जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने ऐसे भी होते हैं सोचा ना था

>> 27 February 2009


वो शादी नहीं करना चाहती ... बस अब यूँ ही ऐसे ही जिये जाना चाहती है ...अब खुद पर उसे विश्वास नहीं कि वो कभी किसी को प्यार कर पायेगी...किसी के साथ जिंदगी गुजार पायेगी ...कोई नहीं कह सकता उसके दोस्तों में से कि ये वही लड़की है जो हमेशा चहचहाती थी, मुस्कुराती थी .....जिसे प्यार से इतना प्यार था कि उसके प्यार पर भी प्यार आता था
घर वाले समझा समझाकर अब उस घडी का इंतज़ार करते हैं ...जब उन्हें पहले जैसी उनकी बेटी मिल जायेगी

अब उसे प्यार से नफरत सी हो गयी है ....आखिर हो भी क्यों ना ...कभी उस दर्द को किसी ने रूह में महसूस नहीं किया .... जिसे वो दिलो जान से प्यार करती थी ...तीन साल जिसने हाँथों में हाँथ डाल कदम से कदम मिलाये ....वो इंसान जो हमेशा जताता था कि उस से बढ़कर उसके लिए कोई नहीं ...वो ऐसा करेगा ....कौन सोच सकता था

तीन साल तक साथ घूमा, कहता था वो इस दुनिया में सबसे ज्यादा उसे चाहता है ....अगर वो उसे न मिली होती तो वो कब का मर गया होता ....दिन भर फ़ोन पर बात, ऑफिस में बात, रेस्टोरेंट में बात, साथ फिल्म देखना, खाना पीना ...हर ख़ुशी हर गम में शामिल करना

और उस इंसान ने माता पिता की मर्ज़ी से , खुद की मर्ज़ी से ख़ुशी ख़ुशी किसी और के साथ शादी तय कर ली .....और उसे पता भी चला तो कब ...जिस दिन उस की शादी होनी थी ....वो भी किसी दोस्त ने फ़ोन करके बताया .... और वो उसे चाहने वाला उसे शादी होने से एक दिन पहले तक फ़ोन से बात करता रहा ....उसे एक पल के लिए भी महसूस नहीं होने दिया कि ऐसा कुछ हो रहा है ....उसने उसे बताने की जहमत तक नहीं उठाई .....

वो पल, वो घडी उसे भुलाये नहीं भूलती ...जिस पल उसे पता चला कि जो उसे तीन साल तक प्यार करता रहा ...तीन साल तक उसके मन पर छाया रहा ....उसने उसे खुद बताने तक की नहीं सोची .....और जब उसे फ़ोन किया तो यह कह कर काट दिया कि बाद में बात करता हूँ ...उसने मिन्नतें की कि वो बस एक बार मिलना चाहती है ...आखिर देखना चाहती है कि उसमे इतनी हिम्मत आई कहाँ से ...उसकी आँखों में झांकना चाहती है ...पर उस ने साफ़ इनकार कर दिया

सच में ऐसे में तो किसी का दिल क्या ...उसकी रूह तक छलनी छलनी हो जाये ....वो तो नेहा है जो अपनी लाश अपने कन्धों पर उठाये हुए है ....जीना चाहती है अपने माता पिता की खातिर ...कहती है अनिल अब तुम ही बताओ क्या मैं जिंदगी में किसी से प्यार कर सकूंगी .... क्या में किसी को जिंदगी में ख़ुशी दे सकूंगी .....
और मैं उसकी बेबस, रुआसू आँखों को देख रो दिया ...

एक बार फिर से एक पुरुष के ऐसे रवैये ने मेरे सर को झुकाने पर मजबूर कर दिया ..... ऐसे में क्या मैं नेहा को समझाता ...क्या उसे कहता .....उस पल मेरी भी रूह छलनी सी हो गयी .....
जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने ऐसे भी होते हैं सोचा न था .....किसी किसी की जिंदगी तो ऐसे पन्नो में ही सिमट कर रह जाती है

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तुम्हारे चले जाने पर फर्श पर पड़ी कैरम की गोटी और कोने में पड़ा लूडो भी रोयेगा

>> 26 February 2009

पता है भईया आज मेरी गुडिया मुझसे बात कर रही थी .....अच्छा , अरे वाह तुम्हारी गुडिया तुमसे बात भी करती है .....हाँ बात करती है ....अच्छा क्या कहती है तुम्हारी गुडिया ....मेरी गुडिया कहती है कि तुम्हारे भईया कितने अच्छे हैं ...तुम्हे टॉफी लाकर देते हैं ..अपनी बहन की इन मासूम सी बातों पर मैं मुस्कुरा देता ...अच्छा तो भाई को उल्लू बनाया जा रहा है ...सीधे बोलो न टॉफी चाहिए ...आ - आ मुंह पर हाँथ रखते हुए बोलती ....आपको भी कोई उल्लू बना सकता है क्या ...आप तो कितने अच्छे हैं ....अच्छा बाबा मैं शाम को टॉफी ले आऊंगा ....और मेरी प्यारी बहन मेरे गले में हाँथ डाल ख़ुशी से झूल जाती

और जब जब रक्षाबंधन या भैया दूज आता तब तब वो और ज्यादा खुश होती ....किसी की मजाल है कि दो भाईयों की इस बहन को कोई कुछ कह दे ....पूरा दिन सुबह से ही ख़ुशी ख़ुशी पूरे घर में चहल कदमी करती रहती ....मुझे अच्छी तरह याद है ...पापा से लिये हुए १० रुपये जब उसके हाथ में देता तो वो कितना खुश होती थी ....और पापा से अलग से कपडे मिलते सो अलग .....वो बहुत खुश होती कि ये उसका दिन है

और हम दोनों भाई पूरी कॉलोनी में अपनी बहन की बाँधी हुई राखी को सीना चौडा करके दिखाते थे .....और इस बात से खुश होते कि हमारी भी बहन है .... पास के ही रहने वाले बिट्टू को हम उस दिन उदास देखते थे .... बहन के होने पर हमें गर्व महसूस होता ....

वक़्त कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता ....पिछले छः साल घर से बाहर ही बिता दिये .. ...ठीक से उसकी शरारत , उसकी जिद , उसका भोलापन देख ही नहीं सका ....कब बड़ी हो गयी पता ही नहीं चला ...
आज भी चाहे जो हो जाये रक्षाबंधन और भैया दूज पर उसके सामने होता हूँ ....जानता हूँ न पहुँच सका तो रो रोकर बुरा हाल कर लेगी ...आखिर हम सबकी लाडली जो है

बचपन में पूँछा करती ...भईया टीचर बनना अच्छा है या डॉक्टर ...मैं कहता दोनों ...दोनों ही लोगों को कुछ ना कुछ देते हैं ....बोलती ...नहीं भईया मैं तो टीचर ही बनूँगी ...हाथ में छड़ी लेकर बच्चो को पढाया करुँगी ....मैं मुस्कुरा देता ...अच्छा ठीक है टीचर बन जाना ....

वो बचपन बीता ...कल का समय बदल कर आज का समय बन गया ... अब डरता हूँ खुद मैं ...कुछ साल बाद जब वो शादी कर चली जायेगी तब ना तो कोई जिद करेगा ...न उल्लू बनाकर अपनी बात पूरी कराएगा ...और ना ही बेझिझक अपने मन की बात कह देने वाली मेरे पास होगी ..तब हर वो जगह, वो कोना , वो कमरा ....वो आंगन ...वो बातें सब उसकी याद दिला दिला कर रुला जाया करेंगी . ....

और मैं कहीं किसी कोने में रो दिया करूँगा ...फिर फ़ोन पर बात कर दिल को हल्का कर लेने पर भी ...उसके फ़ोन रखते ही उसकी हर बात याद आ जाया करेगी .....
वो फर्श पर पड़ी कैरम की गोटी और लूडो पड़ा कहीं रोयेगा
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पिछला लेख : आओ जाने मोहब्बत में ऐसा भी होता है

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आओ जाने मोहब्बत में ऐसा भी होता है ( हास्य व्यंग्य)

>> 23 February 2009

' मोहब्बत ' नाम सामने आते ही दिमाग में ख़ुद ब ख़ुद कुछ चलने लगता है ..... या तो नकारात्मक या सकारात्मक .... जिन्होंने चोट खायी वो जल भुन जाते होंगे और जो इसमे पड़े हुए हैं ...उन्हें ये ऐसी लगती होगी जैसे कहावत है "गूंगे का गुण अर्थात गुण का स्वाद वो लेता है पर वो बता नही सकता कि इसमे क्या आनन्द है "

आओ चलो कुछ किस्सों से रूबरू होते हैं कि उन पर क्या गुजरी ....

वाक्य :

हमारे एक दोस्त हैं एक समय में उनका इश्क अपने चरम पर था ....मतलब मोहब्बत में वो एक कीर्तमान हासिल कर चुके थे ...बस ट्राफी नही मिली थी ..... कहते हैं कि लोग मोहब्बत में हर मुश्किल, हर हालात से लड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं (मैं नही कहता :) ....) ....अब हमारे इन दोस्त को अपनी महबूबा के जन्मदिन पर मिलने जाना था ...दूर दूसरे शहर .....वो प्रण कर चुके थे कि चाहे जो हो जाये वो महबूबा से मिलने जायेंगे ही ...दुनिया की कोई ताकत उन्हें नही रोक सकती.... उनके प्रण के आगे हमारी क्या बिसात ....

कुछ रुपयों की कमी पड़ रही थी ....तो उन्होंने हम से कुछ रुपये लिए ...वैसे हमसे साथ चलने को भी कहा लेकिन हमें अगले दिन कुछ जरूरी काम था ....इस कारण हम उनकी बारात में शामिल ना हो सके ....पता नही क्यों मगर उन्हें क्या सूझा ....वो अपने अन्य दो दोस्तों को साथ लेकर चल दिये...उनके दोस्तों ने पिछले कई महीनो से उन से अनुनय विनय किया था .... कि हमें भी भाभी से मिलना है ...अब भइया भी कैसे पीछे रहते ....वो अपने इन दो बारातियों को साथ लेकर जाने के लिए राजी हो गये

घर पर कुछ बहाना बना ....रात १२ -१ बजे के आस पास आगरा से उनका चलना तय हुआ ..... अब कहते हैं ना कि कभी कभी बारात ले जाना महंगा पड़ जाता है दूल्हे को ....खैर उनके दिल में ना जाने क्या ख्याल आया वो लोग ट्रक में लद लिये.....ट्रक वाले ने भी भल मंसायी दिखाई और अपने अन्य सामान के साथ इन्हे भी लाद लिया

अब रात का समय " सोचा ना था " कि ट्रक अँधा धुंध रफ़्तार से चलाकर उनके महबूबा के शहर में ला फेंकेगा ...वो भी इतनी जल्दी ....अब ट्रक वाले ने इन्हे ना जाने किस मोड़ पर छोड़ा ...रात को ३ बजे ...इन्हे वो रास्ता ना सूझे ...जिसकी इन्हे पहचान थी .... वो अपनी महबूबा की तरफ़ जाने वाली गली के उस मोड़ को भूल गये

"इस मोड़ से आते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते" गाना उन्होंने बखूबी सुन रखा था ...पर ये नही सुना था कि इश्क की ये गली आज कहाँ ले जायेगी .... वो अपने दो बारातियों को साथ ले पैदल चल दिये ...रात का पहर .... सुनसान राहें .... ना घोड़ा, ना बैंड बाजा .... अरे कोई नही कोई नही ..... मतलब न कोई रिक्शा , ना कोई ऑटो .....तो भाई उन्होंने निर्णय लिया कि चलो ये रात पैदल चल किसी पड़ाव पर जाकर गुजरेगी .....

कुछ दूर चलना हुआ था .....उनके एक बाराती के पेट में कुछ हलचल हुई .....उन्होंने आनन-फानन में तय कर डाला कि रोड के एक किनारे पर झाडियों का सहारा लेंगे .... बस चलते चलते करीब ४ बजे का समय हो आया होगा .... उन्होंने अपने पेट को हल्का करने का मूड बना डाला .... झाडियों में घुस गये .... करीब की झाडी के पास पहले से कोई और अपने पेट का वजन हल्का कर रहा था .... थोड़े समय पश्चात् इन्होने उनसे पूंछा कि पानी मिलेगा क्या ....

उससे पहले उस आदमी का इन पर ध्यान नही गया था ....इनका ये कहना हुआ था ...उन्होंने अपनी टॉर्च का परीक्षण इन पर कर डाला .... चेहरे पर रौशनी डालते हुए बोले ...कौन हो ...यहाँ क्या कर रहे हो ...ये नौजवान मजाक के लहजे में बोले ...इत्ती देर से जो आप कर रहे थे वही .... वो बोले ये पानी रखा है जल्दी से बाहर आओ ....

