और इस तरह उनकी प्रेम कहानी शुरू हुई (अन्तिम भाग)

>> 21 March 2009

इस अंतिम भाग को पढने से पहले कृपया इस कहानी का पहला और दूसरा भाग पढ़ लें ....पहला भाग और ....दूसरा भाग

धीरे-धीरे समय बीतता गया और समय के साथ क्लास के साथियों में स्नेह भी बढ़ता गया । इन सब से ज्यादा जो बढ़ा वो था रागिनी का सिद्धांत के लिए प्यार । सिद्धांत तो कभी प्रोजेक्ट रिपोर्ट या कोई फाइल बनाता ही नही था । जबकि जमा करना का समय आ चुका था ।

एक दिन जब सिद्धांत कंप्यूटर लैब में आया तो अपने कंप्यूटर के पास एक सुंदर सी फाइल रखी हुयी देखता है । उसने जब उसे खोल कर देखा तो दंग रह गया । उस फाइल के पहले पेज पर उसका नाम लिखा हुआ था । उसने पूरी फाइल खोल कर देखी । सुसज्जित लिखावट के साथ प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार थी । उसने पास ही बैठी प्रिया से पूँछा की ये फाइल किसकी है । उसने फाइल खोल कर देखी और कहा की नाम तो तुम्हारा ही लिखा है । तुम्हारी ही है फ़िर तो । प्रिया ने कहा लेकिन मैंने तो आज तक कोई फाइल नही बनायीं । सिद्धांत बोला

लिखावट तो बड़ी साफ़ है । प्रिया बोली
पता नही किसने बना दी ? सिद्धांत बोला
सांता क्लाज आए होंगे और रात को बनाकर रख गए होंगे । पास ही खड़े विवेक ने मुस्कुराते हुए कहा एक मिनट लिखावट तो रागिनी की लग रही है । प्रिया बोली
अच्छा उसकी लिखावट है । सिद्धांत बोला
प्रिया : शायद
दूर बैठी रागिनी से सिद्धांत जाकर पूँछता है । ये फाइल तुमने बनायीं है क्या ?
नही मैंने तो नही बनायीं । रागिनी ने कहा

अब जिसने भी बनायीं है । किसी न किसी ने तो मेहनत की ही है । तुम रख लो । प्रिया ने कहा रागिनी ने पिछले पन्द्रह दिन से काफ़ी मेहनत की थी इस फाइल को बनाने के लिए । वो जानती थी की सिद्धांत तो बनाने से रहा । क्लास के बाद जाते हुए सिद्धांत वो फाइल अपने पास रख लेता है । इस तरह से कभी फाइल तो कभी नोट्स और कभी कुछ और जो रागिनी से बन पड़ता वो गुपचुप कोशिशें करती रही ।

कहते हैं न कि सही दिशा में की गई कोशिशें एक दिन रंग जरूर लाती हैं । इस तरह की गई कोशिशों के साथ वक्त बीतता गया । अब बी सी ए की अन्तिम साल थी । जिसमे सिद्धांत काफ़ी जद्दो जहद के बाद पहुँचा था । प्रोग्रामिंग में दक्षता होने के बावजूद वो उसी विषय में दो बार कोशिश करने के बाद उतीर्ण हुआ । सभी शिक्षक इसी बात से हैरान थे की आख़िर वजह क्या है ? सिद्धांत तो काफ़ी कुशल छात्र है फिर भी उतीर्ण नही हो पाता ।

सालाना प्रतियोगिता आयोजित की गयी । इस प्रतियोगिता में प्रोग्रामिंग के माध्यम से प्रोजेक्ट बनाना था और सबसे अच्छे प्रोजेक्ट को पुरुस्कार देने की घोषणा की गयी । यही वो अवसर था जब सबकी जुबान पर ताले लग गए । प्रतियोगिता में सिद्धांत के प्रोजेक्ट को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया । उप विजेता के रूप में रागिनी को पुरूस्कार मिला । सभी शिक्षक सिद्धांत के लिए बहुत खुश थे । रागिनी तो सिद्धांत के लिए बहुत ही ज्यादा खुश थी । रागिनी शुरू से ही जानती थी की सिद्धांत एक कुशाग्र बुद्धि का लड़का है ।

अब रागिनी की गुपचुप की गयी कोशिशों के रंग लाने का वक्त आ चुका था । कुछ दिनों बाद सिद्धांत की तबियत कुछ ज्यादा ही ख़राब हो गयी । उसे अस्पताल में भरती कराया गया । क्लास के सभी साथी सिद्धांत को अस्पताल देखने गए । लेकिन रागिनी के लिए कोई भी ऐसा दिन शेष न रहा जब वो सिद्धांत को देखने अस्पताल ना गयी हो । करीब एक महीने तक वो लगातार अस्पताल जाती रही । सिद्धांत के लिए रागिनी की चाहत से सभी वाकिफ हो चुके थे । लेकिन सिद्धांत फिर भी खामोश था ।

