठ कर आयें"
-नहीं बारिश हो रही है । अभी अभी तो वापस आये थे ।
-अरे एक बार और
-नहीं
-अरे हाँ
-ह्म्म्म्म....
-अरे हाँ हाँ

वो हंसने लगती है । फिर हम उस मोड़ पर ठंडी ठंडी हवा और पड़ती हुई बारिश की फुहारों के तले बैठे हुए हैं.....

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आओ सुनाऊँ प्यार की एक कहानी

>> 12 June 2009

तुम कहती थी कि तारों के टूटने पर विश पूरी होती है चाहे जो भी माँगो....सब मिलता है....या फिर वो जब तुम पलक का कोई बाल टूटने पर अपनी बंद मुट्ठी के ऊपर रख उसे अपनी आँख बंद करके उड़ाती...तो सच एक पल तो मेरा दिल भी यही दुआ माँगता कि काश ये सब बातें सच हों...बिलकुल तुम्हारे होने की तरह....ठीक मेरे सामने बैठे हुए मुस्कुराने की तरह...मुझे चाहने की तरह.....मुझे मँगाने की तरह...काश कि इन दुआओं में असर हो...काश कि तारे के टूटने पर विश पूरी होती हो...काश कि ये पलक का बाल कुछ जादू चला जाये ....

याद है कि एक बार अपनी आँखें बंद कर तुमने जब वो पलक का बाल उड़ाया था...और आँखें खोलने पर तुम्हारी आँखें गीली हो गयी थी...और तुम मेरे सीने से लिपट कहने लगी थी....कि मेरे बिना तुम्हारी जिंदगी कैसी होगी...तुम मेरे बिना जिंदगी के बारे में सोच भी नहीं सकती...और तुम मुझे किसी और के साथ अपनी जिंदगी गुजारते हुए नहीं देख सकती...कभी नहीं....कभी भी नहीं....सच बहुत मुश्किल हो गया था तुम्हें चुप करना....

इन बीते हुए लम्हों को छलांग लगा पार कर एक बार फिर से वही सब जीने को मन करता है....दिल करता है कि यूँ ही तुम्हारे करीब एक शाम गुजारूँ....बिलकुल करीब....जिनकी खुशबू आज भी मेरी साँसों में बसी हुई है....वो जो मुस्कराहट जो चेहरे पर खिला करती थी.....उस मुस्कराहट को बंद मुट्ठी में कर तुमसे मांग लेने को दिल करता है....सच एक बार फिर से तुम्हारे सीने से लिपट जी भर कर रोने को दिल करता है....तुमसे कहने को दिल करता है कि....तुम नहीं तो कुछ भी नहीं....तुम्हारे बिना जिंदगी वीरान है....ये चोकलेट, आइसक्रीम, वो ख़त, वो तुम्हारी दी किताबें, वो गुलाब की पंखुडियाँ, वो वादे....वो शामें....वो मुलाकातें जब तब मुझे तुम्हारी याद दिलाती हैं.....कहना चाहता हूँ कि जिंदगी तुम्हारे साथ गुजारूं....कहना चाहता हूँ कि ये जिंदगी तुम्हारे बिना कुछ नहीं...कुछ भी तो नहीं


फासले जो थे
तेरे मेरे दरमियाँ
उन फासलों को
मिटाया था तुमने

अल्फाज़ जो कह ना पाए
अपने दिलों की दास्ताँ

उन अल्फाजों को प्यार करना
सिखाया था तुमने

मांगी थी हर दुआ तुमने
मेरी खातिर

इतनी दुआओं के बाद भी
दर्द ही हिस्से
आया अपने


ये एहसास भी अजीब है....पाने का एहसास.....खोने का एहसास....ख़ुशी का एहसास....और ये कभी न ख़त्म होने वाले दिल के दर्द का एहसास
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खुदा का घर

>> 06 June 2009

मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज़ चारों और प्रतिध्वनि कर रही थी....साथ ही साथ शंखनाद अपने जोरों पर था....आखिर हो भी क्यों ना...सोमवार के दिन मंदिर में सबसे ज्यादा श्रद्धालु आते थे....शहर के सबसे पौश इलाके में बना ये मंदिर सबकी श्रद्धा का केंद्र था....हर दिन हजारों का चढावा चढ़ता है...और सोमवार के दिन की तो बात ही ख़ास थी....अच्छे खासे रईश आते थे....और खूब पैसा चढाते....