बाहर दूल्हा (मेरा मित्र ) और उनका एक बाराती रोड पर पहले से बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे .... वो आदमी बाहर रोड पर आया बोला ....कौन हो यहाँ क्या कर रहे हो ....अब दूल्हा ये कैसे कहे कि बारात चढाने आये हैं ....झूठ बोल दिया कि अपने एक रिश्तेदार के यहाँ पहली बार आये हैं ...दिल्ली बारात आई थी तो वहां से यहाँ आ गये ...पर रास्ता भटक गये .....उस आदमी ने शक की सुई घुमाई ....

तब तक पेट हल्का करके दूसरा बाराती भी आ गया ....अब तीनो दोस्त ...दूल्हा और उसके दो बाराती ....उस आदमी ने कहा पास ही चौकी है वहां चलो ..... इन तीनो का गला सूख गया .... पर हम लोग तो रिश्तेदारों के यहाँ आये थे ...आप हमारी तलाशी ले लो ... वो सब बाद में होता रहेगा ...जो कहना है साहब से कहना .....अब हरयाणा की पुलिस माल आता देख कहाँ किसी को ऐसे ही छोड़ने वाली है .....

मरता क्या नही करता ....अगर वहां से भागते तो आरोपी साबित होते ...बिना आरोप किए हुये.... तीनो चल दिये उस हवलदार के साथ .....जो बाद में पता चला चौकी जाकर कि ये हवलदार है ....अब तीनो क्या करते सच्चाई भी छुपानी है ...और पुलिस के हांथों से भी बचना है ...दूल्हे ने बाहर ही समझा दिया बारातियों को कि चाहे जो कुछ हो जाये मुंह नही खोलना...सच नही बताना कि लड़की से मिलने आये हैं ....

भाई कोतवाल साहब भूखे शेर की तरफ़ इन पर लपके ....सारी गर्मजोशी दिखाते हुए पूंछा कि कहाँ से आये हो ...क्या करते हो ...किसके यहाँ आये थे ...क्यों आये थे .... इतनी रात क्या कर रहे हो .... तीनो ने वही नापा तुला जवाब दिया ....हवालदार बोला ...साहब ये ऐसे नही बोलेंगे सच ...इन्हे अलग अलग ले जाकर गर्म करना पड़ेगा तभी मुंह खोलेंगे ....अब दूल्हा तो दूल्हा ...बाराती भी सकते में ...कहाँ फंसे ....दूल्हा सोचे कि ये मोहब्बत तो महँगी पड़ रही है ...बाराती सोचे कि ये अच्छी बारात आये ...भाभी के चक्कर में जेल की चक्की ना पीसनी पड़ जाये ....

तीनो को अलग अलग ले जाकर डांट डपट कर पूँछा गया ....तलाशी ली गई ...कोतवाल पहले ही समझ गया था कि ये शरीफ हैं ....पर उसे कमाई होती दिखाई दे रही थी ....लेकिन फिर भी उन तीनो की बस मार नही लगायी बाकी सब कुछ किया ....

ये सब होते होते सुबह के ५-६ बज चुके थे ...दूल्हे के एक दोस्त के रिश्तेदार इसी शहर में रहते थे .... उसका माथा ठनका ....सोचा अब उन्ही का सहारा है ...अब शायद वही बचा पाएंगे .....वो बाराती कोतवाल के पास गया ...बोला कि में अपने रिश्तेदार को यहाँ ले आता हूँ ...तब तो आप विश्वास करोगे .... कोतवाल पहले तो माना नही ..लेकिन फिर बोला ठीक है .... जाओ दो लोग जाओ और एक यहीं रहेगा ....जाओ लेकर आओ उन्हें .... वो बाराती उस दूल्हे को साथ ले अपने रिश्तेदार के यहाँ गया ...वहां भी सच तो बता नही सकते थे ...तो झूठ बोल दिया अपने रिश्ते में लगने वाले भाई से कि तीसरे लड़के के साथ उसकी होने वाली बीबी से मिलने आये थे ....


उनके भाई उनके साथ वहां चल दिये ...लेकिन ये बात उनके रिश्तेदार (बाराती के फूफा जी को) को भी पता चल गयी .... वो भी पीछे से वहां पहुँच गये .....वहां पहुँच ५-६ लप्पड़ उस लड़के में लगाये ..और उसके बाद उस दूल्हे के भी और उस दूसरे बाराती के भी .... लताडा सो अलग ...अब बात आई कोतवाल को समझाने की ..

लेकिन कोतवाल का पेट खाली था ...मुँह में पानी था .... आमदनी का सुबह सुबह जरिया दिखा .... वो बोले भाई इनका तो केस बनेगा .... रात को इस तरह घुमते पाये गये ....यहाँ के आस पास के सेक्टर की सुरक्षा का जिम्मा हमारा है ...कहीं कुछ हो जाता तो ....माथे तो हमारे मढ़ता ...... लाख समझाने पर भी कोतवाल ना माना ....बाहर आकर हवलदार से बात हुई .... हवलदार ने कहा ५ हज़ार रुपये लगेंगे .... तीनो के तब छूटेंगे .... रिश्तेदार मरते क्या ना करते .... बच्चो का सवाल ....पुलिस वालों को ४ हज़ार देकर मामला रफा दफा किया ....

बाद में दूल्हे की बाराती समेत बहुत छीछा लेथन हुई रिश्तेदार के घर जाकर ...तीनो सर झुकाए बस बातें सुन रहे थे ...और मन ही मन इस बारात जैसे दुस्वप्न पर अपने आंसू बहा रहे थे ...तीनो ने उन बुजुर्ग से माफ़ी मांगी ..वो ४ हज़ार रुपये वापस करने के लिये वादा कर ....वहां से वापस चल दिये ....उनके रिश्तेदार ने उस लड़के के घर पर फ़ोन कर सारी कहानी बताई .....राज खुला लेकिन झूठा ..तीनो अपनी जुबान बंद किये रहे ...दूल्हे को छोड़ बेचारा वो तीसरा लड़का बदनाम हुआ .... बाद में तीनो के घर मामला पहुँच गया ...लेकिन माफ़ी मँगाने पर जैसे तैसे मामला शांत हुआ ....ना तो दूल्हा मिल सका उस महबूबा से जन्म दिन पर और ना बाराती अपनी भाभी की सूरत देख पाये ...हाँ वो रात एक दुस्वपन की तरह उन्हें याद जरूर रहेगी .....

तो मोहब्बत में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है ...जाने अनजाने ख़ुद तो फंसते ही हैं दूसरों को भी साथ ले डूबते हैं ....
लेकिन फिर भी वो कहते हैं ना ... "इश्क आग का दरिया है और उसमे तैर के जाना है " ये वाली लाइन वो दूसरों से बोल ऐसे हुए किसी वाक्ये को भूल जाना चाहते हैं

पिछला लेख : माँ फिर से मुझे अपना नन्हा मुन्हा बना लो ना

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माँ फिर से मुझे अपना नन्हा मुन्हा बना लो ना

>> 20 February 2009

हाँ माँ कहने को तो मैं अभी - अभी लौटा हूँ घर से ...पर तुम्हारा प्यार भरा नर्म स्पर्श अभी भी महसूस करता हूँ .....और वो तुम्हारी आँखों से ओझल ना हो जाने तक ...तुम्हे मेरा देखते रहना ....जब चलता हूँ घर से .... तो लगता है रुक जाऊँ , थम जाऊँ .....यहीं ठहर जाऊँ .....


और वो मेरे मना करने पर भी तुम्हारा मेरे बैग में चुपके से परांठे रख देना ....फिर देर रात को बिस्तर पर करवट बदलते हुये ना जाने क्यों ...विश्वास हो जाता है ख़ुद ब ख़ुद कि माँ ने कुछ रखा होगा ...फिर यूँ ही बैग को उलट पुलट करने लगता हूँ मैं ..... किताबों के दरमियान उन परांठों को पाकर .....दिल भर आता है .....वो मुझे उस पल सबसे प्यारे लगने लगते हैं .....उन्हें खाकर एक पल फिर से लगने लगता है ....कि जैसे माँ यहीं कहीं हो मेरे पास ....और प्यार से मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ फिरा रही हो ....और लोरी सुना रही हो ....कब नीद के आगोश में चला जाता हूँ पता ही नही चलता

रात जब तुम ख्वाबों में आयीं तो लगा यूँ कि जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी हो ...एक बार फिर से तुम्हे गले लगाकर दिल को सुकून मिला ... देर शाम रसोई से निकल जब तुम मेरे पास आ ....पहला निवाला खिलाती हो ...वो मुझे सबसे प्यारा लगता है ....और पेट भर जाने पर भी जब तुम कहती हो बस एक और ....सच माँ बहुत याद आता है .....जब यहाँ दूर ख़ुद को तन्हा पाता हूँ ....हर बार पहले निवाले पर तुम याद आ जाती हो ....वही मुस्कुराता चेहरा ...और वही तुम्हारे हांथों में पहला निवाला

सच माँ जिंदगी में इस जीने की दौड़ में तुमसे कितना दूर कर दिया ...जब आँखें भर आती हैं ....तो तुम्हारे पास भाग आने को मन करता है ....दिल करता है फिर से वही सब जियूँ .....वो सार दिन खेलना ..तुम्हारे आँचल टले जिंदगी गुजारना .....तुम्हारा ऊँगली पकड़ मुझे स्कूल तक छोड़कर आना .....छुट्टी हो जाने पर वहीँ खड़े रहना इस विश्वास के साथ कि माँ आएगी मुझे ले जायेगी ....और फिर दूर तुम्हारा मुझे आते दिखाई देना ...और दिल ही दिल खुश होना ....

और वो फिर तुम्हारे हाँथों से खाना खाना ....जबरन दूध का गिलास लेकर तुम्हारा मेरे पास आना ..... पूरे दिन खेल में मस्त रहना .... पापा के डाँटने पर अपनी गोद में छुपा लेना ..... सच माँ सब कुछ पहले जैसा हो तो कितना अच्छा हो है ना ....ना मेरे घर से आने पर तुम उदास हो ....और ना मैं दूर जिंदगी की दौड़ लगाऊँ ....

सच माँ एक बार फिर से तुम्हारे आँचल की छत के तले .....प्यार की दीवारों के बीच ज़िन्दगी गुजारने को मिल जाए तो कितना सुखद हो ....मेरा रूठना , तुम्हारा मनाना .... पास आना ...सीने से लगाना ....

माँ अभी अभी फिर से तुम्हारे नर्म हाथों को महसूस किया मैंने ..... ऐसा लगा जैसे तुम इतने दूर से भी मेरे मन को सुन रही हो ...हमेशा की तरह


पिछला लेख : I hate you Dad

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आई हेट यू डैड

>> 19 February 2009

तुम क्या गये ...लगा यूँ जैसे मेरे सपनों का दामन ही मुझसे छूट गया ... तुम्हारे साथ वो सपने , वो आजादी से जीने की चाहत भी जाती रही ... उस पल लगा कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया हो ... मेरे पैरों तले जमीन मुझसे खींच ली गई हो ...मैं पानी में डूब रहा हूँ ...मेरा दम घुट रहा है ....मैं साँस नही ले पा रहा हूँ

अब कहने को तो आजाद हूँ ...पर पता है डैड अब मैं बारिश के आने पर खुश नही होता ... मेढकों को पकड़ने के लिए उनके पींछे नही भागता ....डरता हूँ फिसल गया तो गिरने पर कौन उठायेगा ... पतंग भी नही उड़ाता ...

आँखें सूज गयी हैं ...दर्द होता है ....नीद नही आती ...कई दिनों से ढेर सारी फिल्में देख डाली ....थकान होती है ....जागता रहता हूँ ...ये आजादी अच्छी नही लगती .... देर रात जागकर पढ़ते रहने पर भी ...मुझे कोई आकर नही सुलाता ...वो कहना तुम्हारा आँखें कमजोर हो जायेंगी ...याद आता है ...चश्मा भी चढ़ गया है अब तो ....

गोद में बिठाकर कोई अंग्रेजी नही पढाता .... जब टूट कर मायूस हो जाता हूँ ....तो कोई सीने से नही लगाता ....खुलेआम सिगरेट पीने पर भी अच्छा नही लगता ...देर रात सड़कों पर भटकने पर भी डर नही लगता .....मन करता है कोई टोके आकर .....बालों के बड़े होने पर ...अब कोई नही कहता ...कितना गधा लग रहा है ...कटा लेना कल जाकर

गर्ल फ्रेंड की शादी तय हो गयी है कहीं पर ....टूटकर बिखर जाने को है दिल करता .... सीने से लिपटकर है रोने को दिल करता ...मगर वो सीना मैं लाऊं कहाँ से .... नही हो पास जो तुम ये कह दो ...कर ले तू उससे शादी ....होगा जो, मैं देखूँगा उसको ...

खरीदता हूँ जब सिगरेट किसी भी दुकान से .... दूर कहीं से कोई बच्चा पकड़कर आता है अपने पापा की उंगली ....देखकर के आँखें भर आती हैं मेरी ...जब वो है कहता दिला दो पापा ये टॉफी ...वो ऊँगली अब मैं लाऊँ कहाँ से ....