सिद्धांत फिर से इंस्टिट्यूट आने लगा । एक दिन जब सिद्धांत कंप्यूटर लैब में अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था तभी पास ही के कंप्यूटर के पास राखी एक किताब पर सिद्धांत की नज़र गयी । किताब प्रोग्रामिंग की थी तो सिद्धांत किताब को खोल कर देखने लगा । किताब रागिनी की थी । अभी कुछ पन्ने ही इधर उधर किये होंगे तभी सिद्धांत की नज़र एक पर्ची पर पड़ती है ।

ये कोई ऐसी वैसी पर्ची नही थी ये वही पर्ची थी जो आगरा भ्रमण के लिए पैसे जमा कराने के बाद सिद्धांत के ना से रागिनी को मिली थी । उस पर्ची को देखने के बाद सिद्धांत को समझने में ज़रा भी देर नही लगती की उसका किराया उस वक्त रागिनी ने ही जमा किया था ।

उसके साथ ही उसमे एक फोटो भी मिला जिसमे रागिनी और सिद्धांत पास-पास बैठे हुए थे । उस समय सिद्धांत ने वो दोनों उसी किताब में रख दिए और अपना काम करने लगा । अगले दिन इंस्टिट्यूट की छत पर सभी ठण्ड होने के कारण धुप सेंक रहे थे । सब आपस में बातें कर रहे थे । बातें ख़त्म होने पर कुछ देर बाद सब धीरे-धीरे जाने लगे । तभी सिद्धांत ने रागिनी से कहा की ज़रा रुकना मुझे तुमसे कुछ बात करनी है ।


हाँ सिद्धांत क्या बात है ? रागिनी ने कहा
क्या तुम मुझ से प्यार करती हो ? सिद्धांत ने रागिनी से पूँछा
नही , नही तो । घबराते हुए रागिनी ने कहा
तो फिर ये सब क्यों करती हो ? सिद्धांत बोला
रागिनी : क्या ?

यही सब कभी तुम मेरे किराये के पैसे जमा कर देती हो और बताती नही । कभी तुम फाइल बनाकर ले आती हो और कभी कुछ । लगातार महीने तक मुझे अस्पताल देखने आती हो । क्यों ? सिद्धांत गुस्से के लहजे में बोला
अगर कुछ नही है तो ये सब काम करना छोड़ दो । ये सब मुझे बिल्कुल पसंद नही । सिद्धांत बोला
उसके बाद सिद्धांत वहाँ से चला गया । सिद्धांत ने यह सब कह तो दिया लेकिन सिद्धांत सब कुछ जानता तो था ही

आज सिद्धांत का जन्म दिन था और वो अपने दोस्त से मिलने घर से बाहर गया हुआ था । रागिनी ने बधाई देने के लिए सिद्धांत को फ़ोन किया और जब सिद्धांत से बात नही हुयी तो वो सिद्धांत के घर उससे मिलने के लिए चली गयी । सिद्धांत के वहां न मिलने पर उसके घर पर ही जन्म दिन का तोहफा रख आयी । जब सिद्धांत घर पर लौट कर आया तो उसे सब पता चला ।

अगले दिन जब सिद्धांत इंस्टिट्यूट गया तो उस दिन रागिनी छत पर अकेली थी । रागिनी थोडी गुमसुम , थोडी परेशान सी खड़ी थी । सिद्धांत रागिनी के पास पहुँचता है ।

ये सब क्या है ? तुमने मेरे घर फ़ोन किया था और वहां तोहफा छोड़ कर आयी थी । सिद्धांत ने कहा
रागिनी घबरा गयी
तुमसे मैंने मन किया था न कि ये सब मुझे पसंद नही । सिद्धांत बोला
साफ़ और सीधी बात तुम कर नही सकती हो तो इस सब कोई जरूरत नही । सिद्धांत ने कहा
ऐसा क्या हुआ ? रागिनी बोली
क्यों तुम मुझ से प्यार करती हो क्या जो ये सब कर रही हो । सिद्धांत बोला
मुझे चाहती हो क्या ? सिद्धांत ने अपना सवाल फिर दोहराया
रागिनी : हाँ
अच्छा तो उस दिन वो सब क्या था ? उस दिन तो कुछ और ही कह रही थी । सिद्धांत ने कहा
मैं घबरा गयी थी और तुम इतने गुस्से में जो थे । रागिनी बोली

देखो रागिनी तुम्हे मेरे सारे हालत पता हैं ...सिद्धांत बोला
आज मैं कुछ भी नहीं हूँ और ना ही हाल फिलहाल मुझे कोई अच्छे आसार नज़र आते ...आज के समय पर तुम मेरे लिए एकदम उचित लड़की हो ....तुमसे बेहतर आज के समय में मैं सोच भी नहीं सकता