मंदिर के ठीक बाहर मुख्य द्वार पर भिखारियों की अच्छी खासी भीड़ लगती थी....सब इसी आस में आते कि रईशों के दिल पसीज गए तो...आज का पेट भर जायेगा....उन्हीं के बीच एक 60 साल का बूढा लगता 80 साल का था ..जो हर समय वहाँ दिखता था ...चाहे दिन हो या रात ...चाहे आंधी आये या तूफ़ान....उसे वहीँ पाया जाता....सभी लोग उसे पहचान गए थे...पिछले कई सालों से वो यहीं दिखता था....कुछ मांगता नहीं....लेकिन लोग खुद ब खुद उसे जरूर कुछ न कुछ देकर जाते....अमीरों का मानना था कि इस बूढे को कुछ देने पर खुद का भला ही होता है...ये मान्यता सी बन गयी थी...

मंदिर से बाहर निकलते एक सज्जन ने चाय वाले की दुकान पर बैठ एक चाय का आर्डर दिया....फिर चाय की चुस्कियों के साथ मुंह से निकला बड़े ही भले से हैं ये बूढे बाबा....ना कुछ बोलते, ना मांगते....जो और जितना मिल जाए....खा पी लेते हैं....चाय वाला मुस्कुराया....जो करीब 50 की उम्र पार कर चुका होगा....बोला कि बेचारा क्या किसी से कुछ बोलेगा....जिसका सब कुछ ख़त्म हो गया हो वो क्या किसी से बोलेगा...और बोलकर मिलेगा भी क्या उसे...एक वक़्त वो खूब बोला ...लेकिन मिला क्या उसे....आज जिस हालत में है...देख ही रहे हो आप....

मतलब मैं कुछ समझा नहीं...चाय पीते हुए वो सज्जन बोले...साहब अब क्या बोलना और क्या बताना...जिस मंदिर से आप अभी बाहर निकल रहे हो....वो किसी रोज़ इस बूढे का घर हुआ करता था....ये पूरी जमीन इसी की थी....बीवी गुज़र चुकी थी....एक बेटी थी उसकी शादी कर दी थी...उसके ससुराल वालों ने दहेज़ में ये जमीन मांगी थी....उसने हाँ कह दिया था....लेकिन कहते हैं ना कि कब किसकी बुरी नियत तुम पर हो....कोई क्या जाने....तब ये पूरा इलाका बस रहा था...सब अमीर लोगों ने यहाँ प्लाट लिए थे...सब गरीबों ने अपनी जमीन बेचीं थी....ये पूरा पौश इलाका बनता जा रहा था....उन्हीं दिनों ये बूढा अपने एक छोटे से कमरे में अकेला गुजर बसर करता था...पास में ही रहने वाले पंडित जी....जिन्होंने बगल वाला प्लाट खरीदा था...इनकी जमीन पर बुरी नज़र आ गयी....वो जानता था कि किसी की जमीन हड़पने का सबसे आसान उपाय क्या है....