जब सजता है किसी का सेहरा ....पास आकर के उसके एक शख्स पहनाता है सेहरा ....वो शख्स अब मैं लाऊं कहाँ से .....बहुत याद आता है गालों को पकड़ कर.. वो मेरे बालों को कंघी करना तुम्हारा ....बेफिक्र होकर के पार करने में सड़क को डर लगता है अब तो ....उंगली तो है पर वो हाँथ मैं लाऊँ कहाँ से ....

जब टूटकर बिखर जाता हूँ ....थक जाता हूँ बेतहाशा ....नही है कोई जो दे दे दिलासा ....नही है कोई जो लगा ले ..अपने सीने से ज़रा सा ....

I hate you dad. Why you left us ......

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क्या वाकई लोगों के दिलों-दिमाग से जात-पात की भावना ख़त्म हुई है ?

>> 18 February 2009

सुना है कि भारत में लोगों में बहुत जागरूकता आ गई है .... लोग जात पात से ऊपर उठकर बहुत सोचते हैं .... सबको समान समझने की अब उनके अन्दर भावना जाग चुकी है .....क्या वाकई ऐसा हुआ है ? कितना हुआ है ?

लेकिन जब तब मैं तो व्यक्तिगत तौर पर बहुत कुछ सुनता और देखता हूँ ....तब मन में एक ही ख्याल आता है कि क्या वाकई बहुत ज्यादा बदलाव आया है ? .....

हमारे हिन्दी साहित्य के महान उपन्यासकार और लेखक या फिर सही तौर पर कहें तो "कलम के सिपाही" ने कुछ इस तरह से अपने उपन्यास "कर्मभूमि" में लिखा है .....

"लाला समरकान्त ने चूहे की तरह झपटकर कहा --
अंग्रेजों के यहाँ रंडियाँ नही, घर की बहू - बेटियाँ नाचती हैं , जैसे हमारे यहाँ चमारों में होता है "

अर्थात आप ख़ुद सोच सकते हैं कि उस समय हिन्दुस्तान में जात पात का स्तर क्या रहा होगा और क्या लोगों की मनोदशा रही होगी

हमारे देश का एक राज्य मिजोरम जिसके २००१ के आंकडे बताते हैं
जनसँख्या : ८,८८,५७३
पुरूष : ४,५९,१०९
स्त्री : ४,२९,४६४
अनुसूचित जाति : २७२
अनुसूचित जनजाति : ८,३९,३१०

इसका मतलब हुआ कि मिजोरम में केवल ४८९९१ लोग सामान्य और अल्पसंख्यक श्रेणी के हैं ....अब सबको पता है कि मिजोरम का कितना विकास अन्य राज्यों की भांति हुआ है और यह राज्य समाचारों में और मीडिया की नज़र में कितना रहता है .....इसी तरह का कुछ बुरा सा और सौतेला हाल अन्य राज्यों जैसे मेघालय, असम, झारखण्ड, सिक्किम ,दादरा नागर हवेली ....वगैरह - वगैरह का है

मेरी एक दोस्त से एक दिन मेरी फ़ोन पर बात हो रही थी ....वो अपनी मम्मी के साथ घर पर की हुई बात को मुझसे हलके मूड में बता रही थी .... "मम्मी मेरी शादी कर दो ना , बेटा शादी तो कर दें लड़का भी तो मिले ....."अरे कोई नही किसी चमार -चूट्टे से ही कर दो ...बस शादी कर दो "
मैंने अपनी उस दोस्त को बोला जानती हो कि चमार -चूट्टे कौन होते हैं ...बोली कि नही ...मैंने कहा तो फिर ये बात कहाँ से सीखी ...बोली कि समाज और घर में रहकर ही सब सीखते हैं ...मैंने उसे काफी देर तक समझाया तब वो बोली कि आगे से वो ऐसा कुछ नही बोलेगी

मैंने उसी दोस्त को बोला कि मान लो तुम्हारा बॉय फ्रेंड गौरव है अगर वो अनुसूचित जाति का होता तब क्या करती ....वो बोली ऐसे कैसे होता ....अगर वो ऐसी किसी जाति का होता तो वो ऐसा कोई प्यार का सम्बन्ध ही ना बनाती....... मतलब आप समझ सकते हैं कि प्यार भी जात पात को देखकर किया जाता है

मेरा एक दोस्त है उसने शादी के लिए जीवनसाथी पर रजिस्ट्रेशन करा रखा है .....उसने एक सुंदर और सुशील कन्या को देखकर उसके पास शादी का प्रस्ताव भेजा ....कन्या ने साफ़ साफ़ अपने प्रोफाइल में लिख रखा था कि जाति बंधन नही अर्थात कोई भी जाति का चलेगा ....जब इन्होने उनसे फ़ोन के माध्यम से संपर्क किया तो वो मना करने लगी ....इन्होने कारण पूँछा तो उन्होंने कहा कि हमारी जाति का मेल नही होता ...तब लड़के ने कहा कि पर आपने तो लिख रखा है कि आप जाति बंधन नही मानती ...तभी उनके पिताजी ने फ़ोन ले लिया वो बोले जाति बंधन का मतलब ये नही कि हम अनुसूचित जाति में शादी कर ले .... अब आप ख़ुद ही देखिये कैसे कैसे लोग हैं जाति बंधन का क्या मतलब समझाते हैं

मेरे एक अन्य दोस्त का प्रेम सम्बन्ध अग्रवाल सर नेम वाली लड़की के साथ चल रहा है ...दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं ....लेकिन लड़की के घर वाले लड़के के अनुसूचित जाति के होने की वजह से त्राहि माम त्राहि माम कर रहे हैं और लड़की पर अपनी पूरी ज़ोर आजमाइश कर रहे हैं कि वो उस लड़के के साथ अपना सम्बन्ध ख़त्म कर ले ....

जब मैंने अपनी एक दोस्त को ये बात बताई तो वो बोली कि आग और घी को एक साथ रखोगे तो आग तो लगेगी ही ना .....मसलन मुझे समझ नही आया कि आग कौन है और घी कौन है ......

मैंने अक्सर देखा है कि जब भी कभी मैं चैट करता हूँ तो सामने वाली फीमेल पर्सन मुझसे मेरा सर नेम पूंछती है ...कोई कोई तो सीधे मेरी जाति ही पूंछने लगती है ...और जब मैं कहता हूँ कि बड़ा जात पात मानती हो तो कहती है कि नही मैं इन सब में बिलीव नही करती .....और जब मैं पूंछता हूँ कि इन सबको पुँछ के क्या होगा ...प्यार तो किसी से भी कर सकती हो और शादी भी किसी भी जात में कर सकती हो ....तो कहती है कि नही मैं घर वालों की मर्ज़ी से ही शादी करुँगी ...अर्थात अपनी ही कास्ट में .....

मेरे एक दोस्त के बड़े भाई बताते हैं कि जब वो छोटे थे तब अपने गाँव में गए ...उनके दादाजी उन्हें अपने साथ ले गए ....पास के ही एक ठाकुर साहब के घर ...ठाकुर साहब खाट पर बैठे थे और उनके दादाजी धरती पर ...पर वो खड़ा रहा ....वो ठाकुर साहब बोले क्यूँ बैठ क्यूँ नही रहा और मजाक के लहजे में बोले कुर्सी पर बैठेगा ? कुर्सी मंगाऊँ.....

सुना है कि उस गाँव में १०-२० घर अनुसूचित जाति के थे ...धीरे धीरे सब पलायन कर शहरों की ओर आ गए क्योंकि कुछ अनुसूचित जाति के घर के सदस्यों की सरकारी नौकरी लग जाने के कारण वो अच्छा खाना पहनने लगे थे ...और ये बात बाकी जात के लोगों को हज़म नही हुई तो उन्होंने उनके बच्चो का अपहरण करवा लिया ...और मोटी रकम ऐंठी ......इन समस्याओं से निजात पाने के लिए वो शहर की ओर रुख कर गये

सब कहते हैं कि जात पात की भावना , बलात्कार , शोषण ये सब ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा होता है ...वहां तो मीडिया भी नही पहुँचती ...ज्यादातर वारदातें दबा दी जाती हैं ...पुलिस थानों तक भी नही पहुँच पाते ऐसे लोग और अगर पहुँच भी जाएँ तो ऊंची जात के लोग शक्ति और पैसे के दम पर उस केस को दबा देते हैं ....

क्या आपको पता है कि भारत की ग्रामीण जनसँख्या क्या होगी ...72.2%, male: 381,668,992, female: 360,948,755 (2001 Census)

क्या वाकई हर स्तर पर लोगों के दिलो दिमाग से जात - पात की भावना ख़त्म हुई है ...क्या लोग वाकई जात पात से ऊपर उठकर देख रहे हैं .....

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ट्रेन वाली लड़की (अन्तिम भाग)

>> 17 February 2009

मुझसे अपने प्रेम का इजहार कर तो दिया नम्रता ने लेकिन मैं मन ही मन जानता था की जितना आसान नम्रता सोच रही है उतना आसान कुछ भी नही होता .....चाहे ज़माना कितना भी आगे चला गया हो किंतु जात पात के मामले में समय का पहिया बहुत ज्यादा आगे नही बढ़ा ....अभी भी अंतरजातीय विवाह में तमाम मुश्किलें आती हैं .... माँ बाप अंतरजातीय विवाह को मंजूर देने के मामले में नाक भौह सिकोड़ने लगते हैं ...

नम्रता कुछ दिन के लिये अपने घर गई .... अब फ़ोन पर हमारी बातों का सिलसिला कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था .... नम्रता ख़ुद को मुझसे बात करने से रोक नही पाती थी ....उस रात की बात है उसके पैर में मोच आ गई थी ...वो रात को १ बजे के दौरान मुझसे मोबाइल पर बात कर रही थी ....वही सब बातें जो एक प्रेमी और प्रेमिका के मध्य होती हैं ...

वो कहते हैं ना की इश्क की हवा ख़ुद ब ख़ुद वादियों में फ़ैल जाती है ....लोगों को बताने की जरूरत नही पड़ती ....ख़बर उन्हें ख़ुद पता चल जाती है ....रात को नम्रता को बात करते हुए उसके पापा ने सुन लिया था .... उन्होंने रात को उससे कुछ नही कहा ....

उनके दोस्त बी.एस.एन.एल. में ही मुलाजिम थे ...नम्रता का पोस्ट पेड कनेक्शन था .... नम्रता के पिताजी ने सारी कॉल डिटेल निकलवा ली .... अब सब कुछ सामने था उनके हाथ में .... २ - ३ घंटे लगातार एस.टी.डी. कॉल होती है नम्रता के नंबर से ये जान वो हैरानी में पड़ गये ... आख़िर एक लड़की के बाप को हैरान तो होना ही पड़ता है ऐसे समय पर ....

उन्होंने घर पर आकर नम्रता और उसकी माँ को बुलाया ...और नम्रता को खूब फटकारा ..तुम्हे ज़रा भी ख्याल नही है हमारी इज्जत का ....इतनी लम्बी लम्बी बात होती हैं एस.टी.डी. ....अब जो मैं कहूँगा वही करोगी तुम ....मैं ६ महीने के अन्दर तुम्हारी शादी कर दूँगा ....लड़का देखना शुरू करता हूँ ....पर पापा मैं आपसे कुछ कहना चाहती थी .....मुझे कुछ नही सुनना ....अब जैसा मैं कहूँगा वैसा ही करोगी तुम ..

नम्रता ने अपनी माँ को सारी कहानी बतायी ....और बोली कि अगर मेरी ये इच्छा पूरी कर दी जाये तो मैं जिंदगी भर खुश रहूँगी ....नम्रता की माँ बोली ...बेटा हमारे खानदान में कभी ऐसा हुआ है ...कभी किसी ने प्रेम विवाह किया है क्या ? और मान भी लो सोचा भी जाये तो लड़का अपनी जात का नही ...दूसरी बिरादरी के लड़के के साथ तुम्हारे पिताजी तुम्हारी शादी कभी नही करेंगे .....पर माँ मैं सिर्फ़ उसी से शादी करुँगी चाहे जो कुछ हो जाये

वो फिर वापस अपनी नौकरी पर आ गयी ....और सारा माज़रा मुझे बताया ...मैंने कहा कि देखो नम्रता मुझे तो पहले से ही शक था कि तुम्हारे माता पिता शायद ही राजी हों ....माँ बाप बच्चों से प्यार तो करते हैं लेकिन जात धर्म का पल्लू उन्हें बहुत प्यारा होता है ...वो उसे नही छोड़ते ..... बोली पर मैं सिर्फ़ तुम से शादी करुँगी चाहे जो कुछ हो जाये ...मैंने कहा ठीक है जैसा तुम चाहोगी वैसा होगा ...अभी कुछ दिन आराम से रहो ...सोचते हैं क्या करना है

करीब २-३ दिन बाद नम्रता के पिताजी का फ़ोन आया कि उन्होंने उसके लिए लड़का देख लिया है और वो भी उसे देखने आ जाये ....अगर सब कुछ सही रहा तो जल्द से जल्द शादी तय कर दी जायेगी ...नम्रता ने कहा कि वो मरते माँ जायेगी लेकिन अपनी मर्जी से ही शादी करेगी ....ये कह उसने फ़ोन रख दिया

अगले रोज नम्रता के घर से फ़ोन आया कि उसके पिताजी अस्पताल में भरती हैं ..उन्हें हार्ट अटैक आया है ....ये सुन नम्रता घर गयी ....उनकी हालत देख नम्रता को रोना आ रहा था ....उनके पास गयी वो बोले बेटा मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ अपनी ही बिरादरी में शादी कर ले .....और रोने लगे ...उनकी हालत देख नम्रता भी रोने लगी .....और बाहर चली आयी ...