तुम बहुत अच्छा विकल्प हो मेरे लिए ...और ऐसा मैं कोई तुमसे प्यार नहीं करता ...सिद्धांत ने कहा
रागिनी बस खामोश सब सुन रही थी
और अगर इन सब बातों को दरकिनार कर भी दिया जाए तो क्या तुम में इतनी हिम्मत है की तुम अपने घर वालों के विरोध के बावजूद भविष्य में मेरे साथ अंतरजातीय विवाह कर सको ...सिद्धांत ने कहा

बोलो है इतनी हिम्मत ...सिद्धांत बोला
कुछ सोचते हुए, मुझे कुछ वक़्त चाहिए सोचने के लिए ...रागिनी ने कहा ....
कितना वक़्त सिद्धांत बोला
एक हफ्ता रागिनी बोली
ठीक है चलो देखते हैं ...सिद्धांत ने कहा
और फिर दोनों क्लास करने के लिए चल दिए

करीब ३-४ दिन बाद रागिनी सिद्धांत के पास आई ...सिद्धांत इंस्टिट्यूट के बाहर सिगरेट पी रहा था ....
मैंने काफी सोचा और सोचने के बाद ही तुमसे बोल रही हूँ ...और चाहे कैसी भी दशा हो ...मैं तुमसे शादी करुँगी ....रागिनी ने कहा

एक बात और कहूं ...सिद्धांत बोला
रागिनी : वो क्या
मुझसे कभी सिगरेट छोड़ने के लिए मत कहना क्योंकि वो मैं नहीं कर पाऊंगा ...सिद्धांत बोला
हाँ वो तो मैं देख ही रही हूँ ...रागिनी मुस्कुराते हुए बोली

इस तरह का प्यार का एग्रीमेंट शायद ही पहले किसी प्यार करने वाले ने किया हो प्यार करने से पहले ...

खैर कुछ भी हो दो इंसानों सिद्धांत और रागिनी की प्रेम कहानी शुरू हो गयी

7 comments:

hem pandey 21 March 2009 at 15:36  

आपके लेखन और ब्लॉग का प्रशंसक हूँ. किन्तु यह पूरी कहानी, कहानी कम केवल प्रेम प्रसंग अधिक लगा.कृपया मेरी आलोचना को अन्यथा न लें.

अनिल कान्त : 21 March 2009 at 16:01  

दोस्त अब क्या करुँ ...ये दास्ताँ सच्ची थी ....हू-ब-हू जो जो हुआ वो लिख दिया ....शायद सच्ची दास्तान प्रेम प्रसंग ही होती है :)
इसमें कुछ भी मेरा बनाया हुआ नहीं था

दिगम्बर नासवा 21 March 2009 at 16:03  

कहानी दिलचस्प है .........
पर अंत में शायद कुछ ज्यादा ही kathor हो गया sidhant की taraf से, मुझे aisaa लगा.
पर जो भी है.....कहानी jordaar है मान गए anil जी

आलोक सिंह 21 March 2009 at 16:53  

मैंने आज ही इस कहानी के तीनो खंडो को पढ़ा और एक साँस में पूरा पढता चला गया .
वाकई बहुत अच्छी प्रेम कहानी है , सिद्धांत और रागिनी का ये प्रेम बना रहे ,
पर हमने भी कॉलेज टाइम में बहुत प्रेम कहानिया देखी है , पर शादी तक एक-आध ही पहुँच पाई ,
कहानी १० वी -१२ वी से शुरु होकर ऍम सी ए, ऍम बी ए तक चली, पर उसके बाद जब उन्होंने सपनो की दुनिया से हकीकत की दुनिया में कदम रखा तो बदल गए .

neeshoo 21 March 2009 at 17:52  

अनिल भई । कहानी पढ़कर मैं बहुत खुश हूँ । जो दोनों मिल गये कहीं दुखान्त होता तो मजा किर किरा हो जाता ,

श्याम सखा 'श्याम' 24 March 2009 at 10:30  

मैने कमेण्ट लिखा है पहुंचा या नहीं
श्याम सखा‘श्याम;

श्याम सखा 'श्याम' 24 March 2009 at 10:38  

पहले दो भाग सुन्दर थे लेकिन अन्तिम लड़खड़ा गया।सच्ची घटना लिखना जरूरी नहीं लेखक के पास कल्पना कि उड़ान का शस्त्र तो होता ही है।अन्तिम भाग पर गौर करें।हां आपके ब्लाग पर आकर पता लगा कि ब्लॉग पर कहानी के भी पाठक है।मैं भी कहानियां पोस्ट करता हूं अपने ब्लॉग पर.मेरे ब्लॉग
http://gazalkbahane.blogspot.com/
दो गज़ल प्रति सप्ताह वज्न सहित
http://katha-kavita.blogspot.com
दो मुक्त-छंद कविता व एक कथा या लघु कथा- लोक-कथा हर सप्ताह

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