चंद रोज़ के लिए बुड्ढा अपनी लड़की के पास क्या गया....पता नहीं रात ही रात उसने क्या किया कि अगले दिन आस पास सभी रहने वाले लोगों को इकठ्ठा करके बोला कि मुझे सपना आया है कि यहाँ माँ दुर्गा ने अपना वास बनाया है....मुझे यहाँ एक मूर्ती दिखाई दे रही थी....इस पर माँ दुर्गा की कृपा है...इसकी जमीन की खुदाई करके देखो.....कुछ लोगों ने फावडा लाकर खुदाई की तो वहाँ माँ दुर्गा की एक मूर्ती निकली....बस पंडित चिल्लाने लगा कि देखा मैंने कहा था न...अब अगर यहाँ मंदिर नहीं बना तो समझ लो अनर्थ हो जायेगा...खुद माँ ने ये कहा है ....अब सब तुम पर है ...क्या चाहते हो...सब लोगों ने कहा कि हाँ ठीक है यहाँ मंदिर ही बनेगा....बुड्ढा खूब रोया, चीखा, चिल्लाया...मगर उसकी एक ना सुनी ...उसे आश्वासन दिया गया कि उसे दूसरी जमीन खरीद कर दे दी जायेगी....पर देनी किसे थी....उधर उसकी लड़की के ससुराल वालों ने न जाने क्या किया कि....बताते हैं कि वो नदी में डूब गयी..कैसे डूबी..किसने डुबोया ....कोई नहीं जानता...केस चला....बुड्ढा वहाँ भी रोया, चीखा....मगर सुनता कौन है.....ये केस भी हारा....वो केस भी हारा.... बुड्ढा गम में पागल हो गया.....तब से ना कुछ बोलता है...ना सुनता है

और जिस मंदिर के पुरोहित के तुम पैर छू कर आ रहे हो वो पंडित वही है....उसका पूरा परिवार इस मंदिर से कमा खा रहा है....आज के समय में करोड़पति से कम नहीं....उसके लड़के इसी पैसों से दूसरे शहर में कारखाना खोले बैठे हैं.....तमाम अमीर हस्तियाँ आती हैं और ढेर सारा चंदा, चढावा चढा कर जाती हैं.....ऐश है....इस घर के तो अब ठाट हैं ....आखिर हो क्यूँ न खुदा का घर जो ठहरा....

तभी एक बच्ची कार से उतर चलती हुई अपनी मम्मी पापा के साथ आती है....एक केला उस बूढे को देती है....बेचारी नासमझी वाला सवाल करती है...बाबा आप भी क्या यहाँ मन्नत मँगाने आये हो.....तभी फिर से शंखनाद और घंटियों की आवाज़ आने लगती है

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वो इश्कबाजी और फिल्मों का दौर

>> 04 June 2009

एक ज़माना गुजर गया....हाँ लगता तो यूँ ही है ...जैसे कि जमाना गुजर गया.....पर दूजे ही पल लगने लगता है कि जैसे कल की ही तो बात हो....शायद जब हम नए नए किशोरावस्था को पार कर रहे थे ....और ठीक से जवान हुए भी थे या नहीं ...इसका कोई अंदाजा नहीं....पिक्चर देखने का शौक हमें बचपन से ही था....या अपने नाना जी के लफ्जों में कहें तो सिनेमा देखने का शौक ...और अंततः कहें तो फिल्म देखने का शौक....

हमें करीब करीब याद है कि किस तरह से बचपन में जब दूरदर्शन पर कभी बुधवार....तो कभी गुरूवार....या फिर कभी शुक्रवार....शनिवार या रविवार को फिल्म आती थी ...हाँ शायद दिन बदलते रहे लेकिन हमारा फिल्म देखने का शौक नहीं बदला....हम बड़े चाव से फिल्म देखा करते थे....और हमें ये भी याद है कि हर सप्ताह के अंत में अपने पूरे परिवार के साथ कोई न कोई फिल्म देखने सिनेमा हॉल भी जाते थे ...चूंकि पिताजी को सिनेमा हॉल का पास मिल जाता था....तो हम आनंदित हो उठते थे .....अच्छा लगता जब सभी साथ में जाते और फिल्म देखते....कलरफुल फिल्म.....बस फिर क्या है धीरे धीरे ये शौक पाल लिया हमने....

फिर जब बचपन बीता...और बीता हमारे स्कूल के दिनों का समय....हमने जब 12 वीं कक्षा प्रथम श्रेणी में पास की....तो उपहार स्वरुप जो पैसे मिले....तो हम पहली बार अपने दोस्तों के साथ अकेले फिल्म देखने गए....बस वो पहला कदम था....