अगले रोज़ नम्रता का मेरे पास फ़ोन आया और उसने सारी कहानी बतायी ..मैंने उसे समझाया कि देखो नम्रता मैंने तुम्हे पहले ही कहा था कि इतना आसान नही होता सब कुछ ...जात धर्म के चक्कर में लोग ना जाने क्या क्या कर जाते हैं .....अब तुम ही देख लो अपनी जात के चक्कर में तुम्हारे पिताजी को हार्ट अटैक आ गया ....देखो ज्यादा परेशन होने की जरूरत नही है ...उनका ख्याल रखो ....और उनकी बात मान लो ...अगर उन्हें कुछ हो गया तो क्या तुम खुश रह पाओगी....बोली मैं क्या करूँ कुछ समझ नही आ रहा .....मैंने बोला देखो नम्रता मैं भी तुम्हे पसंद करता हूँ ...लेकिन मुझे पहले से एहसास था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है ...तुम ज्यादा परेशान मत हो ....दोस्त तो हम जिंदगी भर रहेंगे ही ....ऐसा तो कुछ होगा नही कि दोस्ती ख़त्म हो जायेगी .....

कुछ दिनों बाद उसकी शादी तय हो गयी ...सुना था कि उसके पिताजी ने बहुत बड़ा और आलीशान आयोजन किया था .....उसकी शादी तय कर दी ....एक बार नम्रता से बात हुई ...बता रही थी उसके पिताजी बहुत खुश हैं ... मैंने कहा चलो कोई तो खुश है .....

फिर धीरे धीरे नम्रता की कॉल आना बंद हो गयी मैंने अपनी तरफ़ से दोस्ती निभाने की कोशिश में कॉल की ....लेकिन उनका रिस्पोंस कुछ ख़ास ना रहा .....फिर धीरे धीरे मेल का जवाब भी बंद ....न कोई कॉल ..ना कोई मेल ... धीरे धीरे सभी कम्युनिकेशन ख़त्म सा हो गया ...जबकि सभी माध्यम मौजूद थे

कभी कभी रिश्तों में इस कदर गहराई आती है कि पता नही चलता और फिर वक्त के बदलते हालातों के बदलते रिश्तों की गर्माहट कहाँ खो जाती है पता नही चलता ....सुना था कि उसकी शादी की डेट करीब ३ महीने बाद की तय हो गयी थी .....

करीब २ महीने बाद उसका फ़ोन नंबर भी बदल गया ....उसका ऑरकुट अकाउंट भी बंद हो गया .....बस मेल आईडी था पर कभी उसके नंबर के बंद हो जाने के बाद मेल भी नही आया उसका .....

आज जब कभी उसके बारे में सोचता हूँ तो दिल में एक ख़याल आता है ....

क्या ट्रेन में मिली लड़की को मुझसे प्यार था ?

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ट्रेन वाली लड़की (भाग-2)

>> 12 February 2009

ट्रेन की मुलाक़ात और एक महीना गुजर जाने के बाद, सच पूँछो तो नम्रता मेरे जहन में नही थी । उस दिन अचानक मोबाइल की घंटी बजी । रविवार का दिन, सुबह 10 बजे भी मैं बिस्तर से नहीं निकला था । झुझुलाहट में मोबाइल देखा । गुमनाम नंबर से कॉल, रिसीव किया ।
-"हैलो" उधर से आवाज़ आयी ।
-मैंने भी कहा हैलो
-"कैसे हैं आप ?" उधर से मेरी खैरियत पूँछते हुए लड़की की आवाज़ आयी ।
-"जी मैं तो ठीक हूँ । पर आप कौन बोल रही हैं ?" मैंने कहा ।


-बोली "गैस कीजिये ।"

मैंने दिमाग पर ज़ोर डाला पर दूर दूर तक कोई भी मेरी मेरी जानने वाली का नाम मेरे जेहन में नही आया । जिसे मैं ना पहचानता ।
-मैंने कहा "नही गैस कर सकता । आप ही बता दीजिये कि इस मीठी आवाज़ की मालकिन कौन है ।"
वो हँस दी और बोली "आपके दोस्तों में से आते हैं और फिर भी आप नही पहचान रहे ।"

मैंने कहा "कि जब दोस्त हैं तो जान पहचान की क्या जरूरत आन पड़ी ।"
-वो बोली "नही आपको गैस करना पड़ेगा ।"

मेरे मन में एक बार तो आया कि एक तो सुबह सुबह नीद में हैं ऊपर से हमारा दिमाग खर्च करवाया जा रहा है । गैस करो-गैस करो का खेल खेल कर । अब अगर लड़का होता तो उस पर झल्ला भी जाते, पर लड़की की मीठी आवाज़ और वो भी ख़ुद उसने कॉल किया है ।

-"अब बता भी दीजिये मैडम आप कि आप हमारी कौन सी दोस्त बोल रही हैं ।"
-बोली "हार गए ना । मुझे पता था कि आप नही बता पायेंगे ।
-मैंने कहा "मैं तो शुरू से ही हारा हुआ था, जीता ही कब था ।
-हँसते हुए बोली "आप भी ना बस । मैं नम्रता बोल रही हूँ । एक बार तो दिमाग से उतरा गया "नम्रता? हम्म्म्म्म..."
-"आपकी प्रशंसक नम्रता ।"
-ओह हैलो नम्रता । कैसी हो ? आज अचानक कैसे याद कर लिया इस गरीब को ।

-मैं आपको भूली ही कब थी
- मैंने कहा "अच्छा जी । ऐसी बात है ।
-बोली "सच बताऊँ तो मन ही मन उधेड़ बुन में लगी रही इतने दिनों । कि बात करूँ या न करूँ । फिर कल के वाक्ये से रहा ना गया ।
-"क्यों ऐसा क्या हो गया कल ?" मैंने पूँछा ।
-पता है, मैंने ना आपकी लिखी हुई कविता बैंक में होने वाली प्रतियोगिता में दी थी । पता है, आपकी कविता को इनाम मिला है । पूरे 5 हज़ार रुपये ।
-मैंने कहा "भाई ये भी खूब है । लिखी हमने जीत आप गयी ।
-बोली "नही मैंने उन्हें बता दिया था कि ये मेरे दोस्त की लिखी हुई है ।"

-मैंने कहा "अच्छा फिर"
-वो बोली "फिर क्या तो भी इनाम उसे ही मिला । अच्छा अब आप इन रुपयों का क्या करेंगे ?" उसने पूँछा
-मैंने कहा "भाई जीती आप हैं । आप जैसा उचित समझे आप करे ।
-बोली नही "ये पैसे आपके हैं । आपको ही मिलने चाहिए । अच्छा आपको जब ये रुपये मिलेंगे तो आप क्या करेंगे ?
-मैंने कहा "वैसे इस तरह कभी सोचा नही ।"

-कुछ गरीब बच्चो के लिए कपड़े खरीद कर दे देंगे
-"और मेरी ट्रीट" उधर से आवाज़ आयी ।
-मैंने कहाँ "वो आप जब चाहे ले लें ।"
-बोली "पता है, मैं अगले हफ्ते दिल्ली आ रही हूँ ।"
-मैंने कहा "क्यों ?"
-वो बोली "क्यों नही चाहते कि मैं आऊं ?"
-नही मेरे ऐसा मतलब नही था ।

-मैं अपनी बुआ जी के पास घूमने आ रही हूँ
-मैंने मजाक में बोला "तब ठीक है ।"
-हँसते हुए बोली "आप भी ना । अच्छा मैं आपके पैसे आकर तभी दूँगी ।
-मैंने कहा "पहले आओ तो सही ।"

उस दिन उसकी कॉल आयी ।
-मैं अपनी बुआ जी के यहाँ आ गयी हूँ ।
-मैंने कहा "अच्छा कब पहुँची आप ।"
-बस कल रात । अच्छा तो कब ले रहे हैं आप अपने रुपये मुझ से ।
-मैंने कहा "आप बार-बार पैसों को बीच में क्यों लाती हैं ? हम लोग तो वैसे भी मिल सकते हैं ।"
-इस बात पर वो हँसने लगी । "अच्छा बाबा सॉरी, बस अब आगे से नही बोलूँगी ।"

-अच्छा आप शाम को फ्री हैं ।
-बोली "हाँ"
-ठीक है आप शाम को 6 बजे तैयार रहना मैं, आपको लेने आ जाउँगा । अपना पता बता दीजिये । उसने पता बताते हुए फ़ोन रखा ।

शाम को बताये हुए पते पर पहुँचा । वो बाहर ही मेरा इंतज़ार कर रही थी । बहुत ही प्यारी लग रही थी वो और उस पर वो भोले भाले बच्चों जैसी हँसी । सचमुच दिल में घर कर गयी । हम पास के ही एक रेस्टोरेंट में गये । ऑटो में बैठ मुझे कुछ सूझ नही रहा था कि उससे क्या बात करुँ । बस सुनने का दिल कर रहा था कि वो बोलती रहे और मैं बस सुनता जाऊँ । उसकी बातें और बीच-बीच में खुश होकर उसका हँसना ।

रेस्टोरेंट में पहुँच में पहले ही बैठ गया । वो खड़ी मुस्कुराने लगी फिर अचानक से मेरा दिमाग चला और मैं मुस्कुराता हुआ उठा । उसे आदर के साथ बैठने का आग्रह किया । वो मुस्कुराती हुई बैठ गयी । "सॉरी वो ज़रा भी ख्याल नही रहा ।" मैं बोला ।

-"आप तो कुछ बोल ही नही रहे । ट्रेन में तो बहुत बोले जा रहे थे ।"
-मैंने मजाक के लहजे में कहा "वो दिखाने के दांत थे ।" वो ज़ोर से हँस दी
-बोली "हँसाना तो कोई आपसे सीखे ।"
-मैंने कहा "जब मन करता है तब बहुत बात करता हूँ । जब खामोश रहने का मन करता है तो खामोश रह लेता हूँ ।
-बोली "तो आप मनमौजी हैं ।"
-मैंने कहा "बस ऐसा ही है ।"

मैन्यू कार्ड उसे पकडाते हुए बोला । मैडम क्या खायेंगी आप मंगाइए । बोली "नही आप ही आर्डर कीजिये ।"
-मैंने कहा "ये सब मुझ से नही होता । आप ही मंगाइए ।"
-बोली "आपको क्या पसंद है ?"
-मैंने कहा "मुझे मैगी पसंद है । पर अगर वो बोलूँगा तो भगा देंगे ।
-बोली "आप भी बस ।"
फिर कुछ चीज़ें आर्डर की गयी और उस दिन की ट्रीट पूरी हुई ।

उस दिन अपने-अपने परिवार के सदस्यों, अपनी-अपनी पसंद, अपनी-अपनी नौकरी से सम्बंधित बातें हुई । चलते समय नम्रता ने मुझे पाँच हज़ार रुपये दिये । मैं आनाकानी कर रहा था लेकिन उसने हाँथ में थमा दिये । वापसी में नम्रता को घर पहुँचाने के बाद चल दिया । उसने हाँथ मिलाया और मुस्कुराकर कहा "आज आपके साथ बहुत अच्छा लगा ।" मुझे उस दिन अच्छा महसूस हो रहा था कि मेरी वजह से कोई दिल से इतना खुश है । मैंने उसको बोला कि "कल तैयार रहना । हम अनाथालय चलकर वहाँ कुछ कपड़े खरीद कर दे आयेंगे ।"

अगले दिन हम दोनों ने बाजार से जाकर कुछ कपड़े खरीदे । अनाथालय में जाकर बच्चो को बाँट दिये । वो वहाँ बहुत खुश थी । इतनी खुश दिल लड़की बहुत अरसे से देखी थी मैंने । वहाँ से वापस लौट कहने लगी "सचमुच आज मुझे बहुत अच्छा लगा" फिर बोली "आज सबकुछ आपके मन का करेंगे और आज की ट्रीट मेरी तरफ़ से । मैं मुस्कुरा दिया ।

-मैंने कहा "ऐसा सम्भव है"
-बोली "क्यों नही "
-मैंने कहा "भीड़ मैं खाने में मुझे बहुत ज्यादा मज़ा नही आता ।
-अच्छा तो फिर घर चलो, क्या खाना है ?"
-मैंने कहा "मैगी खाए हुए एक अरसा बीत गया, सूजी का हलवा खाए हुए अरसा बीत गया । अच्छी बनी हुई चाय पिये हुए अरसा बीत गया ।
-बोली "बस-बस समझ गयी । शादी क्यों नही कर लेते ? रोज़ खाया करना मैगी और उसे भी खिलाया करना ।"

मैं हँस दिया । मैंने मजाक मैं बोला "मम्मी सोचती हैं मैं अभी बच्चा हूँ ।"
-बोली "तो बता दो कि बड़े हो गये हो । लड़की देखना शुरू कर दो मेरे लिये ।"
-मैंने लड़कियों के अंदाज मैं बोला "आ अपनी शादी की बात भी करता है कोई ।"
-ज़ोर से हँस पड़ी "आप भी ना बस । बातें बनाना तो कोई आप से सीखे ।"

नम्रता मुझे अपने बुआ जी के घर ले गयी । बुआ जी विद फॅमिली बाहर जा रही थी । उनका अपना प्लान था । नम्रता ने उन्हें माजरा बताया । उन्होंने कहा "ठीक है तुम दोनों बनाओ खाओ ।" नम्रता बोली "सूजी का हलवा तो मैं अच्छा बना लेती हूँ पर मैगी !"
-मैंने कहा "ये बन्दा किस काम आएगा । तुम हलवा बनाओ । मैं मैगी बनाता हूँ ।"
-बोली "सही है आपकी बीवी तो बहुत खुश रहेगी । आप तो शरीफ पति साबित होंगे ।
-मैंने कहा "अब ये तो होने वाली बीवी ही बता पायेगी कि कैसा पति हूँ मैं ?"

जब सब कुछ बनकर तैयार हो गया और हम खाने बैठे । मैगी खाकर बोली "वाह ! मैंने ऐसी मैगी कभी नही खायी । मजा आ गया ! जादू है ये तो ।"
-शुक्रिया ।
-बोली "आप तो अपना ढाबा खोल लो और मैगी बना-बना कर बेचना शुरू कर दो ।
-मैंने का "ये भी सही है । किसी दिन इसका भी सोचा जायेगा ।"

और फिर बातों का सिलसिला चला । जो थमने का नाम नही ले रहा था । हँसी की गूँज और उसका भोला चेहरा मेरी आंखों में छा गया । अगले दिन उसे भोपाल वापस लौटना था । वो चली गयी । अपने साथ वो हँसी, वो बातें, वो भोलापन लेकर ।

हमारी मुलाकाते होती रही । कभी उसका किसी काम से दिल्ली आना होता तो कभी किसी काम से । मोबाइल पर भी ढेरों बातें करती । सचमुच बहुत खूबसूरत दिन थे वो ।

फिर एक दिन आया, जिस दिन सब कुछ अच्छा और सुखद था । नम्रता और मैं एक रेस्टोरेंट में बैठे थे ।
-नम्रता बोली "अच्छा आपने कभी मुझसे नही पूँछा कि मुझे कभी कोई अच्छा नही लगा । इस तरह का सवाल कभी नही किया आपने ।"
-मैंने कहा "कोई जरूरी तो नही और वैसे भी इन सब बातों से ज्यादा मतलब नही रहता मुझे । तुम तो जानती ही हो सब । जब इतनी कहानियाँ रह चुकी हों जिसकी, उसे कितनी दिलचस्पी रह जायेगी इन सब में ।
-अच्छा ऐसी बात है ।

-"अच्छा अब बताइए भी क्या आपको कभी कोई पसंद आया ।" मैंने कहा
-वो खामोश हो गयी
-मैंने कहा "अब बताइए ना ।"
-वो बोली "हाँ अच्छा लगता है मुझे एक इंसान ।"
मैंने खुशी जाहिर करते हुए बोला "ये तो बहुत खुशी की बात है । कौन है वो खुशनसीब ?
-मुझे आप अच्छे लगते हैं ।

मैंने ये कभी नही सोचा था कि नम्रता ऐसा कुछ बोलेगी ।
-क्या बोला ?
-हाँ आप मुझे अच्छे लगते हैं । मैं आपको पसंद करती हूँ । मैं अपनी जिंदगी, आप जैसे इंसान के साथ ही गुजारना चाहती हूँ ।

-क्या बोल रही हो नम्रता । तुम्हे तो सब पता है मेरे बारे में । मेरे अतीत के बारे में, मेरे स्वभाव के बारे में । इसके बावजूद तुम ये बोल रही हो ।
-नम्रता बोली "हाँ मैं सब जानती हूँ और बहुत सोच समझकर ही ये कहा है ।

हँसते हुए बोली इतने भी किशन कन्हैया नही हो । जितनी बातें बताते हो । मुझे पता है कि आप अपनी पत्नी के साथ बहुत वफादार रहेंगे । मैं खुश रहूंगी आपके साथ ।

-मैंने कहा "देखो नम्रता ये जीवन कविता की तरह नही है । जिसमे सब अच्छा और प्यारा लगता है और मान भी लो कि ये सब ठीक है । तो क्या तुम्हारे परिवार के लोग तुम्हे अंतरजातीय विवाह की मंजूरी देंगे ।
-बोली "मैं अपने माता पिता को जानती हूँ । उन्हें मेरी खुशी में ही खुशी मिलती है ।
-मैंने कहा "ठीक है । अपने परिवार की राय जान लो पहले । तभी कोई कदम उठाना । वैसे मुझे तुम जैसी लड़की मिल जाये, तो मेरे लिये इससे बड़ी खुशी की बात और कोई नही हो सकती । तुम किसी की भी जिंदगी खुशियों से भर सकती हो ।

बोली मैं अपने माता पिता से बात करुँगी इस बारे में ....


आगे पढ़िए अंतिम भाग !

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ट्रेन वाली लड़की (भाग-1)

>> 11 February 2009

कभी कभी कुछ इत्तेफाक़ ऐसे होते हैं जो पहले कहानी बनते हैं और फिर रह जाते हैं तो बस याद बनकर । एक याद जो आज भी मेरे जहन में है । सोचता हूँ कि उतार दूँ जिंदगी के पन्नो पर । लेकिन चाह कर भी हम जैसा चाहते हैं, वैसा कहाँ हो पता है ।

ऐसा ही इत्तेफाक उस रोज़ हुआ । मैं जिस सोफ्टवेयर कम्पनी में काम करता था । उस कम्पनी के प्रोजेक्ट के सिलसिले में हैदराबाद जाना हुआ । प्रोजेक्ट का काम एक हफ्ते में समाप्त कर वापस लौटना था । हैदराबाद से दिल्ली के लिए मेरा आरक्षण था ।

आप जब कभी जल्दी में हो तो अक्सर लेट हो जाते हैं । वजह बहुत सारी होती हैं । कभी कुछ तो कभी कुछ । मैं ट्रेन के छूटने से ठीक चन्द पल पहले रेलवे स्टेशन पर पहुँचा । गाड़ी चल दी थी, मैं भागता हुआ ट्रेन में चढ़ गया।

कुछ मुलाकाते बहुत प्यारी होती हैं । जो दिल में घर कर जाती हैं और बस जाती हैं एक सुनहरी याद बनकर । ये मेरी किस्मत थी या कुछ और, नही जानता । मेरे सामने की सीट पर एक करीब 25-26 वर्षीय खूबसूरत लड़की अपना सामान सीट के नीचे रख रही थी । मैं अपनी सीट पर जाकर बैठ जाता हूँ । ऊपर की दोनों ओर की दोनों सीटें खाली पड़ी थी । ना जाने क्यों, नज़र लड़की के चेहरे पर जाती है, लड़की खूबसूरत थी ।

रात का समय होने के कारण सब सोने की तैयारी कर रहे थे । सभी अपनी-अपनी सीट पर लेट रहे थे । "क्या मैं लाईट बंद कर दूँ ? सोने का समय हो गया है । अगर आप बुरा न माने तो ।" लड़की बोली "जी बिल्कुल, शौक से बंद कर दीजिये" मैंने कहा । थैंक यू कहते हुए लड़की ने लाईट बंद कर चादर ओढ़ कर सोने की कोशिश की । दिल में ख़याल आया जब चाँद ही छुप गया तो अब जागने से क्या फायदा ।

मैं सुबह 7 बजे उठा, देखा कि लड़की के चेहरे पर फूलों की सी ताज़गी और खूबसूरती विराजमान थी । उसे देख दिल खुश हो गया । मैं भी नित्य क्रियाएं कर आकर सीट पर बैठ गया । अब मैं कभी लड़की को देखता तो कभी खिड़की के बाहर । थोडी देर बाद चाय वाला आता है । चाय -चाय -चाय ।

"दोस्त एक चाय देना" मैंने उसको बोला । चाय का गिलास हाथ में पकड़ दूसरे हाथ से पर्स निकाल कर जब देखा तो उसमे सब पाँच सौ के नोट थे । मैं भूल ही गया था कि सारे छुट्टे ख़त्म हो चुके हैं । मैंने मुस्कुराते हुए 500 का नोट चाय वाले को दिया । "क्या साहब सुबह सुबह मजाक कर रहे हैं आप" चाय वाला बोला ।

"दोस्त खुले पैसे तो नही हैं" मैंने उससे कहा । "देख लो साहब किसी से ले लो खुले" चाय वाला बोला
"अब किस से माँगू यार ।" आपके पास हैं मैडम 5०० के खुले, सामने सीट पर बैठी लड़की से मैंने पूँछा । "नही 5०० के खुले तो नही हैं ।" लड़की मुस्कुराती हुई बोली ।

"ठीक है दोस्त तुम ये चाय वापस ले लो अपनी । मैं अगले स्टेशन पर कुछ इंतजाम कर लूँगा । मैंने उसको बोला । "आप चाय पी लीजिये मैं पैसे दिए देती हूँ । आप खुले होने पर वापस कर देना ।" लड़की बोली
मैंने कहा "शुक्रिया"
और फिर वो एक हिन्दी की कोई किताब खोल कर पढने लगी ।

किताब के बाहरी पृष्ठ पर अनूठी चित्र कला का प्रदर्शन करते हुए कुछ टेडी मेडी सी पुरूष और महिलाओं की आकृतियाँ बनी हुई थी । मैंने कहा "शुक्रिया आपकी वजह से चाय पी रहा हूँ ।" लड़की ने मद्धम मद्धम सी मुस्कान बिखेरी और पुनः पढने लगी । मैंने कहा "आप हिन्दी की किताबें पढने का शौक रखती हैं ।"
"हाँ मुझे हिन्दी की कविता , कहानियाँ, इन सब में बहुत दिलचस्पी है । लड़की ने मेरी ओर देखकर जवाब दिया ।

मैंने कहा "आज के ज़माने में जब सब अंग्रेजी की तरफ़ भाग रहे हैं । आप मुद्दत से मिली हैं जो हिन्दी का शौक रखती हैं ।" "अरे ऐसा कुछ नही हैं अंग्रेजी में भी पढ़ लेती हूँ पर हिन्दी से मुझे अथाह प्रेम है ।" लड़की बोली
"क्या कहा अथाह प्रेम ? अरे वाह आप तो बहुत ही शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करना जानती हैं।" मैंने उसको मुस्कुराते हुए कहा । "बस पढ़ पढ़ कर ही सीखा है । वैसे मुझे हिन्दी बचपन से ही पसंद हैं ।" लड़की बोली
"बहुत खूब आप तो बहुत बड़ी हिन्दी प्रेमी निकली । जब मैंने ये कहा तो वो मुस्कुरा दी ।

"आप सिर्फ़ बातें बनाना ही जानते हैं या बातों के आलावा कुछ और भी करते हैं ।" वो बोली । "करता हूँ ना बातें - बातें और ढेर सारी बातें" मैंने मुस्कुराते हुए कहा । "क्यों आप कोई नेता हैं ? जो सिर्फ़ बातें करना जानते हैं ।" वो प्रतिउत्तर में बोली । उसकी इस बात पर में ज़ोर से हँस दिया ।

"वैसे जो आप पढ़ रही हैं वो काम मैं भी कर सकता हूँ ।" मैं बोला ।
"क्या किताब पढ़ सकते हैं ?"
"नही मैं लिख सकता हूँ ।"
"अच्छा तो आप लेखक हैं ।" वो बोली

"नही लेखक तो नही लेकिन हाँ कभी कभी लिख लेता हूँ । " मैंने कहा ।
"अच्छा सच में । आप तो बहुत बड़े आदमी निकले ।" लड़की उत्साहित होकर बोली । अब वो मुझ में गहरी रूचि लेने लगी । "तो क्या लिखते हैं आप?" उसने पूँछा । "कुछ नही, शब्दों को आपस में प्यार करना सिखाता हूँ ।" मैंने कहा ।
"क्या मतलब ?" वो बोली ।


"अरे आप नही समझी । अरे यूँ ही जब कभी दिल करता है तो कवितायें लिख लेता हूँ ।
"अरे वाह आप तो बड़े काम के आदमी निकले ।" वो खुश होते हुए बोली ।
"अरे काम का कुछ नही यूँ ही कभी-कभी लिख लेता हूँ ।"
"तो सुनाइये न कुछ अपना लिखा हुआ । उसने कहा । मैं बोला "क्यूँ आपको कवितायें पसंद हैं क्या ?"
"हाँ बहुत ज्यादा, सुनाइये न ।" वो बोली .। मैंने कहा "अच्छा ठीक है सुनाता हूँ । लेकिन आपको एक वादा करना होगा ।"
"क्या ?"
"आपको मुझे चाय पिलानी होगी । अभी तक मेरे पास खुले पैसे नही हैं ।"