पिताजी का स्थान्तरण हो जाने के कारण....हम लोग आगरा छोड़ अपने दादाजी के शहर फिरोजाबाद आ गए....और यहाँ से शुरू हुआ...एक नया दौर....नए दोस्त बने....कॉलेज जाना प्रारंभ किया....और जिन महोदय से हमारी नयी नयी दोस्ती शुरू हुई ....उन्हें पिक्चर देखने का हमसे ज्यादा शौक था....और वो ढेर सारी फिल्में देख चुके थे....

उनका पिक्चर देखने का शौक इसी बात से समझा जा सकता है कि दूरदर्शन पर आयी हुई ....पिछले 15 सालों का पूरा हिसाब किताब उन्होंने अपनी डायरी में बना रखा था....कि किस दिन कौन सी फिल्म आयी...कौन हीरो था और कौन हीरोइन....सबका नाम लिखा रहता था....खैर ये तो रही दूरदर्शन की बात....और जब से उन्होंने सिनेमा हॉल में फिल्म देखना चालू किया तब से हर साल की देखी हुई फिल्मों की पूरी लिस्ट थी ...कि कब, किस दिन, कितने रुपये में, किस सिनेमा हॉल में कौन सी फिल्म देखी ....इन सब का पूरा पूरा ब्यौरा था उनके पास...

भाग्यवश इनका दाखिला हमारे ही कॉलेज में हुआ....या यूँ कहें कि ये एक संयोग था कि इनका एक साल ख़राब हो जाने के कारण...इन्होने फिर हमारे साथ...हमारे ही कॉलेज में एडमिशन लिया....ये बात और थी कि इनका सेक्शन अलग था.....

उन दिनों हमे ढेर सारे ट्यूशन पढाने के ऑफर आये....तो 2-3 हज़ार रुपये की हमारी आमदनी हो जाती थी...जो हम कब किसपर ..कैसे उड़ा देते ....हमारे घर वाले ज्यादा हिसाब किताब ना पूँछते...उन दिनों बादशाह फिल्म आयी हुई थी....बस यूँ कह लीजिये कि वो पहला पायदान था हम दोनों का एक साथ फिल्म देखने का ...फिर चंद रोज़ बाद सरफरोश देखी ...फिर कोई और...और फिर कोई और....

आलम यह था कि हम इतने बिगड़ गए थे...या यूँ कह लें कि बौरा गए थे कि....एक हफ्ते में हमने 9 फिल्में देखीं.....मतलब साफ़ है कि किन्हीं दो दिनों में हमने एक साथ 2-2 फिल्में देख डाली.....होता भी अक्सर ऐसा था कि हम जय और वीरू की तरह सिक्का उछाल कर ये फैसला करते...कि आज फिल्म देखने जाना है या नहीं....और कौनसी क्लास बंक मारनी है .....और कमबख्त हमारा सिक्का भी हमे फिल्म देखने भेज देता...हमने खूब चेक किया हुआ था कि सिक्का दोनों तरफ से एक सा तो नहीं ....और फिर ये आलम भी हुआ कि सिक्का जाने से मना करता तो भी हम रुकते ना और फिल्म देखने जरूर जाते ...

ऐसा नहीं था कि हमारे कॉलेज में अच्छी और खूबसूरत कुडियां नहीं थीं...बहुत थी....और ऐसे हमें लड़कियों से नफरत भी नहीं थी....लड़कियों का चेहरा देखना हमें अच्छा लगता था....पर ना जाने क्यों उन दिनों फिल्म देखने का ऐसा भूत सवार हुआ कि ....किशोरावस्था को पार करते हुए हम....कोई इश्क न फरमा सके....यहाँ तक कि हमारे साथ के सभी लड़कों के इश्क चल निकले थे...और वो तोहफों में मिले कार्ड, इत्र, टी-शर्ट और ना जाने क्या क्या हमें दिखाया करते...हमारे सामने अपने मिले ख़त भी पढ़ा करते...मगर हम नामाकूल उन दिनों ऐसे फिल्मों में मशरूफ हुए कि....लड़कियों के सुन्दर चेहरे....वो प्यार के किस्से...वो रूठना और मनाना...वो चोरी छुपे एक दूसरे से किसी रेस्टोरेंट में मिलने जाना....ये सब भी हमें अपनी ओर ना खीच सके....और यहाँ तक कि हमारे लिए बीच बीच में किसी दोस्त की महबूबा की ओर से संदेशा आता कि उनकी फलां सहेली को हम अच्छे लगते हैं...लेकिन हमारे कान पर जूँ तक ना रेंगती....मतलब नोट इंट्रेस्टेड