वो हँस दी । "हाँ पक्का पिलाऊँगी । "

मैंने अपनी एक कविता सुनाई । उसे पसंद आई । कहने लगी आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं । मैंने कहा चलो तारीफ़ झूठी हो या सच्ची । लेकिन अब चाय तो पीने को मिलेगी । वो मुस्कुरा दी । मुस्कुराते हुए बहुत प्यारी लगती थी वो ।

"आप तो अच्छी कवितायें लिख लेते हैं ।"
मैंने कहा "ऐसे काम नही चलेगा । अब चाय पिलाइए ।" वो फिर हँस दी । थोडी देर में हम दोनों ने चाय पी .
"तो आप कब से लिख रहे हैं कवितायें ।" उसने पूंछा । मैंने कहा यही कोई 8-10 साल ।
"अरे वाह बहुत खूब । अच्छा फिर तो काफ़ी कविताएँ एकत्रित हो गई होंगी"
मैंने कहा "बहुत ज्यादा नही हैं मेरे पास । लिख देता हूँ तो गुम हो जाती हैं । फिर भी 25-30 हैं मेरी डायरी में ।" "अरे वाह दिखाइये ना । वो उत्साहित सुर में बोली । कुछ पढने के बाद बोली "आपकी कविताओं में तो प्रेम की गहराई छुपी हुई है । आप सिर्फ़ प्रेम पर आधारित कवितायें ही लिखते हैं क्या ?"
मैंने कहा नही ऐसा कुछ नही जब मन में जैसे विचार आ जायें ।

"आपकी कविताओं से साफ़ पता चलता है कि आप कितने रसिक हैं ।" लड़की मुस्कुराते हुए बोली ।
"अरे ऐसा कुछ नही है बस लिख लेता हूँ ।" मैंने कहा ।
"प्रेम की वेदना तो बस एक प्रेमी समझ सकता है । कहीं इश्क विश्क इसकी वजह तो नही । उसी के बाद ये शुरू किया हो ।" उसने सवाल के अंदाज़ में कहा ।

"क्यों सिर्फ़ प्यार करने वाला ही प्यार को समझ सकता है क्या ? कवि का तो काम ही है एहसास को शब्दों का सहारा लेकर कविता में उतारना । " मैंने उससे कहा
"इसका मतलब आपको कभी प्यार नही हुआ ?" उसने बोला ।
"सच सुनना चाहेंगी या झूठ" मैंने बोला । "वो बोली दोनों सुना दीजिये ।"
"तो सच और झूठ दोनों यही हैं कि मेरे कई इश्क चले । कई लड़कियों ने मुझसे इश्क किया और दिल भर जाने पर या परेशानी आने पर उनके रास्ते बदल गए । मैं अपने रास्ते बढ़ता रहा ।

"यह सच है या झूठ ।" लड़की बोली ।
"यही हकीक़त है मेरी अब आप चाहे सच माने या झूठ ।" मैंने कहा
"तो कितनी लडकियां प्यार कर चुकी हैं आपसे ।" लड़की मुस्कुराते हुए बोली ।
"यही होंगी कोई 4-5" मैंने हँसते हुए बोला ।
"बहुत समय था आपके पास इन सबके लिये ।" लड़की बोली ।
"बस यूँ समझ लीजिये समय फालतू था मेरे पास । इन सब में खर्च कर दिया । सब अपने आप होता गया ।"

"बहुत खूब , जानकर खुशी हुई ।" वो बोली
"क्या जानकर ?" मैंने कहा
"यही कि आप सच भी बोल लेते हैं इतना दिल खोलकर ।"
इतनी देर में अगला स्टेशन आ जाता है । मैं बाहर जाकर कुछ खाने पीने का सामान खरीद कर लाता हूँ । 500 के खुले जो कराने थे । वापस आकर मैंने उसे उसके पैसे देने चाहे । वो बोली "नही अब आपकी बारी है अब आप मुझे चाय पिलायेंगे।" फिर चाय वाले के आने पर हम लोगों ने चाय के साथ नमकीन और बिस्कुट भी खाए।

"आप करते क्या हैं ?" उसने पूँछा
"मैं एक सोफ्टवेयर इंजीनियर हूँ और प्रोजेक्ट के सिलसिले में यहाँ आया था ।"
" एक बात जो मैं जरूर जानना चाहूँगा ।" मैंने उसको बोला
"क्या ?"
"आपका नाम क्या है ?"
उसने मुस्कुराते हुए कहा नम्रता और मैं एक असिस्टेंट बैंक मैनेजर हूँ । काम के सिलसिले में हैदराबाद आयी थी । मैंने अपना नाम बताते हुए उससे पूँछा "आप कहाँ नौकरी करती हैं ।"
"भोपाल में ।" जवाब दिया ।

"तो मैं एक बैंक मैनेजर के सामने बैठा हूँ ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा ।
नम्रता हँसने लगी । बोली "बातें बनाना तो आपको बहुत आती हैं । अच्छा तो आप कब कविता लिखते हैं ।
मैंने कहा "जब भी मेरा मन करता है तब लिख देता हूँ ।"

मैंने कहा "वैसे मैं अभी भी कविता लिख सकता हूँ । आप सामने होंगी तो तो कविता अपने आप बन पड़ेगी ।
वो बोली "अच्छा ये बात भी है । ज़रा हम भी तो देखें आपका जादू ।"
कुछ देर में उसके सामने बैठ उसको निहारते हुए एक कविता लिख डाली ।
"लिखी कि नही । पूरी हुई या अभी नही ।" वो बोली
"हाँ बस हो गई ।"
"अच्छा अब सुनाओ ।"
मैंने उसे कविता सुनाई । वो बहुत खुश हुई । कहने लगी इस कदर मैंने अपनी तारीफ़ पहले कभी नही सुनी । क्या मैं ये कविता रख सकती हूँ ?"
मैंने कहा "हाँ बिल्कुल क्यों नही । ये तो आपके लिए ही लिखी है मैंने ।"

पता नही क्यों पर वो इस कदर खुश थी । जैसे कि बहुत कुछ कह दिया हो कविता में मैंने । बिना जाने सब कुछ जान लिया हो । वो बोली "मैं तो आपकी प्रशंसक बन गई । क्या आप मुझे अपनी कवितायें देंगे ।"
"क्यों आप क्या करेंगी उनका ?" मैंने पूँछा ।
"अपने पास रखूँगी । एक प्रशंसक का इतना हक़ तो बनता ही है ।
मैं मुस्कुरा दिया "अच्छा प्रशंसक महोदया । आपकी बात तो माननी पड़ेगी ।"
मैंने उसे अपनी डायरी से देख कई सारी कवितायें दूसरे पन्नो पर लिख कर दी ।
वो बोली "आपका ऑटोग्राफ वो भी चाहिए । आप अपना पता भी लिख देना और फ़ोन नंबर भी । अगर प्रशंसक का दिल करे तो चिट्ठी पत्री लिख सके ।
मैं मुस्कुरा दिया । मैंने उसे लिख कर दे दिया । वो सभी कवितायें अपने सूटकेस में रख लेती है । बातों का सिलसिला चलता रहा । नम्रता बहुत खुले दिल की और बहुत समझदार लड़की थी । भोपाल तक का सफर कैसे बीत गया पता ही नही चला । भोपाल पहुँचने पर वो अपना सूटकेस निकालती है फिर अपना हाथ बढाते हुए बोली कुछ नही तो कम से कम हम दोस्त तो बन ही सकते हैं । मैंने हाथ मिलाया ।
"चलो मैं आपको बाहर तक छोड़ देता हूँ"
बाहर जाकर बोली "मुझे पता है कि आप यही सोच रहे होंगे कि मुझसे तो सब कुछ ले लिया और ख़ुद अपना नंबर तक नही दिया ।" मैंने कहा "नही ऐसा कुछ नही है ।"
"अब हम दोस्त तो बन ही गए हैं और आपकी ये प्रशंसक समय मिलने पर आपको फ़ोन जरूर करेगी ।"
उसके बाद नम्रता अलविदा कहते हुए मुस्कुराती हुई चली गई । बाद का सफर मैंने सोते हुए गुज़ारा ।

कुछ दिन तक तो याद रहा वो सब । फिर एक महीने तक ना कोई फ़ोन, ना कोई पत्र । मैं भूल ही गया था सब कुछ । फिर एक दिन उसका फ़ोन आया ।
अनजान नंबर से फ़ोन । कौन हो सकता है ? यही सोच मैंने फ़ोन उठाया...

आगे की कहानी के लिंक ये हैं :
दूसरा भाग
और
अंतिम भाग

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शायद तब एहसास करोगी

>> 10 February 2009

शायद तब एहसास करोगी
मेरे प्यार के छाँव तले
जब वो गुजरे दिन याद करोगी

यूँ तो जीवन की राहों में
कितने साथ मिले और बिछडे हैं
और ना जाने कितने
तेरे मेरे बीच खड़े हैं

अंतर्मन से मैं हूँ तेरा
एक दिन ये आभास करोगी
शायद तब एहसास करोगी

आज तुम्हारे घट में
संशय बीज किसी ने भर डाला है
या मेरे ही कुछ लफ्जों ने
दिल को घायल कर डाला है

जिस दिन तुम अपना समझोगी
तब मिलने की चाह करोगी
शायद तब एहसास करोगी

मन की बात नही समझोगी
म्रग्त्रसना बनकर भटकोगी
मैं बादल बनकर बरसूँगा
फिर भी प्यासी तड़पोगी

मेरे दिल में बसे प्रेम का
जिस दिन तुम विश्वास करोगी
शायद तब एहसास करोगी

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हर्षित मन है कितना मेरा

>> 09 February 2009

हर्षित मन है कितना मेरा
तुम्हारी ही सोच मैं कितना श्रंखलित है

हर पल मैं समझाऊँ इसको
फिर भी ये हठ करता है
कितना भी दूर ले जाऊँ इसको
तुम्हारे ही पास भटकता है

पल पल मैं समझाऊँ इसको
फिर भी याद तुम्हे ही करता है
कब हो जाओ दूर तुम मुझसे
इससे ये क्यों डरता है

ऐसा क्या है बीच तुम्हारे और मेरे
जो नही ये मन संभलता है

पुलकित मन की व्यथा
कैसे आज बताऊं तुमको
हर पल में ही तुम्हे सोचता
कैसे आज बहलाऊँ इसको

कुछ तो है अनजान सा रिश्ता
कुछ तो विशेष है इसमे जो
तोड़े से जो ना टूटे
अनोखा है इसमे वो

हर पल करता ये तुम्हारी कल्पना
निरुद्देश्य ही नही है ये
कुछ तो है प्यारा सा हम में
कैसे मैं बतलाऊँ ये

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मेरी नन्ही सी गुमनाम मोहब्बत (बचपन के दिनों से)

>> 07 February 2009

उसके गालों पर डिम्पल थे । कितनी क्यूट लगती थी, जब वो हँसती । गुस्सा तो जैसे नाक पर रखा रहता उसके, जब भी मोनिटर-मोनिटर खेलती । हाँ, वो हमारी क्लास की मोनिटर जो थी । और मेरा नन्हा-मुन्ना सा दिल धड़क-धड़क के इतनी आवाजें करता कि बुरा हाल हो जाता ।

जबसे विद फेमिली, वो फ़िल्म देख ली थी, अरे जिसमे वो दोनों कहते थे "दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी" । और मैं मासूम बहक गया, दोस्ती के चक्कर में । मेरा मासूम दिल, जब भी उसको सामने पाता, बस चारो खाने चित्त हो जाता । जबकि मैं सिर्फ़ पाँचवी क्लास में था । हाँ यारों मेरा दिल क्लीन बोल्ड हो गया....मुझे प्यार हो गया ।

जहाँ पहले मैं, उसके सामने, मैडम से याद ना करके लाने पर मार खाता, वहीँ बाद के दिनों में, अपनी रैपुटेशन सुधारने के लिये पाठ कंठस्थ करके लाता ।
"माँ एक रसगुल्ला और दो न, लंच के लिए"
"अरे तू कब से इतना खाने लगा"
अब उन्हें कौन बताये ? कि ये रसगुल्ला, वो निगार खान के लिये ले जा रहा है । और स्कूल पहुँचकर बामुश्किल, हिम्मत करके, कोई बहाना बनाकर, उसे खिलायेगा ।

मेरे प्यार को बस मैं और मेरा दिल जानता था । तब पता भी नही था कि अपने दिल की बात को जाहिर कैसे करें ? यारों उसके चक्कर में मैं होशियार बच्चों की श्रेणी में आ गया ।

बुजुर्ग कह गए हैं कि "कभी-कभी, अपनी किसी भूल का परिणाम, आपको कैसे भुगतना पड़े, आप नहीं जानते" । मैं भी भूल कर बैठा । अपने साथ बैठने वाले दोस्त को, मैंने अपना राजदार बनाते हुए, अपने दिल की बात कह डाली । और वो कम्बखत, निरा गूण दिमाग निकला । उस बेसुरे से रहा नही गया और उसने मेरी मोहब्बत, जो जवान भी न हो पायी थी, का राग, हमारी ही क्लास में पढने वाली, अपनी बहन को अलाप दिया ।

कुछ दिन तो चैन से कटी । हालाँकि, उसकी बहन के माध्यम से, निगार तक बात पहुँच गई होगी । इतना तो पक्का है । केवल इतना रहा, तब तक तो ठीक था । उस कम्बखत से रहा न गया और मेरे इश्क का बैरी, उसे क़त्ल करने के इरादे से, एक बचपन की नादानी कर बैठा ।

उन साहब ने क्या काम किया ?