एक साल हमने जम कर फिल्में देखीं...लेकिन खुदा की मर्ज़ी कि हमारे जो साथी थे...उनका दिल पढाई में ना लगने के कारण...उनका वो साल भी खराब हो गया....हालांकि हमने भी कोई ख़ास पढाई नहीं की थी...लेकिन हम ठीक ठाक नंबरों से पास हो गए....हमारे साथी ने वो कॉलेज छोड़ दिया ...वो दूसरे शहर को प्रस्थान कर गए....अब हम अकेले रह गए....कुछ अन्य मित्र बन गए...लेकिन उतनी फिल्में ना देख सके...फिर हम बीच बीच में अकेले फिल्म देख आते...और जब वो भाई साहब घर को वापस आते हफ्ते दो हफ्ते में तो फिर साथ साथ फिल्म देखने जाते....

वक़्त बीतता गया ...हमने खूब जम के फिल्में देखीं....हमारे साथ के दोस्तों ने जम के इश्क किया....साथ जीने मरने की कसमें खायीं....और फिर उस लड़की की शादी में दावत खाने का निमंत्रण भी पाया...अब घर वाले कहें कि जाओ जाके दावत खा आओ ...अब कैसे खा आयें ....कैसे कह दें कि वो उनकी महबूबा की शादी है...खैर ऐसे दो चार किस्से हुए.....और कोई इश्क अपनी सफलता की चोटी पर ना पहुँच सका ....हमने एक साल में 125 फिल्में देखने का रिकॉर्ड बनाया....हाँ इश्क वालों में एक इश्क सफल भी हुआ....लड़का लड़की अपने घर से भाग गए ...और उन्होंने भाग कर शादी कर ली ...आजकल उनकी बिटिया हमें ताऊ कहती है.....फिर हमारा दिल ज्यादा ख़ास उस शहर में लगा नहीं ....एम.सी.ए. में एडमिशन की परीक्षा दी और पास हो गए ...अच्छा सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज मिल गया ...और हम वहाँ चले गए

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डैड क्या मैं वाकई तुमसे नफरत करता हूँ ?

>> 02 June 2009

पता है डैड मैं सपने देखने से बहुत डरता हूँ । मैं डरता हूँ कि मुझे कोई सपना दिखाई न दे क्योंकि मैं जानता हूँ आज तक ऐसा कोई सपना नहीं आया, जिसमें मुझे तुम ना दिखाई दिए हो । इसीलिए मैं डरता हूँ कि कहीं मुझे कोई सपना ना आये । और हाँ एक कड़वा सच यह भी है कि ऐसा कोई दिन नहीं गया जब मुझे सपना ना आया हो ।

जब-जब तुम मुझे सपने में दिखाई देते हो तब-तब मैं दर्द से तड़प उठता हूँ । घुटन सी होने लगती है मुझे । एक ऐसा दर्द, जिसका इलाज़ ना तो मेरे पास है, ना ही किसी और के पास । पता है इन सपनों की वजह से मेरा दिमाग अजीब सा हो गया है । तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं वही लड़का हूँ, जिसने हाई स्कूल और इंटर में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था । और आज वही लड़का एमसीए के बाद भी अपने हक़ के लिए लड़ रहा है । उसे अपने दिमाग को संतुलित रखने की कोशिश करनी पड़ती है । एक साथ तमाम सोच चलती रहती हैं दिमाग में । घर का खर्च, अपना खर्च, बिगड़ते हालात, गुजरता हुआ समय, माँ का दुःख, भाई बहन की पढाई, बड़ी होती बहन की शादी, बिखरे हुए को इकठ्ठा करना, खुद की नौकरी, और ना जाने क्या क्या । हाँ वो लड़का जिसका दिमाग कभी इतना शार्प हुआ करता था । जो किसी भी चीज़ को कंटस्थ याद कर लिया करता था । शायद कंटस्थ याद की हुई आखिरी बात मेरे लिए वही है, कि तुम हमे छोड़ के चले गए ।

ये सपने मुझे रुलाते हैं । कभी सुनहरे सपने देखा करता था मैं । सफलता के, शीर्ष के, शक्ति के, अपने हुनर के । और आज सिर्फ और सिर्फ दुःख के सपने, अरमानों के टूटने के सपने देखा करता हूँ । वो सपने जिन्हें मैं कभी देखना नहीं चाहता । उन्हें बार बार लेकर मेरे सामने क्यों आ जाते हो ? क्यों मुझे याद दिलाते हो कि तुम बचपन में मुझे अपनी गोद में बिठा कर अंग्रेजी पढाया करते थे । क्यों याद दिलाते हो कि तुम्हारे आने की राह ताका करता था मैं ? क्यों याद दिलाते हो वही पुरानी बातें ? वो बातें जो दुःख देती हैं ।

मैं थक चुका हूँ ये सोच-सोच कर । फिर क्यों मुझे याद दिलाते हो, वही ट्रेन जिसे पकड़ कर आपधापी में मैं आया था । जब पता चला था कि तुम हमें छोड़ कर जा चुके हो । हाँ मुझे बर्दाश्त नहीं होती वो रात । जो मैंने बिना पलक बंद किये काटी थी । वो बंद कमरा, वो मेरे सामने रोते बिलखते भाई-बहन, रोती हुई माँ, वो माँ का टूटा हुआ हौसला ।

पता है, मेरा सबसे बड़ा दुःख क्या है ? कि मैं रोना चाहता हूँ पर रो नहीं सकता । पता नहीं वो आँसू कहाँ थमे बैठे हैं ? कमबख्त निकलने का नाम ही नहीं लेते । उस रोज़ से आज तक लाख बार मैंने रोने की पूरी कोशिश की लेकिन मैं हर बार असफल हुआ । आज तक वो आँसू कहीं छुपे हुए हैं । लोगों के सामने हँसता हूँ, मुस्कुराता हूँ लेकिन रोना नहीं आता । पर मैं रोना चाहता हूँ, चीख-चीख कर, फूट-फूट कर । बहा देना चाहता हूँ सारे आँसू लेकिन कमबख्त निकलते नहीं ।

तो फिर क्यों मेरे हर सपने में वही पुराने किस्से लेकर आ जाते हो ? क्यों मुझे वही सब दिखाते हो ? जो मैं नहीं देखना चाहता ? क्यों लुभाते हो वही बचपन ला लाकर मेरे सपनों में ? नहीं, हाँ नहीं देखना चाहता मैं वो सब । जिनसे मेरा दिल दुखता है । वही जो घटित हुआ 5 साल पहले । वो बार-बार मेरे सपनो में आता है । हर बार मेरे जख्म को हरा कर जाता है ।

पता है सबसे बड़ा दुःख क्या है डैड ? इंसान जिंदगी भर जिससे नफरत करते रहने की कोशिश करता रहे लेकिन वो कर ना सके । मैं भी वही इंसान हूँ । मैं जिंदगी भर तुमसे नफरत करता रहना चाहता हूँ, बहुत-बहुत, ढेर सारी नफरत । मैं पिछले 5 साल से एक रात भी ठीक से नहीं सो सका और उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ तुम हो । तुम्हारा हर सपना मुझे रुलाता है, दर्द दे जाता है । तुम हर बार सपने में आकर मुझे बहलाने की लाख कोशिश करते हो लेकिन मैं हर बार, हर रात, हर सपने के बाद दर्द से कराह उठता हूँ ।

हाँ मैं वही इंसान हूँ जो जिंदगी भर तुमसे हमेशा के लिए नफरत करते रहने की कोशिश करता रहेगा । जानता हूँ जो इस दुनिया में सबसे मुश्किल काम है ।

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