हमारी महबूबा की फेयर कोपी पर, जो उसकी बहन के पास थी । उसपे लिख मारा, कि "मैं तुमसे प्यार करता हूँ । आई लव यू निगार, मुझसे शादी करोगी ?"
और उसके नीचे हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में गोद दिया । और यह खबर हमें सीना फुलाकर दी ।

अब हमारी तो कर दी न दुर्दशा । मरता क्या ना करता । चलो कोई बात नहीं । किस्मत से, वो अंतिम पीरियड था । उस दिन तो खैर रही । अब घर पहुँचे....
"क्या हुआ ? काहे चेहरा लटका हुआ है ?" माँ पूँछती है ।
"कुछ नहीं...."
अब उनको क्या बताएं, कि अगली रोज़ हमारी मार पड़ने वाली है ।

मालूम था कि मैडम के हाथों, अगली रोज़ बहुत मार पड़ेगी । पेट दर्द का बहाना बना दिया । खुदा न खास्ता, एन वक्त पर, गाँव से हमारे चचा जान आ गए । वो हमें तीन दिन के लिये, अपने साथ रिश्तेदारों के यहाँ ले गये ।

हम सोच रहे थे, कि चलो अब तक मामला शांत हो चुका होगा । मन में तसल्ली का लड्डू खाते हुए स्कूल गए । पर हमे क्या मालूम था, कि हमारे प्यार की ख़बर, पूरी बगिया में फ़ैल गई है । बच्चा-बच्चा वाकिफ हो चला है । उस ससुरे दोस्त ने बात का बतंगड़ बना दिया था । और सारा इल्जाम हमारे मत्थे मढ़ दिया ।

निगार ने हमारी शिकायत क्लास टीचर से कर दी । जिनसे में सबसे ज्यादा खौफ खाता था । फिर क्या था ? पहले ही पीरियड में, टीचर्स रूम से बुलावा लेकर, निगार और उसकी सहेली आ गयीं "तुम्हे मैडम बुला रही हैं" ।

काटो तो खून नही, जैसी स्थति हो गयी थी हमारी ।

मैडम बोली "ये सब क्या है ? दूध के दाँत ठीक से टूटे नही और प्यार करने चले हो । नेकर पहनना आता है ठीक से ? और ये सब खुरापते कहाँ से सीखी तुमने ?"
मैं चुपचाप एक कोने में खड़ा हूँ । 10-20 डस्टर हाथों पर पड़ते हैं, 5-6 चांटे गाल पर पड़ते हैं । कभी इस गाल पर तो कभी उस गाल पर । कान पकड़ कर उट्ठक-बैठक करवाई गयी ।
"बोलो करोगे अब ये सब"
"नही मैडम" मुँह से आवाज़ निकली ।
"सॉरी बोलो इसको"
"सॉरी निगार"
"बोलो निगार, तुम मेरी बहन हो"
मन में सोचा "ये सब क्या है ? ये तो मैं कतई नही बोलूँगा ।"
बोलो...बोलो...
पर मैं खामोश...

"साँप क्यों सूंघ गया, बोलो निगार मेरी बहन है ।"
"मैं फिर भी खामोश ।"
"अरे नही बोलोगे ।"
"चलो मुर्गा बन जाओ ।"

मैं मुर्गा बन जाता हूँ ।
"तुम ऐसे नही मानोगे, जब ऐसे ही मुर्गा बने रहोगे, तब बोलोगे"

दस मिनट गुजरे, फिर पंद्रह-बीस मिनट हुए । टप-टप, आँखों से आँसू निकलने लगे ।
"मैडम लग रही है"
"हाँ, हाँ, तो और लगेगी । बोलो अभी ।"
मैं फिर भी मौन ।

मेरी महबूबा को दया आ गयी । बोली "मैडम रहने दो, जाने दो, छोड़ दो अब । ये नही बोलेगा ।"

मैडम उठा कर, दो-चार और धरती हैं गाल पर । "आइन्दा फिर से ऐसा किया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई ना होगा ।" मन में सोचा "आपसे बुरा है भी नहीं कोई ।"

मार खायी । सज़ा काटी । किन्तु दिल में सुकून था, कि बहन नही बोला । दिल ही दिल में खुश हो रहा था । बाद में सोचता हूँ । चलो बच गये, महबूबा की नज़र में इज्जत तो रहेगी । भले ही उसके सामने मार खा ली ।

फिर क्या, कुछ दिन गुजरे । मामला शांत हो गया ।

एक दिन लंच टाइम में निगार मेरे पास आकर, अपना लंच बॉक्स आगे करके बोली "ये गुलाब जामुन खाओ । आज मेरी बहन का जन्मदिन है । वही हँसता, खिलखिलाता चेहरा और गालों के डिम्पल देख, मन प्रसन्न हो गया । मैंने गुलाब जामुन खा लिया ।

फिर ज्यादातर समय वो मेरे पास आती और मुझे कुछ न कुछ खाने को देती । जब कभी मेरा काम पूरा न होता तो अपनी होम वर्क की कॉपी भी शेयर करती । मैं मन ही मन में प्रसन्न होता । कभी वो मुझे कुछ खिलाती तो कभी मैं...

वो एक दिन बोली "तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते थे ना । अब तो हम दोस्त हैं न ।"
मैंने कहा "धत, दोस्ती ऐसे थोड़े होती है ।"
"तो कैसे होती है ?"
"गर्ल फ्रेंड तो गाल पर किस करती है ।"
"अच्छा तो लो" और उसने मेरे गाल पर किस कर लिया ।

यारों अपनी तो लाइफ सेट हो गयी । अब वो मेरी गर्ल फ्रेंड बन गयी....

कुछ दिन दोस्ती के अच्छे बीते । साथ झूलना...साथ बैठना...साथ खाना । अब मुझ पर मोनिटरगीरी भी नही दिखाती थी । सब कुछ अच्छा चला । पाँचवी के बाद, मेरे प्यार को किसी की नज़र लग गयी । उसके पिताजी का ट्रांसफर हो गया । वो कहाँ चली गयी ? किस शहर ? पता ही नही चला ।

मेरी मोहब्बत, मेरी दोस्ती का दी एंड हो गया....

पापा ने मुझे दूसरे स्कूल में डाल दिया । जहाँ निरे लड़के ही लड़के भरे पड़े थे । और मैं उनके साथ, उनकी शरारतों में रम गया । हाँ कभी कभी, अपनी गर्ल फ्रेंड की याद आ जाती....जैसे कि आज आ गयी :) :)

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चरित्र को बोओ और भाग्य को काटो

>> 06 February 2009

सामान्यतः चरित्र का अर्थ यौन - सम्बन्धों , स्त्री - पुरूष विषयक सम्बन्धों से लगाया जाता है ....लेकिन यह बहुत ही सीमित अर्थ है ....आचरण वस्तुतः पूरे व्यक्तित्व को दर्शाता है .....

चरित्र के अन्तर्गत व्यक्ति के मन, वचन , वाणी से सम्बन्धित समस्त क्रिया कलाप आ जाते हैं .... चेतना विकास भी चरित्र का अंग है ....चेतना विकास के अनुसार इच्छा शक्ति अथवा वासना विचार उत्पन्न होते हैं ....इच्छा , ज्ञान , क्रिया अथवा वासना , विचार इन सबका चक्र अबाध गति से चलता रहता है .....इस प्रक्रिया के नवनीत रूप चरित्र नामक तत्त्व का निर्माण होता है .....

इसी लिए कहा गया है ...कर्म को बोओ और आदत को काटो , आदत को बोओ और चरित्र को काटो , चरित्र को बोओ और भाग्य को काटो ......

दि ग्रीन नामक विद्ववान ने कहा है ..."चरित्र का सुधारना ही मानव का परम लक्ष्य होना चाहिए " .....

प्लूटार्क ने कहा है ..." चरित्र हमारा स्थायी स्वभाव है , हमे अपनी इस स्थायी संपत्ति की रक्षा हर प्रकार , हर कीमत पर करनी चाहिए "....

हम यह भूल जाते हैं कि ....हमारी और हमारे समाज की अस्मिता समझोता करने वाले जयचंदों ,मानसिंहों, मीरजाफरों आदि के कारण नही है ..... बल्कि इसके मूल में हैं ....महाराणा प्रताप , गुरु गोविन्द सिंह , महारानी लक्ष्मीबाई , अशफाक उल्ला खान जैसे व्यक्तियों की चारित्रिक द्णता है ....

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने भी कहा है ....."चरित्र का जो मूल्य है वो किसी और वस्तु का नही है " ....

जर्मन दार्शनिक गेट के अनुसार ..."चरित्र का निर्माण संसार के संघर्ष के मध्य होता है "....सफलता एवं प्रतिष्ठा चरित्र रुपी वृक्ष की छाया है ...

फ्रेडरिक सांडर्स के शब्दों में ..."चरित्र जीवन में शासन करने वाला तत्त्व है , शासक जितना द्रण निश्चयी एवं अपने निर्णयों को जितनी द्णता से पालन करने वाला होगा , वह उसी अनुपात में स्वनाम धन्य होता चला जायेगा "....

चरित्र मनुष्य के अन्दर रहता है उसकी प्रतिछाया के रूप में बाहर दिखायी देता है ....

(नोट : लेख में कई पाठ्य सामग्री का सहारा लिया गया है )

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और मैं दोस्तों के षडयंत्र का शिकार हो गया

>> 05 February 2009

चादर तान मैं बिस्तर तोड़ रहा था .... टन - टन - टन - टन .....उफ्फ सोते वक्त एस. एम.एस. की घंटी मुझे नीद की सौतन जान पड़ती है ....रहा नही गया ....पास पड़े मोबाइल को खोल एस. एम. एस. देखा ... हाय अनिल , हाउ आर यू , गुड मोर्निंग अनिल जी ....एक गुमनाम संदेश प्राप्त हुआ ...

गुमनाम संदेश की ख़ास बात होती है वो नाम जानने की ललक भी अपने साथ लेकर आता है ....फिर भी मैंने नज़र अंदाज़ किया और सो गया ...उस गुमनाम मोबाइल नंबर से ३-४ दिन तक एस. एम.एस. आते रहे ...आख़िर मैं भी इंसान हूँ रहा ना गया ....गुमनाम को कॉल किया ....कॉल रिसीव ना किया गया ...

गुस्सा चढ़ा मोबाइल रख दिया ....खामखाँ पता नही क्यों दिमाग ख़राब करते हैं लोग .... क्या हुआ ? रूम पार्टनर इंदरजीत बोला ... अरे यार ३-४ दिनों से एस. एम.एस. कर रहा है कोई गुमनाम नंबर से ...कॉल करने पर रिसीव नही करता ....

एस. एम.एस. के स्वरुप अब बदलने लगे ..."अनिल जी आप मुझे अच्छे लगते हैं ...मैं आपको पसंद करती हूँ ....मुझे पूरा यकीन था कि हम साथ किराए पर रह रहे एम.सी.ए. के १६ लड़कों मैं से किसी की कारिस्तानी है .....आपस में बेवकूफ बनाना , मजाक करना उन दिनों शौक हुआ करता था ...

उस गुमनाम नंबर और उन एस.एम.एस. की चर्चा आपस में १६ -१७ लड़कों में हो गयी.....सही है यार तेरी तो निकल पड़ी ...तेरी तो किस्मत सही है ....बैठे बिठाये गर्ल फ्रेंड मिल गयी ...पर हो कौन सकती है ? .....ये बातें करते वो सब ....और मैं हँसी में टाल देता ....कमीनो बता दो कि किस ने नया सिम लिया है ...कौन बेवकूफ बना रहा है ....पर मजाल है इस बात पर भी किसी के चेहरे पर शिकन तक आयी हो ....अरे यार क्या बात कर रहा है ...हम सब क्यों करेंगे ऐसा ...

गुमनाम नंबर पर कॉल करो तो रिसीव न करे ...और एस.एम.एस. का जवाब दे कि मैं तुमसे बहुत जल्द मिलूँगी ...तभी सारी बातें पूँछ लेना ...पर मैं नज़र अंदाज़ करता गया ....उस नंबर के बारे में अपनी क्लास के सभी ४७ लड़कों से पूँछताछ की ... किसी को कुछ नही पता ....साथ रहने वाले १६-१७ लड़कों में से जिन पर ज्यादा शक था उन से गहरी पूँछताछ की गयी ...लेकिन उन्होंने उतनी ही गहराई से जवाब दिया ...नही हम नही हैं ....

१५ दिन हो गए .....ये खेल चलते चलते ...रहा ना गया क्लास की लड़कियों से फ़ोन करके पूँछा ....नही हमे नही पता नही जानते ....उनसे ये जवाब मिला ..... उन्होंने उल्टा सवाल दाग दिया ...पर माजरा क्या है ....उन्हें माजरा बताया गया ..... कहीं से कोई सुराग नही मिल रहा था उस नंबर का ...फिर भी मुझे यकीन था कि ये सब साथ रहने वाले १६ लड़कों में से किसी की कारिस्तानी है ....

पता नही मेरे पीछे पींछे क्या खेल खेला जा रहा था .....अगले दिन क्लास की लड़की का फ़ोन आया कि वो उस नंबर को जानती है ...वो एक लड़की का नंबर है ....मैंने पूँछा कौन हैं ? ...सॉरी बताने से मना किया है ....साथ खड़े रूम पार्टनर इंदरजीत ने फ़ोन लिया ...पूँछा ...कौन है ?बी.टेक. की है या एम.सी.ए. की ....नही एम.सी.ए. की नही है .....

धीरे धीरे पूरे के पूरे १६-१७ लड़के मेरे कमरे में आ गए ..... ओये बल्ले बल्ले ....मजे आ गए अब तो ....अब तो बॉय फ्रेंड बन गया ....काश हमे भी कोई चाहता .....हमे भी कोई एस.एम.एस. करता ....वगैरह वगैरह ....जो जितना बोल सकता था बोला ....ट्रीट ट्रीट ....अब तो अनिल को ट्रीट देनी पड़ेगी ...और जबरन मुझे पकड़ की में ले गए और और अपने अपने पेट की पूरी हसरतें निकाली ..........और मेरे पर्स को हलाल कर दिया ....


आज शाम को ७ बजे फलां रेस्टोरेंट में आ जाना में आप से मिलना चाहती हूँ ....ये गुमनाम नंबर से एस.एम.एस. आया .....लड़कों ने देखा ...जा मिल ले भाई ....पता तो चले कौन है ? शाम को ४ बजे किसी दूसरे गुमनाम नंबर से कॉल आयी ....अभद्र व्यवहार और होस्टल में दी जाने वाली गलियों सहित जनाब बोल रहे थे ...तेरा जो चल रहा है वो सब पता चल गया है मुझे ....बहुत एस.एम.एस. ---एस.एम.एस. खेल रहा है .....साले वो मेरी बहन है ...तेरे हाथ पैर तो तोड़ने ही पड़ेंगे ....

मैं अवाक रह गया ये सब सुन .....अंत में मेरे मुंह से यही आवाज़ निकली ठीक है जो करना है कर लो ....और मैं चादर तान बिस्तर पर लेट गया .....बाकी के सभी लड़के एक एक कर मेरे कमरे में आने लगे ...कोई गिटार बजाता हुआ ...तो कोई गाना गाता हुआ .....कमरे में आकर पूरा डराने वाला माहौल पैदा करने लगे .... यार वो लड़की का भाई है ...पता नही कौन सी लड़की है और कौन सा भाई .....यार तू शाम को मिलने मत जाना अगर वो वहाँ आ गया तो खामखाँ मारपीट करे ....झगडा हो ....

मंगलवार होने के कारण मुझे शाम को मन्दिर जाना था ...जो मैं हर मंगलवार को जाता था ... यार एक दिन मन्दिर नही जायेगा तो क्या हो जाएगा ...एक लड़का बोला ....मैं किसी से डरता नही हूँ और मैंने ख़ुद कुछ नही किया समझे ....अब मैं देखना चाहता हूँ कि उस रेस्टोरेंट में कौन सा गुंडा आता है ....
शाम को मन्दिर गया और उसके बाद रेस्टोरेंट गया ....आधा घंटे इंतज़ार करने के बाद जब कोई नही आया ...ना लड़की और न उसका भाई तो मैंने रूम पार्टनर इंदरजीत को कॉल किया ....... और वहाँ के हालातों से अवगत कराया......तू यहाँ आ जा हम सब समझाते हैं .....तू गया ही क्यों ...वापस आ जा ....

उधर मेरे पीछे क्लास की लड़की को इंदरजीत ने फ़ोन किया कि बात कुछ ज्यादा ही बिगड़ गयी वो वहाँ रेस्टोरेंट पहुँच गया .....मजाक कुछ ज्यादा ही हो गया ....लड़की बोली कि में वहां जाती हूँ उसे समझाती हूँ सारी बात .... नही तुम रहने दो हम देख लेंगे .....लौटते वक्त रास्ते में धीरे धीरे मैं सब समझ गया की असली बात क्या है ...कोई एक नही सब मिलकर ये खेल खेल रहे थे .....असलियत पता चलती भी तो चलती कैसे ...

रूम पर आते ही सब मिलकर सॉरी सॉरी कहने लगे ....बात कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी .....हम सब मिलकर ही ये एस.एम.एस. कर रहे थे ....नई सिम ली थी जो सिर्फ़ एस.एम.एस. करने के वक्त ही मोबाइल में डाली जाती थी .... मैं चुपचाप वहाँ से उठा और अपनी क्लास के दूसरे दोस्तों के यहाँ चला गया .....

इंदरजीत और ३-४ लड़के वहां आ गए ...माफी मांगने लगे .....मैंने कोई बात नही की .....यार हमे नही पता था की बात इतनी सीरियस हो जायेगी .....यार तुम जो कर रहे थे करते रहते ...लड़की को शामिल करने की क्या जरूरत थी ....विश्वास जीतने के लिए ना.....यार इंदरजीत तुझसे तो ये उम्मीद नही थी .....तूने तो विश्वास तोडा है ..... डरा रहे हो धमका रहे हो ....मन्दिर जाने से मनाकर रहे हो ...झूठी कसमे खा रहे हो ....क्या ये मजाक है ? ....

सभी लड़के २ घंटे तक वही डेरा जमाये रहे मांफी मांगते रहे ....हम अपनी गलती मानते हैं ....कि हमे लड़की को शामिल नही करना चाहिए था ........उधर क्लास की लड़की का फ़ोन आया ...सॉरी बोलने लगी ....रोने लगी ....अपने इस हथियार का उपयोग लडकियां बहुत ज्यादा करती हैं ....मैंने समझाया कि मैं तुम्हे हमेशा अपनी बड़ी बहन की तरह समझता था ...और तुमने ऐसा किया ....

सभी सॉरी बोलते रहे ...पूरे २-३ दिन तक मैंने किसी से बात नही की .... अगली रात सब मुझे जबरन उठा कर केन्टीन ले गये .....वहाँ ले जाकर बिठा दिया ....बोलने लगे असली बात ये है कि तू इस लिए खफा है कि वो सचमुच लड़की नही थी .... यार देख लड़की तो हम दिला नही सकते ...हाँ खिला पिला सकते हैं ....और उनकी इन बातों पर मैं हँस पड़ा .....फिर वही गपशप ...फिर वही सिगरेट का धुंआ ....और अपने अपने पेट की हसरतें निकाली गयी .....पर इस बार मेरा पर्स हलाल नही हुआ ....

अब जब भी वो वाक्य याद आता है तो ...दोस्तों का साथ और होस्टल के दिन याद आ जाते हैं ...और हाँ उन सब का खुरापाती दिमाग भी मैं कभी नही भूलता

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खुश होता हूँ ये देख कि एक्सपायरी डेट अभी बाकी है

>> 03 February 2009

जब आँखें थक जायें तो आँखों को बंद कर लेना चाहिए ....क्या पता बंद आँखों से कोई हसीन ख्वाब दिख जाये और मन को सुखद अनुभूति हो ...
इसी सुखद अनुभूति के साथ मैंने अपनी आँखें बंद की ....पता है मुझे तुम दिखायी दीं .... कहीं ऐसा तो नही कि तुम्हे देखने से ज्यादा सुखद कुछ लगता ही ना हो ......

हाँ पता है तुम अब यही कहोगी ...क्या तुमने अभी तक बाइक चलाना नही सीखी ....तुम्हारा कुछ नही हो सकता ...कैसे लड़के हो ....पर क्या करूँ तुम्हारी स्कूटी के पीछे की सीट मुझे अब भी बाइक चलाना सीखने से ज्यादा सुखद लगती है .....

अच्छा लो मैं हार गया ...तुम जीती ...हाँ मैं सीखने की कोशिश करूँगा .....अच्छा अब तुम मुस्कुरा क्यों रही हो ....अच्छा अब तुम यही कहना चाहती हो कि मैं हमेशा हार मान लेता हूँ .... हाँ हाँ पिछली गोल गप्पा कॉम्पटीशन तुमने ही जीती थी .....

पर अब गोल गप्पे देखता हूँ तो भी उन्हें खाने का मन नही करता ....तुम अब पास खड़े होकर कॉम्पटीशन नही करती .....सच कहूँ तुमसे हारकर ही मुझे खुशी मिलती है ....

पता है अब यही कहोगी बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे ....पर अब मैंने कई दिनों से मोबाइल भी रीचार्ज नही कराया ..... वो तुम्हारे रीचार्ज कराये हुए ४२ रुपये अभी तक वैसे ही पड़े हैं ......

तुम्हारा खरीदा हुआ मैगी का पैकेट अभी भी रसोई में रखा हुआ है ....रोज़ मेरी आँखों के सामने आता है ....चिढाता है ....और मैं खुश होता हूँ ये देख कि एक्सपायरी डेट अभी बाकी है ....

सुनिए एक बहुत ही खूबसूरत गीत ..... जिसके बोल हैं ...
सबसे पीछे हम खड़े ( सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें )

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मैं अपनी बात हिन्दी में कहूँगा जिसकी गरज पड़ेगी वो सुनेगा

>> 02 February 2009

मैं अपनी बात अपनी मातृ भाषा हिन्दी में कहूँगा जिसकी गरज पड़ेगी वो सुनेगा ....सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) रेलवे स्टेशन पर हिन्दी से सम्बंधित कई बोर्ड लगे हुए थे .....जो कि हमारे स्वतंत्रता सैनानियों की कही हुई पंक्तियाँ थी ....

रेलवे आरक्षण खिड़की के सामने पंक्ति में खड़ा हुआ मैं यही पंक्तियाँ पढ़ रहा था ....जो कि हमारे महान स्वतंत्रता के दीवानों ने कही थी .... इन्ही पंक्तियों में खोया हुआ मेरा ध्यान अचानक से टूटा ......

यार हिन्दी में फॉर्म भर कर क्यों लेकर आते हो ..... ठीक से समझ भी नही आता ... ..आरक्षण करने वाले क्लर्क ने खिड़की पर पहुंचे पच्चास वर्षीय ताऊ से कहा ..... अरे बाबू जी ज़रा देख लेओ ...बड़ी देर से लाइन में खडों हूँ ....
जाओ पहले फॉर्म ठीक से इंग्लिश में भर के लेकर आओ ....किसी से भर वा लो ....

ध्यान टूटा ... फिर मैंने सोचा कहीं मुझे अफ़सोस तो नही हो रहा कि मैं हिन्दी में कविता लिखता हूँ .... अरे नही नही .....मन ने दिमाग को समझाया .....धैर्य रख वैसे भी ये आरक्षण करने वाला तेरी कविता सुनने के लिये नही बैठा ....

मेरी एक दोस्त बताती है कि उसकी अंग्रेजी अच्छी होने के पीछे एक वजह है ...कि वो जिस स्कूल में पढ़ती थी उसमे हार्ड एंड फास्ट रुल था कि अगर कोई बच्चा स्कूल के समय में हिन्दी बोलता हुआ पाया गया तो उसके गले में पूरे दिन "I am a fool " का बोर्ड लटका दिया जाता था .....और किसी में इतनी हिम्मत नही थी कि वो सज़ा झेल पाये .....मसलन अंग्रेजी की तो बल्ले बल्ले ......

दूर खड़ी अंग्रेजी .....सहमी सी हिन्दी की खिल्ली उड़ा रही होती होगी शायद उस दौरान ....कहती होगी देखा ....मुझ से पंगा मत लियो ...वरना जो रही सही कसर है वो भी निकाल दूँगी .....

इन स्कूल में पढ़े बच्चे गज़ब की अंग्रेजी बोलते हैं ...हाँ हिन्दी के अक्षर टेड़े मे॰ढे बनते हैं बस ..... तो क्या हुआ अगर मात्राएँ ग़लत चढ़ जाए या लगे ही ना ..... उन्हें हिन्दी सबसे खतरनाक सब्जेक्ट लगता है ....

मसलन हिन्दी उन्हें याद आती होगी उस रोचक किस्से के साथ कि फलां दिन उस लड़के या लड़की के गले में वो बोर्ड टंगा था ....हमे कितना मजा आया था ....

फिर ऐसे ही बच्चे ....किशोर ...युवा कहते हैं ...."You write in hindi ...thats very nice ....keep it up buddy " ......
फिर से मुझे सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन पर टंगा वो बोर्ड याद आता है ....मैं अपनी बात अपनी मातृ भाषा हिन्दी में कहूँगा जिसकी गरज पड़ेगी वो सुनेगा...

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